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स्तोत्र

नारायणी स्तुति — देवीमाहात्म्य अध्याय ११

देवीमाहात्म्य के ११वें अध्याय में करुणा, मातृशक्ति और विश्व-रक्षा की ३३ श्लोकों वाली स्तुति।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

3

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य

अर्थ

हे शरणागतों का दुःख दूर करने वाली देवी, प्रसन्न हों! समस्त जगत् की माता, कृपा करें। विश्वेश्वरी, संसार की रक्षा करें; चल और अचल सब पर आपका ही अधिपत्य है।

व्याख्या

स्तुति विजय के गर्व से नहीं, शरण और करुणा की प्रार्थना से आरम्भ होती है। बार-बार की गई कृपा-याचना देवताओं से आगे समस्त चराचर जगत् तक पहुँचती है। देवी के सार्वभौम अधिकार का कथन इस स्तुति की भक्ति-प्रधान दृष्टि है।

4

आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये

अर्थ

आप ही पृथ्वी-स्वरूप होकर जगत् को धारण करती हैं। जल-स्वरूप में स्थित होकर आप पूरे संसार का पोषण करती हैं, हे अपराजेय सामर्थ्यवाली देवी।

व्याख्या

पृथ्वी और जल जीवन के दो आधारों—आश्रय और पोषण—का चित्र देते हैं। श्लोक में इन तत्वों के माध्यम से देवी की स्तुति है; इसे भौतिक विज्ञान का विवरण नहीं समझना चाहिए। जल-स्वरूप से जुड़ा संस्कृत समास अलग से जाँचना आवश्यक है।

5

त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः

अर्थ

आप अनन्त सामर्थ्यवाली वैष्णवी शक्ति, विश्व का परम बीज और महान् माया हैं। आपकी मायाशक्ति में जगत् मोहित होता है; प्रसन्न होने पर आप मुक्ति का मार्ग भी खोलती हैं।

व्याख्या

स्तुति आवरण और मुक्ति, दोनों को उसी देवी-शक्ति से जोड़ती है। यहाँ 'माया' दैवी सामर्थ्य का दार्शनिक शब्द है, जिसका विवेचन विभिन्न परम्पराओं में भिन्न हो सकता है। इससे देवी को केवल भ्रम मान लेने का निष्कर्ष नहीं निकलता।

6

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरापरोक्तिः

अर्थ

हे देवी, समस्त विद्याएँ आपके ही विविध रूप हैं और लोकों की सभी स्त्रियाँ आपकी अभिव्यक्तियाँ हैं। माता, आप अकेली सारे जगत् में व्याप्त हैं; जो सभी स्तुतियों से परे हैं, उनकी पर्याप्त स्तुति शब्दों से कैसे हो?

व्याख्या

यह पद ज्ञान और स्त्रीत्व में दिव्यता को देखने वाली स्तुति की व्यापक दृष्टि प्रकट करता है। अन्त का प्रश्न स्वीकार करता है कि शब्द देवी की पूर्णता को बाँध नहीं सकते। इसे स्तोत्र की धार्मिक दृष्टि के रूप में समझना चाहिए; इससे स्त्रियों की व्यक्तिगत पहचान मिटती नहीं।

7

सर्वभूता यदा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः

अर्थ

जब आप सभी प्राणियों में विद्यमान देवी और भोग तथा मुक्ति दोनों देने वाली हैं, तब आपकी स्तुति के लिए और कौन-से उच्चतम शब्द शेष रह जाते हैं?

व्याख्या

यह पिछले पद के प्रश्न को आगे बढ़ाता है। भुक्ति और मुक्ति जीवन के भिन्न उद्देश्यों—सांसारिक फल और आध्यात्मिक स्वतंत्रता—की ओर संकेत करते हैं। स्तुति इन्हें देवी से जोड़ती है, पर इन्हें यांत्रिक परिणाम या समानार्थक फल नहीं मानना चाहिए।

8

सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

समस्त जनों के हृदय में बुद्धि के रूप में स्थित, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

यहाँ देवी को केवल बाहरी रक्षक नहीं, मनुष्य की विवेक-बुद्धि में भी अनुभव किया गया है। 'नारायणि नमोऽस्तु ते' का आवर्तन आगे अनेक पदों को जोड़ता है; वेबसाइट पर इसका रूप स्थिर रखते हुए हर पद का विशिष्ट अर्थ भी स्पष्ट रहना चाहिए।

9

कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

कला, काष्ठा आदि काल-विभागों के रूप में आप परिवर्तन को सम्भव बनाती हैं और विश्व की निवृत्ति पर भी समर्थ हैं। हे नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

कला और काष्ठा काल-मापन की पारम्परिक इकाइयाँ हैं। श्लोक उनका गणित नहीं बताता, बल्कि समय, परिवर्तन और विश्व-निवृत्ति को देवी की सत्ता से सम्बद्ध करता है। 'उपरति' को केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु तक सीमित करना इस प्रसंग को छोटा कर देगा।

10

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

समस्त मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब प्रयोजनों की सिद्धि कराने वाली, शरण देने वाली त्रिनयनी गौरी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

प्रसिद्ध पद में देवी के अनेक मंगलकारी नाम एक ही प्रार्थना में समाहित हैं। 'त्र्यम्बके' शिव-सम्बद्ध त्रिनेत्र-रूप की स्मृति जगाता है, पर स्तुति की सम्बोधित सत्ता देवी ही हैं। सभी अर्थों की साधिका कहना भक्ति का स्तवन है, किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी नहीं।

11

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

सृष्टि, पालन और संहार की मूल शक्ति, सनातनी, प्रकृति के गुणों का आधार तथा गुणमयी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

यह पद सृष्टि, स्थिति और लय को एक ही दैवी शक्ति से जोड़ता है। 'गुण' प्रकृति के गुणों की दार्शनिक परम्परा की याद दिलाता है। फिर भी यह कोई पूर्ण शास्त्रीय सिद्धान्त नहीं गढ़ता; मूल उद्देश्य देवी की सर्वव्यापकता की स्तुति है।

12
विषय-सूची पर लौटें

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

शरण में आए हुए दीन और दुःखी जनों की रक्षा में निरत, सबकी पीड़ा हरने वाली देवी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

विश्वव्यापी महिमा से यह पद पीड़ित मनुष्य की प्रत्यक्ष आवश्यकता की ओर लौटता है। शरणागत की रक्षा इसका भाव है। धार्मिक सांत्वना को आवश्यक उपचार, सहायता अथवा सुरक्षा का विकल्प बताना पाठ के करुणामय आशय के विरुद्ध होगा।

13

हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

हंसों से युक्त विमान पर विराजमान, ब्राह्माणी रूप धारण करने वाली और पवित्र जल का छिड़काव करने वाली नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

ब्राह्माणी उन मातृकाओं में से हैं जिनका युद्ध-प्रसंग पहले आ चुका है। हंसवाहन और जल-छिड़काव से उनकी अलग पहचान बनती है। जल के लिए प्रयुक्त संस्कृत समास को सार्वजनिक पाठ से पहले ऐतिहासिक मुद्रण में अक्षरशः जाँचना चाहिए।

14

त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तुते

अर्थ

त्रिशूल, चन्द्रकला और सर्प धारण करके महान् वृषभ पर आरूढ़ माहेश्वरी-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

माहेश्वरी के साथ शिव के परिचित चिह्न—त्रिशूल, चन्द्रकला, सर्प और वृषभ—जुड़े हैं। स्तोत्र उन्हें देवी की शक्ति का एक विशिष्ट रूप बताता है। सभी मातृकाओं के नाम और विशेषताओं को मिटाकर एक ही अस्पष्ट चित्र बना देना उचित नहीं होगा।

15

मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

मोर और कुक्कुट से सम्बद्ध, महान् शक्ति-आयुध धारण करने वाली निष्कलुष कौमारी-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

कौमारी का सम्बन्ध कुमार या स्कन्द की प्रतीक-परम्परा से है, इसलिए पक्षी-चिह्न और शक्ति नामक अस्त्र आते हैं। यहाँ 'शक्ति' विशेष युद्धायुध है; इसे व्यापक दैवी ऊर्जा के अर्थ से अलग करके समझाना आवश्यक है।

16

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे श्रेष्ठ आयुध धारण करने वाली वैष्णवी-स्वरूपा, कृपा करें; हे नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

वैष्णवी के हाथों के आयुध विष्णु की प्रसिद्ध पहचान से जुड़े हैं। शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग की सूची इस पद को विशिष्ट बनाती है। फिर भी अन्त का आवर्ती प्रणाम उसी देवी को समर्पित रहता है जिसकी विभिन्न शक्तियाँ यहाँ गाई जा रही हैं।

17

गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

उग्र महाचक्र धारण करके वाराह-रूप में अपने दाँतों पर पृथ्वी को उठाने वाली कल्याणमयी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

यह पद वाराही की स्तुति वाराह के पृथ्वी-उद्धार प्रसंग से करता है। दंष्ट्राओं से उठाई पृथ्वी विश्व-रक्षा का पौराणिक चित्र है। देवी-माहात्म्य इसे मातृका के स्वरूप में स्मरण करता है; इससे मूल युद्धकथा बदल नहीं जाती।

18

नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान्कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

उग्र नरसिंह-रूप धारण करके असुरों के विनाश और तीनों लोकों की रक्षा के लिए तत्पर नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

नारसिंही-रूप अत्याचारी शक्तियों के विरुद्ध हस्तक्षेप के नरसिंह-प्रतीक को स्मरण कराता है। उग्रता और संरक्षण दो विरोधी संदेश नहीं हैं: कथानक में संकटकारी असुर का दमन और लोकों की रक्षा एक साथ आते हैं।

19

किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

मुकुटधारिणी, महान् वज्र को धारण करने वाली, सहस्र नेत्रों से दीप्त, वृत्र का प्राणान्त करने वाली ऐन्द्री-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

ऐन्द्री के वज्र और सहस्र नेत्र इन्द्र के दैवी चिह्न हैं। वृत्र का उल्लेख एक अन्य पुराण-वैदिक स्मृति को जोड़ता है। ऐन्द्री देवी का रूप है; केवल नाम-साम्य के कारण उन्हें स्तुति कर रहे इन्द्र से एक ही पात्र न समझें।

20

शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले । घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

शिवदूती रूप में असुरों की विशाल शक्ति का विनाश करने वाली, घोर रूप और प्रचण्ड गर्जना वाली नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

शुम्भ की सेना से संघर्ष में शिवदूती का प्रसंग पहले आ चुका है। नाम देवी द्वारा शिव को दूत बनाने के प्रसंग की ओर संकेत करता है, केवल किसी स्वतंत्र दूत का वर्णन नहीं। मातृकाओं की स्तुति में यह विशिष्ट कथासूत्र बनाए रखना चाहिए।

21

दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे । चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

उभरी दंष्ट्राओं से विकराल मुख वाली, मुण्डमाला से विभूषित, मुण्ड का संहार करने वाली चामुण्डा नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

उग्र मुख और मुण्डमाला का वर्णन देवी की भयावह युद्ध-छवि को यथावत् रखता है। सातवें अध्याय में चण्ड और मुण्ड के वध से चामुण्डा नाम प्राप्त होने का प्रसंग आता है। इसे पवित्र आख्यान का रूप समझाना चाहिए, वास्तविक हिंसा का निर्देश नहीं।

22
विषय-सूची पर लौटें

लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे । महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवता, महारात्रि और महामाया-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

अब स्तुति युद्धरूपों से धार्मिक और मानवीय जीवन के गुणों की ओर मुड़ती है। 'स्वधा' पितरों के अर्पण से जुड़ा विशिष्ट शब्द है; 'महारात्रि' और 'महामाया' भी विशेष धार्मिक नाम हैं। सबका अर्थ एक ही सामान्य शब्द में घटाना उचित नहीं।

23

मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि । नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तुते

अर्थ

मेधा, सरस्वती, वरदायिनी, समृद्धि, बाभ्रवी, तामसी और नियति-स्वरूपा परमेश्वरी, कृपा करें; हे नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

इस सघन नामावली में मेधा, विद्या, समृद्धि के साथ तम और नियति से जुड़े रूप भी आते हैं। 'बाभ्रवी' तथा 'तामसी' के अर्थ पर विशेष भाषिक और परम्परागत टिप्पणी चाहिए। स्तुति को केवल अच्छे-बुरे रूपों की सीधी सूची बना देना इसके आशय को सरल कर देगा।

24

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते

अर्थ

आप सब रूपों की धारिणी, सबकी ईश्वरी और सभी शक्तियों से युक्त हैं। हे दुर्गे देवी, हमें भय से बचाएँ; आपको नमस्कार है।

व्याख्या

विभिन्न मातृकाओं के नाम लेने के बाद देवता सबको आधार देने वाली देवी से सीधे प्रार्थना करते हैं। मुख्य याचना भय से रक्षा की है। 'सर्वस्वरूपे' सब रूपों की धार्मिक एकता को व्यक्त करता है; इससे उनके अलग प्रसंग नष्ट नहीं होते।

25

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते

अर्थ

आपका त्रिनेत्रों से सुशोभित सौम्य मुख सभी प्राणियों से होने वाले संकटों से हमारी रक्षा करे; हे कात्यायनी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

उग्र युद्धचित्रों के बाद देवी का सौम्य मुख रक्षा का प्रतीक बनता है। 'सर्वभूतेभ्यः' से सुरक्षा की व्यापक प्रार्थना व्यक्त होती है; इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक जीव को शत्रु मानना चाहिए।

26

ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते

अर्थ

आपका ज्वाला-जैसा विकराल, अत्यन्त उग्र और समस्त असुरों का संहार करने वाला त्रिशूल हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

त्रिशूल को भक्तों की आक्रामकता के निर्देश के रूप में नहीं, कथा में देवी की रक्षक सामर्थ्य के रूप में पुकारा गया है। 'भद्र' और उग्र रूप का मेल कल्याण और कठोर संकट-निवारण को साथ रखता है।

27

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्। सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव

अर्थ

जिस घंटा की ध्वनि संसार को भरकर असुरों का तेज नष्ट करती है, वह हमें पापों से उसी प्रकार बचाए जैसे माता अपने बच्चों की रक्षा करती है।

व्याख्या

युद्ध की घंटा यहाँ भक्त के लिए रक्षा का चिन्ह बनती है। माता और बच्चों की उपमा उग्र युद्ध के बीच मातृत्व को सामने लाती है। 'पाप' का अर्थ प्रसंगानुसार नैतिक या धार्मिक दोष है; इसे आधुनिक रोग अथवा कानूनी अपराध का समानार्थक नहीं बना देना चाहिए।

28

असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्

अर्थ

हे चण्डिके, आपके तेजस्वी हाथ में शोभित, असुरों के रक्त और वसा से सना खड्ग हमारे लिए कल्याणकारी हो। हम आपको प्रणाम करते हैं।

व्याख्या

यह पद युद्धोपरान्त की उग्र छवि को स्पष्ट रूप में रखता है। उसी खड्ग के लिए कल्याण की प्रार्थना भयावहता और रक्षा के संयुक्त भाव को दर्शाती है। व्याख्या में दृश्य की हिंसा को छिपाना भी अनुचित है और उसे व्यवहारिक हिंसा की स्वीकृति समझना भी।

29

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान्सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति

अर्थ

प्रसन्न होने पर आप रोगों को दूर करती हैं; अप्रसन्न होने पर इच्छित कामनाओं को रोक देती हैं। आपकी शरण में आए जन विनाश को प्राप्त नहीं होते; आपका आश्रय पाकर वे दूसरों के लिए भी आश्रय बनते हैं।

व्याख्या

ये देवी की प्रसन्नता और अप्रसन्नता पर देवताओं के भक्ति-वचन हैं, चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं। अन्त में प्राप्त आश्रय का अर्थ दूसरों का सहारा बन सकना भी है। रोग-संबंधी पंक्ति किसी आवश्यक चिकित्सा को छोड़ने की सलाह नहीं बननी चाहिए।

30

एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम्। रूपैरनेकैर्बहुधात्ममूर्तिं कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या

अर्थ

हे अम्बिके, धर्म-विरोधी इन बड़े असुरों का आज आपने अनेक रूपों में प्रकट होकर जो संहार किया, वह आपके अतिरिक्त कौन कर सकता था?

व्याख्या

यह पद युद्ध में प्रकट हुई अनेक देवशक्तियों को फिर एक मूल देवी से जोड़ता है। प्रश्न स्तुति का अलंकार है। 'धर्मद्विष्' कथा के पौराणिक विरोधियों का वर्णन है; समकालीन मनुष्यों या समुदायों पर यह नाम थोपने की अनुमति नहीं।

31

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या । ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्

अर्थ

विद्याओं, शास्त्रों, प्राचीन वचनों और विवेक के दीपों में प्रकाशित होने पर भी 'मेरा' के गहरे अन्धकार में इस जगत् को भटका सकने वाली आपसे भिन्न कौन है?

व्याख्या

यह जानबूझकर रखा गया विरोधाभास है: विवेक के प्रकाश और मोह के अन्धकार को एक ही दैवी सत्ता से जोड़ा गया है। 'ममत्व' स्वामित्व-बोध में फँसने का संकेत है और अन्धकार की गर्त उसकी पकड़ का चित्र है। इसे 'विद्या बुरी है' जैसे साधारण निष्कर्ष में नहीं बदलना चाहिए; संस्कृत वाक्य-विन्यास की भी समीक्षा चाहिए।

32
विषय-सूची पर लौटें

रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र । दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्

अर्थ

जहाँ भयंकर प्राणी, विषधर नाग, शत्रु, डाकुओं के दल, वनाग्नि या समुद्र के बीच संकट हो, वहाँ भी आप जगत् की रक्षा के लिए उपस्थित रहती हैं।

व्याख्या

यह सूची प्रकृति और मनुष्यों से आने वाले अनेक संकटों को गिनाती है। वनाग्नि और समुद्र जैसे चित्र सुरक्षा की प्रार्थना को मूर्त बनाते हैं। यह विश्वास का स्तोत्र है, प्रत्येक संकट के अलौकिक ढंग से मिट जाने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

33

विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीह विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः

अर्थ

विश्वेश्वरी, आप विश्व की रक्षा करती हैं और विश्वात्मिका होकर उसे धारण करती हैं। विश्व के अधिपति भी आपकी वन्दना करते हैं; जो आपकी भक्ति से झुकते हैं, वे लोक के लिए सहारा बनते हैं।

व्याख्या

इस पद में विश्व-रक्षा और साधक के आचरण का सम्बन्ध जुड़ता है। देवी की भक्ति से विनम्र व्यक्ति दूसरों के लिए सहारा बन सकता है—यह विशेष भाव है। अन्तिम खण्ड का व्याकरण जाँचना चाहिए, ताकि इसे किसी व्यक्ति द्वारा सचमुच समस्त संसार नियंत्रित करने का दावा न बना दिया जाए।

34

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्

अर्थ

हे देवी, जैसे अभी असुरों का वध करके आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा शत्रुओं के भय से रक्षा करें। संसार के पापों और अशुभ उपद्रवों से उपजे बड़े संकटों को शीघ्र शान्त करें।

व्याख्या

देवता कथा की एक विजय को भविष्य की सतत शान्ति की प्रार्थना में बदलते हैं। लम्बे पद में तीन अभिप्राय जुड़े हैं—रक्षा, पाप-शमन और बड़े उपद्रवों का शमन। संकटों के संस्कृत समास का ऐतिहासिक पाठ से फिर मिलान आवश्यक है।

35
विषय-सूची पर लौटें

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव

अर्थ

हे विश्व का दुःख हरने वाली देवी, प्रणाम करने वालों पर कृपा करें। तीनों लोकों के निवासियों द्वारा स्तुति के योग्य, समस्त लोकों के लिए वरदायिनी बनें।

व्याख्या

यह संक्षिप्त प्रार्थना स्तुति के मुख्य भाग का समापन करती है। इसका उद्देश्य केवल अभी बचे हुए देवताओं का हित नहीं, तीनों लोकों का कल्याण है। अगले सूत्र के साथ कथन का स्वर देवताओं की प्रशंसा से देवी के सीधे उत्तर में बदलता है।

सन्दर्भ और उपयोग

संस्करण एवं पुनःप्रयोग सूचना: यह शिवगोरक्ष के अभी अस्वीकृत देवीमाहात्म्य अध्याय ११ का आन्तरिक पाठ है—11.3 से 11.35, कुल 33 श्लोक। ऐतिहासिक 1917 मुद्रण से स्वतंत्र अक्षरशः मिलान तथा पुनःप्रकाशन-अधिकार स्वीकृति बाकी है। इन श्लोकों का पाठ पुराने अध्याय ११ के प्रारूप से बिना नया स्वतंत्र संस्करण बनाए पुनः लिया गया है।

पाठ की रूपरेखा: स्तुति के तीन चरण

11.3–7 — जगन्माता और मुक्ति: देवी की करुणा, पृथ्वी-जल से जीवन-समर्थन, माया, विद्या तथा भुक्ति-मुक्ति के व्यापक भाव। ये भक्ति-वचन हैं, निश्चित परिणाम की घोषणाएँ नहीं। 11.8–23 — नारायणी और मातृकाएँ: बुद्धि, समय और शरण की स्तुति के साथ ब्राह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती तथा चामुण्डा के अलग-अलग रूप। यहाँ रूपों की विशिष्टता भी बनी रहती है। 11.24–35 — रक्षा और करुणा: विश्व-रक्षा की प्रार्थना, देवी के प्रतीक आयुध, विपत्ति से बचाव और कल्याण का आग्रह। इसे आवश्यक उपचार या व्यावहारिक सुरक्षा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

मूल देवीमाहात्म्य अध्याय से सम्बन्ध

अध्याय ११ के दूसरे पद में देवगण कात्यायनी की स्तुति आरम्भ करने को उद्यत हैं। स्तोत्र 11.3 में “देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद” से प्रारम्भ होकर 11.35 में “लोकानां वरदा भव” पर पूर्ण होता है। 11.36 से देवी का उत्तर आता है। भक्ति-पृष्ठ को भविष्य में स्वीकृत मूल शास्त्र के उन्हीं पाठ-नोडों का पाठक-दृश्य बनाना चाहिए; यहाँ कोई नया स्वतंत्र ‘अंतिम’ संस्कृत संस्करण नहीं बनाया गया है। 1 4 5

पाठभेद, स्रोत और सम्पादकीय सावधानियाँ

  • 11.7: वर्तमान आन्तरिक पाठ में “भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी” है; एक अन्य आधुनिक गीता-प्रेस-आधारित प्रस्तुति में “स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी” मिलता है। मूल 1917 मुद्रण से जाँच अभी बाकी है। 1 4 6
  • 11.13: “कौशाम्भःक्षरिके” समास और उसका अर्थ शास्त्रीय तथा मुद्रित-पाठ जाँच के अधीन है। 1 2
  • 11.23: पूर्व अध्याय-प्रारूप में इसे विशेष ऐतिहासिक पाठभेद/अनुपस्थिति की सम्भावना वाला स्थल बताया गया है; यह अभी अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं। 1 3
  • अन्य समीक्षा-स्थल: 11.14, 11.25, 11.29 और 11.34; संस्कृत संधि और शब्द-विच्छेद में अन्तर को बिना प्रमाण अलग पाठ-परम्परा न कहें।
  • रचनाकार: यह देवीमाहात्म्य/मार्कण्डेयपुराण का अध्यायांश है। कथावाचक अथवा बाद में प्रचलित शीर्षक को किसी आधुनिक कवि के ऐतिहासिक हस्ताक्षर की तरह न पढ़ें।

सामान्य प्रश्न

नारायणी स्तुति में कितने श्लोक हैं? यहाँ चुने हुए अध्यायांश में 33 श्लोक हैं—11.3 से 11.35। अन्य पुस्तकें अध्याय का बड़ा भाग एक ही नाम से प्रस्तुत कर सकती हैं। क्या यह पूरा ग्यारहवाँ अध्याय है? नहीं। इससे पहले कथा-भूमिका और इसके बाद देवी का उत्तर तथा भावी रूपों का वर्णन है। “नारायणि नमोऽस्तु ते” बार-बार क्यों आता है? यह वन्दना मातृकाओं, काल, बुद्धि और रक्षा के अनेक रूपों को एक स्तुति-सूत्र में जोड़ती है। क्या इस पृष्ठ का संस्कृत पाठ अलग प्रमाणित संस्करण है? नहीं। यह पहले से तैयार लेकिन अभी अस्वीकृत शास्त्र-अध्याय का सम्पादकीय दर्पण है; सार्वजनिक उपयोग से पहले साझा पाठ-नोड स्वीकृत होने चाहिए। क्या यहाँ कोई विशेष दीक्षा या अनुष्ठान बताया गया है? नहीं। यह पाठ-अर्थ-व्याख्या है, अनिवार्य जप-संख्या, विधि या तिथि-निर्देश नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 3

    devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato’khilasya | prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya

  2. 4

    ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi | apāṃ svarūpasthitayā tvayaitadāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye

  3. 5

    tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā | sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ

  4. 6

    vidyāḥ samastāstava devi bhedāḥ striyaḥ samastāḥ sakalā jagatsu | tvayaikayā pūritamambayaitat kā te stutiḥ stavyaparāparoktiḥ

  5. 7

    sarvabhūtā yadā devī bhuktimuktipradāyinī | tvaṃ stutā stutaye kā vā bhavantu paramoktayaḥ

  6. 8

    sarvasya buddhirūpeṇa janasya hṛdi saṃsthite | svargāpavargade devi nārāyaṇi namo’stu te

  7. 9

    kalākāṣṭhādirūpeṇa pariṇāmapradāyini | viśvasyoparatau śakte nārāyaṇi namo’stu te

  8. 10

    sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te

  9. 11

    sṛṣṭisthitivināśānāṃ śaktibhūte sanātani | guṇāśraye guṇamaye nārāyaṇi namo’stu te

  10. 12

    śaraṇāgatadīnārtaparitrāṇaparāyaṇe | sarvasyārtihare devi nārāyaṇi namo’stu te

  11. 13

    haṃsayuktavimānasthe brahmāṇīrūpadhāriṇi | kauśāmbhaḥkṣarike devi nārāyaṇi namo’stu te

  12. 14

    triśūlacandrāhidhare mahāvṛṣabhavāhini | māheśvarīsvarūpeṇa nārāyaṇi namo’stute

  13. 15

    mayūrakukkuṭavṛte mahāśaktidhare’naghe | kaumārīrūpasaṃsthāne nārāyaṇi namo’stu te

  14. 16

    śaṅkhacakragadāśārṅgagṛhītaparamāyudhe | prasīda vaiṣṇavīrūpe nārāyaṇi namo’stu te

  15. 17

    gṛhītogramahācakre daṃṣṭroddhṛtavasundhare | varāharūpiṇi śive nārāyaṇi namo’stu te

  16. 18

    nṛsiṃharūpeṇogreṇa hantuṃ daityānkṛtodyame | trailokyatrāṇasahite nārāyaṇi namo’stu te

  17. 19

    kirīṭini mahāvajre sahasranayanojjvale | vṛtraprāṇahare caindri nārāyaṇi namo’stu te

  18. 20

    śivadūtīsvarūpeṇa hatadaityamahābale | ghorarūpe mahārāve nārāyaṇi namo’stu te

  19. 21

    daṃṣṭrākarālavadane śiromālāvibhūṣaṇe | cāmuṇḍe muṇḍamathane nārāyaṇi namo’stu te

  20. 22

    lakṣmi lajje mahāvidye śraddhe puṣṭi svadhe dhruve | mahārātri mahāmāye nārāyaṇi namo’stu te

  21. 23

    medhe sarasvati vare bhūti bābhravi tāmasi | niyate tvaṃ prasīdeśe nārāyaṇi namo’stute

  22. 24

    sarvasvarūpe sarveśe sarvaśaktisamanvite | bhayebhyastrāhi no devi durge devi namo’stu te

  23. 25

    etatte vadanaṃ saumyaṃ locanatrayabhūṣitam| pātu naḥ sarvabhūtebhyaḥ kātyāyani namo’stu te

  24. 26

    jvālākarālamatyugramaśeṣāsurasūdanam| triśūlaṃ pātu no bhīterbhadrakāli namo’stu te

  25. 27

    hinasti daityatejāṃsi svanenāpūrya yā jagat| sā ghaṇṭā pātu no devi pāpebhyo naḥ sutāniva

  26. 28

    asurāsṛgvasāpaṅkacarcitaste karojjvalaḥ | śubhāya khaḍgo bhavatu caṇḍike tvāṃ natā vayam

  27. 29

    rogānaśeṣānapahaṃsi tuṣṭā ruṣṭā tu kāmānsakalānabhīṣṭān| tvāmāśritānāṃ na vipannarāṇāṃ tvāmāśritā hyāśrayatāṃ prayānti

  28. 30

    etatkṛtaṃ yatkadanaṃ tvayādya dharmadviṣāṃ devi mahāsurāṇām| rūpairanekairbahudhātmamūrtiṃ kṛtvāmbike tatprakaroti kānyā

  29. 31

    vidyāsu śāstreṣu vivekadīpeṣvādyeṣu vākyeṣu ca kā tvadanyā | mamatvagarte’timahāndhakāre vibhrāmayatyetadatīva viśvam

  30. 32

    rakṣāṃsi yatrograviṣāśca nāgā yatrārayo dasyubalāni yatra | dāvānalo yatra tathābdhimadhye tatra sthitā tvaṃ paripāsi viśvam

  31. 33

    viśveśvari tvaṃ paripāsi viśvaṃ viśvātmikā dhārayasīha viśvam| viśveśavandyā bhavatī bhavanti viśvāśrayā ye tvayi bhaktinamrāḥ

  32. 34

    devi prasīda paripālaya no’ribhīternityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ | pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān

  33. 35

    praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi | trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava

स्रोत और स्थिति

1 शिवगोरक्ष का पूर्व तैयार अध्याय ११ त्रिभाषी आन्तरिक प्रारूप; अभी अप्रकाशित।

2 पंशीकर (सम्पा.), दुर्गासप्तशती, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई, 1917; ऐतिहासिक स्रोत-उम्मीदवार, पर इस संस्करण हेतु नया प्रत्यक्ष मुद्रण-मिलान नहीं हुआ।

3 शिवगोरक्ष का पूर्व स्रोत-शोध प्रतिवेदन और अधिकार-सावधानियाँ।

4 Sanskrit Documents का तुलनात्मक डिजिटल पाठ; अधिकार स्वीकृति नहीं।

5 देवीमाहात्म्य डिजिटल टेम्पल की अध्याय ११ व्याख्या—केवल सीमाएँ और प्रसंग समझने के लिए।

6 Astrojay का आधुनिक अध्याय ११ पाठ—केवल तुलना के लिए।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

नीचे दिया अर्थ और विवेचन परियोजना के पहले अध्याय ११ प्रारूप का लेखकीय पाठ है; इसे स्वीकृत शास्त्रीय व्याख्या या अंतिम अनुवाद न समझें।

श्लोक 11.3

सरल अर्थ: हे शरणागतों का दुःख दूर करने वाली देवी, प्रसन्न हों! समस्त जगत् की माता, कृपा करें। विश्वेश्वरी, संसार की रक्षा करें; चल और अचल सब पर आपका ही अधिपत्य है। व्याख्या: स्तुति विजय के गर्व से नहीं, शरण और करुणा की प्रार्थना से आरम्भ होती है। बार-बार की गई कृपा-याचना देवताओं से आगे समस्त चराचर जगत् तक पहुँचती है। देवी के सार्वभौम अधिकार का कथन इस स्तुति की भक्ति-प्रधान दृष्टि है।

श्लोक 11.4

सरल अर्थ: आप ही पृथ्वी-स्वरूप होकर जगत् को धारण करती हैं। जल-स्वरूप में स्थित होकर आप पूरे संसार का पोषण करती हैं, हे अपराजेय सामर्थ्यवाली देवी। व्याख्या: पृथ्वी और जल जीवन के दो आधारों—आश्रय और पोषण—का चित्र देते हैं। श्लोक में इन तत्वों के माध्यम से देवी की स्तुति है; इसे भौतिक विज्ञान का विवरण नहीं समझना चाहिए। जल-स्वरूप से जुड़ा संस्कृत समास अलग से जाँचना आवश्यक है।

श्लोक 11.5

सरल अर्थ: आप अनन्त सामर्थ्यवाली वैष्णवी शक्ति, विश्व का परम बीज और महान् माया हैं। आपकी मायाशक्ति में जगत् मोहित होता है; प्रसन्न होने पर आप मुक्ति का मार्ग भी खोलती हैं। व्याख्या: स्तुति आवरण और मुक्ति, दोनों को उसी देवी-शक्ति से जोड़ती है। यहाँ 'माया' दैवी सामर्थ्य का दार्शनिक शब्द है, जिसका विवेचन विभिन्न परम्पराओं में भिन्न हो सकता है। इससे देवी को केवल भ्रम मान लेने का निष्कर्ष नहीं निकलता।

श्लोक 11.6

सरल अर्थ: हे देवी, समस्त विद्याएँ आपके ही विविध रूप हैं और लोकों की सभी स्त्रियाँ आपकी अभिव्यक्तियाँ हैं। माता, आप अकेली सारे जगत् में व्याप्त हैं; जो सभी स्तुतियों से परे हैं, उनकी पर्याप्त स्तुति शब्दों से कैसे हो? व्याख्या: यह पद ज्ञान और स्त्रीत्व में दिव्यता को देखने वाली स्तुति की व्यापक दृष्टि प्रकट करता है। अन्त का प्रश्न स्वीकार करता है कि शब्द देवी की पूर्णता को बाँध नहीं सकते। इसे स्तोत्र की धार्मिक दृष्टि के रूप में समझना चाहिए; इससे स्त्रियों की व्यक्तिगत पहचान मिटती नहीं।

श्लोक 11.7

सरल अर्थ: जब आप सभी प्राणियों में विद्यमान देवी और भोग तथा मुक्ति दोनों देने वाली हैं, तब आपकी स्तुति के लिए और कौन-से उच्चतम शब्द शेष रह जाते हैं? व्याख्या: यह पिछले पद के प्रश्न को आगे बढ़ाता है। भुक्ति और मुक्ति जीवन के भिन्न उद्देश्यों—सांसारिक फल और आध्यात्मिक स्वतंत्रता—की ओर संकेत करते हैं। स्तुति इन्हें देवी से जोड़ती है, पर इन्हें यांत्रिक परिणाम या समानार्थक फल नहीं मानना चाहिए।

श्लोक 11.8

सरल अर्थ: समस्त जनों के हृदय में बुद्धि के रूप में स्थित, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: यहाँ देवी को केवल बाहरी रक्षक नहीं, मनुष्य की विवेक-बुद्धि में भी अनुभव किया गया है। 'नारायणि नमोऽस्तु ते' का आवर्तन आगे अनेक पदों को जोड़ता है; वेबसाइट पर इसका रूप स्थिर रखते हुए हर पद का विशिष्ट अर्थ भी स्पष्ट रहना चाहिए।

श्लोक 11.9

सरल अर्थ: कला, काष्ठा आदि काल-विभागों के रूप में आप परिवर्तन को सम्भव बनाती हैं और विश्व की निवृत्ति पर भी समर्थ हैं। हे नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: कला और काष्ठा काल-मापन की पारम्परिक इकाइयाँ हैं। श्लोक उनका गणित नहीं बताता, बल्कि समय, परिवर्तन और विश्व-निवृत्ति को देवी की सत्ता से सम्बद्ध करता है। 'उपरति' को केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु तक सीमित करना इस प्रसंग को छोटा कर देगा।

श्लोक 11.10

सरल अर्थ: समस्त मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब प्रयोजनों की सिद्धि कराने वाली, शरण देने वाली त्रिनयनी गौरी नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: प्रसिद्ध पद में देवी के अनेक मंगलकारी नाम एक ही प्रार्थना में समाहित हैं। 'त्र्यम्बके' शिव-सम्बद्ध त्रिनेत्र-रूप की स्मृति जगाता है, पर स्तुति की सम्बोधित सत्ता देवी ही हैं। सभी अर्थों की साधिका कहना भक्ति का स्तवन है, किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी नहीं।

श्लोक 11.11

सरल अर्थ: सृष्टि, पालन और संहार की मूल शक्ति, सनातनी, प्रकृति के गुणों का आधार तथा गुणमयी नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: यह पद सृष्टि, स्थिति और लय को एक ही दैवी शक्ति से जोड़ता है। 'गुण' प्रकृति के गुणों की दार्शनिक परम्परा की याद दिलाता है। फिर भी यह कोई पूर्ण शास्त्रीय सिद्धान्त नहीं गढ़ता; मूल उद्देश्य देवी की सर्वव्यापकता की स्तुति है।

श्लोक 11.12

सरल अर्थ: शरण में आए हुए दीन और दुःखी जनों की रक्षा में निरत, सबकी पीड़ा हरने वाली देवी नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: विश्वव्यापी महिमा से यह पद पीड़ित मनुष्य की प्रत्यक्ष आवश्यकता की ओर लौटता है। शरणागत की रक्षा इसका भाव है। धार्मिक सांत्वना को आवश्यक उपचार, सहायता अथवा सुरक्षा का विकल्प बताना पाठ के करुणामय आशय के विरुद्ध होगा।

श्लोक 11.13

सरल अर्थ: हंसों से युक्त विमान पर विराजमान, ब्राह्माणी रूप धारण करने वाली और पवित्र जल का छिड़काव करने वाली नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: ब्राह्माणी उन मातृकाओं में से हैं जिनका युद्ध-प्रसंग पहले आ चुका है। हंसवाहन और जल-छिड़काव से उनकी अलग पहचान बनती है। जल के लिए प्रयुक्त संस्कृत समास को सार्वजनिक पाठ से पहले ऐतिहासिक मुद्रण में अक्षरशः जाँचना चाहिए।

श्लोक 11.14

सरल अर्थ: त्रिशूल, चन्द्रकला और सर्प धारण करके महान् वृषभ पर आरूढ़ माहेश्वरी-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: माहेश्वरी के साथ शिव के परिचित चिह्न—त्रिशूल, चन्द्रकला, सर्प और वृषभ—जुड़े हैं। स्तोत्र उन्हें देवी की शक्ति का एक विशिष्ट रूप बताता है। सभी मातृकाओं के नाम और विशेषताओं को मिटाकर एक ही अस्पष्ट चित्र बना देना उचित नहीं होगा।

श्लोक 11.15

सरल अर्थ: मोर और कुक्कुट से सम्बद्ध, महान् शक्ति-आयुध धारण करने वाली निष्कलुष कौमारी-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: कौमारी का सम्बन्ध कुमार या स्कन्द की प्रतीक-परम्परा से है, इसलिए पक्षी-चिह्न और शक्ति नामक अस्त्र आते हैं। यहाँ 'शक्ति' विशेष युद्धायुध है; इसे व्यापक दैवी ऊर्जा के अर्थ से अलग करके समझाना आवश्यक है।

श्लोक 11.16

सरल अर्थ: शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे श्रेष्ठ आयुध धारण करने वाली वैष्णवी-स्वरूपा, कृपा करें; हे नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: वैष्णवी के हाथों के आयुध विष्णु की प्रसिद्ध पहचान से जुड़े हैं। शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग की सूची इस पद को विशिष्ट बनाती है। फिर भी अन्त का आवर्ती प्रणाम उसी देवी को समर्पित रहता है जिसकी विभिन्न शक्तियाँ यहाँ गाई जा रही हैं।

श्लोक 11.17

सरल अर्थ: उग्र महाचक्र धारण करके वाराह-रूप में अपने दाँतों पर पृथ्वी को उठाने वाली कल्याणमयी नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: यह पद वाराही की स्तुति वाराह के पृथ्वी-उद्धार प्रसंग से करता है। दंष्ट्राओं से उठाई पृथ्वी विश्व-रक्षा का पौराणिक चित्र है। देवी-माहात्म्य इसे मातृका के स्वरूप में स्मरण करता है; इससे मूल युद्धकथा बदल नहीं जाती।

श्लोक 11.18

सरल अर्थ: उग्र नरसिंह-रूप धारण करके असुरों के विनाश और तीनों लोकों की रक्षा के लिए तत्पर नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: नारसिंही-रूप अत्याचारी शक्तियों के विरुद्ध हस्तक्षेप के नरसिंह-प्रतीक को स्मरण कराता है। उग्रता और संरक्षण दो विरोधी संदेश नहीं हैं: कथानक में संकटकारी असुर का दमन और लोकों की रक्षा एक साथ आते हैं।

श्लोक 11.19

सरल अर्थ: मुकुटधारिणी, महान् वज्र को धारण करने वाली, सहस्र नेत्रों से दीप्त, वृत्र का प्राणान्त करने वाली ऐन्द्री-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: ऐन्द्री के वज्र और सहस्र नेत्र इन्द्र के दैवी चिह्न हैं। वृत्र का उल्लेख एक अन्य पुराण-वैदिक स्मृति को जोड़ता है। ऐन्द्री देवी का रूप है; केवल नाम-साम्य के कारण उन्हें स्तुति कर रहे इन्द्र से एक ही पात्र न समझें।

श्लोक 11.20

सरल अर्थ: शिवदूती रूप में असुरों की विशाल शक्ति का विनाश करने वाली, घोर रूप और प्रचण्ड गर्जना वाली नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: शुम्भ की सेना से संघर्ष में शिवदूती का प्रसंग पहले आ चुका है। नाम देवी द्वारा शिव को दूत बनाने के प्रसंग की ओर संकेत करता है, केवल किसी स्वतंत्र दूत का वर्णन नहीं। मातृकाओं की स्तुति में यह विशिष्ट कथासूत्र बनाए रखना चाहिए।

श्लोक 11.21

सरल अर्थ: उभरी दंष्ट्राओं से विकराल मुख वाली, मुण्डमाला से विभूषित, मुण्ड का संहार करने वाली चामुण्डा नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: उग्र मुख और मुण्डमाला का वर्णन देवी की भयावह युद्ध-छवि को यथावत् रखता है। सातवें अध्याय में चण्ड और मुण्ड के वध से चामुण्डा नाम प्राप्त होने का प्रसंग आता है। इसे पवित्र आख्यान का रूप समझाना चाहिए, वास्तविक हिंसा का निर्देश नहीं।

श्लोक 11.22

सरल अर्थ: हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवता, महारात्रि और महामाया-स्वरूपा नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: अब स्तुति युद्धरूपों से धार्मिक और मानवीय जीवन के गुणों की ओर मुड़ती है। 'स्वधा' पितरों के अर्पण से जुड़ा विशिष्ट शब्द है; 'महारात्रि' और 'महामाया' भी विशेष धार्मिक नाम हैं। सबका अर्थ एक ही सामान्य शब्द में घटाना उचित नहीं।

श्लोक 11.23

सरल अर्थ: मेधा, सरस्वती, वरदायिनी, समृद्धि, बाभ्रवी, तामसी और नियति-स्वरूपा परमेश्वरी, कृपा करें; हे नारायणी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: इस सघन नामावली में मेधा, विद्या, समृद्धि के साथ तम और नियति से जुड़े रूप भी आते हैं। 'बाभ्रवी' तथा 'तामसी' के अर्थ पर विशेष भाषिक और परम्परागत टिप्पणी चाहिए। स्तुति को केवल अच्छे-बुरे रूपों की सीधी सूची बना देना इसके आशय को सरल कर देगा।

श्लोक 11.24

सरल अर्थ: आप सब रूपों की धारिणी, सबकी ईश्वरी और सभी शक्तियों से युक्त हैं। हे दुर्गे देवी, हमें भय से बचाएँ; आपको नमस्कार है। व्याख्या: विभिन्न मातृकाओं के नाम लेने के बाद देवता सबको आधार देने वाली देवी से सीधे प्रार्थना करते हैं। मुख्य याचना भय से रक्षा की है। 'सर्वस्वरूपे' सब रूपों की धार्मिक एकता को व्यक्त करता है; इससे उनके अलग प्रसंग नष्ट नहीं होते।

श्लोक 11.25

सरल अर्थ: आपका त्रिनेत्रों से सुशोभित सौम्य मुख सभी प्राणियों से होने वाले संकटों से हमारी रक्षा करे; हे कात्यायनी, आपको नमस्कार है। व्याख्या: उग्र युद्धचित्रों के बाद देवी का सौम्य मुख रक्षा का प्रतीक बनता है। 'सर्वभूतेभ्यः' से सुरक्षा की व्यापक प्रार्थना व्यक्त होती है; इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक जीव को शत्रु मानना चाहिए।

श्लोक 11.26

सरल अर्थ: आपका ज्वाला-जैसा विकराल, अत्यन्त उग्र और समस्त असुरों का संहार करने वाला त्रिशूल हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली, आपको नमस्कार है। व्याख्या: त्रिशूल को भक्तों की आक्रामकता के निर्देश के रूप में नहीं, कथा में देवी की रक्षक सामर्थ्य के रूप में पुकारा गया है। 'भद्र' और उग्र रूप का मेल कल्याण और कठोर संकट-निवारण को साथ रखता है।

श्लोक 11.27

सरल अर्थ: जिस घंटा की ध्वनि संसार को भरकर असुरों का तेज नष्ट करती है, वह हमें पापों से उसी प्रकार बचाए जैसे माता अपने बच्चों की रक्षा करती है। व्याख्या: युद्ध की घंटा यहाँ भक्त के लिए रक्षा का चिन्ह बनती है। माता और बच्चों की उपमा उग्र युद्ध के बीच मातृत्व को सामने लाती है। 'पाप' का अर्थ प्रसंगानुसार नैतिक या धार्मिक दोष है; इसे आधुनिक रोग अथवा कानूनी अपराध का समानार्थक नहीं बना देना चाहिए।

श्लोक 11.28

सरल अर्थ: हे चण्डिके, आपके तेजस्वी हाथ में शोभित, असुरों के रक्त और वसा से सना खड्ग हमारे लिए कल्याणकारी हो। हम आपको प्रणाम करते हैं। व्याख्या: यह पद युद्धोपरान्त की उग्र छवि को स्पष्ट रूप में रखता है। उसी खड्ग के लिए कल्याण की प्रार्थना भयावहता और रक्षा के संयुक्त भाव को दर्शाती है। व्याख्या में दृश्य की हिंसा को छिपाना भी अनुचित है और उसे व्यवहारिक हिंसा की स्वीकृति समझना भी।

श्लोक 11.29

सरल अर्थ: प्रसन्न होने पर आप रोगों को दूर करती हैं; अप्रसन्न होने पर इच्छित कामनाओं को रोक देती हैं। आपकी शरण में आए जन विनाश को प्राप्त नहीं होते; आपका आश्रय पाकर वे दूसरों के लिए भी आश्रय बनते हैं। व्याख्या: ये देवी की प्रसन्नता और अप्रसन्नता पर देवताओं के भक्ति-वचन हैं, चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं। अन्त में प्राप्त आश्रय का अर्थ दूसरों का सहारा बन सकना भी है। रोग-संबंधी पंक्ति किसी आवश्यक चिकित्सा को छोड़ने की सलाह नहीं बननी चाहिए।

श्लोक 11.30

सरल अर्थ: हे अम्बिके, धर्म-विरोधी इन बड़े असुरों का आज आपने अनेक रूपों में प्रकट होकर जो संहार किया, वह आपके अतिरिक्त कौन कर सकता था? व्याख्या: यह पद युद्ध में प्रकट हुई अनेक देवशक्तियों को फिर एक मूल देवी से जोड़ता है। प्रश्न स्तुति का अलंकार है। 'धर्मद्विष्' कथा के पौराणिक विरोधियों का वर्णन है; समकालीन मनुष्यों या समुदायों पर यह नाम थोपने की अनुमति नहीं।

श्लोक 11.31

सरल अर्थ: विद्याओं, शास्त्रों, प्राचीन वचनों और विवेक के दीपों में प्रकाशित होने पर भी 'मेरा' के गहरे अन्धकार में इस जगत् को भटका सकने वाली आपसे भिन्न कौन है? व्याख्या: यह जानबूझकर रखा गया विरोधाभास है: विवेक के प्रकाश और मोह के अन्धकार को एक ही दैवी सत्ता से जोड़ा गया है। 'ममत्व' स्वामित्व-बोध में फँसने का संकेत है और अन्धकार की गर्त उसकी पकड़ का चित्र है। इसे 'विद्या बुरी है' जैसे साधारण निष्कर्ष में नहीं बदलना चाहिए; संस्कृत वाक्य-विन्यास की भी समीक्षा चाहिए।

श्लोक 11.32

सरल अर्थ: जहाँ भयंकर प्राणी, विषधर नाग, शत्रु, डाकुओं के दल, वनाग्नि या समुद्र के बीच संकट हो, वहाँ भी आप जगत् की रक्षा के लिए उपस्थित रहती हैं। व्याख्या: यह सूची प्रकृति और मनुष्यों से आने वाले अनेक संकटों को गिनाती है। वनाग्नि और समुद्र जैसे चित्र सुरक्षा की प्रार्थना को मूर्त बनाते हैं। यह विश्वास का स्तोत्र है, प्रत्येक संकट के अलौकिक ढंग से मिट जाने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

श्लोक 11.33

सरल अर्थ: विश्वेश्वरी, आप विश्व की रक्षा करती हैं और विश्वात्मिका होकर उसे धारण करती हैं। विश्व के अधिपति भी आपकी वन्दना करते हैं; जो आपकी भक्ति से झुकते हैं, वे लोक के लिए सहारा बनते हैं। व्याख्या: इस पद में विश्व-रक्षा और साधक के आचरण का सम्बन्ध जुड़ता है। देवी की भक्ति से विनम्र व्यक्ति दूसरों के लिए सहारा बन सकता है—यह विशेष भाव है। अन्तिम खण्ड का व्याकरण जाँचना चाहिए, ताकि इसे किसी व्यक्ति द्वारा सचमुच समस्त संसार नियंत्रित करने का दावा न बना दिया जाए।

श्लोक 11.34

सरल अर्थ: हे देवी, जैसे अभी असुरों का वध करके आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा शत्रुओं के भय से रक्षा करें। संसार के पापों और अशुभ उपद्रवों से उपजे बड़े संकटों को शीघ्र शान्त करें। व्याख्या: देवता कथा की एक विजय को भविष्य की सतत शान्ति की प्रार्थना में बदलते हैं। लम्बे पद में तीन अभिप्राय जुड़े हैं—रक्षा, पाप-शमन और बड़े उपद्रवों का शमन। संकटों के संस्कृत समास का ऐतिहासिक पाठ से फिर मिलान आवश्यक है।

श्लोक 11.35

सरल अर्थ: हे विश्व का दुःख हरने वाली देवी, प्रणाम करने वालों पर कृपा करें। तीनों लोकों के निवासियों द्वारा स्तुति के योग्य, समस्त लोकों के लिए वरदायिनी बनें। व्याख्या: यह संक्षिप्त प्रार्थना स्तुति के मुख्य भाग का समापन करती है। इसका उद्देश्य केवल अभी बचे हुए देवताओं का हित नहीं, तीनों लोकों का कल्याण है। अगले सूत्र के साथ कथन का स्वर देवताओं की प्रशंसा से देवी के सीधे उत्तर में बदलता है।

  1. इस पाठ के तुलनात्मक स्रोत और संस्करण-टिप्पणियाँ
  2. Durgā Saptashatī / Devi Mahatmyam (Durga Saptashati), ed. Vāsudeva Lakṣmaṇa Śāstrī Paṇśīkar · स्रोत खोलें
  3. इस पाठ के तुलनात्मक स्रोत और संस्करण-टिप्पणियाँ
  4. Nārāyaṇīstutiḥ अथवा Nārāyaṇīsūktam — Chapter 11 · स्रोत खोलें
  5. Chapter 11 – Interpretations · स्रोत खोलें
  6. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) Chapter 11 Sanskrit display · स्रोत खोलें