पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

चालीसा

श्री गोरक्ष चालीसा — सम्पूर्ण शिवगोरक्ष सम्पादित संस्करण

आपके दिए 44-पाठ-इकाई वाले गोरख चालीसा संस्करण का देवनागरी पाठ और सरल हिन्दी व्याख्या।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

आरम्भिक दोहा

गणपति गिरिजा पुत्र को, सिमरूँ बारम्बार। हाथ जोड़ विनती करूँ, शारद नाम अधार॥

अर्थ

भक्त गिरिजा-पुत्र गणेश का स्मरण करता है और हाथ जोड़कर शारदा का सहारा लेकर प्रार्थना आरम्भ करता है.

व्याख्या

गणेश और शारदा का संयुक्त स्मरण शुभ आरम्भ तथा विवेकपूर्ण वाणी की अभिलाषा प्रकट करता है; यह अपने-आप में किसी प्राचीन वैदिक मन्त्र का प्रमाण नहीं है.

चौपाई 1

जय जय जय गोरख अविनाशी, कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी।

अर्थ

गोरख को अविनाशी मानकर उनके गुरु-रूप प्रकाश और कृपा की याचना की जाती है.

व्याख्या

‘अविनाशी’ गुरु की आध्यात्मिक महिमा का भक्तिपरक विशेषण है, किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के शरीर के अमर होने का प्रमाण नहीं.

चौपाई 2

जय जय जय गोरख गुणज्ञानी, इच्छा रूप योगी वरदानी॥

अर्थ

गोरख को गुण-ज्ञानी, वरदायी योगी और सामान्य रूप-सीमाओं से परे बताया गया है.

व्याख्या

इच्छानुसार रूप धारण करने की बात धार्मिक स्तुति की भाषा है; इसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक घटना के रूप में न पढ़ें.

चौपाई 3

अलख निरंजन तुम्हरो नामा, सदा करो भक्तन हित कामा।

अर्थ

‘अलख निरंजन’ उपाधि से गोरख को इन्द्रियों की पकड़ से परे और निर्मल सत्य से जोड़ा गया है.

व्याख्या

‘अलख’ सामान्य दृष्टि से अगोचर तथा ‘निरंजन’ निर्मल भाव की ओर संकेत करता है; नाथ परम्पराओं में इनके अर्थ-ज़ोर भिन्न हो सकते हैं.

चौपाई 4

नाम तुम्हारा जो कोई गावे, जन्म जन्म के दुःख नशावे॥

अर्थ

गोरख-नाम के स्मरण को अनेक जन्मों के दुःख से राहत की भक्तिपरक आशा कहा गया है.

व्याख्या

यह भक्त की आशा का काव्यात्मक विधान है; केवल पाठ करने से सभी दुःख अनिवार्यतः मिटेंगे, ऐसा प्रमाणित दावा नहीं.

चौपाई 5

जो कोई गोरक्ष नाम सुनावे, भूत पिशाच निकट नहीं आवे।

अर्थ

गोरख के नाम-स्मरण को भूत-पिशाच आदि के भय से रक्षा की प्रार्थना के रूप में कहा गया है.

व्याख्या

भूत-पिशाच आदि शब्द लोकविश्वास की पृष्ठभूमि में आते हैं; यह किसी अदृश्य खतरे के वैज्ञानिक अस्तित्व का प्रमाण नहीं.

चौपाई 6

ज्ञान तुम्हारा योग से पावे, रूप तुम्हार लख्या ना जावे॥

अर्थ

योगमार्ग को ज्ञान की दिशा और गुरु के तत्त्व को बाहरी आँख से परे बताया गया है.

व्याख्या

पद ज्ञान और योग का सम्बन्ध जोड़ता है, किन्तु इससे कोई विशिष्ट दीक्षा-आधारित अभ्यास स्वतः अनुमत नहीं होता.

चौपाई 7

निराकार तुम हो निर्वाणी, महिमा तुम्हरी वेद बखानी।

अर्थ

गोरख को निराकार और निर्वाणी कहकर उनकी महिमा का वेदों से सम्बन्ध जोड़ा गया है.

व्याख्या

यह चालीसा का धर्मवैचारिक कथन है; किसी विशेष वैदिक मन्त्र में ऐतिहासिक गोरखनाथ का उल्लेख सिद्ध नहीं होता.

चौपाई 8

घट घट के तुम अन्तर्यामी, सिद्ध चौरासी करें प्रणामी॥

अर्थ

गुरु को प्रत्येक जीव के भीतर उपस्थित और चौरासी सिद्धों द्वारा वन्दनीय कहा गया है.

व्याख्या

चौरासी सिद्ध नाथ और व्यापक सिद्ध परम्परा की एक प्रमुख संख्या है, पर विभिन्न सूचियों में नाम बदलते हैं.

भस्म अंग गले नाद विराजे, जटा सीस अति सुन्दर साजे।

अर्थ

भस्म, गले का नाद और जटाएँ गोरख की योगी-वेशभूषा का चित्र बनाती हैं.

व्याख्या

ये चिह्न नाथ योगियों के रूप-वर्णन से जुड़े हैं; सभी मठों और युगों में इनका उपयोग समान रहा हो, यह आवश्यक नहीं.

चौपाई 10

तुम बिन देव और नहीं दूजा, देव मुनी जन करते पूजा॥

अर्थ

कवि गुरु को सर्वोपरि मानता है और देवताओं तथा मुनियों को उनकी स्तुति करते दिखाता है.

व्याख्या

यह भक्त का अपना आस्थामूलक दृष्टिकोण है, सम्पूर्ण हिन्दू परम्परा की सर्वसम्मत पदानुक्रम-सूची नहीं.

चौपाई 11

चिदानन्द सन्तन हितकारी, मंगल करे अमंगल हारी।

अर्थ

गोरख को सन्तों का हितकारी और अमंगल को दूर करने वाला कहा गया है.

व्याख्या

मंगल-अमंगल की भाषा उस नैतिक आशा को व्यक्त करती है कि ज्ञान और संयम संकट में दिशा दे सकते हैं.

चौपाई 12

पूरण ब्रह्म सकल घट वासी, गोरक्षनाथ सकल प्रकासी॥

अर्थ

गुरु की महिमा को सर्वव्यापी ब्रह्म और चैतन्य के प्रकाश से जोड़ा गया है.

व्याख्या

यह भक्तिपरक तत्त्वचिन्तन है; गुरु, शिव और ब्रह्म के सम्बन्ध को सभी नाथ ग्रन्थ एक ही ढंग से नहीं कहते.

चौपाई 13

गोरक्ष गोरक्ष जो कोई ध्यावे, ब्रह्म रूप के दर्शन पावे।

अर्थ

गोरख का ध्यान व्यापक ब्रह्मतत्त्व की पहचान का साधन बताया गया है.

व्याख्या

ब्रह्म-दर्शन की पंक्ति आध्यात्मिक आकांक्षा है; इसे निश्चित रूप से होने वाली इन्द्रिय-अनुभूति न माना जाए.

चौपाई 14

शंकर रूप धर डमरू बाजे, कानन कुण्डल सुन्दर साजे॥

अर्थ

शंकर-संबद्ध रूप, डमरू और योगी के कुण्डलों का वर्णन किया गया है.

व्याख्या

नाथ परम्परा में कुण्डलों का ऐतिहासिक महत्त्व है, किन्तु काव्यचित्र सभी योगियों के वस्त्र-आभूषण का नियम नहीं बनाता.

चौपाई 15

नित्यानन्द है नाम तुम्हारा, असुर मार भक्तन रखवारा।

अर्थ

गोरख को नित्यानन्द-स्वरूप और भक्त-रक्षक कहा गया है.

व्याख्या

असुर-वध जैसी भाषा स्तुति की कथात्मक शक्ति दिखाती है, किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का निर्देश नहीं.

चौपाई 16

अति विशाल है रूप तुम्हारा, सुर नर मुनि जन पावं न पारा॥

अर्थ

गुरु की विराटता को देवता और मुनियों की समझ से भी परे बताया गया है.

व्याख्या

अतिशयोक्ति अनन्त के सामने विनम्रता जगाती है; इसे मापने योग्य जीवनी-सूचना नहीं समझना चाहिए.

चौपाई 17

दीन बन्धु दीनन हितकारी, हरो पाप हम शरण तुम्हारी।

अर्थ

वक्ता दीनजन के हितैषी गुरु की शरण लेकर क्षमा और सहारा माँगता है.

व्याख्या

यहाँ विशाल महिमा से बात व्यक्तिगत शरणागति, अपने दोषों की स्वीकृति और कृपा की याचना तक आती है.

चौपाई 18

योग युक्ति में हो प्रकाशा, सदा करो सन्तन तन वासा॥

अर्थ

गुरु से योग-विवेक का प्रकाश और साधकों के जीवन में मार्गदर्शन माँगा गया है.

व्याख्या

योग-युक्ति का नाम लेना किसी खास श्वास, मुद्रा अथवा गुप्त अभ्यास की विधि नहीं देता.

प्रातःकाल ले नाम तुम्हारा, सिद्धि बढ़े अरु योग प्रचारा।

अर्थ

प्रातः स्मरण को साधना की प्रेरणा और योगमार्ग के प्रसार से जोड़ा गया है.

व्याख्या

प्रातःकाल का स्मरण भक्ति का संदर्भ है, कोई अनिवार्य उपचार या निश्चित अनुष्ठान-नियम नहीं.

चौपाई 20

हठ हठ हठ गोरक्ष हठीले, मार मार वैरी के कीले॥

अर्थ

उग्र संबोधन में गोरख के अटल संकल्प और विरोधी शक्तियों पर विजय की कल्पना है.

व्याख्या

इस उग्र भाषा का नैतिक अर्थ अज्ञान और हानिकारक प्रवृत्तियों पर संयमपूर्ण विजय की प्रार्थना हो सकता है; यह हिंसा-निर्देश नहीं.

चौपाई 21

चल चल चल गोरक्ष विकराला, दुश्मन मान करो बेहाला।

अर्थ

कवि विपत्ति के सामने गोरख के प्रचण्ड रक्षक-रूप को पुकारता है.

व्याख्या

यह रक्षक-स्तुति की काव्यशैली है; इससे प्रतिशोध या शत्रुनाश के किसी कर्मकाण्ड का निर्देश नहीं निकाला गया है.

चौपाई 22

जय जय जय गोरक्ष अविनासी, अपने जन की हरो चौरासी॥

अर्थ

भक्त चौरासी लाख योनियों के जन्म-मरण-चक्र से मुक्ति की प्रार्थना करता है.

व्याख्या

चौरासी लाख योनियों की संख्या धार्मिक ब्रह्माण्ड-कल्पना का हिस्सा है, जीव-विज्ञान की प्रजाति-गणना नहीं.

चौपाई 23

अचल अगम हैं गोरक्ष योगी, सिद्धि देवो हरो रस भोगी।

अर्थ

गोरख को अचल-अगम कहकर भोगासक्ति से मुक्त होने की सहायता माँगी जाती है.

व्याख्या

यह याचना इन्द्रिय-आसक्ति पर विवेक और अनुशासन चाहती है, सामान्य गृहस्थ जीवन के प्रति तिरस्कार नहीं.

चौपाई 24

काटो मार्ग यम की तुम आई, तुम बिन मेरा कौन सहाई॥

अर्थ

भक्त मृत्यु-भय और असहायता के पार जाने के लिए गुरु का सहारा माँगता है.

व्याख्या

यम का उल्लेख पारम्परिक धर्म-कल्पना है; इससे शारीरिक मृत्यु से बचने की गारंटी नहीं मिलती.

चौपाई 25

अजर अमर है तुम्हरो देहा, सनकादिक सब जोहहिं नेहा।

अर्थ

गुरु को अजर-अमर कहकर सनकादि मुनियों के स्नेह का वर्णन किया गया है.

व्याख्या

‘अजर-अमर’ आध्यात्मिक महिमा की भाषा है; इसे निश्चित जन्मतिथि या असाधारण शारीरिक आयु का प्रमाण न मानें.

चौपाई 26

कोटि न रवि सम तेज तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ

गोरख के तेज की तुलना असंख्य सूर्यों से की गई है.

व्याख्या

यह प्रकाश ज्ञान और पवित्रता की काव्यात्मक उपमा है, ऊर्जा की भौतिक माप नहीं.

चौपाई 27

योगी लखें तुम्हारी माया, पार ब्रह्म से ध्यान लगाया।

अर्थ

योगियों को गुरु की लीला पहचानकर परब्रह्म में चित्त स्थिर करते बताया गया है.

व्याख्या

यह विवेक और चिन्तन के सम्बन्ध की ओर इशारा है, किन्तु कोई गुप्त ध्यान-प्रक्रिया नहीं बताता.

चौपाई 28

ध्यान तुम्हारा जो कोई लावे, अष्ट सिद्धि नव निधि घर पावे॥

अर्थ

ध्यान की महिमा के साथ अष्टसिद्धियों और नौ निधियों की पारम्परिक बात आती है.

व्याख्या

सिद्धि और निधि धार्मिक भाषा में आने वाले भाव हैं; पाठक को अलौकिक शक्ति या धन की निश्चित उपलब्धि का दावा नहीं किया जाता.

शिव गोरक्ष है नाम तुम्हारा, पापी दुष्ट अधम को तारा।

अर्थ

‘शिव गोरक्ष’ नाम में गुरु का शिव से सम्बन्ध और पतितों के उद्धार की भावना दिखाई गई है.

व्याख्या

यह नाथभक्ति की धार्मिक पहचान है; इससे शिव और ऐतिहासिक गोरख के सभी संदर्भ एक ही नहीं हो जाते.

चौपाई 30

अगम अगोचर निर्भय नाथा, सदा रहो सन्तन के साथा॥

अर्थ

गुरु को निर्भय, अगोचर और सन्तों का सहचर कहा गया है.

व्याख्या

ये उपाधियाँ आध्यात्मिक साहस, विनम्रता तथा साधक-संगति की भावना पर ज़ोर देती हैं.

चौपाई 31

शंकर रूप अवतार तुम्हारा, गोपीचन्द भर्तृहरि को तारा।

अर्थ

गोरख को शंकर-स्वरूप मानते हुए गोपीचन्द और भर्तृहरि के उद्धार की लोककथाओं का स्मरण है.

व्याख्या

गोपीचन्द और भर्तृहरि की कथाएँ अनेक भाषाओं और क्षेत्रों में बदलती हैं; इनके जीवन-सम्बन्धों की ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है.

चौपाई 32

सुन लीजो गुरु अरज हमारी, कृपा सिन्धु योगी ब्रह्मचारी॥

अर्थ

भक्त कृपासिन्धु ब्रह्मचारी योगी से अपनी प्रार्थना सुनने का अनुरोध करता है.

व्याख्या

‘ब्रह्मचारी’ स्तुति के योगी-आदर्श को दर्शाता है; गोरखनाथ की ऐतिहासिक जीवनी के प्रश्न इससे स्वतः नहीं सुलझते.

चौपाई 33

पूर्ण आस दास की कीजे, सेवक जान ज्ञान को दीजे।

अर्थ

सेवक गुरु से ज्ञान और उचित आशाओं की पूर्ति की याचना करता है.

व्याख्या

इच्छाओं के साथ ज्ञान माँगना महत्त्वपूर्ण है—भक्त केवल बाहरी सफलता नहीं, समझ भी चाहता है.

चौपाई 34

पतित पावन अधम अधारा, तिनके हेतु तुम लेत अवतारा॥

अर्थ

गुरु को उपेक्षित और दोषग्रस्त लोगों का भी सहारा बताकर करुणा की सार्वभौमिकता व्यक्त की गई है.

व्याख्या

करुणा का अर्थ हानिकारक कर्मों को उचित ठहराना नहीं है; सुधार में उत्तरदायित्व भी आवश्यक है.

चौपाई 35

अलख निरंजन नाम तुम्हारा, अगम पंथ जिन योग प्रचारा।

अर्थ

‘अलख निरंजन’ फिर आता है और गहन योगमार्ग की पहचान बनता है.

व्याख्या

यह पुनरावृत्ति अवर्णनीय तत्त्व की ओर लौटाती है; इससे किसी साधना-विधि की दीक्षा नहीं मिलती.

चौपाई 36

जय जय जय गोरक्ष भगवाना, सदा करो भक्तन कल्याना॥

अर्थ

भक्त गोरख के भक्तों और समस्त जन के कल्याण की प्रार्थना करता है.

व्याख्या

यहाँ प्रार्थना व्यक्तिगत आवश्यकताओं से आगे बढ़कर सामूहिक मंगल की ओर जाती है.

चौपाई 37

जय जय जय गोरक्ष अविनाशी, सेवा करें सिद्ध चौरासी।

अर्थ

चौरासी सिद्धों की सेवा और प्रणाम का उल्लेख गुरु की महिमा बढ़ाने के लिए फिर आता है.

व्याख्या

दोहराया गया संकेत नाथों की साझा स्मृति को पुष्ट करता है, पर सिद्धों की एक अपरिवर्तनीय ऐतिहासिक सूची स्थापित नहीं करता.

चौपाई 38

जो पढ़ही गोरक्ष चालीसा, होय सिद्ध साक्षी जगदीशा॥

अर्थ

चालीसा का पाठ करने वाले के लिए सिद्धि की भक्तिपरक आशा व्यक्त की गई है.

व्याख्या

फलश्रुति श्रद्धालु की अपेक्षा प्रकट करती है; उसे सुनिश्चित प्रयोगात्मक परिणाम का दावा न बनाएं.

बारह पाठ पढ़े नित्य जोई, मनोकामना पूरण होई।

अर्थ

मन्दिर-पाठ में बारह बार पाठ और मनोकामना-पूर्ति की पारम्परिक पंक्ति आती है.

व्याख्या

संख्या मूल पाठ का कथन है; शिवगोरक्ष किसी पाठ-संख्या को अनिवार्य नियम नहीं बनाता और परिणाम की गारंटी नहीं देता.

चौपाई 40

और श्रद्धा से रोट चढ़ावे, हाथ जोड़कर ध्यान लगावे॥

अर्थ

श्रद्धापूर्वक रोट अर्पित करने और हाथ जोड़कर ध्यान का भाव चौपाइयों को समाप्त करता है.

व्याख्या

मन्दिर-पाठ में ‘रोट’ का संकेत है, जबकि अन्य पाठों में सामान्य ‘भेंट’ मिलता है; यह पाठभेद है, यहाँ पूजा-विधि नहीं सिखाई गई.

समापन दोहा 1

सुने सुनावे प्रेमवश, पूजे अपने हाथ। मन इच्छा सब कामना, पूरे गोरक्षनाथ॥

अर्थ

पहले समापन दोहे में प्रेम से सुनने-सुनाने और पूजा द्वारा मंगल की आशा व्यक्त है.

व्याख्या

मुख्य शब्द ‘प्रेम’ है—यांत्रिक उच्चारण से अधिक भावपूर्ण सम्बन्ध की महत्ता सामने आती है.

समापन दोहा 2

अगम अगोचर नाथ तुम, पारब्रह्म अवतार। कानन कुण्डल सिर जटा, अंग विभूति अपार॥

अर्थ

दूसरे दोहे में अगम गुरु के दिव्य तत्त्व के साथ कुण्डल, जटा और भस्म का रूप-स्मरण है.

व्याख्या

अगोचर तत्त्व और दिखाई देने वाले योगी-चिह्न साथ आते हैं; यही इस स्तुति की प्रमुख काव्यगत विशेषता है.

सिद्ध पुरुष योगेश्वरों, दो मुझको उपदेश। हर समय सेवा करूँ, सुबह शाम आदेश॥

अर्थ

अन्तिम दोहे में गुरु से उपदेश माँगते हुए ‘आदेश’ अभिवादन का स्मरण है.

व्याख्या

‘आदेश’ नाथ परम्परा का अभिवादन है; इसका उल्लेख दीक्षा या विशेष प्राणायाम-कर्म का निर्देश नहीं है.

सन्दर्भ और उपयोग

आरम्भिक दोहा

मूल: गणपति गिरिजा पुत्र को, सिमरूँ बारम्बार। / हाथ जोड़ विनती करूँ, शारद नाम अधार॥

अर्थ: भक्त गिरिजा-पुत्र गणेश का स्मरण करता है और हाथ जोड़कर शारदा का सहारा लेकर प्रार्थना आरम्भ करता है. व्याख्या: गणेश और शारदा का संयुक्त स्मरण शुभ आरम्भ तथा विवेकपूर्ण वाणी की अभिलाषा प्रकट करता है; यह अपने-आप में किसी प्राचीन वैदिक मन्त्र का प्रमाण नहीं है.

समापन दोहा 1

मूल: सुने सुनावे प्रेमवश, पूजे अपने हाथ। / मन इच्छा सब कामना, पूरे गोरक्षनाथ॥

अर्थ: पहले समापन दोहे में प्रेम से सुनने-सुनाने और पूजा द्वारा मंगल की आशा व्यक्त है. व्याख्या: मुख्य शब्द ‘प्रेम’ है—यांत्रिक उच्चारण से अधिक भावपूर्ण सम्बन्ध की महत्ता सामने आती है. सम्पादकीय सूचना: पहली समापन पंक्ति पाठक ने एक ही पंक्ति में दी थी; “हाथ” के बाद का विभाजन केवल पढ़ने के लिए है, ऐतिहासिक पाठ-समीक्षा नहीं।

समापन दोहा 2

मूल: अगम अगोचर नाथ तुम, पारब्रह्म अवतार। / कानन कुण्डल सिर जटा, अंग विभूति अपार॥

अर्थ: दूसरे दोहे में अगम गुरु के दिव्य तत्त्व के साथ कुण्डल, जटा और भस्म का रूप-स्मरण है. व्याख्या: अगोचर तत्त्व और दिखाई देने वाले योगी-चिह्न साथ आते हैं; यही इस स्तुति की प्रमुख काव्यगत विशेषता है.

समापन दोहा 3

मूल: सिद्ध पुरुष योगेश्वरों, दो मुझको उपदेश। / हर समय सेवा करूँ, सुबह शाम आदेश॥

अर्थ: अन्तिम दोहे में गुरु से उपदेश माँगते हुए ‘आदेश’ अभिवादन का स्मरण है. व्याख्या: ‘आदेश’ नाथ परम्परा का अभिवादन है; इसका उल्लेख दीक्षा या विशेष प्राणायाम-कर्म का निर्देश नहीं है.

प्रसंग और भक्तिपरक अर्थ

यह गोरक्षनाथ आरती का योगदानकर्ता द्वारा दिया गया पाठ है। इसकी प्राचीनतम रचना-तिथि और मूल रचनाकार का निर्धारण नहीं हुआ है। गोरक्ष चालीसा गोरखनाथ से सम्बद्ध नाथ भक्ति परम्परा का हिन्दी/लोकभाषा स्तुतिपाठ है। आरम्भ में गणेश और शारदा का स्मरण करके यह गुरु को अलख निरंजन कहती है। इसमें योगी-वेश, चौरासी सिद्ध, ज्ञान की प्रार्थना, संकट में आश्रय और भक्त की विनम्रता एक साथ आती हैं। 1 5 10

गोरक्ष, शिव और चौरासी सिद्ध

चालीसा गोरक्षनाथ को शिव से जोड़ती है तथा गोपीचन्द और भर्तृहरि का नाम लेती है। नाथ साहित्य में इनके अनेक आख्यान मिलते हैं; किंतु किसी कथा का भक्तिपरक महत्व और उसका इतिहास-सिद्ध होना एक बात नहीं है। चौरासी सिद्धों की सूचियाँ भी सभी क्षेत्रों और ग्रन्थों में बिल्कुल समान नहीं हैं। 5 6

अलख निरंजन और आदेश

अलख सामान्य दृष्टि की पहुँच से परे और निरंजन निर्मल भाव का सूचक है। इन पदों के अर्थ नाथ परम्परा के भीतर भी विभिन्न सन्दर्भों में समझे जाते हैं। समापन में आदेश सम्मान और नाथ सम्बद्ध अभिवादन है; इसे कोई गोपनीय दीक्षा-विधि बताना उचित नहीं। 5 6

भक्तिपरक प्रतिज्ञाएँ और सावधानियाँ

भूत-पिशाच, जन्म-मरण, सिद्धियों, मनोकामना और पाठ-संख्या से जुड़े कथन इस चालीसा की आस्था-भाषा हैं। वे चिकित्सा, धन या अलौकिक प्रभाव के वैज्ञानिक प्रमाण अथवा निश्चित परिणाम नहीं हैं। सामान्य पाठ की व्याख्या से किसी दीक्षा-आधारित योग-विधि की अनुमति भी नहीं मिलती। 10

इस संस्करण में शिवगोरक्ष का मौलिक योगदान

शिवगोरक्ष ने पाठ के रूप-विन्यास, सीमित वर्तनी-संशोधन, रोमन लिप्यन्तरण, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ तथा व्याख्या तैयार की है। चालीसा के मूल शब्द पाठक पहले से बचपन से जानते हैं, अतः इसकी मूल रचना शिवगोरक्ष द्वारा नई लिखी गई है—ऐसा दावा नहीं किया गया है। मूल दिए हुए शब्द स्रोत-सूची में सुरक्षित हैं। 10

पाठान्तर और शोध-सीमाएँ

पाठक ने 44 इकाइयों का सम्पूर्ण स्मृतिपाठ दिया। इसकी कुछ वर्तनी, लोकभाषायी शब्द या विरामचिह्न मन्दिर की वेबसाइट और अन्य पाठों से अलग हो सकते हैं। इस संस्करण में पाठक की शब्दावली सुरक्षित है। पहले समापन दोहे का पंक्ति-विभाजन सम्पादकीय है; उसका ठीक दिया हुआ रूप स्रोत अभिलेख में उपलब्ध है। ऐतिहासिक रचनाकार और सार्वजनिक पुनर्प्रकाशन के अधिकार अब भी अप्रमाणित हैं। 1 3 10

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कुल कितनी पाठ-इकाइयाँ हैं? एक आरम्भिक दोहा, 40 चौपाइयाँ और तीन समापन दोहे—कुल 44 इकाइयाँ।

इस चालीसा के रचयिता कौन हैं? इस स्मृतिपाठ का ऐतिहासिक मूल रचयिता प्रमाणित नहीं है। शिवगोरक्ष का श्रेय सम्पादित संस्करण और व्याख्या तक सीमित है।

क्या सम्पूर्ण चालीसा दी गई है? हाँ, पाठक के दिए हुए सभी शब्द व्याख्या से पहले देवनागरी या रोमन हिन्दी में मौजूद हैं।

अलख निरंजन का अर्थ क्या है? नाथ परम्पराओं में इसके सन्दर्भानुसार विभिन्न अर्थ हैं; यहाँ अगोचर और निर्मल भाव प्रमुख हैं।

चौरासी सिद्ध कौन हैं? सिद्ध योगियों का एक प्रसिद्ध पारम्परिक समूह; अलग-अलग सूचियों में नाम भिन्न मिल सकते हैं।

क्या पाठ से सब इच्छाएँ निश्चित पूरी होती हैं? यह भक्तिपरक आशा है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध निश्चित परिणाम नहीं।

क्या यह योग-अभ्यास सिखाता है? नहीं, इसमें कोई दीक्षा-आधारित या जोखिमपूर्ण अभ्यास-विधि नहीं दी गई है।

क्या यह चालीसा प्रकाशित हो चुकी है? नहीं, स्रोत, अधिकार और विशेषज्ञ समीक्षा के बाद ही प्रकाशन पर अलग निर्णय होगा।

सम्बद्ध शिवगोरक्ष सामग्री

प्रारूप सम्बन्ध (इन पृष्ठों के सार्वजनिक होने का दावा नहीं): सम्बन्धित पाठ — गोरखनाथ; सम्बन्धित पाठ — मत्स्येन्द्रनाथ; सम्बन्धित पाठ — गोरखनाथ आरती (भिन्न रचना); सम्बन्धित पाठ — शैव-नाथ मोक्ष अध्ययन।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Underlying lyric permission confirmed by the founder; supporting document not independently inspected. ShivGoraksh edited educational presentation and original bilingual meanings. No recording or music included.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening doha

    Ganapati Girija putra ko, simarun baarambaar. Haath jod vinati karun, Shaarad naam adhaar.

  2. Chaupai 1

    Jai jai jai Gorakh avinaashi, kripa karo Gurudev prakaashi.

  3. Chaupai 2

    Jai jai jai Gorakh gungyaani, ichchha roop yogi vardaani.

  4. Chaupai 3

    Alakh Niranjan tumharo naama, sada karo bhaktan hit kaama.

  5. Chaupai 4

    Naam tumhara jo koi gaave, janam janam ke dukh nashaave.

  6. Chaupai 5

    Jo koi Goraksh naam sunaave, bhoot pishaach nikat nahin aave.

  7. Chaupai 6

    Gyaan tumhara yog se paave, roop tumhaar lakhya na jaave.

  8. Chaupai 7

    Niraakaar tum ho nirvaani, mahima tumhari Ved bakhaani.

  9. Chaupai 8

    Ghat ghat ke tum antaryaami, siddh chauraasi karein pranaami.

  10. Chaupai 9

    Bhasm ang gale naad viraaje, jata sees ati sundar saaje.

  11. Chaupai 10

    Tum bin dev aur nahin dooja, dev muni jan karte pooja.

  12. Chaupai 11

    Chidaanand santan hitkaari, mangal kare amangal haari.

  13. Chaupai 12

    Pooran Brahm sakal ghat vaasi, Gorakshnath sakal prakaashi.

  14. Chaupai 13

    Goraksh Goraksh jo koi dhyaave, Brahm roop ke darshan paave.

  15. Chaupai 14

    Shankar roop dhar damru baaje, kaanan kundal sundar saaje.

  16. Chaupai 15

    Nityaanand hai naam tumhara, asur maar bhaktan rakhvaara.

  17. Chaupai 16

    Ati vishaal hai roop tumhara, sur nar muni jan paavan na paara.

  18. Chaupai 17

    Deen bandhu deenan hitkaari, haro paap hum sharan tumhari.

  19. Chaupai 18

    Yog yukti mein ho prakaasha, sada karo santan tan vaasa.

  20. Chaupai 19

    Praatahkaal le naam tumhara, siddhi badhe aru yog prachaara.

  21. Chaupai 20

    Hath hath hath Goraksh hatheele, maar maar vairi ke keele.

  22. Chaupai 21

    Chal chal chal Goraksh vikraala, dushman maan karo behaala.

  23. Chaupai 22

    Jai jai jai Goraksh avinaasi, apne jan ki haro chauraasi.

  24. Chaupai 23

    Achal agam hain Goraksh yogi, siddhi devo haro ras bhogi.

  25. Chaupai 24

    Kaato maarg Yam ki tum aai, tum bin mera kaun sahaai.

  26. Chaupai 25

    Ajar amar hai tumharo deha, Sanakaadik sab johahin neha.

  27. Chaupai 26

    Koti na ravi sam tej tumhara, hai prasiddh jagat ujiyaara.

  28. Chaupai 27

    Yogi lakhein tumhari maaya, Paar Brahm se dhyaan lagaaya.

  29. Chaupai 28

    Dhyaan tumhara jo koi laave, asht siddhi nav nidhi ghar paave.

  30. Chaupai 29

    Shiv Goraksh hai naam tumhara, paapi dusht adham ko taara.

  31. Chaupai 30

    Agam agochar nirbhay naatha, sada raho santan ke saatha.

  32. Chaupai 31

    Shankar roop avataar tumhara, Gopichand Bhartrihari ko taara.

  33. Chaupai 32

    Sun leejo Guru araj hamaari, kripa sindhu yogi brahmachaari.

  34. Chaupai 33

    Poorn aas daas ki keeje, sevak jaan gyaan ko deeje.

  35. Chaupai 34

    Patit paavan adham adhaara, tinke hetu tum let avataara.

  36. Chaupai 35

    Alakh Niranjan naam tumhara, agam panth jin yog prachaara.

  37. Chaupai 36

    Jai jai jai Goraksh Bhagvaana, sada karo bhaktan kalyaana.

  38. Chaupai 37

    Jai jai jai Goraksh avinaashi, seva karein siddh chauraasi.

  39. Chaupai 38

    Jo padhahi Goraksh Chalisa, hoy siddh saakshi Jagdeesha.

  40. Chaupai 39

    Baarah paath padhe nitya joi, manokaamna pooran hoi.

  41. Chaupai 40

    Aur shraddha se rot chadhaave, haath jodkar dhyaan lagaave.

  42. Closing doha 1

    Sune sunaave premvash, pooje apne haath. Man ichchha sab kaamna, poore Gorakshnath.

  43. Closing doha 2

    Agam agochar Naath tum, Paarbrahm avataar. Kaanan kundal sir jata, ang vibhooti apaar.

  44. Closing doha 3

    Siddh purush yogeshwaron, do mujhko updesh. Har samay seva karun, subah shaam Aadesh.

स्रोत और सम्पादकीय स्थिति

मुख्य पाठ-स्रोत: पाठक का सम्पूर्ण दिया हुआ पाठ 10; तुलनार्थ मन्दिर पाठ 1, पाठान्तर 2 3 और नाथ परम्परा का शोध 5 6। पाठाधिकार, स्वतंत्र पाठ-मिलान, भाषा-सम्पादन और विशेषज्ञ अनुमोदन लंबित हैं।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

चौपाई 1

मूल: जय जय जय गोरख अविनाशी, कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी। अर्थ: गोरख को अविनाशी मानकर उनके गुरु-रूप प्रकाश और कृपा की याचना की जाती है. व्याख्या: ‘अविनाशी’ गुरु की आध्यात्मिक महिमा का भक्तिपरक विशेषण है, किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के शरीर के अमर होने का प्रमाण नहीं.

चौपाई 2

मूल: जय जय जय गोरख गुणज्ञानी, इच्छा रूप योगी वरदानी॥

अर्थ: गोरख को गुण-ज्ञानी, वरदायी योगी और सामान्य रूप-सीमाओं से परे बताया गया है. व्याख्या: इच्छानुसार रूप धारण करने की बात धार्मिक स्तुति की भाषा है; इसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक घटना के रूप में न पढ़ें.

चौपाई 3

मूल: अलख निरंजन तुम्हरो नामा, सदा करो भक्तन हित कामा। अर्थ: ‘अलख निरंजन’ उपाधि से गोरख को इन्द्रियों की पकड़ से परे और निर्मल सत्य से जोड़ा गया है. व्याख्या: ‘अलख’ सामान्य दृष्टि से अगोचर तथा ‘निरंजन’ निर्मल भाव की ओर संकेत करता है; नाथ परम्पराओं में इनके अर्थ-ज़ोर भिन्न हो सकते हैं.

चौपाई 4

मूल: नाम तुम्हारा जो कोई गावे, जन्म जन्म के दुःख नशावे॥

अर्थ: गोरख-नाम के स्मरण को अनेक जन्मों के दुःख से राहत की भक्तिपरक आशा कहा गया है. व्याख्या: यह भक्त की आशा का काव्यात्मक विधान है; केवल पाठ करने से सभी दुःख अनिवार्यतः मिटेंगे, ऐसा प्रमाणित दावा नहीं.

चौपाई 5

मूल: जो कोई गोरक्ष नाम सुनावे, भूत पिशाच निकट नहीं आवे। अर्थ: गोरख के नाम-स्मरण को भूत-पिशाच आदि के भय से रक्षा की प्रार्थना के रूप में कहा गया है. व्याख्या: भूत-पिशाच आदि शब्द लोकविश्वास की पृष्ठभूमि में आते हैं; यह किसी अदृश्य खतरे के वैज्ञानिक अस्तित्व का प्रमाण नहीं.

चौपाई 6

मूल: ज्ञान तुम्हारा योग से पावे, रूप तुम्हार लख्या ना जावे॥

अर्थ: योगमार्ग को ज्ञान की दिशा और गुरु के तत्त्व को बाहरी आँख से परे बताया गया है. व्याख्या: पद ज्ञान और योग का सम्बन्ध जोड़ता है, किन्तु इससे कोई विशिष्ट दीक्षा-आधारित अभ्यास स्वतः अनुमत नहीं होता.

चौपाई 7

मूल: निराकार तुम हो निर्वाणी, महिमा तुम्हरी वेद बखानी। अर्थ: गोरख को निराकार और निर्वाणी कहकर उनकी महिमा का वेदों से सम्बन्ध जोड़ा गया है. व्याख्या: यह चालीसा का धर्मवैचारिक कथन है; किसी विशेष वैदिक मन्त्र में ऐतिहासिक गोरखनाथ का उल्लेख सिद्ध नहीं होता.

चौपाई 8

मूल: घट घट के तुम अन्तर्यामी, सिद्ध चौरासी करें प्रणामी॥

अर्थ: गुरु को प्रत्येक जीव के भीतर उपस्थित और चौरासी सिद्धों द्वारा वन्दनीय कहा गया है. व्याख्या: चौरासी सिद्ध नाथ और व्यापक सिद्ध परम्परा की एक प्रमुख संख्या है, पर विभिन्न सूचियों में नाम बदलते हैं.

चौपाई 9

मूल: भस्म अंग गले नाद विराजे, जटा सीस अति सुन्दर साजे। अर्थ: भस्म, गले का नाद और जटाएँ गोरख की योगी-वेशभूषा का चित्र बनाती हैं. व्याख्या: ये चिह्न नाथ योगियों के रूप-वर्णन से जुड़े हैं; सभी मठों और युगों में इनका उपयोग समान रहा हो, यह आवश्यक नहीं.

चौपाई 10

मूल: तुम बिन देव और नहीं दूजा, देव मुनी जन करते पूजा॥

अर्थ: कवि गुरु को सर्वोपरि मानता है और देवताओं तथा मुनियों को उनकी स्तुति करते दिखाता है. व्याख्या: यह भक्त का अपना आस्थामूलक दृष्टिकोण है, सम्पूर्ण हिन्दू परम्परा की सर्वसम्मत पदानुक्रम-सूची नहीं.

चौपाई 11

मूल: चिदानन्द सन्तन हितकारी, मंगल करे अमंगल हारी। अर्थ: गोरख को सन्तों का हितकारी और अमंगल को दूर करने वाला कहा गया है. व्याख्या: मंगल-अमंगल की भाषा उस नैतिक आशा को व्यक्त करती है कि ज्ञान और संयम संकट में दिशा दे सकते हैं.

चौपाई 12

मूल: पूरण ब्रह्म सकल घट वासी, गोरक्षनाथ सकल प्रकासी॥

अर्थ: गुरु की महिमा को सर्वव्यापी ब्रह्म और चैतन्य के प्रकाश से जोड़ा गया है. व्याख्या: यह भक्तिपरक तत्त्वचिन्तन है; गुरु, शिव और ब्रह्म के सम्बन्ध को सभी नाथ ग्रन्थ एक ही ढंग से नहीं कहते.

चौपाई 13

मूल: गोरक्ष गोरक्ष जो कोई ध्यावे, ब्रह्म रूप के दर्शन पावे। अर्थ: गोरख का ध्यान व्यापक ब्रह्मतत्त्व की पहचान का साधन बताया गया है. व्याख्या: ब्रह्म-दर्शन की पंक्ति आध्यात्मिक आकांक्षा है; इसे निश्चित रूप से होने वाली इन्द्रिय-अनुभूति न माना जाए.

चौपाई 14

मूल: शंकर रूप धर डमरू बाजे, कानन कुण्डल सुन्दर साजे॥

अर्थ: शंकर-संबद्ध रूप, डमरू और योगी के कुण्डलों का वर्णन किया गया है. व्याख्या: नाथ परम्परा में कुण्डलों का ऐतिहासिक महत्त्व है, किन्तु काव्यचित्र सभी योगियों के वस्त्र-आभूषण का नियम नहीं बनाता.

चौपाई 15

मूल: नित्यानन्द है नाम तुम्हारा, असुर मार भक्तन रखवारा। अर्थ: गोरख को नित्यानन्द-स्वरूप और भक्त-रक्षक कहा गया है. व्याख्या: असुर-वध जैसी भाषा स्तुति की कथात्मक शक्ति दिखाती है, किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का निर्देश नहीं.

चौपाई 16

मूल: अति विशाल है रूप तुम्हारा, सुर नर मुनि जन पावं न पारा॥

अर्थ: गुरु की विराटता को देवता और मुनियों की समझ से भी परे बताया गया है. व्याख्या: अतिशयोक्ति अनन्त के सामने विनम्रता जगाती है; इसे मापने योग्य जीवनी-सूचना नहीं समझना चाहिए.

चौपाई 17

मूल: दीन बन्धु दीनन हितकारी, हरो पाप हम शरण तुम्हारी। अर्थ: वक्ता दीनजन के हितैषी गुरु की शरण लेकर क्षमा और सहारा माँगता है. व्याख्या: यहाँ विशाल महिमा से बात व्यक्तिगत शरणागति, अपने दोषों की स्वीकृति और कृपा की याचना तक आती है.

चौपाई 18

मूल: योग युक्ति में हो प्रकाशा, सदा करो सन्तन तन वासा॥

अर्थ: गुरु से योग-विवेक का प्रकाश और साधकों के जीवन में मार्गदर्शन माँगा गया है. व्याख्या: योग-युक्ति का नाम लेना किसी खास श्वास, मुद्रा अथवा गुप्त अभ्यास की विधि नहीं देता.

चौपाई 19

मूल: प्रातःकाल ले नाम तुम्हारा, सिद्धि बढ़े अरु योग प्रचारा। अर्थ: प्रातः स्मरण को साधना की प्रेरणा और योगमार्ग के प्रसार से जोड़ा गया है. व्याख्या: प्रातःकाल का स्मरण भक्ति का संदर्भ है, कोई अनिवार्य उपचार या निश्चित अनुष्ठान-नियम नहीं.

चौपाई 20

मूल: हठ हठ हठ गोरक्ष हठीले, मार मार वैरी के कीले॥

अर्थ: उग्र संबोधन में गोरख के अटल संकल्प और विरोधी शक्तियों पर विजय की कल्पना है. व्याख्या: इस उग्र भाषा का नैतिक अर्थ अज्ञान और हानिकारक प्रवृत्तियों पर संयमपूर्ण विजय की प्रार्थना हो सकता है; यह हिंसा-निर्देश नहीं.

चौपाई 21

मूल: चल चल चल गोरक्ष विकराला, दुश्मन मान करो बेहाला। अर्थ: कवि विपत्ति के सामने गोरख के प्रचण्ड रक्षक-रूप को पुकारता है. व्याख्या: यह रक्षक-स्तुति की काव्यशैली है; इससे प्रतिशोध या शत्रुनाश के किसी कर्मकाण्ड का निर्देश नहीं निकाला गया है.

चौपाई 22

मूल: जय जय जय गोरक्ष अविनासी, अपने जन की हरो चौरासी॥

अर्थ: भक्त चौरासी लाख योनियों के जन्म-मरण-चक्र से मुक्ति की प्रार्थना करता है. व्याख्या: चौरासी लाख योनियों की संख्या धार्मिक ब्रह्माण्ड-कल्पना का हिस्सा है, जीव-विज्ञान की प्रजाति-गणना नहीं.

चौपाई 23

मूल: अचल अगम हैं गोरक्ष योगी, सिद्धि देवो हरो रस भोगी। अर्थ: गोरख को अचल-अगम कहकर भोगासक्ति से मुक्त होने की सहायता माँगी जाती है. व्याख्या: यह याचना इन्द्रिय-आसक्ति पर विवेक और अनुशासन चाहती है, सामान्य गृहस्थ जीवन के प्रति तिरस्कार नहीं.

चौपाई 24

मूल: काटो मार्ग यम की तुम आई, तुम बिन मेरा कौन सहाई॥

अर्थ: भक्त मृत्यु-भय और असहायता के पार जाने के लिए गुरु का सहारा माँगता है. व्याख्या: यम का उल्लेख पारम्परिक धर्म-कल्पना है; इससे शारीरिक मृत्यु से बचने की गारंटी नहीं मिलती.

चौपाई 25

मूल: अजर अमर है तुम्हरो देहा, सनकादिक सब जोहहिं नेहा। अर्थ: गुरु को अजर-अमर कहकर सनकादि मुनियों के स्नेह का वर्णन किया गया है. व्याख्या: ‘अजर-अमर’ आध्यात्मिक महिमा की भाषा है; इसे निश्चित जन्मतिथि या असाधारण शारीरिक आयु का प्रमाण न मानें.

चौपाई 26

मूल: कोटि न रवि सम तेज तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ: गोरख के तेज की तुलना असंख्य सूर्यों से की गई है. व्याख्या: यह प्रकाश ज्ञान और पवित्रता की काव्यात्मक उपमा है, ऊर्जा की भौतिक माप नहीं.

चौपाई 27

मूल: योगी लखें तुम्हारी माया, पार ब्रह्म से ध्यान लगाया। अर्थ: योगियों को गुरु की लीला पहचानकर परब्रह्म में चित्त स्थिर करते बताया गया है. व्याख्या: यह विवेक और चिन्तन के सम्बन्ध की ओर इशारा है, किन्तु कोई गुप्त ध्यान-प्रक्रिया नहीं बताता.

चौपाई 28

मूल: ध्यान तुम्हारा जो कोई लावे, अष्ट सिद्धि नव निधि घर पावे॥

अर्थ: ध्यान की महिमा के साथ अष्टसिद्धियों और नौ निधियों की पारम्परिक बात आती है. व्याख्या: सिद्धि और निधि धार्मिक भाषा में आने वाले भाव हैं; पाठक को अलौकिक शक्ति या धन की निश्चित उपलब्धि का दावा नहीं किया जाता.

चौपाई 29

मूल: शिव गोरक्ष है नाम तुम्हारा, पापी दुष्ट अधम को तारा। अर्थ: ‘शिव गोरक्ष’ नाम में गुरु का शिव से सम्बन्ध और पतितों के उद्धार की भावना दिखाई गई है. व्याख्या: यह नाथभक्ति की धार्मिक पहचान है; इससे शिव और ऐतिहासिक गोरख के सभी संदर्भ एक ही नहीं हो जाते.

चौपाई 30

मूल: अगम अगोचर निर्भय नाथा, सदा रहो सन्तन के साथा॥

अर्थ: गुरु को निर्भय, अगोचर और सन्तों का सहचर कहा गया है. व्याख्या: ये उपाधियाँ आध्यात्मिक साहस, विनम्रता तथा साधक-संगति की भावना पर ज़ोर देती हैं.

चौपाई 31

मूल: शंकर रूप अवतार तुम्हारा, गोपीचन्द भर्तृहरि को तारा। अर्थ: गोरख को शंकर-स्वरूप मानते हुए गोपीचन्द और भर्तृहरि के उद्धार की लोककथाओं का स्मरण है. व्याख्या: गोपीचन्द और भर्तृहरि की कथाएँ अनेक भाषाओं और क्षेत्रों में बदलती हैं; इनके जीवन-सम्बन्धों की ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है.

चौपाई 32

मूल: सुन लीजो गुरु अरज हमारी, कृपा सिन्धु योगी ब्रह्मचारी॥

अर्थ: भक्त कृपासिन्धु ब्रह्मचारी योगी से अपनी प्रार्थना सुनने का अनुरोध करता है. व्याख्या: ‘ब्रह्मचारी’ स्तुति के योगी-आदर्श को दर्शाता है; गोरखनाथ की ऐतिहासिक जीवनी के प्रश्न इससे स्वतः नहीं सुलझते.

चौपाई 33

मूल: पूर्ण आस दास की कीजे, सेवक जान ज्ञान को दीजे। अर्थ: सेवक गुरु से ज्ञान और उचित आशाओं की पूर्ति की याचना करता है. व्याख्या: इच्छाओं के साथ ज्ञान माँगना महत्त्वपूर्ण है—भक्त केवल बाहरी सफलता नहीं, समझ भी चाहता है.

चौपाई 34

मूल: पतित पावन अधम अधारा, तिनके हेतु तुम लेत अवतारा॥

अर्थ: गुरु को उपेक्षित और दोषग्रस्त लोगों का भी सहारा बताकर करुणा की सार्वभौमिकता व्यक्त की गई है. व्याख्या: करुणा का अर्थ हानिकारक कर्मों को उचित ठहराना नहीं है; सुधार में उत्तरदायित्व भी आवश्यक है.

चौपाई 35

मूल: अलख निरंजन नाम तुम्हारा, अगम पंथ जिन योग प्रचारा। अर्थ: ‘अलख निरंजन’ फिर आता है और गहन योगमार्ग की पहचान बनता है. व्याख्या: यह पुनरावृत्ति अवर्णनीय तत्त्व की ओर लौटाती है; इससे किसी साधना-विधि की दीक्षा नहीं मिलती.

चौपाई 36

मूल: जय जय जय गोरक्ष भगवाना, सदा करो भक्तन कल्याना॥

अर्थ: भक्त गोरख के भक्तों और समस्त जन के कल्याण की प्रार्थना करता है. व्याख्या: यहाँ प्रार्थना व्यक्तिगत आवश्यकताओं से आगे बढ़कर सामूहिक मंगल की ओर जाती है.

चौपाई 37

मूल: जय जय जय गोरक्ष अविनाशी, सेवा करें सिद्ध चौरासी। अर्थ: चौरासी सिद्धों की सेवा और प्रणाम का उल्लेख गुरु की महिमा बढ़ाने के लिए फिर आता है. व्याख्या: दोहराया गया संकेत नाथों की साझा स्मृति को पुष्ट करता है, पर सिद्धों की एक अपरिवर्तनीय ऐतिहासिक सूची स्थापित नहीं करता.

चौपाई 38

मूल: जो पढ़ही गोरक्ष चालीसा, होय सिद्ध साक्षी जगदीशा॥

अर्थ: चालीसा का पाठ करने वाले के लिए सिद्धि की भक्तिपरक आशा व्यक्त की गई है. व्याख्या: फलश्रुति श्रद्धालु की अपेक्षा प्रकट करती है; उसे सुनिश्चित प्रयोगात्मक परिणाम का दावा न बनाएं.

चौपाई 39

मूल: बारह पाठ पढ़े नित्य जोई, मनोकामना पूरण होई। अर्थ: मन्दिर-पाठ में बारह बार पाठ और मनोकामना-पूर्ति की पारम्परिक पंक्ति आती है. व्याख्या: संख्या मूल पाठ का कथन है; शिवगोरक्ष किसी पाठ-संख्या को अनिवार्य नियम नहीं बनाता और परिणाम की गारंटी नहीं देता.

चौपाई 40

मूल: और श्रद्धा से रोट चढ़ावे, हाथ जोड़कर ध्यान लगावे॥

अर्थ: श्रद्धापूर्वक रोट अर्पित करने और हाथ जोड़कर ध्यान का भाव चौपाइयों को समाप्त करता है. व्याख्या: मन्दिर-पाठ में ‘रोट’ का संकेत है, जबकि अन्य पाठों में सामान्य ‘भेंट’ मिलता है; यह पाठभेद है, यहाँ पूजा-विधि नहीं सिखाई गई.

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