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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

स्तोत्र

बिल्वाष्टकम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ और हिन्दी अर्थ

शिव को बिल्वपत्र अर्पण की आठ-श्लोकी स्तुति और पाठान्तरों की स्पष्ट जानकारी।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

श्लोक 1

त्रिदळं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधं । त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥१॥

अर्थ

स्तोत्र में तीन दलों वाला एक बिल्वपत्र तीन गुणों, शिव के तीन नेत्रों और तीन आयुधों की याद दिलाता है। कवि उसे तीन जन्मों के पाप मिटाने की भक्ति-भावना के साथ शिव को समर्पित करता है।

व्याख्या

बार-बार आया ‘त्रि’ साधारण पत्ते को शिव-चिन्तन का रूप देता है। ‘तीन जन्म’ को मापने योग्य कर्म-गणना नहीं, धार्मिक शुद्धि की काव्यमय अभिव्यक्ति समझें। चयनित पाठ में त्रिदळं और शिवार्पितम् हैं; इन्हें दूसरी पाठ-परम्परा के शब्दों से नहीं बदला गया।

श्लोक 2

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैश्शुभैः । तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥२॥

अर्थ

तीन शाखाओं वाले, कोमल, शुभ और बिना छेद के बिल्वपत्रों से मैं आपकी पूजा करूँगा; यह एक बिल्वपत्र शिव को समर्पित है।

व्याख्या

पत्ते की पूर्णता अर्पण में सावधानी और श्रद्धा को महत्त्व देती है, महँगी सामग्री को नहीं। दूसरी पंक्ति की पूरी टेक सम्पादकीय विस्तार है: चयनित मुद्रित पृष्ठ यहाँ ‘एक ...’ लिखकर टेक संक्षिप्त करता है। ‘पूजा करूँगा’ काव्य का कथन है, अनिवार्य विधि नहीं।

श्लोक 3

दर्शनं बिल्ववृक्षैश्च स्पर्शनं पापनाशनम् । अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥३॥

अर्थ

बिल्ववृक्षों का दर्शन और स्पर्श पवित्र करने वाला बताया गया है; अर्पित बिल्वपत्र को गम्भीर पापों से मुक्ति की प्रार्थना से जोड़ा गया है।

व्याख्या

वृक्ष को देखना और छूना पवित्र प्रकृति से निकटता का भाव जगाता है। इसे वैज्ञानिक उपचार, वास्तविक हानि की क्षतिपूर्ति या नैतिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं मानना चाहिए। दूसरे पाठों में यहाँ नन्दिकेश्वर वाला अलग श्लोक मिलता है।

श्लोक 4

सालग्रामेषु विप्रेषु तटाके वनकूपयोः । यज्ञकोटिसहस्राणां एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥४॥

अर्थ

यह श्लोक एक बिल्वपत्र के अर्पण की तुलना शालग्राम, ब्राह्मणों, तालाबों, वन-कुओं और असंख्य यज्ञों से जुड़े पुण्य से करता है।

व्याख्या

यह पुराने पुण्य-वर्णन की संक्षिप्त सूची है, जिसमें दान और जल-संरचना जैसे लोकहितकारी कार्य आते हैं। व्याकरण कई स्थानों पर संक्षिप्त है; प्रत्येक शब्द से कोई निश्चित दान-विधि सिद्ध नहीं होती। बिल्वपत्र और यज्ञों की तुलना को धन का वास्तविक मूल्यांकन न समझें।

श्लोक 5

दन्तिकोटिसहस्रेषु अश्वमेधशतानि च । कोटिकन्याप्रदानेन एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥५॥

अर्थ

कवि एक बिल्वपत्र को हाथियों के असाधारण दान, सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों और कन्यादान से जुड़े प्राचीन पुण्य-वर्णन के बराबर रखता है।

व्याख्या

यह धार्मिक अतिशयोक्ति है; इसका आशय महिलाओं को वस्तु मानना या पशु-बलि करने का निर्देश देना नहीं है। ऐतिहासिक दान-भाषा को आज के नैतिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। इस पाठ में अश्वमेध है; कुछ अन्य पाठों में वाजपेय आता है।

श्लोक 6

एकं च बिल्वपत्रैश्च कोटियज्ञफलं लभेत् । महादेवैश्च पूजार्थ एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥६॥

अर्थ

यह श्लोक कहता है कि महादेव के प्रति श्रद्धा से एक बिल्वपत्र अर्पित करना असंख्य यज्ञों के पुण्य के तुल्य माना गया है।

व्याख्या

चयनित मुद्रित पाठ में वचन और वाक्यरचना की कठिनाइयाँ हैं। यहाँ एकं च बिल्वपत्रैश्च तथा महादेवैश्च पूजार्थ यथावत् रखे गए हैं; उन्हें चुपचाप अधिक प्रचलित व्याकरण में नहीं बदला। अर्थ सम्भावित भक्तिभाव को बताता है, किसी असिद्ध शब्दशः पाठ को नहीं।

श्लोक 7

काशीक्षेत्रे निवासं च कालभैरवदर्शनम् । गयाप्रयागमे दृष्ट्वा एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥७॥

अर्थ

काशी में निवास, कालभैरव का दर्शन और गया-प्रयाग से जुड़े तीर्थदर्शन जैसे पुण्यकारी प्रसंग एक बिल्वपत्र के अर्पण के साथ स्मरण किए गए हैं।

व्याख्या

यह श्लोक शिवभक्ति को उत्तर भारत की तीर्थपरम्परा से जोड़ता है। मुद्रित गयाप्रयागमे दृष्ट्वा को ज्यों का त्यों रखा गया है; दूसरे पाठ में प्रयागे माधवं दृष्ट्वा मिलता है, जिससे दर्शन का विषय बदलता है। यहाँ यात्रा का अनिवार्य नियम नहीं दिया गया।

श्लोक 8

उमया सह देवेशं वाहनं नन्दिशङ्करम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो एकबिल्वं शिवार्पितम् ॥८॥

॥ इति श्रीबिल्वाष्टकम् ॥

अर्थ

कवि उमा के साथ देवेश शिव और नन्दी की स्मृति करता है तथा एक बिल्वपत्र के अर्पण से पापों से मुक्ति की प्रार्थना करता है।

व्याख्या

उमा-शिव का उल्लेख दिव्यता के पारिवारिक और सम्बन्धात्मक रूप को भी सामने लाता है। मुद्रित वाहनं नन्दिशङ्करम् का व्याकरण अस्पष्ट है; इसलिए नन्दी को शिव से सम्बद्ध बताना सुरक्षित है, पर कोई एक निश्चित समासार्थ सिद्ध बताना नहीं।

तुलसी बिल्व निर्गुण्डी अपामार्गकपित्थको । शमी चामलकं दूर्वा अष्टबिल्वाः प्रकीर्तिताः ॥९॥

॥ इत्यष्टबिल्वानि॥

अर्थ

एक परिशिष्ट-श्लोक तुलसी, बिल्व, निर्गुण्डी, अपामार्ग, कपित्थ, शमी, आमलक और दूर्वा जैसे आठ वनस्पति-नामों को ‘अष्टबिल्व’ की सूची में रखता है।

व्याख्या

मूल पाठ में इसके पहले इति श्रीबिल्वाष्टकम् और बाद में इत्यष्टबिल्वानि है। इसलिए यह आठ मूल स्तुतिश्लोकों से अलग वनस्पति-सूची है, न नौवाँ मुख्य स्तोत्रश्लोक और न फलश्रुति। पौधों की क्षेत्रीय पहचान विशेषज्ञ जाँच की विषयवस्तु है; यह औषधि या पत्ते तोड़ने की विधि नहीं है।

सन्दर्भ और उपयोग

संस्करण-सूचना: आठ मूल श्लोक संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (प्रथम भाग; स्कैन पृष्ठ 446–447, 1953 के रूप में अंकित) के पाठ से लिए गए हैं। मुद्रित पाठ में 2–7 श्लोकों की बार-बार आने वाली टेक ‘एक ...’ के रूप में संक्षिप्त है; यहाँ उसी प्रमाणित टेक का विस्तार किया गया है। बाद की वनस्पति-सूची अलग रखी गई है। मूल स्कैन का विशेषज्ञ मिलान और अधिकार-जाँच शेष है। 1 2 3

हर श्लोक का हिन्दी अर्थ और व्याख्या

अलग परिशिष्ट — आठ पौधों की सूची {#appendix-001}

अर्थ: एक परिशिष्ट-श्लोक तुलसी, बिल्व, निर्गुण्डी, अपामार्ग, कपित्थ, शमी, आमलक और दूर्वा जैसे आठ वनस्पति-नामों को ‘अष्टबिल्व’ की सूची में रखता है। व्याख्या: मूल पाठ में इसके पहले इति श्रीबिल्वाष्टकम् और बाद में इत्यष्टबिल्वानि है। इसलिए यह आठ मूल स्तुतिश्लोकों से अलग वनस्पति-सूची है, न नौवाँ मुख्य स्तोत्रश्लोक और न फलश्रुति। पौधों की क्षेत्रीय पहचान विशेषज्ञ जाँच की विषयवस्तु है; यह औषधि या पत्ते तोड़ने की विधि नहीं है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

बिल्वाष्टकम् क्या है? बिल्वाष्टकम् आठ श्लोकों की वह स्तुति है जिसमें शिव को एक बिल्वपत्र समर्पित करने का भाव बार-बार आता है। चुने हुए पाठ की टेक ‘एकबिल्वं शिवार्पितम्’ है। कवि छोटे-से अर्पण को दान, यज्ञ, तीर्थदर्शन और पाप-शुद्धि के बड़े पारम्परिक प्रतीकों के साथ रखता है। उसका संदेश श्रद्धा का मूल्य है; गणित की तरह पुण्य का हिसाब देना नहीं। 1 5

बेल/बिल्व का वनस्पति-विज्ञान में नाम Aegle marmelos है और यह रूटेसी (Rutaceae) कुल का पौधा है। केव के वनस्पति अभिलेख के अनुसार इसकी पत्तियाँ प्रायः तीन पत्रकों वाली होती हैं और इसका मूल क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप है। ये वैज्ञानिक तथ्य हैं; तीन गुण, तीन नेत्र या तीन दिव्य प्रतीकों का सम्बन्ध धार्मिक व्याख्या है। 6

एक पत्ते में इतना महत्त्व क्यों? स्तोत्र बार-बार प्रश्न उठाता है: भक्ति में मूल्य वस्तु की कीमत से आता है या अर्पणकर्ता की निष्ठा से? ‘एक बिल्वपत्र’ महँगी सामग्री के बजाय सहज श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है। करोड़ों दान या सैकड़ों यज्ञों के उल्लेख साहित्यिक अतिशयोक्ति की शैली हैं। इससे वास्तविक जीवन में किसी चमत्कार की गारंटी या हानि पहुँचाने के बाद उत्तरदायित्व से छूट नहीं मिलती। पुराने सामाजिक संदर्भों में अश्वमेध और कन्यादान जैसे शब्द आते हैं। उनकी ऐतिहासिक स्थिति समझाना उचित है, लेकिन उन्हें आज के पाठक के लिए पशुबलि या किसी व्यक्ति को संपत्ति मानने का निर्देश नहीं बनाया जा सकता।

अलग-अलग बिल्वाष्टकम् क्यों मिलते हैं? एक प्रसिद्ध पाठ में नन्दिकेश्वर, लक्ष्मी से बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति और जड़–मध्य–अग्र में ब्रह्मा–विष्णु–शिव का वर्णन मिलता है। उसमें प्रायः अलग फलश्रुति भी है। चयनित बृहत्स्तोत्ररत्नाकर पाठ में इसके स्थान पर बिल्ववृक्ष का दर्शन, काशी–कालभैरव और बाद में आठ वनस्पतियों की अलग सूची आती है। दोनों परम्पराओं को जोड़कर नया ‘प्रामाणिक’ पाठ नहीं बनाया गया है। 1 4 5

चयनित पाठ के चौथे और छठे श्लोक का संस्कृत व्याकरण कुछ स्थानों पर कठिन या अनियमित है। व्याख्याएँ भक्तिभाव का सम्भावित अर्थ देती हैं, न कि असिद्ध शब्दार्थ को निश्चित बताती हैं। मुद्रण में 2–7 श्लोकों की संक्षिप्त टेक केवल उसी संस्करण में उपलब्ध पूर्ण टेक के आधार पर भरी गई है और यह सम्पादकीय विस्तार बताया गया है।

रचनाकार और स्रोत की सीमा

इस चयनित संस्करण से किसी एक कवि का नाम ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं होता। कुछ आधुनिक वेबसाइटों पर आदि शंकराचार्य का नाम मिलता है, लेकिन उससे इस विशेष पाठ का लेखन प्रमाणित नहीं हो जाता। इसी तरह ‘1953’ पुस्तक/विकिस्रोत का दिनांकन है, स्तोत्र की रचनातिथि नहीं। मूल छपी छवि, मुखपृष्ठ और पाठान्तरों का स्वतंत्र विशेषज्ञ मिलान शेष है। 1 2 3

सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर बिल्वपत्र अर्पण की परम्पराएँ मिलती हैं। सभी परिवारों और मठों में सामग्री चुनने, पत्ते लाने या पाठ की संख्या के समान नियम नहीं होते। यह पाठ आध्यात्मिक-साहित्यिक अध्ययन के लिए है, किसी विशेष पूजाविधि का आदेश नहीं।

शब्दार्थ और उच्चारण

शब्दसरल अर्थ
बिल्वबेल का वृक्ष या पत्ता
अष्टकम्आठ श्लोकों की स्तुति
एकबिल्वम्एक बिल्वपत्र
शिवार्पितम्शिव को अर्पित/समर्पित
त्रिगुणसत्त्व, रजस्, तमस् — तीन गुण
कालभैरवकाशी से जुड़े पूजनीय भैरव स्वरूप
अष्टबिल्वाःपरिशिष्ट में दी गई आठ पौधों की सूची का शब्द

देवनागरी में त्रिदळं की ‘ळ’ को ध्यान से पढ़ें; कई दूसरे संस्करण त्रिदलं लिखते हैं। ‘शिवार्पितम्’ और ‘शिवार्पणम्’ को बिना बताए एक-दूसरे के स्थान पर नहीं रखना चाहिए।

सामान्य प्रश्न

बिल्वाष्टकम् में कितने श्लोक हैं? मुख्य स्तोत्र के आठ श्लोक हैं। इस संस्करण में समाप्ति-पंक्ति के बाद नौवाँ क्रमांक लिए वनस्पतियों का अलग परिशिष्ट है। क्या यह ‘एकबिल्वं शिवार्पणम्’ वाला पाठ है? यही पाठ-परिवार है, पर चयनित प्रति में ‘शिवार्पितम्’ है। अन्य संस्करणों में ‘शिवार्पणम्’ या ‘बिल्वपत्रं शिवार्पणम्’ मिलता है। मेरे घर में कुछ श्लोक अलग क्यों हैं? कई पाठ-परम्पराएँ हैं। उनके श्लोक बदलने या क्रम मिलाने से मूल साक्ष्य बदल जाता है। क्या परिशिष्ट का अर्थ बिल्ववृक्ष के आठ अंग हैं? नहीं। वहाँ अलग-अलग पौधों के नाम गिनाए गए हैं। रचनाकार कौन हैं? उपलब्ध चयनित पाठ से ऐतिहासिक लेखक निश्चित नहीं होता। क्या पाठ से पाप अपने-आप मिट जाते हैं? यह धार्मिक आशा का काव्यात्मक कथन है; वास्तविक जीवन के कर्म और जिम्मेदारी अलग बने रहते हैं। क्या कोई निश्चित पाठ-संख्या या विधि अनिवार्य है? यह संस्करण ऐसी विधि नहीं बताता; समुदायों की परम्पराएँ अलग हो सकती हैं। क्या बिल्व वास्तविक वृक्ष है? हाँ। Aegle marmelos का वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है; उसकी पवित्रता धार्मिक प्रतीक का विषय है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Anonymous traditional hymn; historical printed compilation. Based on Bṛhatstotraratnākara (first part), Bilvāṣṭakam, scanned pages 446–447, Sanskrit Wikisource transcription. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Verse 1

    tridaḷaṃ triguṇākāraṃ trinetraṃ ca triyāyudhaṃ | trijanmapāpasaṃhāraṃ ekabilvaṃ śivārpitam ||1||

  2. Verse 2

    triśākhairbilvapatraiśca acchidraiḥ komalaiśśubhaiḥ | tava pūjāṃ kariṣyāmi ekabilvaṃ śivārpitam ||2||

  3. Verse 3

    darśanaṃ bilvavṛkṣaiśca sparśanaṃ pāpanāśanam | aghorapāpasaṃhāraṃ ekabilvaṃ śivārpitam ||3||

  4. Verse 4

    sālagrāmeṣu vipreṣu taṭāke vanakūpayoḥ | yajñakoṭisahasrāṇāṃ ekabilvaṃ śivārpitam ||4||

  5. Verse 5

    dantikoṭisahasreṣu aśvamedhaśatāni ca | koṭikanyāpradānena ekabilvaṃ śivārpitam ||5||

  6. Verse 6

    ekaṃ ca bilvapatraiśca koṭiyajñaphalaṃ labhet | mahādevaiśca pūjārtha ekabilvaṃ śivārpitam ||6||

  7. Verse 7

    kāśīkṣetre nivāsaṃ ca kālabhairavadarśanam | gayāprayāgame dṛṣṭvā ekabilvaṃ śivārpitam ||7||

  8. Verse 8

    umayā saha deveśaṃ vāhanaṃ nandiśaṅkaram | mucyate sarvapāpebhyo ekabilvaṃ śivārpitam ||8||

  9. Separate appendix — Eight named plants

    tulasī bilva nirguṇḍī apāmārgakapitthako | śamī cāmalakaṃ dūrvā aṣṭabilvāḥ prakīrtitāḥ ||9||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 {#shloka-001}

अर्थ: स्तोत्र में तीन दलों वाला एक बिल्वपत्र तीन गुणों, शिव के तीन नेत्रों और तीन आयुधों की याद दिलाता है। कवि उसे तीन जन्मों के पाप मिटाने की भक्ति-भावना के साथ शिव को समर्पित करता है। व्याख्या: बार-बार आया ‘त्रि’ साधारण पत्ते को शिव-चिन्तन का रूप देता है। ‘तीन जन्म’ को मापने योग्य कर्म-गणना नहीं, धार्मिक शुद्धि की काव्यमय अभिव्यक्ति समझें। चयनित पाठ में त्रिदळं और शिवार्पितम् हैं; इन्हें दूसरी पाठ-परम्परा के शब्दों से नहीं बदला गया। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 2 {#shloka-002}

अर्थ: तीन शाखाओं वाले, कोमल, शुभ और बिना छेद के बिल्वपत्रों से मैं आपकी पूजा करूँगा; यह एक बिल्वपत्र शिव को समर्पित है। व्याख्या: पत्ते की पूर्णता अर्पण में सावधानी और श्रद्धा को महत्त्व देती है, महँगी सामग्री को नहीं। दूसरी पंक्ति की पूरी टेक सम्पादकीय विस्तार है: चयनित मुद्रित पृष्ठ यहाँ ‘एक ...’ लिखकर टेक संक्षिप्त करता है। ‘पूजा करूँगा’ काव्य का कथन है, अनिवार्य विधि नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 3 {#shloka-003}

अर्थ: बिल्ववृक्षों का दर्शन और स्पर्श पवित्र करने वाला बताया गया है; अर्पित बिल्वपत्र को गम्भीर पापों से मुक्ति की प्रार्थना से जोड़ा गया है। व्याख्या: वृक्ष को देखना और छूना पवित्र प्रकृति से निकटता का भाव जगाता है। इसे वैज्ञानिक उपचार, वास्तविक हानि की क्षतिपूर्ति या नैतिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं मानना चाहिए। दूसरे पाठों में यहाँ नन्दिकेश्वर वाला अलग श्लोक मिलता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 4 {#shloka-004}

अर्थ: यह श्लोक एक बिल्वपत्र के अर्पण की तुलना शालग्राम, ब्राह्मणों, तालाबों, वन-कुओं और असंख्य यज्ञों से जुड़े पुण्य से करता है। व्याख्या: यह पुराने पुण्य-वर्णन की संक्षिप्त सूची है, जिसमें दान और जल-संरचना जैसे लोकहितकारी कार्य आते हैं। व्याकरण कई स्थानों पर संक्षिप्त है; प्रत्येक शब्द से कोई निश्चित दान-विधि सिद्ध नहीं होती। बिल्वपत्र और यज्ञों की तुलना को धन का वास्तविक मूल्यांकन न समझें। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 5 {#shloka-005}

अर्थ: कवि एक बिल्वपत्र को हाथियों के असाधारण दान, सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों और कन्यादान से जुड़े प्राचीन पुण्य-वर्णन के बराबर रखता है। व्याख्या: यह धार्मिक अतिशयोक्ति है; इसका आशय महिलाओं को वस्तु मानना या पशु-बलि करने का निर्देश देना नहीं है। ऐतिहासिक दान-भाषा को आज के नैतिक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। इस पाठ में अश्वमेध है; कुछ अन्य पाठों में वाजपेय आता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 6 {#shloka-006}

अर्थ: यह श्लोक कहता है कि महादेव के प्रति श्रद्धा से एक बिल्वपत्र अर्पित करना असंख्य यज्ञों के पुण्य के तुल्य माना गया है। व्याख्या: चयनित मुद्रित पाठ में वचन और वाक्यरचना की कठिनाइयाँ हैं। यहाँ एकं च बिल्वपत्रैश्च तथा महादेवैश्च पूजार्थ यथावत् रखे गए हैं; उन्हें चुपचाप अधिक प्रचलित व्याकरण में नहीं बदला। अर्थ सम्भावित भक्तिभाव को बताता है, किसी असिद्ध शब्दशः पाठ को नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 7 {#shloka-007}

अर्थ: काशी में निवास, कालभैरव का दर्शन और गया-प्रयाग से जुड़े तीर्थदर्शन जैसे पुण्यकारी प्रसंग एक बिल्वपत्र के अर्पण के साथ स्मरण किए गए हैं। व्याख्या: यह श्लोक शिवभक्ति को उत्तर भारत की तीर्थपरम्परा से जोड़ता है। मुद्रित गयाप्रयागमे दृष्ट्वा को ज्यों का त्यों रखा गया है; दूसरे पाठ में प्रयागे माधवं दृष्ट्वा मिलता है, जिससे दर्शन का विषय बदलता है। यहाँ यात्रा का अनिवार्य नियम नहीं दिया गया। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

श्लोक 8 {#shloka-008}

अर्थ: कवि उमा के साथ देवेश शिव और नन्दी की स्मृति करता है तथा एक बिल्वपत्र के अर्पण से पापों से मुक्ति की प्रार्थना करता है। व्याख्या: उमा-शिव का उल्लेख दिव्यता के पारिवारिक और सम्बन्धात्मक रूप को भी सामने लाता है। मुद्रित वाहनं नन्दिशङ्करम् का व्याकरण अस्पष्ट है; इसलिए नन्दी को शिव से सम्बद्ध बताना सुरक्षित है, पर कोई एक निश्चित समासार्थ सिद्ध बताना नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3

  1. Bṛhatstotraratnākara (first part), Bilvāṣṭakam, scanned pages 446–447, Sanskrit Wikisource transcription · स्रोत खोलें
  2. Proofread source page 446, Bṛhatstotraratnākara first part · स्रोत खोलें
  3. Proofread source page 447, Bṛhatstotraratnākara first part · स्रोत खोलें
  4. Gita Press Shiva Stotra Ratnakar recensional discussion (indirect via Valkala source audit) · स्रोत खोलें
  5. Shri Shiv Dham Hindu Temple Bilvashtakam recitation page · स्रोत खोलें
  6. Aegle marmelos (L.) Corrêa — Plants of the World Online · स्रोत खोलें
  7. Alternative printed Bilvashtakam discussed from 1957 Bṛhatstotraratnākara · स्रोत खोलें