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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

मन्त्र और जप

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये — नारायणी स्तुति का श्लोक

देवी नारायणी की एक प्रसिद्ध पूर्ण श्लोक-प्रार्थना, मूल पाठ, अर्थ तथा स्रोत-सावधानियों सहित।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते

अर्थ

समस्त मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब प्रयोजनों की सिद्धि कराने वाली, शरण देने वाली त्रिनयनी गौरी नारायणी, आपको नमस्कार है।

व्याख्या

प्रसिद्ध पद में देवी के अनेक मंगलकारी नाम एक ही प्रार्थना में समाहित हैं। 'त्र्यम्बके' शिव-सम्बद्ध त्रिनेत्र-रूप की स्मृति जगाता है, पर स्तुति की सम्बोधित सत्ता देवी ही हैं। सभी अर्थों की साधिका कहना भक्ति का स्तवन है, किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

सरल हिन्दी अर्थ एवं व्याख्या

पूरे श्लोक का अर्थ

पूर्व अध्याय-११ की स्वीकृति-प्रतीक्षारत हिन्दी अर्थ-पंक्ति: समस्त मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणकारिणी, सब प्रयोजनों की सिद्धि कराने वाली, शरण देने वाली त्रिनयनी गौरी नारायणी, आपको नमस्कार है। पूर्व अध्याय-११ की मूल सम्पादकीय व्याख्या: प्रसिद्ध पद में देवी के अनेक मंगलकारी नाम एक ही प्रार्थना में समाहित हैं। 'त्र्यम्बके' शिव-सम्बद्ध त्रिनेत्र-रूप की स्मृति जगाता है, पर स्तुति की सम्बोधित सत्ता देवी ही हैं। सभी अर्थों की साधिका कहना भक्ति का स्तवन है, किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी नहीं। सरल भाषा में देवता देवी को संबोधित करते हुए कहते हैं—हे सब मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणकारी, उचित प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनयनी गौरी और नारायणी, आपको नमस्कार है। श्लोक के ये शब्द किसी विशेष काम की सफलता माँगने की सूची नहीं हैं; यहाँ देवी के विविध गुणों का स्तवन हो रहा है। आखिरी पद नमोऽस्तु ते समर्पण और आदर का भाव व्यक्त करता है। 1 4

पद-पद का अर्थ

मूल पदभाषा और व्याकरणसहज अर्थ
सर्वमङ्गलमाङ्गल्येअनेक शब्दों से बना समास; स्त्रीलिंग सम्बोधनसमस्त मंगलों की परम मंगलमयी
शिवेस्त्रीलिंग सम्बोधन, शिवा का रूपहे कल्याणकारी देवी
सर्वार्थसाधिकेसभी हितकारी प्रयोजनों को साधने वालीहे सब प्रयोजनों को पूर्ण करने में समर्थ देवी
शरण्येशरण देने योग्य/शरण देने वालीहे शरणदात्री
त्र्यम्बकेतीन नेत्रों वाली, स्त्रीलिंग सम्बोधनहे त्रिनयनी
गौरिगौरी शब्द का सम्बोधन रूपहे गौरी
नारायणिनारायणी शब्द का सम्बोधन रूपहे नारायणी
नमोऽस्तु तेनमः + अस्तु + ते का संधि-रूपआपको नमस्कार हो

यहाँ गौरि और नारायणि की छोटी इकारान्त ध्वनि पर ध्यान देना उपयोगी है। नाम के सामान्य रूप गौरी और नारायणी हैं, लेकिन संस्कृत सम्बोधन में गौरि और नारायणि आते हैं। इसे स्वतः वर्तनी की गलती मानकर बदलना ठीक नहीं। 1 4

श्लोक का भाव कैसे समझें?

'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये' का आशय

श्लोक केवल किसी शुभ अवसर की सफलता की कामना नहीं करता। देवी को स्वयं मंगल का आधार बताता है। भक्त के लिए इसमें कृतज्ञता, भरोसा, आन्तरिक आशा और कल्याण की भावना झलकती है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जीवन में दुःख या कठिनाई कभी नहीं आएगी अथवा किसी निश्चित संख्या में पाठ करने पर हर समस्या समाप्त हो जाएगी।

'शिवे' में क्या भगवान शिव का सम्बोधन है? यहाँ शिवे स्त्रीलिंग सम्बोधन है, जिसका अर्थ कल्याणमयी देवी है। शिव-शक्ति के पारस्परिक सम्बन्ध की स्मृति स्वाभाविक है, लेकिन इस श्लोक का सम्बोधन अचानक भगवान शिव की ओर नहीं चला जाता। पूरा श्लोक नारायणी के प्रति देवी-स्तुति है। अलग-अलग शैव और शाक्त परम्पराओं में इन नामों की दार्शनिक व्याख्या अलग हो सकती है।

'त्र्यम्बके', 'गौरि' और 'नारायणि' एक साथ क्यों? तीन नेत्र दिव्य ज्ञान और व्यापक दृष्टि की धार्मिक छवि से जुड़े हैं। गौरी नाम देवी के सौम्य तथा मातृरूप की स्मृति कराता है। नारायणी उसी स्तुति का बार-बार आने वाला सम्बोधन है। एक ही पंक्ति में अनेक नामों के आने से पाठ का भाव व्यापक होता है। इन्हें परस्पर विरोधी देवी-नाम मानने की आवश्यकता नहीं, किन्तु सभी सम्प्रदायों की व्याख्या को एक जैसा घोषित करना भी उचित नहीं। 1 4

'सर्वार्थसाधिके' से क्या सभी इच्छाएँ अवश्य पूरी होंगी? यह देवी की महिमा का काव्यात्मक और भक्तिपूर्ण वर्णन है। जीवन में धर्म, कल्याण, सद्भाव और उचित उद्देश्य की ओर बढ़ने का विचार इससे जोड़ा जा सकता है। किन्तु श्लोक अपने भीतर नौकरी, परीक्षा, धन, स्वास्थ्य या किसी रिश्ते के निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं देता। इसमें किसी गुप्त जप-संख्या, विशेष समय अथवा अनिवार्य विधि का उल्लेख भी नहीं है।

देवीमाहात्म्य में इसका स्थान

यह श्लोक मार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के ग्यारहवें अध्याय में आता है। शुम्भ-वध के बाद देवगण देवी की स्तुति करते हैं। शिवगोरक्ष के पूर्व तैयार नारायणी स्तुति में अध्याय ११ के ३–३५ श्लोक सम्मिलित हैं। यहाँ उसी संग्रह के केवल ११.१० श्लोक का अलग पढ़ने योग्य परिचय है, न कि दूसरा और भिन्न मूलपाठ। भविष्य में वेबसाइट पर इसे मूल अध्याय-११ के एक ही प्रमाणित श्लोक-रिकॉर्ड से जोड़ना चाहिए। 1 2

क्रमांक का अन्तर: कुछ संस्करणों में यह ११.९ अंकित मिलता है। शिवगोरक्ष की पहले से बनी अध्याय-११ प्रति में ११.१० है। अध्याय में वक्ता-सूचक अंशों और पदों की गणना भिन्न होने से यह अन्तर उत्पन्न हो सकता है; इससे स्वतः मूल श्लोक में शब्दों का अन्तर सिद्ध नहीं होता। 4 5

पाठभेद और सम्पादकीय सावधानियाँ

  1. ११.१० या ११.९: यह क्रमांकन का अन्तर है। इस संस्करण में मौजूदा अध्याय-पाठ के अनुरूप ११.१० सुरक्षित रखा गया है।
  2. सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये: कुछ जगह शब्द अलग-अलग लिखे जाते हैं, या साधारण हिन्दी वर्तनी में सर्वमंगलमांगल्ये आता है। यह आवश्यक नहीं कि अलग प्राचीन पाठ-परम्परा हो।
  3. त्र्यम्बके/त्रयम्बके: पहले से सुरक्षित पाठ त्र्यम्बके है। दूसरे डिजिटल पाठ में त्रयम्बके का रूप मिलता है; मुद्रित साक्ष्य के बिना किसी को मूलपाठ में नहीं मिलाया जाएगा।
  4. गौरि/गौरी, नारायणि/नारायणी: मूल में सम्बोधन के रूप गौरि तथा नारायणि ही रखे गए हैं। सामान्य नामों से इनका भेद व्याकरण-संगत है।
  5. नमोऽस्तु/नमोस्तु: अवग्रह के साथ और बिना लिखने का अन्तर अक्सर केवल लिप्यांकन का होता है। वर्तमान आधार-पाठ में नमोऽस्तु ते रखा गया है।
  6. 'ॐ' जोड़ना: कुछ परम्पराओं के पाठ में आरम्भ में ॐ लगाया जाता है। यह यहाँ चुने गए मूल अध्याय-श्लोक का भाग नहीं है।
  7. मूलस्रोत: १९१७ का पाण्शीकर/निर्णयसागर संस्करण एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य है, पर इस श्लोक के सम्बन्धित मुद्रित पृष्ठ का स्वतंत्र मिलान और पुनः उपयोग की विधिक अनुमति अभी नहीं हुई है। 3

इस सूची में सभी रूपों को प्रमाणित प्राचीन पाण्डुलिपि-पाठभेद नहीं माना गया है। कुछ केवल आधुनिक प्रस्तुति या सम्पादकीय तुलना के उदाहरण हैं।

भक्तिपरक प्रयोग और सीमाएँ

यह श्लोक घर की सामान्य प्रार्थना, नारायणी स्तुति, नवरात्रि और दुर्गा पूजा से जुड़े पाठों में सुना जाता है। परिवार, क्षेत्र और परम्परा के अनुसार विधियाँ भिन्न होती हैं। शिवगोरक्ष का यह लेख मूल शब्दों और अर्थ को समझने के लिए है; यहाँ अनिवार्य पाठ-संख्या, न्यास, दीक्षा-विधि, अनुष्ठान-निर्देश या चमत्कारी परिणाम नहीं बताए गए हैं। इस श्लोक को पढ़ने पर मन में एक प्रश्न उठ सकता है—हम अपने जीवन में मंगल, करुणा और उचित उद्देश्य को किस तरह स्थान दे सकते हैं? यह आधुनिक सम्पादकीय मनन है, मूल संस्कृत में छिपा कोई अतिरिक्त आदेश नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये पूरा मन्त्र है? इसे स्वतन्त्र रूप में भी पढ़ा जाता है, लेकिन यह मूलतः देवीमाहात्म्य अध्याय ११ का एक पूरा श्लोक है। इसका अलग प्राचीन रचयिता यहाँ नहीं माना गया है। यह श्लोक ११.९ है या ११.१०? शिवगोरक्ष का मूल अध्याय-११ प्रारूप और सम्बन्धित पाठ ११.१० क्रमांक अपनाते हैं। दूसरे पाठ-संस्करण में ११.९ अंकित है। 1 5

'शिवे' का अर्थ 'भगवान शिव' है? इस संदर्भ में नहीं। यह देवी के लिए स्त्रीलिंग सम्बोधन है, जिसका अर्थ मंगलमयी है। क्या श्लोक में ॐ जोड़ना चाहिए? हमारे चुने गए अध्याय-श्लोक की शुरुआत सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये से ही होती है। अन्य पूजा-पद्धतियों का अतिरिक्त आरम्भ अलग परम्परा का विषय है। क्या यह सभी मनोकामनाओं की गारंटी देता है? नहीं। सर्वार्थसाधिके भक्तिपूर्ण स्तुति का पद है, किसी विशेष सांसारिक परिणाम की शर्त या गारंटी नहीं। क्या इस लेख में जप-विधि और ऑडियो है? नहीं। इस संस्करण में प्रमाणित रिकॉर्डिंग या परम्परा-विशेष अनुष्ठान-विधान सम्मिलित नहीं है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

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    sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te

स्रोत और प्रकाशन-स्थिति

सभी स्रोतों के लिए स्रोत-सूची में 1 से 6 देखें। यह सामग्री पुराने अध्याय-११ प्रारूप पर आधारित है। ऐतिहासिक पाठ-मिलान, संस्कृत विशेषज्ञ की समीक्षा, हिन्दी-अंग्रेज़ी सम्पादन और अधिकार-संबंधी स्वीकृति अभी बाकी है। 3

केवल आन्तरिक शैक्षिक संस्करण। यह लेख या इसका मूल अध्याय प्रकाशित करने अथवा आदेश के उत्तरों में उपयोग करने के लिए अभी अनुमोदित नहीं है।

  1. इस पाठ के तुलनात्मक स्रोत और संस्करण-टिप्पणियाँ
  2. इस पाठ के तुलनात्मक स्रोत और संस्करण-टिप्पणियाँ
  3. Durgā Saptashatī / Devi Mahatmyam (Durga Saptashati), Paṇśīkar / Nirṇaya Sāgara Press, Bombay · स्रोत खोलें
  4. Śrī Durgā Saptashatī Chapter 11 — Devyā Stuti, digital recitation reading · स्रोत खोलें
  5. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) Chapter 11 (51-verse Markandeya Purana numbering) · स्रोत खोलें
  6. Sarvamangala Mangalye — Sanskrit text and English translation · स्रोत खोलें