संपादकीय संस्करण-सूचना: 1 के स्थिर विकिस्रोत पाठ में 40 क्रमांकित चौपाइयाँ तथा अलग, बिना क्रमांक वाली समापन विनती हैं। नीचे पूरा चयनित देवनागरी पाठ दिया गया है। विशेषज्ञ और लाइसेंस समीक्षा पूर्ण होने तक प्रकाशन निषिद्ध है।
प्रत्येक चौपाई और समापन का भावार्थ
समापन विनती {#closing-invocation}
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
अर्थ: समापन में 'देवीदास' नाम से शरणागत भक्त जगदम्बा भवानी से कृपा माँगता है। व्याख्या: काव्य में 'देवीदास' नाम आता है; स्वतंत्र प्रमाण के बिना लेखक का जीवन-वृत्त या काल निश्चित नहीं।
यह चालीसा क्या कहती है? दुर्गा चालीसा उत्तर भारतीय भक्तिकाव्य की हिंदी रचना है, जिसमें ब्रज और अवधी से प्रभावित कई शब्द मिलते हैं। इसकी शुरुआत तीनों लोकों में फैलने वाली देवी-ज्योति से होती है; आगे अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी और कालिका के विविध रूप आते हैं। अंत में कवि एक सामान्य भक्त की तरह अपने दुःख और आशाओं को लेकर माता की शरण माँगता है। यह परिवर्तन इसे केवल वीर-गाथा नहीं, आत्मीय प्रार्थना भी बनाता है। 1
'चालीसा' नाम चालीस पाठखंडों की परंपरा से जुड़ा है। चुने हुए संस्करण में 40 क्रमांकित चौपाइयों के बाद एक बिना क्रमांक वाली समापन विनती छपी है। इसलिए 41 पाठखंड दिखाना, 41 क्रमांकित चौपाइयाँ होने का दावा नहीं है। ऊपर का मूल पाठ उसी स्रोत का है; रोमन लिप्यंतरण पढ़ने की सहायता है, दूसरी मूल रचना नहीं।
देवी के स्वरूप और प्रतीक
ज्योति और निरंकार: एक ओर देवी का रूप चंद्र-समान ललाट, सिंहवाहन और अस्त्रों से साकार होता है, दूसरी ओर उनकी ज्योति किसी एक मूर्ति में सीमित नहीं रहती। शक्ति का अर्थ केवल शारीरिक बल नहीं, सृष्टि की क्रियाशील क्षमता और दैवी सामर्थ्य भी है। 1
अन्नपूर्णा, लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी: पोषण, ऐश्वर्य, विद्या और करुणा को एक महाशक्ति में जोड़ा गया है। यह शाक्त भक्तिदृष्टि है; इसका अर्थ यह नहीं कि वैष्णव, शैव और देवी की सभी स्वतंत्र परंपराओं में हर रूप की व्याख्या एक जैसी है। त्रिशूल, खड्ग, खप्पर और सिंह: ये संकट का सामना करने, रक्षा और अन्याय पर विजय के धार्मिक प्रतीक हैं; मनुष्यों पर हिंसा करने के निर्देश नहीं। ऐतिहासिक दुर्गा-मूर्तियों में सिंह, त्रिशूल तथा महिषासुर-वध के दृश्य मिलते हैं। 5
देवीमाहात्म्य और कथाओं का अंतर
महिषासुर, रक्तबीज, शुम्भ और निशुम्भ की कथाओं के सूत्र देवीमाहात्म्य / दुर्गा सप्तशती से जुड़े हैं। उस संस्कृत ग्रंथ में महिषासुर का प्रसंग मुख्यतः अध्याय 2–3, रक्तबीज का अध्याय 8, निशुम्भ का अध्याय 9 और शुम्भ का अध्याय 10 में मिलता है। दुर्गा चालीसा उसी ग्रंथ का अक्षरशः अंश नहीं, बल्कि अलग हिंदी स्तुति है जो कथाओं का संक्षिप्त स्मरण करती है। 4
नरसिंह–प्रह्लाद पंक्तियों में देवी को व्यापक शक्ति मानकर नरसिंह रूप से जोड़ा गया है। वैष्णव परंपरा की प्रसिद्ध कथा में नरसिंह विष्णु के अवतार हैं। चुने हुए चालीसा पाठ में 'हिरण्याक्ष' लिखा है, जबकि प्रह्लाद के पिता के रूप में सामान्य कथा में हिरण्यकशिपु आते हैं। इसलिए मूल पाठ बिना चुपचाप सुधार किए सुरक्षित रखा गया है। 1 2
शंकराचार्य के तप और शक्ति-पहचान से जुड़ा प्रसंग इस चालीसा का शिक्षाप्रद भक्तिकथन है; इसे ऐतिहासिक आदि शंकराचार्य की प्रमाणित जीवनी की घटना समझना उचित नहीं। यहाँ मुख्य शिक्षा यह है कि शक्ति-तत्त्व को अनदेखा करके आध्यात्मिक समझ अधूरी रहती है।
शक्तिपीठ, महाविद्या और कठिन पाठ
हिंगलाज तथा नगरकोट क्षेत्र-विशिष्ट देवी-आराधना की याद दिलाते हैं। यह पाठ श्रद्धा के स्थानों का उल्लेख करता है; इससे किसी तीर्थ की यात्रा-विधि, तिथि या मुहूर्त तय नहीं होता। मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगलामुखी और तारा जैसे नाम विभिन्न महाविद्या-संबद्ध परंपराओं में आते हैं। यहाँ उनके अर्थ समझाए गए हैं, बीज मंत्र, न्यास, यंत्र या दीक्षा-संबंधी प्रयोग नहीं। चुने हुए स्रोत में 'श्री भैरव', 'छिन्न भाल' और 'शंखन' जैसे पाठ मिलते हैं। इन्हें अनुमान से भैरवी, छिन्नमस्ता या किसी दूसरे शब्द में नहीं बदला गया। इनके लिए पुराने मुद्रित संस्करणों से मिलान अपेक्षित है। 1 2
अंतिम विनती में 'देवीदास' नाम स्वयं को देवी की शरण में रखता है। यह काव्यगत हस्ताक्षर है; इससे उनके जन्मस्थान, रचनाकाल या ऐतिहासिक पहचान का स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिलता।
साधना का भाव, बिना फल-गारंटी
यह स्तुति शुरुआत में देवी की व्यापक शक्ति का वर्णन करती है, बीच में लोककथाओं और पौराणिक विजयों की याद दिलाती है, फिर भक्त के निजी अनुभव—दुःख, आशा, तृष्णा, मोह और अहंकार—की ओर आती है। संसार के शत्रुओं से अधिक मन के विकारों पर यह अंतिम खंड चिंतन का अवसर देता है। धन, रोग-निवारण, सुरक्षा, सिद्धि और मोक्ष की प्रार्थनाएँ आस्था की अभिव्यक्ति हैं; निश्चित आर्थिक या स्वास्थ्य-परिणाम का प्रमाण नहीं। सामान्य स्तोत्र-पाठ और किसी गुरु-परंपरा के विशिष्ट तांत्रिक प्रयोग अलग विषय हैं। पाठ से आप करुणा, साहस, कृतज्ञता तथा जिम्मेदारी के मानवीय अर्थ भी ग्रहण कर सकते हैं।
चुना हुआ स्रोत, पाठभेद और श्रेय
मुख्य पाठ: विकिस्रोत का निश्चित संस्करण oldid 415580। इसमें 40 क्रमांकित चौपाइयाँ और अलग समापन विनती हैं। वेबसाइट पर CC BY-SA 4.0 सूचना दी गई है। श्रेय: Wikisource contributors, “दुर्गा चालीसा”, स्थिर स्रोत संस्करण, लाइसेंस। इस मसौदे में बदलाव: नया रोमन लिप्यंतरण और स्वतंत्र लिखे अर्थ/व्याख्या; देवनागरी के शब्द और क्रमांक-सहित विशिष्ट विरामचिह्न मूल स्रोत के अनुरूप रखे गए हैं। वेबसाइट पर प्रकाशन से पहले श्रेय, शेयर-अलाइक और मूल पाठ-अधिकार की कानूनी समीक्षा आवश्यक है। 1 6
अलग दर्ज पाठभेद: पहली चौपाई में 'दुर्गे/अम्बे', प्रह्लाद-कथा का असुर-नाम, कठिन महाविद्या-संबंधी शब्द, आंतरिक विकारों के वर्णन और समापन की गणना। संस्कृत डॉक्युमेंट्स के साधारण पाठ में अन्य वर्तनी भी मिलती है; उसे यहाँ मिलाकर कृत्रिम पाठ नहीं बनाया गया। 2 3
शब्दावली
चालीसा: लगभग चालीस पाठखंडों की भक्तिकाव्य शैली; अम्बा/जगदम्बा: माता/जगत की माता; शक्ति: दैवी सामर्थ्य; अन्नपूर्णा: जगत का पोषण करने वाली; दर्शन: श्रद्धापूर्ण साक्षात्कार; भक्ति: प्रेमपूर्ण समर्पण; परमपद: मोक्ष/उच्च आध्यात्मिक अवस्था का भक्तिपरक नाम; ऋद्धि-सिद्धि: समृद्धि और उपलब्धि से जुड़े परंपरा-विशिष्ट शब्द।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
चौपाई 1 {#chaupai-01}
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥१॥
अर्थ: भक्त दुर्गा को बार-बार प्रणाम करता है और उन्हें सुख देने तथा दुःख हरने वाली माता कहता है। व्याख्या: यह भक्तिपरक विनती है, हर कठिनाई समाप्त होने का निश्चित वादा नहीं।
चौपाई 2 {#chaupai-02}
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥२॥
अर्थ: देवी की निरंकार ज्योति तीनों लोकों को प्रकाशित करती है। व्याख्या: यहाँ दृश्य ज्योति और रूप से परे सत्ता एक साथ आती हैं; स्रोत का 'निरंकार' पाठ सुरक्षित है।
चौपाई 3 {#chaupai-03}
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥३॥
अर्थ: देवी के चंद्र-समान ललाट, विशाल मुख, लाल नेत्र और उग्र भौंहों का वर्णन है। व्याख्या: उग्र मुखाकृति देवी की रक्षात्मक शक्ति का प्रतीक है, मनुष्य-जैसे क्रोध का चिकित्सकीय वर्णन नहीं।
चौपाई 4 {#chaupai-04}
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥४॥
अर्थ: माता का मनोहर रूप देखकर भक्त को अत्यंत आनंद होता है। व्याख्या: 'दर्शन' मात्र चित्र देखने से अधिक, श्रद्धामय साक्षात्कार का भाव है।
चौपाई 5 {#chaupai-05}
तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥५॥
अर्थ: जगत की शक्ति देवी से जुड़ी है और अन्न-धन द्वारा उनका पालन बताया गया है। व्याख्या: जगत का पोषण यहाँ मुख्य है; पाठ करने पर निजी धन मिलने की गारंटी नहीं।
चौपाई 6 {#chaupai-06}
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥६॥
अर्थ: अन्नपूर्णा रूप में माता संसार का पालन करती हैं और आदि-सुंदरी कही जाती हैं। व्याख्या: अन्नपूर्णा पोषण का रूप हैं; 'बाला' का संकेत युवा देवी-रूप की ओर भी हो सकता है।
चौपाई 7 {#chaupai-07}
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥७॥
अर्थ: प्रलय में संहार करने वाली माता ही शिवप्रिय गौरी कही गई हैं। व्याख्या: सृष्टि, पालन और संहार की शक्तियाँ एक ही देवी-तत्त्व से संबद्ध दिखाई गई हैं।
चौपाई 8 {#chaupai-08}
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥८॥
अर्थ: शिव, योगी, ब्रह्मा और विष्णु देवी के गुणों का गान और ध्यान करते हैं। व्याख्या: यह शाक्त भक्तिपरक दृष्टि है; सभी हिंदू संप्रदायों की एक समान देव-क्रम व्यवस्था नहीं।
चौपाई 9 {#chaupai-09}
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥९॥
अर्थ: देवी सरस्वती के रूप में बुद्धि देकर ऋषि-मुनियों का कल्याण करती हैं। व्याख्या: यह दुर्गा और सरस्वती का भक्तिपरक तादात्म्य है; दोनों की स्वतंत्र परंपराएँ भी हैं।
चौपाई 10 {#chaupai-10}
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥१०॥
अर्थ: कविता में माता को स्तंभ फाड़कर प्रकट हुए नरसिंह रूप से जोड़ा गया है। व्याख्या: प्रचलित वैष्णव कथा में नरसिंह विष्णु के अवतार हैं; यहाँ देवी की सर्वव्यापक शक्ति पर बल है।
चौपाई 11 {#chaupai-11}
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥११॥
अर्थ: प्रह्लाद की रक्षा का उल्लेख है और इस पाठ में पराजित असुर का नाम 'हिरण्याक्ष' है। व्याख्या: पाठभेद: प्रह्लाद–नरसिंह की मुख्य कथा में हिरण्यकशिपु आता है, हिरण्याक्ष नहीं; मूल पाठ चुपचाप न बदलें।
चौपाई 12 {#chaupai-12}
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥१२॥
अर्थ: लक्ष्मी रूप में देवी श्रीनारायण के साथ विराजती हैं। व्याख्या: यह स्तुति वैष्णव छवि को व्यापक देवी-तत्त्व की व्याख्या में रखती है।
चौपाई 13 {#chaupai-13}
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥१३॥
अर्थ: क्षीरसागर में विराजने वाली दयामयी माता से हृदय की आशा पूरी करने की विनती है। व्याख्या: क्षीरसागर पौराणिक ब्रह्मांड-कल्पना का अंग है, कोई प्रमाणित भौगोलिक स्थल नहीं।
चौपाई 14 {#chaupai-14}
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥१४॥
अर्थ: देवी को हिंगलाज भवानी कहा गया है और उनकी महिमा अवर्णनीय बताई गई है। व्याख्या: हिंगलाज की स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तिपीठ परंपरा है; यहाँ यात्रा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
चौपाई 15 {#chaupai-15}
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥१५॥
अर्थ: मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी को देवी-स्वरूप कहा गया है। व्याख्या: ये दशमहाविद्या परंपराओं से जुड़े नाम हैं; उनके विशिष्ट अनुष्ठान सामान्य पाठ से अलग हैं।
चौपाई 16 {#chaupai-16}
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥१६॥
अर्थ: भैरव-संबद्ध रूप, तारा और छिन्न रूप की देवी को संसार-दुःख हरने वाली कहा गया है। व्याख्या: स्रोत में सचमुच 'श्री भैरव' और 'छिन्न भाल' है; इन्हें बिना प्रमाण 'भैरवी' या 'छिन्नमस्ता' न बदलें।
चौपाई 17 {#chaupai-17}
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥१७॥
अर्थ: भवानी सिंहवाहिनी हैं और लांगुर वीर उनकी अगवानी करता है। व्याख्या: 'लांगुर वीर' की पहचान क्षेत्रीय पाठों में बदल सकती है; इसे हनुमान कहना अलग प्रमाण माँगता है।
चौपाई 18 {#chaupai-18}
कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥१८॥
अर्थ: देवी के खड्ग और खप्पर से काल तक भयभीत बताया गया है। व्याख्या: खप्पर उग्र देवी-प्रतिमा का चिह्न हो सकता है; काल के डरने का वर्णन काव्यात्मक है।
चौपाई 19 {#chaupai-19}
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥१९॥
अर्थ: अस्त्र और त्रिशूल देखकर शत्रुओं के हृदय काँप उठते हैं। व्याख्या: यह बाधाओं से रक्षा का भाव है, किसी मनुष्य को हानि पहुँचाने का निर्देश नहीं।
चौपाई 20 {#chaupai-20}
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥२०॥
अर्थ: नगरकोट में देवी की उपस्थिति और तीनों लोकों में उनके यश का वर्णन है। व्याख्या: नगरकोट को कांगड़ा क्षेत्र की देवी-परंपरा से जोड़ा जाता है; ऐतिहासिक विवरण अलग जाँचें।
चौपाई 21 {#chaupai-21}
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥२१॥
अर्थ: माता शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज का संहार करती हैं। व्याख्या: ये देवीमाहात्म्य के युद्ध-प्रसंगों से जुड़े नाम हैं; 'शंखन' यहाँ अस्पष्ट स्रोत-पाठ है।
चौपाई 22 {#chaupai-22}
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥२२॥
अर्थ: अभिमानी महिषासुर के अत्याचार से पृथ्वी व्याकुल बताई गई है। व्याख्या: महिषासुर का प्रसंग देवीमाहात्म्य के अध्याय 2–3 से संबंधित है; चालीसा उसका स्वतंत्र पुनर्कथन है।
चौपाई 23 {#chaupai-23}
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥२३॥
अर्थ: देवी कालिका का कराल रूप लेकर महिषासुर की सेना सहित उसे हराती हैं। व्याख्या: देवी-रूपों की कथाएँ परंपराओं में भिन्न क्रम पाती हैं; चालीसा कई प्रसंग संक्षेप में मिलाती है।
चौपाई 24 {#chaupai-24}
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥२४॥
अर्थ: संतों पर संकट पड़ने पर माता उनकी सहायता करती हैं। व्याख्या: यह दैवी सहारे की श्रद्धा है, प्रत्येक संकट से निश्चित बचाव का ऐतिहासिक दावा नहीं।
चौपाई 25 {#chaupai-25}
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥२५॥
अर्थ: देवलोकों में माता की महिमा से शोक न रहने का चित्र है। व्याख्या: अमरपुरी और वासव-लोक पौराणिक संदर्भ हैं, समय-स्थान की आधुनिक सूची नहीं।
चौपाई 26 {#chaupai-26}
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥२६॥
अर्थ: ज्वाला को देवी की ज्योति मानकर स्त्री-पुरुष उनका पूजन करते हैं। व्याख्या: ज्वाला की छवि ज्वालामुखी परंपरा याद दिला सकती है, पर इस पंक्ति से विशिष्ट मंदिर सिद्ध नहीं होता।
चौपाई 27 {#chaupai-27}
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥२७॥
अर्थ: प्रेमपूर्वक स्तुति करने से दुःख और दरिद्रता दूर होने की आशा व्यक्त है। व्याख्या: भक्ति-विश्वास को आर्थिक सफलता की गारंटी या व्यावहारिक सहायता का विकल्प न बनाएँ।
चौपाई 28 {#chaupai-28}
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥२८॥
अर्थ: एकाग्र चित्त से देवी का ध्यान जन्म-मरण से मुक्ति से जोड़ा गया है। व्याख्या: यह मोक्ष संबंधी धार्मिक समझ है, प्रयोगशाला में मापने योग्य फल नहीं।
चौपाई 29 {#chaupai-29}
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥२९॥
अर्थ: योगी, देवता और मुनि कहते हैं कि देवी-शक्ति के बिना योग नहीं होता। व्याख्या: यह शाक्त दर्शन में साधना और चेतना के लिए शक्ति को अनिवार्य मानने का भाव है।
चौपाई 30 {#chaupai-30}
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥३०॥
अर्थ: शंकर आचार्य के तप और काम-क्रोध पर विजय का उल्लेख है। व्याख्या: शंकराचार्य से जुड़ा प्रसंग भक्तिकथा की तरह समझें; ऐतिहासिक विवरण स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं।
चौपाई 31 {#chaupai-31}
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥३१॥
अर्थ: कविता कहती है कि वे शिव का ध्यान करते रहे पर देवी का स्मरण नहीं किया। व्याख्या: यह शाक्त शिक्षाप्रद कथा है, प्रमाणित जीवनी या किसी अन्य संप्रदाय की निंदा नहीं।
चौपाई 32 {#chaupai-32}
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥३२॥
अर्थ: शक्ति के रहस्य को न समझकर उनकी शक्ति हटने पर पश्चात्ताप का प्रसंग आता है। व्याख्या: कथा इस स्तुति में शक्ति और आध्यात्मिक समझ का अभिन्न संबंध सिखाती है।
चौपाई 33 {#chaupai-33}
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥३३॥
अर्थ: शरणागत होकर जगदम्बा भवानी की बार-बार जय कही जाती है। व्याख्या: यहाँ कथा से भाव बदलकर सीधी शरणागति और स्तुति हो जाती है।
चौपाई 34 {#chaupai-34}
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥३४॥
अर्थ: आदि जगदम्बा प्रसन्न होकर बिना विलंब शक्ति प्रदान करती हैं। व्याख्या: प्रसंग कृपा में परिणत होता है; यह आध्यात्मिक अनुभवों की सार्वभौमिक समय-सीमा नहीं।
चौपाई 35 {#chaupai-35}
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥३५॥
अर्थ: कष्टों से घिरा भक्त माता से दुःख दूर करने की प्रार्थना करता है। व्याख्या: वीर-कथाओं के बाद असहाय भक्त की विनती आती है; यही स्तुति का आत्मीय मोड़ है।
चौपाई 36 {#chaupai-36}
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥३६॥
अर्थ: आशा, तृष्णा, मोह और मद मन को व्याकुल करते हैं; उनसे मुक्ति माँगी गई है। व्याख्या: यह चौपाई बाहरी असुरों से मन के मोह और अहंकार की ओर ध्यान मोड़ती है।
चौपाई 37 {#chaupai-37}
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥३७॥
अर्थ: भक्त शत्रु-विनाश की प्रार्थना करता है और एकाग्र होकर भवानी का स्मरण करता है। व्याख्या: सार्वजनिक अर्थ में 'शत्रु' को सुरक्षा की काव्य-प्रार्थना समझें, हिंसा का आदेश नहीं।
चौपाई 38 {#chaupai-38}
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।३८॥
अर्थ: दयालु माता से ऋद्धि और सिद्धि द्वारा कल्याण करने की विनती है। व्याख्या: ऋद्धि-सिद्धि के भक्तिपरक तथा योग-संबंधी अर्थ हैं; यहाँ विशिष्ट सिद्धि-अभ्यास का निर्देश नहीं।
चौपाई 39 {#chaupai-39}
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥३९॥
अर्थ: जीवन भर देवी की दया माँगते हुए उनका यश गाने का संकल्प है। व्याख्या: मुख्य भाव निरंतर स्मरण और कृतज्ञता है, कोई निश्चित-जप-संख्या का अनुबंध नहीं।
चौपाई 40 {#chaupai-40}
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥४०॥
अर्थ: चालीसा के गायन के साथ सुख और परमपद की भक्तिपूर्ण आशा व्यक्त है। व्याख्या: 'परमपद' मोक्ष की धार्मिक भाषा है; इसका अर्थ गारंटीकृत लौकिक फल नहीं।