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प्रार्थना

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः — गुरु-वन्दना

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर और परम ब्रह्म के प्रतीकों से आदर्श गुरु का सम्मान करने वाला एक श्लोक।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अर्थ

गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के स्वरूप से सम्मानित किया गया है; अन्ततः उन्हें साक्षात् परम ब्रह्म के रूप में नमन किया गया है। ऐसे आदरणीय गुरु को प्रणाम।

व्याख्या

यह एक श्लोक आदर्श आध्यात्मिक गुरु का धार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के नामों से ज्ञान का उदय, उसका संरक्षण और अज्ञान का परिवर्तन समझा जा सकता है; अंत में ‘परं ब्रह्म’ के माध्यम से सर्वोच्च तत्त्व की ओर संकेत है। यह भक्तिपरक व्याख्या है, ऐसा ऐतिहासिक कथन नहीं कि गुरु कहलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति देवता है। गुरु के प्रति आदर विवेक, सहमति, नैतिक जिम्मेदारी या प्रश्न पूछने के अधिकार को समाप्त नहीं करता। चुने गए आधुनिक मुद्रित स्रोत में ‘गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म’ है, जबकि जाँचे गए गुरुगीता-पाठों में ‘गुरुरेव’ मिलता है। मूल लेखक तथा सबसे पुराना रचनाकाल प्रमाणित नहीं हैं। 1 2 3

सन्दर्भ और उपयोग

चुने गए पाठ का परिचय: दो पंक्तियों और चार चरणों वाला एक संस्कृत गुरु-वन्दना श्लोक। डिवाइन लाइफ सोसाइटी की आधुनिक मुद्रित पुस्तक Guru Tattva, परिशिष्ट Essence of Guru Gita के श्लोक ४ का पृष्ठ-चित्र देखकर पाठ मिलाया गया है। इससे यह चयनित श्लोक पूरा मिलता है, लेकिन इसके सबसे पुराने रचनाकाल, मूल लेखक या गुरुगीता के सभी पाठों से इसकी शब्दशः समानता सिद्ध नहीं होती। 1

संपूर्ण हिन्दी अर्थ और व्याख्या

एक प्रार्थना

भावार्थ। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के स्वरूप से सम्मानित किया गया है; अन्ततः उन्हें साक्षात् परम ब्रह्म के रूप में नमन किया गया है। ऐसे आदरणीय गुरु को प्रणाम। यह एक श्लोक आदर्श आध्यात्मिक गुरु का धार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के नामों से ज्ञान का उदय, उसका संरक्षण और अज्ञान का परिवर्तन समझा जा सकता है; अंत में ‘परं ब्रह्म’ के माध्यम से सर्वोच्च तत्त्व की ओर संकेत है। यह भक्तिपरक व्याख्या है, ऐसा ऐतिहासिक कथन नहीं कि गुरु कहलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति देवता है। गुरु के प्रति आदर विवेक, सहमति, नैतिक जिम्मेदारी या प्रश्न पूछने के अधिकार को समाप्त नहीं करता। चुने गए आधुनिक मुद्रित स्रोत में ‘गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म’ है, जबकि जाँचे गए गुरुगीता-पाठों में ‘गुरुरेव’ मिलता है। मूल लेखक तथा सबसे पुराना रचनाकाल प्रमाणित नहीं हैं। 1 2 3

चारों चरणों का शब्दार्थ और विस्तृत अर्थ

1. गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः — गुरु को ब्रह्मा के समान और गुरु को विष्णु के समान आदर दिया गया है। प्रथम चरण में सृष्टि से जुड़े ब्रह्मा और पालन से जुड़े विष्णु का स्मरण है। यहाँ गुरु के द्वारा समझ का उदय होना और उस समझ का पालन-पोषण होना भक्तिपरक संकेत हैं। गुरुर्ब्रह्मा आदि में ‘गुरुः’ का संधिरूप ‘गुरुर्’ आता है। चरण को अलग दिखाने के लिए यहाँ विष्णुः लिखा गया है, लेकिन ऊपर संपूर्ण मूल पंक्ति की संधि यथावत् है। इस उपमा का अर्थ हर शिक्षक को शाब्दिक रूप से सृष्टिकर्ता देवता घोषित करना नहीं है। 2. गुरुर्देवो महेश्वरः — गुरु को महेश्वर अर्थात् शिव के समान श्रद्धा दी गई है। महेश्वर शिव का नाम है। इस प्रार्थना में उसे अज्ञान और जड़ता के परिवर्तन, तथा विवेक के उदय से जोड़कर समझा जा सकता है। ‘देवो महेश्वरः’ महेश्वर देव का संकेत है। गुरु-स्तुति की धार्मिक भाषा को किसी मानव शिक्षक के लिए निरंकुश अधिकार, दबाव या प्रश्न न करने की अनिवार्यता नहीं समझना चाहिए। 3. गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म — गुरु को साक्षात् परम ब्रह्म के रूप में नमन किया गया है। ‘साक्षात्’ का आशय प्रत्यक्ष रूप से प्रकट या सामने उपस्थित होना है; ‘परं ब्रह्म’ वेदान्तीय संदर्भ में परम तत्त्व है। चुनी गई डिवाइन लाइफ सोसाइटी की मुद्रित पुस्तक में यही ‘गुरुः साक्षात्’ पाठ है। गुरुगीता के जाँचे गए पाठों में इसके स्थान पर ‘गुरुरेव’ है; दोनों को एक ही अविकृत स्रोत-पंक्ति कह देना गलत होगा। पहले चरण का देवता ‘ब्रह्मा’ और यहाँ नपुंसकलिङ्ग ‘ब्रह्म’ अलग पद हैं। 4. तस्मै श्रीगुरवे नमः — ऐसे आदरणीय गुरु को मेरा नमस्कार है। ‘तस्मै’ अर्थात् ‘उसको’, ‘श्रीगुरवे’ गुरु के प्रति चतुर्थी विभक्ति है और ‘नमः’ श्रद्धापूर्ण प्रणाम। प्रार्थना किसी चमत्कारी प्रतिफल या कर्मकाण्ड के विधान पर नहीं, बल्कि कृतज्ञ नमस्कार पर समाप्त होती है। आधुनिक विद्यार्थी अपने शिक्षकों और मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान रख सकता है, लेकिन श्लोक का आध्यात्मिक आदर्श साधारण धन्यवाद से अधिक विशिष्ट है।

महत्वपूर्ण संस्कृत शब्द

पदसरल अर्थसावधानी
गुरुः / गुरुर्श्रद्धेय शिक्षक, मार्गदर्शकयहाँ आध्यात्मिक आदर्श गुरु का वर्णन है।
ब्रह्मासृष्टिकर्ता देवतातीसरे चरण के ‘ब्रह्म’ से भिन्न।
विष्णुःपालन से सम्बद्ध भगवान विष्णुयहाँ गुरु की उपमा का अंग।
देवो महेश्वरःमहेश्वर यानी भगवान शिवपरिवर्तन तथा अज्ञान-निवारण का व्याख्यात्मक संकेत।
साक्षात्प्रत्यक्ष, सामने उपस्थितइसी शब्द पर प्रमुख पाठभेद है।
परं ब्रह्मसर्वोच्च तत्त्व / परम ब्रह्मब्रह्मा देवता का दूसरा नाम मात्र नहीं।
तस्मै श्रीगुरवेउस पूज्य गुरु कोचतुर्थी विभक्ति में सम्मानपूर्ण संबोधन।
नमःनमस्कार, विनम्र प्रणामकोई चमत्कारी फल या जप-संख्या नहीं बताई गई।

संधि और पाठ-उच्चारण। ‘गुरुः’ का ‘गुरुर्’ बनना संस्कृत संधि का सामान्य रूप है। ‘गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो’ को चरण के अनुसार अलग करने पर ‘गुरुर्विष्णुः’ लिखा जा सकता है; यह पाठशिक्षण के लिए पद-विभाजन है, अलग प्रमाणित प्राचीन पाठ नहीं। यहाँ वैदिक स्वरचिह्न अथवा किसी सम्प्रदाय की शुद्ध मौखिक परम्परा प्रमाणित नहीं की गई है। 1 2

ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर का एक साथ स्मरण क्यों? हिन्दू धार्मिक व्याख्या में ब्रह्मा का सम्बन्ध सृष्टि से, विष्णु का पालन से और महेश्वर का परिवर्तन या संहार से रखा जाता है। श्लोक इन्हीं नामों से गुरु के ज्ञानदायी स्वरूप की प्रशंसा करता है: गुरु विद्यार्थी में समझ जगाता है, उस समझ को पुष्ट करता है और भ्रम को दूर करने में सहायता देता है। यह आधुनिक सम्पादकीय भावार्थ है; इसे प्राचीन रचयिता का ऐतिहासिक प्रमाणित गद्य-भाष्य न समझें। ‘परं ब्रह्म’ उस उपमा को परम तत्त्व की ओर ले जाता है। इस श्लोक को गुरु-भक्ति, गुरु-वन्दना, अध्ययन या श्रद्धापूर्वक स्मरण के प्रसंग में पढ़ा जाता है। गुरु पूर्णिमा गुरु-सम्मान से सम्बद्ध प्रसिद्ध अवसर है, पर मूल दो पंक्तियों में कोई तिथि, मुहूर्त, जप-संख्या, दीक्षा-विधान या अनिवार्य पर्व नहीं बताया गया है।

श्रद्धा का अर्थ विवेक छोड़ना नहीं है

श्लोक आध्यात्मिक आदर्श की स्तुति है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि गुरु कहलाने वाला हर व्यक्ति कभी गलती नहीं कर सकता। अच्छे मार्गदर्शन में प्रश्न, विचार, सीखने वाले की स्वायत्तता तथा नैतिक सीमाएँ बनी रहती हैं। प्रार्थना के शब्द किसी व्यक्ति के अनुचित व्यवहार, शोषण या अन्ध-आज्ञापालन का समर्थन नहीं करते। यह पृष्ठ किसी विशिष्ट परम्परा की दीक्षा या विशेष अनुष्ठान नहीं सिखाता।

प्रमाणित आधार-पाठ और गुरुगीता का भिन्न पाठ

Guru Tattva के परिशिष्ट Essence of Guru Gita में यह श्लोक ४ क्रमांक पर मिलता है और दूसरे चरण की दूसरी पंक्ति ‘गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म’ है। पुस्तक के आरम्भ में छठे संस्करण का वर्ष १९९८ है; यह आधुनिक पुस्तक का विवरण है, प्रार्थना के मूल रचनाकाल का प्रमाण नहीं। 1

इसके विपरीत संस्कृत डॉक्यूमेंट्स की लघु गुरुगीता, श्लोक ३२, में ‘गुरुरेव परब्रह्म’ मिलता है। उसी संग्रह की दीर्घ गुरुगीता, श्लोक ५८, में ‘गुरुरेव परं ब्रह्म’ मिलता है। इसलिए चुने हुए ‘साक्षात्’ वाले पाठ को गुरुगीता के इन दोनों क्रमांकों का अक्षरशः प्रमाणित मूल कहना गलत होगा। यह पाठ केवल स्वतंत्र एक-श्लोकी गुरु-वन्दना का है, संपूर्ण गुरुगीता का संस्करण नहीं। 2 3

पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय से सम्बद्ध पाण्डुलिपि-सूचियों में गुरुगीता की दो प्रतियों के अभिलेख मिलते हैं, जिनकी सम्भावित तिथि लगभग १७००–१८५० बताई गई है। इन पाण्डुलिपियों के संबंधित पर्ण/श्लोक का प्रत्यक्ष पाठ-मिलान नहीं हुआ है। इसलिए वे न तो आधुनिक ‘साक्षात्’ रूप का प्रमाण हैं और न ही इस विशिष्ट श्लोक के मूल लेखक या पहली रचना का। व्यास, स्कन्दपुराण या शिव-पार्वती संवाद की परम्परागत संबद्धता और प्रत्यक्ष पाठ-साक्ष्य अलग-अलग स्तरों पर दर्ज किए गए हैं। 4 5

पाठभेदों की पारदर्शी सूची

विषयइस संस्करण में चयनितदूसरे साक्ष्य मेंसम्पादकीय निर्णय
गुरु के ब्रह्म-स्वरूप का पदगुरुः साक्षात् परं ब्रह्मलघु गुरुगीता ३२ में गुरुरेव परब्रह्म‘साक्षात्/एव’ का अर्थपूर्ण बदलाव छिपाया नहीं गया 1 2
दीर्घ गुरुगीतागुरुः साक्षात् परं ब्रह्मश्लोक ५८ में गुरुरेव परं ब्रह्मअलग संस्करण और क्रमांक 3
शब्द-मिलानपरं ब्रह्मआधुनिक गुरुस्तोत्र में परब्रह्मउपलब्ध लिखित रूप स्पष्ट रखा 1 6
पंक्ति की संधिविष्णुर्गुरुर्देवोचरण-विभाजन पर विष्णुः । गुरुर्देवोपाठ-विश्लेषण, नई पाण्डुलिपि नहीं 1 2

ये अलग पाठ या संपादकीय प्रस्तुति हैं; इन्हें जोड़कर नया मिश्रित ‘मूल श्लोक’ नहीं बनाया गया। मूल के लिए ऊपर दिया पाठ तथा मूल पाठ-अभिलेख ही आधार माना जाए।

सामान्य प्रश्न

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः का पूरा मूल पाठ कौन-सा है? इस स्वतंत्र चयन में ऊपर की दो संस्कृत पंक्तियाँ संपूर्ण हैं। इनमें चार चरण हैं। दूसरे गुरुस्तोत्रों के अतिरिक्त श्लोक इससे स्वतः नहीं जुड़ते।

क्या यह श्लोक गुरुगीता में सचमुच है? गुरुगीता के जाँचे गए लघु और दीर्घ पाठों में इससे निकट-संबन्धित श्लोक हैं, किंतु वहाँ ‘गुरुरेव’ है; यहाँ चुनी गई मुद्रित प्रार्थना में ‘गुरुः साक्षात्’ है। इसलिए पाठ और श्लोक-क्रमांक दोनों साथ बताने चाहिए। 1 2 3

ब्रह्मा और ब्रह्म एक ही शब्द हैं क्या? नहीं। प्रथम चरण में ‘ब्रह्मा’ एक देवता का नाम है; तीसरे चरण में ‘परं ब्रह्म’ परम तत्त्व है। दोनों को बिना भेद के समझना अर्थ बिगाड़ सकता है।

इस श्लोक के रचयिता कौन हैं? सबसे पुराने लेखक का ऐतिहासिक निर्धारण इस अनुसन्धान में नहीं हुआ है। व्यास या स्कन्दपुराण से संबंधित पारम्परिक विवरण को इसी ‘साक्षात्’ पाठ के प्रमाणित व्यक्तिगत लेखकत्व का सबूत नहीं माना गया है। 2 4

क्या इसका अर्थ है कि हर गुरु भगवान होता है? यह आदर्श गुरु का धार्मिक गौरवगान है। किसी भी मानव गुरु की नैतिक जाँच, प्रश्नों के उत्तर और उचित सीमाएँ महत्वहीन नहीं हो जातीं।

क्या इसका निश्चित संख्या में जप करना अनिवार्य है? चुने गए मूल श्लोक में कोई संख्या या विशेष प्रक्रिया नहीं है। अलग समुदायों की अपनी परम्पराएँ हो सकती हैं, लेकिन यह पृष्ठ ऐसे अनुष्ठान का निर्देश नहीं दे रहा है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    gurur brahmā gurur viṣṇur gurur devo maheśvaraḥ | guruḥ sākṣāt paraṃ brahma tasmai śrīgurave namaḥ ||

स्रोत, अधिकार और समीक्षा की सीमा

स्रोत: 1 डिवाइन लाइफ सोसाइटी, Guru Tattva, परिशिष्ट श्लोक ४ (मुद्रित पृष्ठ ४७; PDF पृष्ठ-चित्र जाँचा); 2 लघु गुरुगीता, श्लोक ३२ (PDF चित्र जाँचा); 3 दीर्घ गुरुगीता, श्लोक ५८; 4 और 5 पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की पाण्डुलिपि सूचियाँ (श्लोक-विशेष का मिलान नहीं); 6 धर्मार्थ का आधुनिक गुरुस्तोत्र; 7 ग्रीनमेस्ज का आधुनिक गुरुस्तोत्र। URL, अलग-अलग पाठ, लेखकत्व तथा अधिकार की समीक्षा स्रोत-सूची में दर्ज हैं। इस पृष्ठ का हिन्दी भावार्थ और विवेचन नए लिखे गए हैं; किसी आधुनिक स्रोत का पूरा अनुवाद नकल नहीं किया गया है। सम्पादकीय सूचना: एक-श्लोकी चुना गया आधुनिक मुद्रित पाठ पूरा है; पर सबसे पुराने स्रोत, रचयिता, ऐतिहासिक पाण्डुलिपि-मिलान तथा पुनर्प्रकाशन अधिकारों को प्रमाणित नहीं किया गया। यह पठन स्वतंत्र विद्वत्-प्रमाणन का दावा नहीं करता।

  1. Guru Tattva — Appendix: Essence of Guru Gita · स्रोत खोलें
  2. Śrīgurugītā Laghu — short Sanskrit recension · स्रोत खोलें
  3. Guru Gita — long Sanskrit recension · स्रोत खोलें
  4. Gurugītā — University of Pennsylvania manuscript Ms. Coll. 390 Item 2229 · स्रोत खोलें
  5. Gurugītā — University of Pennsylvania manuscript Ms. Coll. 390 Item 2284 · स्रोत खोलें
  6. Guru Stotram — traditional devotional selection · स्रोत खोलें
  7. Guru Stotram — Sanskrit and English meaning · स्रोत खोलें