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प्रार्थना

गोरक्ष गुरु वन्दना

शिवगोरक्ष संपादित बारह खण्डों की सम्पूर्ण नाथ-गुरु प्रार्थना; हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ और पाठभेद।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

गंगे हर-नर्मदे हर, जटाशङ़्करी हर ऊँ नमो पार्वती पतये हर, बोलिये श्री शम्भू जती गुरु गोरक्षनाथ महाराज की जय, माया स्वरूपी दादा मत्स्येन्द्रनाथ महाराज की जय, नवनाथ चौरासी सिद्धों की जय, भेष भगवान की जय, अटल क्षेत्र की जय, रमतेश्वर महाराज की जय, कदली काल भैरवनाथ जी की जय, पात्र देवता की जय, ज्वाला महामाई की जय, सनातन धर्म की जय, अपने-अपने गुरु महाराज की जय, गौ-ब्राह्मण की जय, बोले साचे दरबार की जय, हर हर महादेव की जय।

अर्थ

समुदाय गंगा-नर्मदा और पार्वतीपति शिव का स्मरण करता है; फिर गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, नवनाथ, चौरासी सिद्ध, अन्य पूज्य नाथ-परम्परा-पुरुषों, गुरुओं और महादेव के जयघोष करता है।

व्याख्या

यह एक संगठित नाथ-प्रार्थना का आरम्भिक जयघोष है, किसी एक प्राचीन संस्कृत श्लोक का नाम नहीं। “नवनाथ” और “चौरासी सिद्ध” पारम्परिक समूह हैं; अलग ग्रन्थों में नामावलियाँ भिन्न हो सकती हैं। “भेष भगवान”, “अटल क्षेत्र”, “पात्र देवता” तथा स्थानीय नामों का प्रसंग नाथ-विशेषज्ञ से जाँचना चाहिए। इस जयघोष में ज्वाला का अर्थ अग्नि की लौ या प्रकाश है। जयघोष श्रद्धा प्रकट करता है; वह अपने आप ऐतिहासिक विवरण का प्रमाण नहीं है।

कपूर्रगौरम् करुणावतारम् संसारसारम् भुजगेन्द्र हारम्। सदा वसन्तम् हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितम् नमामि।।

अर्थ

मैं भवानी सहित भगवान भव को प्रणाम करता हूँ—जो कपूर की तरह गौर, करुणामय, जगत् के सार तथा नागराज को हार रूप में धारण करने वाले हैं और हृदय-कमल में वास करने वाले माने जाते हैं।

व्याख्या

इस नाथ-प्रार्थना में प्रसिद्ध शिव-वन्दना का एक पद समाहित है। कपूर की उज्ज्वलता पवित्रता का रूपक है, सर्पमाला शिव के स्वरूप से जुड़ी है और हृदय-कमल आन्तरिक आराधना को सूचित करता है। “कपूर्रगौरम्” साधारण “कर्पूरगौरं” पाठ से भिन्न है; यहाँ बिना अनुमति बदलाव नहीं किया गया। इसके लिए निश्चित प्राचीन रचयिता या पुराण-स्रोत नहीं बताया गया।

मन्दारमाला कलिनाल कायै कपालमालाङि़्कत कन्थराय। दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय, नमः शिवायै च नमः शिवाय

अर्थ

मन्दार-मालाधारी तथा दिव्य वस्त्रों से सुशोभित शिवा (पार्वती) और कपालमाला तथा दिगम्बर रूप वाले शिव को नमस्कार है।

व्याख्या

यह अर्धनारीश्वरस्तोत्र के पाँचवें श्लोक के एक पाठरूप जैसा है। इसमें देवी के अलंकारों के सामने शिव की वैराग्यमय छवि रखी जाती है। “कलिनाल कायै” और “कन्थराय” प्रचलित “कलितालकायै” और “कन्धराय” से अलग हैं। उपयोगकर्ता के पाठ में “दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय” है, जो मंदिर के HTML पाठ में नहीं दिखाई देता। यह सम्मिलित परम्परागत स्तुति है, गोरक्षनाथ-रचित मूल पद का प्रमाण नहीं।

गोरक्ष बालम् गुरु शिष्य पालम् शेषांहिमालम् शशिखण्ड भालम्। कालस्य कालम् जितजन्म जालम् वन्दे जटालम जगदब्जनालम्।।

अर्थ

गुरु-शिष्य परम्परा के पालक, चन्द्रकलायुक्त ललाट वाले, जटाधारी तथा काल और जन्म-जाल से परे वर्णित गोरक्षनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ। दो कठिन समासों का अर्थ अभी अनिश्चित है।

व्याख्या

“शेषांहिमालम्” और “जगदब्जनालम्” का निर्विवाद समास-विग्रह उपलब्ध पाठों से सम्भव नहीं। “कालस्य कालम्” आध्यात्मिक श्रेष्ठता का काव्य-वर्णन है, शारीरिक अमरता का वादा नहीं।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर! गुरुः साक्षात्परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवै नमः।।

अर्थ

गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के प्रतीकों से स्तुत करके परम सत्य का बोध कराने वाले पूज्य शिक्षक के रूप में नमस्कार किया गया है।

व्याख्या

यह प्रसिद्ध गुरु-वन्दना ShivGoraksh के स्वतंत्र सम्बन्धित पाठ में भी है। यहाँ उसका उपयोग एक बड़ी नाथ-प्रार्थना के अंग के रूप में है, जिससे सम्बन्धित पाठ बदलता नहीं और उसका लेखक गोरक्षनाथ सिद्ध नहीं होता। “गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म” के पाठ में गुरुगीता-परम्पराओं से भिन्नता मिलती है। गुरु-श्रद्धा के साथ विवेक और नैतिक उत्तरदायित्व आवश्यक हैं।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजा मूलं गुरोः पदम् मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलं गुरोः कृपा

अर्थ

गुरु का रूप ध्यान का आधार, चरण पूजा का आधार, वाणी मार्गदर्शन का आधार और कृपा मोक्ष का मूल मानी गई है।

व्याख्या

चार समानान्तर पद ध्यान, पूजा, मन्त्र तथा मुक्ति के क्षेत्र में गुरु के महत्त्व को बताते हैं; वे कोई विस्तृत अनुष्ठान-विधि नहीं देते। “चरण” विनय और श्रद्धा का पारम्परिक प्रतीक हैं। “मोक्ष मूलं गुरोः कृपा” को दिए गए पाठ के अनुसार रखा गया है। इससे दीक्षा या गुप्त अभ्यास के नियम प्रमाणित नहीं माने जाएँगे।

मन्त्र सत्यं पूजा सत्यं सत्यदेव निरन्जनम् गुरुवाक्यं सदा सत्यं सत्यमेकम् परंपदम्

अर्थ

यह खण्ड मन्त्र, पूजा और गुरु के वचन में सत्य का महत्त्व दोहराता है तथा एक परम सत्य की ओर संकेत करता है।

व्याख्या

“सत्य” की पुनरावृत्ति धार्मिक और नैतिक आदर्श दोनों है। गुरु-वचन को सत्य कहने का अर्थ विवेक छोड़ना या अनुचित व्यवहार स्वीकार करना नहीं है। “निरन्जनम्” निर्मल/निष्कलंक तत्त्व का संकेत दे सकता है, लेकिन “सत्यदेव” के साथ इसका निश्चित विभाजन अभी जाँचना चाहिए।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविड़म् त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देव देव!

अर्थ

हे देवदेव! आप ही माता-पिता, बन्धु-मित्र, विद्या और धन-संपदा का आधार तथा मेरे लिए सब कुछ हैं। तीसरी पंक्ति का प्रदत्त शब्द अस्पष्ट है।

व्याख्या

स्वतंत्र प्रचलित पाठ में “त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव” मिलता है, जबकि यहाँ “द्रविड़म्” लिखा है। ‘संपत्ति’ का अर्थ उस तुलनात्मक पाठ पर निर्भर है; यह दावा नहीं कि लिखे हुए “द्रविड़म्” का भी वही प्रमाणित अर्थ है। यह वन्दना ShivGoraksh सम्बन्धित पाठ से भी जुड़ी है।

आकाशे ताडका लिंगम पाताले वटुकेश्वरम् मर्त्ये लोके महाकालम् सर्व लिंगम नमोस्तुते।।

अर्थ

प्रार्थना आकाश, पाताल और मृत्युलोक से सम्बद्ध शिवलिङ्ग स्वरूपों—महाकाल सहित—को प्रणाम करती है।

व्याख्या

“ताडका लिंगम”, “वटुकेश्वरम्” और “महाकालम्” जैसे रूप इसी क्रम में प्रस्तुत हैं। “ताडका” का स्थान-सम्बन्धी या पाठभेद-सम्बन्धी निश्चय नहीं किया गया है। आकाश-पाताल का उल्लेख भक्तिपरक विश्व-दृष्टि है, किसी भौतिक मार्ग या सभी शिवमन्दिरों में समान अनुष्ठान का प्रमाण नहीं।

शेली श्रृंगी शिर जटा झोली भगवा भेष, कानन कुण्डल भस्म लसै, शिव गोरक्ष आदेश।।

अर्थ

श्रृंगी, जटाएँ, भगवा भेष, कानों के कुण्डल और भस्मधारी नाथयोगी की छवि प्रस्तुत करके “शिव गोरक्ष आदेश” कहा गया है।

व्याख्या

श्रृंगी, कुण्डल, जटा और भस्म नाथ-परम्परा के प्रतीक हैं। क्षेत्र-क्षेत्र में नाम और प्रयोग बदल सकते हैं। “आदेश” नाथ-परम्परा का महत्वपूर्ण अभिवादन/अनुमोदन है; यहाँ इसके अर्थ की चर्चा की गई है, कोई गुप्त साधना नहीं बताई गई। यह पाठ के भीतर लोकभाषायी छन्द जैसा खण्ड है।

ऊँकार तेरा आधार तीन लोक में जय-जयकार। नाद बाजे काल भागे, ज्ञान की टोपी, गोरख साजे गले नाद, पुष्पन की माला रक्षा करें, श्री शम्भुजति गुरु गोरक्षनाथ जी बाला।।

अर्थ

ओंकार को आधार मानकर तीनों लोकों में उसकी जयध्वनि की जाती है। नाद, ज्ञान की टोपी, माला और गोरक्षनाथ की रक्षा-प्रार्थना से नाथ-वेश तथा भक्ति की छवि उभरती है।

व्याख्या

यह लयबद्ध वन्दना नादयोग की कोई तकनीकी प्रशिक्षण-विधि नहीं और निश्चित अलौकिक सुरक्षा का वादा भी नहीं। “काल भागे” भय पर विजय का काव्यात्मक भाव है। ॐ/प्रणव पर स्वतंत्र सम्बन्धित पाठ विद्यमान है; उसके उपनिषद्-आधारित विवेचन के स्थान पर इस खण्ड को न रखा जाए।

चार खाणी चार बानी चन्द्र सूर्य पवन पानी एको देवा सर्वत्र सेवा ज्योति पाटले परसो देवा कानन कुण्डल गले नाद करो सिद्धो नाद्कार सिद्ध गुरुवरों को आदेश! आदेश!!

अर्थ

समापन में चार खाणी, चार वाणी, चन्द्र-सूर्य, पवन-पानी और एक दैवी तत्त्व का स्मरण करके सिद्ध गुरुओं को “आदेश! आदेश!!” कहा जाता है।

व्याख्या

“चार खाणी” को भारतीय परम्परा में जन्म की चार श्रेणियों से जोड़ा जाता है, किन्तु नाथ-विशेष अर्थ तथा “चार बानी” को विशेषज्ञ से समझना चाहिए। “ज्योति पाटले परसो देवा” और “नाद्कार” यहाँ अस्पष्ट हैं; उनका मनमाना शब्दार्थ नहीं दिया गया। अंतिम “आदेश” सामूहिक भक्तिपरक अभिवादन है, अनिवार्य शारीरिक अनुष्ठान का आदेश नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित संस्करण: उपयोगकर्ता-प्रदत्त शिवगोरक्ष संपादित सम्पूर्ण नाथ-प्रार्थना, क्रमबद्ध बारह खण्ड। गोरखनाथ मन्दिर का डिजिटल पाठ इस क्रम के अधिकांश भाग की पुष्टि करता है, किन्तु पूरी तरह समान नहीं है। नाथ परम्परा का मंगलोच्चार

भावार्थ: समुदाय गंगा-नर्मदा और पार्वतीपति शिव का स्मरण करता है; फिर गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, नवनाथ, चौरासी सिद्ध, अन्य पूज्य नाथ-परम्परा-पुरुषों, गुरुओं और महादेव के जयघोष करता है। व्याख्या: यह एक संगठित नाथ-प्रार्थना का आरम्भिक जयघोष है, किसी एक प्राचीन संस्कृत श्लोक का नाम नहीं। “नवनाथ” और “चौरासी सिद्ध” पारम्परिक समूह हैं; अलग ग्रन्थों में नामावलियाँ भिन्न हो सकती हैं। “भेष भगवान”, “अटल क्षेत्र”, “पात्र देवता” तथा स्थानीय नामों का प्रसंग नाथ-विशेषज्ञ से जाँचना चाहिए। इस जयघोष में ज्वाला का अर्थ अग्नि की लौ या प्रकाश है। जयघोष श्रद्धा प्रकट करता है; वह अपने आप ऐतिहासिक विवरण का प्रमाण नहीं है।

2. कर्पूरगौर शिव और भवानी की वन्दना

भावार्थ: मैं भवानी सहित भगवान भव को प्रणाम करता हूँ—जो कपूर की तरह गौर, करुणामय, जगत् के सार तथा नागराज को हार रूप में धारण करने वाले हैं और हृदय-कमल में वास करने वाले माने जाते हैं। व्याख्या: इस नाथ-प्रार्थना में प्रसिद्ध शिव-वन्दना का एक पद समाहित है। कपूर की उज्ज्वलता पवित्रता का रूपक है, सर्पमाला शिव के स्वरूप से जुड़ी है और हृदय-कमल आन्तरिक आराधना को सूचित करता है। “कपूर्रगौरम्” साधारण “कर्पूरगौरं” पाठ से भिन्न है; यहाँ बिना अनुमति बदलाव नहीं किया गया। इसके लिए निश्चित प्राचीन रचयिता या पुराण-स्रोत नहीं बताया गया।

3. शिवा और शिव के संयुक्त स्वरूप की स्तुति

भावार्थ: मन्दार-मालाधारी तथा दिव्य वस्त्रों से सुशोभित शिवा (पार्वती) और कपालमाला तथा दिगम्बर रूप वाले शिव को नमस्कार है। व्याख्या: यह अर्धनारीश्वरस्तोत्र के पाँचवें श्लोक के एक पाठरूप जैसा है। इसमें देवी के अलंकारों के सामने शिव की वैराग्यमय छवि रखी जाती है। “कलिनाल कायै” और “कन्थराय” प्रचलित “कलितालकायै” और “कन्धराय” से अलग हैं। उपयोगकर्ता के पाठ में “दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय” है, जो मंदिर के HTML पाठ में नहीं दिखाई देता। यह सम्मिलित परम्परागत स्तुति है, गोरक्षनाथ-रचित मूल पद का प्रमाण नहीं।

4. गोरक्षनाथ का चतुष्पादी स्तवन

भावार्थ: गुरु-शिष्य परम्परा के पालक, चन्द्रकलायुक्त ललाट वाले, जटाधारी तथा काल और जन्म-जाल से परे वर्णित गोरक्षनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ। दो कठिन समासों का अर्थ अभी अनिश्चित है। व्याख्या: “शेषांहिमालम्” और “जगदब्जनालम्” का निर्विवाद समास-विग्रह उपलब्ध पाठों से सम्भव नहीं। “कालस्य कालम्” आध्यात्मिक श्रेष्ठता का काव्य-वर्णन है, शारीरिक अमरता का वादा नहीं।

5. गुरु में दिव्य तत्त्व का दर्शन

भावार्थ: गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के प्रतीकों से स्तुत करके परम सत्य का बोध कराने वाले पूज्य शिक्षक के रूप में नमस्कार किया गया है। व्याख्या: यह प्रसिद्ध गुरु-वन्दना ShivGoraksh के स्वतंत्र सम्बन्धित पाठ में भी है। यहाँ उसका उपयोग एक बड़ी नाथ-प्रार्थना के अंग के रूप में है, जिससे सम्बन्धित पाठ बदलता नहीं और उसका लेखक गोरक्षनाथ सिद्ध नहीं होता। “गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म” के पाठ में गुरुगीता-परम्पराओं से भिन्नता मिलती है। गुरु-श्रद्धा के साथ विवेक और नैतिक उत्तरदायित्व आवश्यक हैं।

6. गुरु-साधना के चार मूल आधार

भावार्थ: गुरु का रूप ध्यान का आधार, चरण पूजा का आधार, वाणी मार्गदर्शन का आधार और कृपा मोक्ष का मूल मानी गई है। व्याख्या: चार समानान्तर पद ध्यान, पूजा, मन्त्र तथा मुक्ति के क्षेत्र में गुरु के महत्त्व को बताते हैं; वे कोई विस्तृत अनुष्ठान-विधि नहीं देते। “चरण” विनय और श्रद्धा का पारम्परिक प्रतीक हैं। “मोक्ष मूलं गुरोः कृपा” को दिए गए पाठ के अनुसार रखा गया है। इससे दीक्षा या गुप्त अभ्यास के नियम प्रमाणित नहीं माने जाएँगे।

7. मन्त्र, पूजा और गुरु-वचन में सत्य का स्मरण

भावार्थ: यह खण्ड मन्त्र, पूजा और गुरु के वचन में सत्य का महत्त्व दोहराता है तथा एक परम सत्य की ओर संकेत करता है। व्याख्या: “सत्य” की पुनरावृत्ति धार्मिक और नैतिक आदर्श दोनों है। गुरु-वचन को सत्य कहने का अर्थ विवेक छोड़ना या अनुचित व्यवहार स्वीकार करना नहीं है। “निरन्जनम्” निर्मल/निष्कलंक तत्त्व का संकेत दे सकता है, लेकिन “सत्यदेव” के साथ इसका निश्चित विभाजन अभी जाँचना चाहिए।

8. त्वमेव माता—ईश्वर में समस्त सम्बन्ध

भावार्थ: हे देवदेव! आप ही माता-पिता, बन्धु-मित्र, विद्या और धन-संपदा का आधार तथा मेरे लिए सब कुछ हैं। तीसरी पंक्ति का प्रदत्त शब्द अस्पष्ट है। व्याख्या: स्वतंत्र प्रचलित पाठ में “त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव” मिलता है, जबकि यहाँ “द्रविड़म्” लिखा है। ‘संपत्ति’ का अर्थ उस तुलनात्मक पाठ पर निर्भर है; यह दावा नहीं कि लिखे हुए “द्रविड़म्” का भी वही प्रमाणित अर्थ है। यह वन्दना ShivGoraksh सम्बन्धित पाठ से भी जुड़ी है।

9. तीनों लोकों में शिवलिङ्ग को प्रणाम

भावार्थ: प्रार्थना आकाश, पाताल और मृत्युलोक से सम्बद्ध शिवलिङ्ग स्वरूपों—महाकाल सहित—को प्रणाम करती है। व्याख्या: “ताडका लिंगम”, “वटुकेश्वरम्” और “महाकालम्” जैसे रूप इसी क्रम में प्रस्तुत हैं। “ताडका” का स्थान-सम्बन्धी या पाठभेद-सम्बन्धी निश्चय नहीं किया गया है। आकाश-पाताल का उल्लेख भक्तिपरक विश्व-दृष्टि है, किसी भौतिक मार्ग या सभी शिवमन्दिरों में समान अनुष्ठान का प्रमाण नहीं।

10. नाथ-योगियों का भेष और आदेश

भावार्थ: श्रृंगी, जटाएँ, भगवा भेष, कानों के कुण्डल और भस्मधारी नाथयोगी की छवि प्रस्तुत करके “शिव गोरक्ष आदेश” कहा गया है। व्याख्या: श्रृंगी, कुण्डल, जटा और भस्म नाथ-परम्परा के प्रतीक हैं। क्षेत्र-क्षेत्र में नाम और प्रयोग बदल सकते हैं। “आदेश” नाथ-परम्परा का महत्वपूर्ण अभिवादन/अनुमोदन है; यहाँ इसके अर्थ की चर्चा की गई है, कोई गुप्त साधना नहीं बताई गई। यह पाठ के भीतर लोकभाषायी छन्द जैसा खण्ड है।

11. ओंकार, नाद और गोरख का स्मरण

भावार्थ: ओंकार को आधार मानकर तीनों लोकों में उसकी जयध्वनि की जाती है। नाद, ज्ञान की टोपी, माला और गोरक्षनाथ की रक्षा-प्रार्थना से नाथ-वेश तथा भक्ति की छवि उभरती है। व्याख्या: यह लयबद्ध वन्दना नादयोग की कोई तकनीकी प्रशिक्षण-विधि नहीं और निश्चित अलौकिक सुरक्षा का वादा भी नहीं। “काल भागे” भय पर विजय का काव्यात्मक भाव है। ॐ/प्रणव पर स्वतंत्र सम्बन्धित पाठ विद्यमान है; उसके उपनिषद्-आधारित विवेचन के स्थान पर इस खण्ड को न रखा जाए।

12. चार खाणी और समापन आदेश

भावार्थ: समापन में चार खाणी, चार वाणी, चन्द्र-सूर्य, पवन-पानी और एक दैवी तत्त्व का स्मरण करके सिद्ध गुरुओं को “आदेश! आदेश!!” कहा जाता है। व्याख्या: “चार खाणी” को भारतीय परम्परा में जन्म की चार श्रेणियों से जोड़ा जाता है, किन्तु नाथ-विशेष अर्थ तथा “चार बानी” को विशेषज्ञ से समझना चाहिए। “ज्योति पाटले परसो देवा” और “नाद्कार” यहाँ अस्पष्ट हैं; उनका मनमाना शब्दार्थ नहीं दिया गया। अंतिम “आदेश” सामूहिक भक्तिपरक अभिवादन है, अनिवार्य शारीरिक अनुष्ठान का आदेश नहीं।

संयुक्त नाथ-प्रार्थना को समझना

यह किसी एक प्राचीन रचनाकार का निरन्तर संस्कृत स्तोत्र नहीं है। इसमें संस्थागत नाथ-जयघोष, शिव-भवानी प्रार्थना, अर्धनारीश्वर परम्परा का पद, गोरक्ष-वन्दना, गुरु-वन्दना, सत्य-स्मरण, “त्वमेव माता”, लिङ्ग-स्तुति और लोकभाषा में नाथचिह्न तथा आदेश-वन्दना सम्मिलित हैं। इनके अलग-अलग स्रोत और पाठभेदों की जाँच आवश्यक है। [SRC-MANDIR-064] [SRC-ARDHA-064]

पूर्व v1 की चार-चरणीय गोरक्ष-वन्दना अब खण्ड ४ है और उसकी पहचान सम्बन्धित पाठ सुरक्षित है। विस्तृत v2 का अलग edition ID है। स्वतंत्र सम्बन्धित पाठ, 056, 067 और 068 के मूल पाठों को इस परिवर्तन से नहीं बदला गया।

मुख्य पाठभेद एवं अधूरे स्रोत-प्रश्न

  • Absence of introductory “ऊँ शिव गोरक्ष योगी”: Mandir HTML supplies a stand-alone line before the text; the selected user sequence starts at “गंगे…”
  • जटाशङ़्करी: Non-standard nukta on ङ; temple shows same form, other Nath witnesses spell this differently
  • ज्वाला महामाई: Temple HTML also displays “ज्वाला”; separate Nath witness reads “ज्वाला”
  • कपूर्रगौरम्: Widely printed “कर्पूरगौरं”; temple HTML has the user form
  • मन्दारमाला कलिनाल कायै: Ardhanārīśvara-stotra comparator: “मन्दारमालाकलितालकायै”
  • कपालमालाङि़्कत कन्थराय: Ardhanārīśvara-stotra comparator: “कपालमालाङ्कितकन्धराय”
  • दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय: Present in supplied sequence and full Ardhanārīśvara stanza; apparently omitted in online Mandir HTML
  • शेषांहिमालम्: Earlier separate सम्बन्धित पाठ GYAN comparator “Sesha himalam”; meaning of compound unresolved
  • जगदब्जनालम्: Earlier four-pāda witness gives jagadābjanālam; exact segmentation and meaning unresolved
  • गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: Common Sanskrit recitation writes “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः”; do not silently replace user spelling
  • द्रविड़म्: Common Tvameva prayer comparator reads “द्रविणं”; user and Mandir HTML have “द्रविड़म्”
  • ताडका लिंगम: Current source does not establish the geographic/theological referent or alternate reading
  • ज्योति पाटले परसो देवा: Nath oral/literary regional wording needs expert elucidation
  • नाद्कार: No secure meaning/reading from checked comparisons
  • Lineage names within the acclamation: Alternate modern Nath prayer changes some divine/place names; do not blend versions
  • मन्दारमाला verse attribution: Ardhanārīśvara-stotra verse 5 embedded in composite; entire Nath prayer must not be attributed to Shankara or Goraksh Ardhanārīśvara-stotra verse 5 embedded in composite; entire Nath prayer must not be attributed to Śaṅkara or Gorakṣa

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह एक ही श्लोक है? नहीं। यह बारह खण्डों की संयुक्त प्रार्थना है, जिसमें संस्कृत पद, नाथ-जयघोष और लोकभाषायी वन्दनाएँ हैं।

क्या सम्पूर्ण पाठ गोरक्षनाथ ने लिखा? यह प्रमाणित नहीं। वे इस प्रार्थना में पूज्य गुरु हैं; इसके घटक अन्य परम्पराओं से भी आए हैं।

“द्रविड़म्” और “ज्वाला” अभी क्यों नहीं सुधारे? यह उपयोगकर्ता द्वारा चुना गया संपादित पाठ है। सम्भावित सही रूप तुलना हेतु दर्ज हैं, किन्तु बिना स्वीकृति मूल खण्ड नहीं बदला गया।

क्या अर्धनारीश्वरस्तोत्र पूरा है? इस संकलन में उसका चयनित चार-पंक्ति पद है; पूर्ण दीर्घ स्तोत्र अलग रचना है। नहीं। मंदिर-पाठ के पुनर्प्रकाशन की अनुमति, पाठ-समीक्षा, कला-संपत्ति और विशेषज्ञ स्वीकृति शेष हैं।

क्या इसमें दीक्षा या गुप्त नाथ-साधना की विधि है? नहीं। यह शैक्षिक व्याख्या है, नाथ-सम्प्रदाय की दीक्षा-विधि नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Underlying lyric permission confirmed by the founder; supporting document not independently inspected. ShivGoraksh edited educational presentation and original bilingual meanings. No recording or music included.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening Nath acclamations

    Gange har-Narmade har, jatashankari har, un namo Parvati pataye har, Boliye Shri Shambhu jati Guru Gorakshanath Maharaj ki jai, maya svarupi Dada Matsyendranath Maharaj ki jai, Navnath chaurasi siddhon ki jai, bhesh Bhagavan ki jai, atal kshetra ki jai, Ramteshvar Maharaj ki jai, Kadali Kal Bhairavnath ji ki jai, patra devata ki jai, Jwala Mahamai ki jai, Sanatan Dharm ki jai, apne-apne Guru Maharaj ki jai, gau-brahman ki jai, bole sache darbar ki jai, Har Har Mahadev ki jai.

  2. Camphor-white Śiva with Bhavānī

    kapūrragauram karuṇāvatāram saṃsārasāram bhujagendra hāram | sadā vasantam hṛdayāravinde bhavaṃ bhavānī sahitam namāmi ||

  3. Śivā and Śiva — shared divinity

    mandāramālā kalināla kāyai kapālamālāṅikat kantharāya | divyāmbarāyai ca digambarāya, namaḥ śivāyai ca namaḥ śivāya

  4. Gorakṣa praise — four pādas

    gorakṣa bālam guru śiṣya pālam śeṣāṃhimālam śaśikhaṇḍa bhālam | kālasya kālam jitajanma jālam vande jaṭālam jagadabjanālam ||

  5. Guru as the Divine

    gururbrahmā gururviṣṇu gururdevo maheśvara! guruḥ sākṣātparabrahma, tasmai śrī guravai namaḥ ||

  6. Four roots of guru practice

    dhyānamūlaṃ gurormūrtiḥ, pūjā mūlaṃ guroḥ padam mantramūlaṃ gurorvākyaṃ mokṣa mūlaṃ guroḥ kṛpā

  7. Truth of mantra, worship and guru teaching

    mantra satyaṃ pūjā satyaṃ satyadeva nirañjanam guruvākyaṃ sadā satyaṃ satyamekam paraṃpadam

  8. You alone are mother and father

    tvameva mātā ca pitā tvameva tvameva bandhuśca sakhā tvameva | tvameva vidyā draviṛam tvameva tvameva sarvam mama deva deva!

  9. Śiva-liṅga reverence in three realms

    ākāśe tāḍakā liṅgam pātāle vaṭukeśvaram martye loke mahākālam sarva liṅgam namostute ||

  10. Nath yogic appearance and Ādeś

    Sheli shringi shir jata jholi bhagva bhesh, Kanan kundal bhasm lasai, Shiv Goraksh Aadesh.

  11. Oṃkāra, nāda and Gorakh

    Unkar tera adhar Tin lok men jai-jaikar. Nad baje kal bhage, Gyan ki topi, Gorakh saje Gale nad, pushpan ki mala Raksha karen, Shri Shambhujati Guru Gorakshanath ji bala.

  12. Four life-forms and final Ādeś

    Char khani char bani Chandra surya pavan pani Eko deva sarvatra seva Jyoti patale parso deva Kanan kundal gale nad Karo siddho nadkar Siddh guruvaron ko Aadesh! Aadesh!!

स्रोत, रचनाकार-सावधानी तथा प्रकाशन प्रतिबन्ध

  1. User-submitted ShivGoraksh-edited Gorakh Guru Vandana
  2. Gorakhnath Mandir, Gorakhpur — प्रार्थना · स्रोत खोलें
  3. Nath Samparday ki Paramparik Prarthana — Shri Goraksh Nathji · स्रोत खोलें
  4. Ardhanarishvarastotram with meaning · स्रोत खोलें
  5. GYAN — Goraskha Vandana · स्रोत खोलें
  6. इस संस्करण के साथ दिया गया तुलनात्मक पाठ