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चालीसा

काली चालीसा — लाइसेंसयुक्त वैकल्पिक पाठ

काली चालीसा का अलग 57-पदों वाला MIT-लाइसेंसयुक्त पाठ; नए द्विभाषी अर्थ सहित। यह पहले के अप्रकाशित पाठ से भिन्न है।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

प्रारम्भ 1

जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज। वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय निकुंज॥

अर्थ

हे काली जगन्माता, दोषों को दूर करके भक्त के हृदय में निवास करें।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

प्रारम्भ 2

जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि। कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि॥

अर्थ

कपालिनी कालिका को प्रणाम; सेवक मानकर कृपा और शुभभाव दें।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 1

जय जय जय काली कंकाली। जय कपालिनी, जयति कराली॥

अर्थ

काली के कंकाली, कपालिनी और कराली रूपों की वन्दना है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 2

शंकर प्रिया, अपर्णा, अम्बा। जय कपर्दिनी, जय जगदम्बा॥

अर्थ

आप शंकरप्रिया, अपर्णा, अम्बा और जगदम्बा कहलाती हैं।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 3

आर्या, हला, अम्बिका, माया। कात्यायनी उमा जगजाया॥

अर्थ

स्तुति आर्या, हला, अम्बिका, माया, कात्यायनी और उमा नामों से प्रणाम करती है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 4

गिरिजा गौरी दुर्गा चण्डी। दाक्षाणायिनी शाम्भवी प्रचंडी॥

अर्थ

आप गिरिजा, गौरी, दुर्गा, चण्डी, दक्षकन्या और शाम्भवी के रूप में स्तुत हैं।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 5

पार्वती मंगला भवानी। विश्वकारिणी सती मृडानी॥

अर्थ

पार्वती, मंगला, भवानी, सती और मृडानी नामों में जगत की धारिणी का स्मरण है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 6

सर्वमंगला शैल नन्दिनी। हेमवती तुम जगत वन्दिनी॥

अर्थ

आप मंगलदायिनी शैलनन्दिनी और हेमवती हैं, जिनकी जगत वन्दना करता है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 7

ब्रह्मचारिणी कालरात्रि जय। महारात्रि जय मोहरात्रि जय॥

अर्थ

ब्रह्मचारिणी, कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि की जय कही गई है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

तुम त्रिमूर्ति रोहिणी कालिका। कूष्माण्डा कार्तिका चण्डिका॥

अर्थ

चालीसा त्रिमूर्ति, रोहिणी, कालिका, कूष्माण्डा, कार्तिका और चण्डिका नाम गिनाती है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 9

तारा भुवनेश्वरी अनन्या। तुम्हीं छिन्नमस्ता शुचिधन्या॥

अर्थ

तारा, अनुपम भुवनेश्वरी और छिन्नमस्ता के रूपों में आपको प्रणाम है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 10

धूमावती षोडशी माता। बगला मातंगी विख्याता॥

अर्थ

धूमावती, षोडशी, बगला और मातंगी नामों से देवी का स्मरण है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 11

तुम भैरवी मातु तुम कमला। रक्तदन्तिका कीरति अमला॥

अर्थ

भैरवी, कमला तथा निर्मल कीर्तिवाली रक्तदन्तिका की वन्दना है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 12

शाकम्भरी कौशिकी भीमा। महातमा अग जग की सीमा॥

अर्थ

शाकम्भरी, कौशिकी और भीमा नामों में चराचर से परे देवी की महिमा कही गई है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 13

चन्द्रघण्टिका तुम सावित्री। ब्रह्मवादिनी मां गायत्री॥

अर्थ

चन्द्रघण्टिका, सावित्री, ब्रह्मवादिनी और गायत्री माता का स्मरण है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 14

रूद्राणी तुम कृष्ण पिंगला। अग्निज्वाला तुम सर्वमंगला॥

अर्थ

रुद्राणी, कृष्णपिंगला, अग्निज्वाला और सर्वमंगला रूपों की स्तुति है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 15

मेघस्वना तपस्विनि योगिनी। सहस्राक्षि तुम अगजग भोगिनी॥

अर्थ

मेघस्वना, तपस्विनी, योगिनी और सहस्राक्षी के रूप में जगतव्यापिनी को प्रणाम है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 16

जलोदरी सरस्वती डाकिनी। त्रिदशेश्वरी अजेय लाकिनी॥

अर्थ

यह पद जलोदरी, सरस्वती, डाकिनी, त्रिदशेश्वरी और अजेय लाकिनी नाम लेता है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 17

पुष्टि तुष्टि धृति स्मृति शिव दूती। कामाक्षी लज्जा आहूती॥

अर्थ

पुष्टि, तुष्टि, धृति, स्मृति, शिवदूती, कामाक्षी, लज्जा और आहुति में देवी का स्मरण है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

महोदरी कामाक्षि हारिणी। विनायकी श्रुति महा शाकिनी॥

अर्थ

महोदरी, कामाक्षी, विनायकी और महाशाकिनी सहित देवी के नामों का आह्वान है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 19

अजा कर्ममोही ब्रह्माणी। धात्री वाराही शर्वाणी॥

अर्थ

अजा, ब्रह्माणी, धात्री, वाराही और शर्वाणी रूपों की वन्दना है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 20

स्कन्द मातु तुम सिंह वाहिनी। मातु सुभद्रा रहहु दाहिनी॥

अर्थ

स्कन्दमाता और सिंहवाहिनी माता से सुभद्रा रूप में अनुकूल रहने की प्रार्थना है।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 21

नाम रूप गुण अमित तुम्हारे। शेष शारदा बरणत हारे॥

अर्थ

आपके नाम, रूप और गुण इतने हैं कि शेष और शारदा भी पूरा वर्णन नहीं कर पाते।

व्याख्या

पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं।

चौपाई 22

तनु छवि श्यामवर्ण तव माता। नाम कालिका जग विख्याता॥

अर्थ

माता का श्यामवर्ण रूप कालिका नाम से प्रसिद्ध बताया गया है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 23

अष्टादश तब भुजा मनोहर। तिनमहँ अस्त्र विराजत सुन्दर॥

अर्थ

इस पद में देवी की अठारह भुजाओं और उनमें धारण आयुधों का वर्णन है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 24

शंख चक्र अरू गदा सुहावन। परिघ भुशण्डी घण्टा पावन॥

अर्थ

शंख, चक्र, गदा, परिघ, भुशुण्डी और घण्टा उनके आयुध बताए गए हैं।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 25

शूल बज्र धनुबाण उठाए। निशिचर कुल सब मारि गिराए॥

अर्थ

शूल, वज्र और धनुष-बाण धारण कर असुरों के पराभव का वर्णन है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 26

शुंभ निशुंभ दैत्य संहारे। रक्तबीज के प्राण निकारे॥

अर्थ

शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज के संहार की कथा का स्मरण है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 27

चौंसठ योगिनी नाचत संगा। मद्यपान कीन्हैउ रण गंगा॥

अर्थ

युद्ध के उग्र दृश्य में चौंसठ योगिनियों के नृत्य और मद्यपान का काव्यात्मक उल्लेख है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि। दैत्यवंश कांपत जेहि सुनि-सुनि॥

अर्थ

करधनी और नूपुर की ध्वनि से असुरों के काँपने का चित्रण है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 29

कर खप्पर त्रिशूल भयकारी। अहै सदा सन्तन सुखकारी॥

अर्थ

खप्पर और त्रिशूल भयावह हैं, पर वही रूप भक्तों के लिए आश्रय है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 30

शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा। बजत मृदंग भेरी के बाजा॥

अर्थ

शव पर आरूढ़ देवी के नृत्य और मृदंग-भेरी की ध्वनि का वर्णन है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 31

रक्त पान अरिदल को कीन्हा। प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा॥

अर्थ

युद्ध-काव्य में विरोधी असुरदल के रक्तपान और पराभव का उल्लेख है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 32

लपलपाति जिव्हा तव माता। भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता॥

अर्थ

लपलपाती जिह्वा के उग्र रूप में भक्तों के सुख और दुष्टता के प्रतिकार की स्तुति है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 33

लसत भाल सेंदुर को टीको। बिखरे केश रूप अति नीको॥

अर्थ

ललाट पर सिन्दूर और बिखरे केशों से देवी के रूप का वर्णन है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 34

मुंडमाल गल अतिशय सोहत। भुजामल किंकण मनमोहन॥

अर्थ

मुण्डमाला और भुजाओं के आभूषणों से देवी की छवि बताई गई है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 35

प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी। जगदम्बा कहि वेद बखानी॥

अर्थ

प्रलय-नृत्य करने वाली भवानी को जगदम्बा कहकर स्तुति की गई है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 36

तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला॥

अर्थ

श्मशानवासिनी कराल देवी से भक्ति द्वारा भवबन्धन से मुक्ति की कामना है।

व्याख्या

यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं।

चौपाई 37

बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर। जहाँ बिराजत विविध रूप धर॥

अर्थ

यह पद बावन शक्तिपीठों और देवी के विविध रूपों का पारम्परिक उल्लेख करता है।

व्याख्या

यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता।

विन्ध्यवासिनी कहूँ बड़ाई। कहँ कालिका रूप सुहाई॥

अर्थ

कहीं विन्ध्यवासिनी और कहीं कालिका रूप में देवी की महिमा गाई जाती है।

व्याख्या

यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता।

चौपाई 39

शाकम्भरी बनी कहँ ज्वाला। महिषासुर मर्दिनी कराला॥

अर्थ

शाकम्भरी, ज्वाला और महिषासुरमर्दिनी रूपों का स्मरण है।

व्याख्या

यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता।

चौपाई 40

कामाख्या तव नाम मनोहर। पुजवहिं मनोकामना द्रुततर॥

अर्थ

कामाख्या नाम की महिमा के साथ भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं।

व्याख्या

यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता।

चौपाई 41

चंड मुंड वध छिन महं करेउ। देवन के उर आनन्द भरेउ॥

अर्थ

चण्ड-मुण्ड के संहार से देवताओं के आनन्दित होने की कथा है।

व्याख्या

यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता।

चौपाई 42

सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा। अरिदल दलन लेहु अवतारा॥

अर्थ

सर्वव्यापिनी तारा से असुरदल का प्रतिकार करने के लिए प्रकट होने की प्रार्थना है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 43

खलबल मचत सुनत हुँकारी। अगजग व्यापक देह तुम्हारी॥

अर्थ

देवी की हुँकार से विरोधी शक्तियों में हलचल और चराचर में उनकी व्याप्ति कही गई है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 44

तुम विराट रूपा गुणखानी। विश्व स्वरूपा तुम महारानी॥

अर्थ

देवी को विराट, गुणों की खान, विश्वस्वरूप और महारानी कहा गया है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 45

उत्पत्ति स्थिति लय तुम्हरे कारण। करहु दास के दोष निवारण॥

अर्थ

सृष्टि, स्थिति और लय की आधारभूत देवी से अपने दोषों के निवारण की प्रार्थना है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 46

माँ उर वास करहू तुम अंबा। सदा दीन जन की अवलंबा॥

अर्थ

अम्बा माता से हृदय में रहने और दीनजनों का सहारा बनने की विनती है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 47

तुम्हारो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहुँ नहिं होई॥

अर्थ

देवी के ध्यान को भय के बीच आश्रय के रूप में सराहा गया है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

विश्वरूप तुम आदि भवानी। महिमा वेद पुराण बखानी॥

अर्थ

आदि भवानी के विश्वरूप की महिमा वेद-पुराण की स्तुति-भाषा में कही गई है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 49

अति अपार तव नाम प्रभावा। जपत न रहन रंच दुःख दावा॥

अर्थ

देवी के नामस्मरण को दुःख और व्याकुलता में सहारे के रूप में सराहा गया है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 50

महाकालिका जय कल्याणी। जयति सदा सेवक सुखदानी॥

अर्थ

कल्याणकारी महाकालिका की जय है, जिनसे भक्त सुख और कृपा की आशा रखते हैं।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 51

तुम अनन्त औदार्य विभूषण। कीजिए कृपा क्षमिये सब दूषण॥

अर्थ

अनन्त उदारता वाली माता से कृपा और दोषों की क्षमा माँगी गई है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 52

दास जानि निज दया दिखावहु। सुत अनुमानित सहित अपनावहु॥

अर्थ

अपने को सेवक और संतान मानकर दया तथा अपनापन देने की विनती है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 53

जननी तुम सेवक प्रति पाली। करहु कृपा सब विधि माँ काली॥

अर्थ

पालन करने वाली माता से सभी प्रकार की कृपा माँगी गई है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

चौपाई 54

पाठ करै चालीसा जोई। तापर कृपा तुम्हारी होई॥

अर्थ

अन्तिम चौपाई में श्रद्धापूर्वक पाठ पर देवी की कृपा की आशा व्यक्त की गई है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

जय तारा, जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल। शरणागत 'भक्त' है, रहहु सदा अनुकूल॥

अर्थ

तारा, दक्षिणा और कलावती की वन्दना करते हुए शरणागत भक्त अनुकूल कृपा माँगता है।

व्याख्या

भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

सन्दर्भ और संस्करण

यह MIT लाइसेंसयुक्त hindu-devotional-texts 0.8.0 पर आधारित अलग संस्करण है। इसे पूर्व पाण्डुलिपि-संस्करण का अभिन्न पाठ न समझें। इस संस्करण के वास्तविक 57 पाठ-खण्ड सुरक्षित हैं। रोमन पाठ देवनागरी का वर्तनी-आधारित IAST रूप है; हिन्दी बोलचाल के स्वर-लोप अलग हो सकते हैं। स्वतंत्र भाषा एवं छन्द समीक्षा अधूरी है।

पाठ की मर्यादा

इसे भक्ति-काव्य के रूप में पढ़ें। यह दीक्षा, अनुष्ठानिक अधिकार, आरोग्य-धन की गारंटी या अग्नि-विधि का निर्देश नहीं देता। पारम्परिक पाठ में नाम, कथा और फल-कथन उसी स्तुति की भाषा हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

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पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening 1

    jaya kālī jagadamba jaya, harani ogha agha puṃja| vāsa karahu nija dāsa ke, niśadina hṛdaya nikuṃja||

  2. Opening 2

    jayati kapālī kālikā, kaṃkālī sukha dāni| kṛpā karahu varadāyinī, nija sevaka anumāni||

  3. Chaupai 1

    jaya jaya jaya kālī kaṃkālī| jaya kapālinī, jayati karālī||

  4. Chaupai 2

    śaṃkara priyā, aparṇā, ambā| jaya kapardinī, jaya jagadambā||

  5. Chaupai 3

    āryā, halā, ambikā, māyā| kātyāyanī umā jagajāyā||

  6. Chaupai 4

    girijā gaurī durgā caṇḍī| dākṣāṇāyinī śāmbhavī pracaṃḍī||

  7. Chaupai 5

    pārvatī maṃgalā bhavānī| viśvakāriṇī satī mṛḍānī||

  8. Chaupai 6

    sarvamaṃgalā śaila nandinī| hemavatī tuma jagata vandinī||

  9. Chaupai 7

    brahmacāriṇī kālarātri jaya| mahārātri jaya moharātri jaya||

  10. Chaupai 8

    tuma trimūrti rohiṇī kālikā| kūṣmāṇḍā kārtikā caṇḍikā||

  11. Chaupai 9

    tārā bhuvaneśvarī ananyā| tumhīṃ chinnamastā śucidhanyā||

  12. Chaupai 10

    dhūmāvatī ṣoḍaśī mātā| bagalā mātaṃgī vikhyātā||

  13. Chaupai 11

    tuma bhairavī mātu tuma kamalā| raktadantikā kīrati amalā||

  14. Chaupai 12

    śākambharī kauśikī bhīmā| mahātamā aga jaga kī sīmā||

  15. Chaupai 13

    candraghaṇṭikā tuma sāvitrī| brahmavādinī māṃ gāyatrī||

  16. Chaupai 14

    rūdrāṇī tuma kṛṣṇa piṃgalā| agnijvālā tuma sarvamaṃgalā||

  17. Chaupai 15

    meghasvanā tapasvini yoginī| sahasrākṣi tuma agajaga bhoginī||

  18. Chaupai 16

    jalodarī sarasvatī ḍākinī| tridaśeśvarī ajeya lākinī||

  19. Chaupai 17

    puṣṭi tuṣṭi dhṛti smṛti śiva dūtī| kāmākṣī lajjā āhūtī||

  20. Chaupai 18

    mahodarī kāmākṣi hāriṇī| vināyakī śruti mahā śākinī||

  21. Chaupai 19

    ajā karmamohī brahmāṇī| dhātrī vārāhī śarvāṇī||

  22. Chaupai 20

    skanda mātu tuma siṃha vāhinī| mātu subhadrā rahahu dāhinī||

  23. Chaupai 21

    nāma rūpa guṇa amita tumhāre| śeṣa śāradā baraṇata hāre||

  24. Chaupai 22

    tanu chavi śyāmavarṇa tava mātā| nāma kālikā jaga vikhyātā||

  25. Chaupai 23

    aṣṭādaśa taba bhujā manohara| tinamaham̐ astra virājata sundara||

  26. Chaupai 24

    śaṃkha cakra arū gadā suhāvana| parigha bhuśaṇḍī ghaṇṭā pāvana||

  27. Chaupai 25

    śūla bajra dhanubāṇa uṭhāe| niśicara kula saba māri girāe||

  28. Chaupai 26

    śuṃbha niśuṃbha daitya saṃhāre| raktabīja ke prāṇa nikāre||

  29. Chaupai 27

    cauṃsaṭha yoginī nācata saṃgā| madyapāna kīnhaiu raṇa gaṃgā||

  30. Chaupai 28

    kaṭi kiṃkiṇī madhura nūpura dhuni| daityavaṃśa kāṃpata jehi suni-suni||

  31. Chaupai 29

    kara khappara triśūla bhayakārī| ahai sadā santana sukhakārī||

  32. Chaupai 30

    śava ārūṛha nṛtya tuma sājā| bajata mṛdaṃga bherī ke bājā||

  33. Chaupai 31

    rakta pāna aridala ko kīnhā| prāṇa tajeu jo tumhiṃ na cīnhā||

  34. Chaupai 32

    lapalapāti jivhā tava mātā| bhaktana sukha duṣṭana duḥkha dātā||

  35. Chaupai 33

    lasata bhāla seṃdura ko ṭīko| bikhare keśa rūpa ati nīko||

  36. Chaupai 34

    muṃḍamāla gala atiśaya sohata| bhujāmala kiṃkaṇa manamohana||

  37. Chaupai 35

    pralaya nṛtya tuma karahu bhavānī| jagadambā kahi veda bakhānī||

  38. Chaupai 36

    tuma maśāna vāsinī karālā| bhajata turata kāṭahu bhavajālā||

  39. Chaupai 37

    bāvana śakti pīṭha tava sundara| jahām̐ birājata vividha rūpa dhara||

  40. Chaupai 38

    vindhyavāsinī kahūm̐ baṛāī| kaham̐ kālikā rūpa suhāī||

  41. Chaupai 39

    śākambharī banī kaham̐ jvālā| mahiṣāsura mardinī karālā||

  42. Chaupai 40

    kāmākhyā tava nāma manohara| pujavahiṃ manokāmanā drutatara||

  43. Chaupai 41

    caṃḍa muṃḍa vadha china mahaṃ kareu| devana ke ura ānanda bhareu||

  44. Chaupai 42

    sarva vyāpinī tuma mām̐ tārā| aridala dalana lehu avatārā||

  45. Chaupai 43

    khalabala macata sunata hum̐kārī| agajaga vyāpaka deha tumhārī||

  46. Chaupai 44

    tuma virāṭa rūpā guṇakhānī| viśva svarūpā tuma mahārānī||

  47. Chaupai 45

    utpatti sthiti laya tumhare kāraṇa| karahu dāsa ke doṣa nivāraṇa||

  48. Chaupai 46

    mām̐ ura vāsa karahū tuma aṃbā| sadā dīna jana kī avalaṃbā||

  49. Chaupai 47

    tumhāro dhyāna dharai jo koī| tā kaham̐ bhīti katahum̐ nahiṃ hoī||

  50. Chaupai 48

    viśvarūpa tuma ādi bhavānī| mahimā veda purāṇa bakhānī||

  51. Chaupai 49

    ati apāra tava nāma prabhāvā| japata na rahana raṃca duḥkha dāvā||

  52. Chaupai 50

    mahākālikā jaya kalyāṇī| jayati sadā sevaka sukhadānī||

  53. Chaupai 51

    tuma ananta audārya vibhūṣaṇa| kījie kṛpā kṣamiye saba dūṣaṇa||

  54. Chaupai 52

    dāsa jāni nija dayā dikhāvahu| suta anumānita sahita apanāvahu||

  55. Chaupai 53

    jananī tuma sevaka prati pālī| karahu kṛpā saba vidhi mām̐ kālī||

  56. Chaupai 54

    pāṭha karai cālīsā joī| tāpara kṛpā tumhārī hoī||

  57. Closing 1

    jaya tārā, jaya dakṣiṇā, kalāvatī sukhamūla| śaraṇāgata 'bhakta' hai, rahahu sadā anukūla||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

हे काली जगन्माता, दोषों को दूर करके भक्त के हृदय में निवास करें। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। कपालिनी कालिका को प्रणाम; सेवक मानकर कृपा और शुभभाव दें। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। काली के कंकाली, कपालिनी और कराली रूपों की वन्दना है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। आप शंकरप्रिया, अपर्णा, अम्बा और जगदम्बा कहलाती हैं। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। स्तुति आर्या, हला, अम्बिका, माया, कात्यायनी और उमा नामों से प्रणाम करती है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। आप गिरिजा, गौरी, दुर्गा, चण्डी, दक्षकन्या और शाम्भवी के रूप में स्तुत हैं। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। पार्वती, मंगला, भवानी, सती और मृडानी नामों में जगत की धारिणी का स्मरण है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। आप मंगलदायिनी शैलनन्दिनी और हेमवती हैं, जिनकी जगत वन्दना करता है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। ब्रह्मचारिणी, कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि की जय कही गई है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। चालीसा त्रिमूर्ति, रोहिणी, कालिका, कूष्माण्डा, कार्तिका और चण्डिका नाम गिनाती है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। तारा, अनुपम भुवनेश्वरी और छिन्नमस्ता के रूपों में आपको प्रणाम है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। धूमावती, षोडशी, बगला और मातंगी नामों से देवी का स्मरण है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। भैरवी, कमला तथा निर्मल कीर्तिवाली रक्तदन्तिका की वन्दना है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। शाकम्भरी, कौशिकी और भीमा नामों में चराचर से परे देवी की महिमा कही गई है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। चन्द्रघण्टिका, सावित्री, ब्रह्मवादिनी और गायत्री माता का स्मरण है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। रुद्राणी, कृष्णपिंगला, अग्निज्वाला और सर्वमंगला रूपों की स्तुति है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। मेघस्वना, तपस्विनी, योगिनी और सहस्राक्षी के रूप में जगतव्यापिनी को प्रणाम है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। यह पद जलोदरी, सरस्वती, डाकिनी, त्रिदशेश्वरी और अजेय लाकिनी नाम लेता है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। पुष्टि, तुष्टि, धृति, स्मृति, शिवदूती, कामाक्षी, लज्जा और आहुति में देवी का स्मरण है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। महोदरी, कामाक्षी, विनायकी और महाशाकिनी सहित देवी के नामों का आह्वान है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। अजा, ब्रह्माणी, धात्री, वाराही और शर्वाणी रूपों की वन्दना है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। स्कन्दमाता और सिंहवाहिनी माता से सुभद्रा रूप में अनुकूल रहने की प्रार्थना है। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। आपके नाम, रूप और गुण इतने हैं कि शेष और शारदा भी पूरा वर्णन नहीं कर पाते। पद काली की स्तुति में देवी के अनेक नाम जोड़ता है। इस काव्यात्मक अभेद से सभी परम्पराएँ और उनकी विधियाँ एक समान अधिकृत नहीं हो जातीं। माता का श्यामवर्ण रूप कालिका नाम से प्रसिद्ध बताया गया है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। इस पद में देवी की अठारह भुजाओं और उनमें धारण आयुधों का वर्णन है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। शंख, चक्र, गदा, परिघ, भुशुण्डी और घण्टा उनके आयुध बताए गए हैं। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। शूल, वज्र और धनुष-बाण धारण कर असुरों के पराभव का वर्णन है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज के संहार की कथा का स्मरण है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। युद्ध के उग्र दृश्य में चौंसठ योगिनियों के नृत्य और मद्यपान का काव्यात्मक उल्लेख है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। करधनी और नूपुर की ध्वनि से असुरों के काँपने का चित्रण है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। खप्पर और त्रिशूल भयावह हैं, पर वही रूप भक्तों के लिए आश्रय है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। शव पर आरूढ़ देवी के नृत्य और मृदंग-भेरी की ध्वनि का वर्णन है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। युद्ध-काव्य में विरोधी असुरदल के रक्तपान और पराभव का उल्लेख है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। लपलपाती जिह्वा के उग्र रूप में भक्तों के सुख और दुष्टता के प्रतिकार की स्तुति है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। ललाट पर सिन्दूर और बिखरे केशों से देवी के रूप का वर्णन है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। मुण्डमाला और भुजाओं के आभूषणों से देवी की छवि बताई गई है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। प्रलय-नृत्य करने वाली भवानी को जगदम्बा कहकर स्तुति की गई है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। श्मशानवासिनी कराल देवी से भक्ति द्वारा भवबन्धन से मुक्ति की कामना है। यह देवी-कथा और प्रतिमा-विधान की काव्यात्मक छवि है; हिंसा, मद्यपान या प्रतिबन्धित विधि करने का निर्देश नहीं। यह पद बावन शक्तिपीठों और देवी के विविध रूपों का पारम्परिक उल्लेख करता है। यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता। कहीं विन्ध्यवासिनी और कहीं कालिका रूप में देवी की महिमा गाई जाती है। यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता। शाकम्भरी, ज्वाला और महिषासुरमर्दिनी रूपों का स्मरण है। यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता। कामाख्या नाम की महिमा के साथ भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं। यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता। चण्ड-मुण्ड के संहार से देवताओं के आनन्दित होने की कथा है। यह देवी के नाम, तीर्थ या कथा का स्मरण है। परम्पराएँ अलग हैं; पद कोई सर्वमान्य सूची या पर्व की तारीख प्रमाणित नहीं करता। सर्वव्यापिनी तारा से असुरदल का प्रतिकार करने के लिए प्रकट होने की प्रार्थना है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। देवी की हुँकार से विरोधी शक्तियों में हलचल और चराचर में उनकी व्याप्ति कही गई है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। देवी को विराट, गुणों की खान, विश्वस्वरूप और महारानी कहा गया है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। सृष्टि, स्थिति और लय की आधारभूत देवी से अपने दोषों के निवारण की प्रार्थना है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। अम्बा माता से हृदय में रहने और दीनजनों का सहारा बनने की विनती है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। देवी के ध्यान को भय के बीच आश्रय के रूप में सराहा गया है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। आदि भवानी के विश्वरूप की महिमा वेद-पुराण की स्तुति-भाषा में कही गई है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। देवी के नामस्मरण को दुःख और व्याकुलता में सहारे के रूप में सराहा गया है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। कल्याणकारी महाकालिका की जय है, जिनसे भक्त सुख और कृपा की आशा रखते हैं। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। अनन्त उदारता वाली माता से कृपा और दोषों की क्षमा माँगी गई है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। अपने को सेवक और संतान मानकर दया तथा अपनापन देने की विनती है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। पालन करने वाली माता से सभी प्रकार की कृपा माँगी गई है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। अन्तिम चौपाई में श्रद्धापूर्वक पाठ पर देवी की कृपा की आशा व्यक्त की गई है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं। तारा, दक्षिणा और कलावती की वन्दना करते हुए शरणागत भक्त अनुकूल कृपा माँगता है। भक्त श्रद्धा और कृपा की कामना व्यक्त करता है। फल-संबंधी कथन स्तुति की विश्वास-भाषा हैं, व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी नहीं।

  1. hindu-devotional-texts 0.8.0, पाठ-संग्रह · स्रोत खोलें