पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

सरल दुर्गा पूजा

दुर्गा की घरेलू आराधना, अर्पण, अर्थ और सावधानियों की मार्गदर्शिका।

संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

इस पूजा के बारे में

यह मार्गदर्शिका उत्तर भारतीय घरेलू दुर्गा-भक्ति का परिचय देती है। अलग-अलग परिवारों में अर्पण और प्रार्थनाओं का क्रम बदलता है; एक विस्तृत पद्धति को सभी परिवारों का एकमात्र नियम न मानें। चरणवार पाठ प्रतीक, अर्थ और आवश्यक सावधानियाँ समझने के लिए है। 4

षोडशोपचार का अर्थ देवता का अतिथि की भाँति लगभग सोलह प्रकार के सत्कार से पूजन करना है—आसन, जल, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, भोजन इत्यादि। कुछ विधियों में सोलह मुख्य उपचारों को उपचरणों में बाँटकर बीस से अधिक क्रमांक दिए जाते हैं। पञ्चोपचार में सामान्यतः पाँच मुख्य उपचारों को महत्त्व दिया जाता है। इन विभिन्न सूचियों को बिना प्रमाण एक ही सार्वत्रिक और ‘सरलीकृत शास्त्रीय’ क्रम घोषित करना उचित नहीं। 41

महत्त्व और परम्परा

देवी, दुर्गा, अम्बिका और शक्ति

‘देवी’ स्त्री-दैवी स्वरूप का सामान्य नाम है; ‘दुर्गा’ रक्षा, सामर्थ्य और दुर्गति से उबारने से जुड़ी पूजित शक्ति हैं। ‘अम्बा’ या ‘अम्बिका’ मातृत्वपूर्ण सम्बोधन है। शाक्त दर्शन में ‘शक्ति’ सृजनशील दैवी सामर्थ्य की व्यापक संकल्पना है। अलग-अलग संप्रदायों में इन नामों की समानता हो सकती है, किन्तु उनकी ऐतिहासिक विशेषताएँ मिटा देना ठीक नहीं। देवीमाहात्म्य में महिषासुरमर्दिनी का प्रसंग अन्याय के प्रतिरोध और धर्मव्यवस्था की स्थापना को देवी के रूपक में प्रस्तुत करता है। सिंहवाहिनी, अनेक भुजाएँ तथा अस्त्र-शस्त्र ऐतिहासिक मूर्तियों में भी मिलते हैं; इन्हें व्यवहार में हिंसा का निर्देश न समझें। 5?

बंगाल की सार्वजनिक दुर्गापूजा, उत्तर भारतीय घरेलू नवरात्रि-पूजन और दक्षिण भारत की विविध नवरात्रि-रीतियों में प्रतिमा, कलश, पर्व-क्रम, प्रसाद और विसर्जन के तरीके भिन्न हो सकते हैं। परिवार की कुल-परम्परा महत्त्वपूर्ण है। यह मार्गदर्शिका औपचारिक शाक्त तन्त्र, श्रीविद्या, बंगाली दुर्गापूजा अथवा मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठित विधि का प्रतिस्थापन नहीं।

उपचारों का भावार्थ

‘उपचार’ पूज्य अतिथि के प्रति सत्कार है। जल, सुगन्ध, पुष्प, भोजन और प्रकाश के द्वारा साधक का ध्यान, नम्रता और कृतज्ञता व्यक्त होते हैं। इनसे निश्चित सांसारिक, चिकित्सकीय या अलौकिक परिणाम होने का दावा नहीं किया जाता। देवी की करुणा, साहस और असुर-विजय को नैतिक दृढ़ता, विवेक और बाधाओं के बीच आशा के रूप में भी समझ सकते हैं। 1?

आवश्यक सामग्री

स्वच्छ स्थिर चौकी, दुर्गा का चित्र या पहले से पूजित घरेलू विग्रह, स्वच्छ जल एवं छोटा पात्र, ताजे पुष्प, थोड़ी उचित चन्दन-गन्ध, इच्छानुसार रोली/कुमकुम, आवश्यक हो तो साफ चुनरी, और फल अथवा अन्य स्वच्छ सात्त्विक भोग—ये घरेलू आराधना की वैकल्पिक सामग्री हैं। घंटी तथा धूप वैकल्पिक हैं। दीप केवल सुरक्षित पर्यवेक्षण में; बच्चे, पालतू पशु, कपड़े, कागज़, दमा अथवा बन्द कमरा हो तो लौ और धुएँ से बचें। छपे चित्र, पुरातन चित्रित प्रतिमा या विद्युत सज्जा पर जल न डालें। महंगे आभूषण, अखण्ड ज्योति, रक्तबलि, अनिवार्य उपवास या दीक्षा यहाँ नहीं सिखाई जाती। 41?

मन्त्र-सत्यता का नियम: किसी उपचार का विस्तृत संस्कृत श्लोक और उसके बाद का छोटा ‘समर्पयामि’ सूत्र अलग पाठ-वर्ग हैं। यदि श्लोक में घीदीप, पंचामृत, दस द्रव्यों की धूप या छः रसों के भोजन का वर्णन है और वास्तव में वह सामग्री नहीं है, तो वह श्लोक उसी प्रकार के अर्पण का प्रमाण नहीं बनता। प्रत्येक उपचार को उसका सत्यापित स्रोत-पाठ दिया गया है; बिना आधार एक सामान्य मन्त्र को सबका पृथक् मन्त्र नहीं कहा गया। 4

आरम्भ करने से पहले

स्वीकृत अभ्यास की सीमाएँ

गणेश और गुरु-स्मरण वैकल्पिक आरम्भिक प्रार्थनाएँ हैं। चाहें तो भक्ति का उद्देश्य अपनी सामान्य भाषा में कहें; गोत्र, जन्म-नक्षत्र या पंचांग का अनुमान लगाकर संस्कृत संकल्प न बनाएँ। औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा, न्यास, दीक्षा-आधारित बीज-प्रयोग, यन्त्र-स्थापना और विशेष रात्रि-साधनाएँ इस घरेलू परिचय का भाग नहीं हैं। नवार्ण मन्त्र और अम्बे तू है जगदम्बे काली अपने अलग पठन-सन्दर्भ रखते हैं।

संस्कृत का उच्चारण और पाठ

पाठ में देवनागरी के साथ कार्यशील IAST लिप्यन्तरण है। ā, ī, ū दीर्घ स्वर; ṭ, ḍ, ṇ मूर्धन्य वर्ण; तथा ś, ṣ अलग उष्म वर्ण दर्शाते हैं। यह उच्चारण-विशेषज्ञ का प्रमाणपत्र या वैदिक स्वर-दीक्षा नहीं है। स्पष्टता से धीरे पढ़ें; बिना स्रोत निश्चित जप-संख्या को अनिवार्य न बनाएं। देवीमाहात्म्य से लिए गए स्तोत्र-पद्य शास्त्रीय स्तुति हैं, उपचार में मन से बनाए मन्त्र नहीं। 57

घरेलू आराधना: चरण और सन्दर्भ

चरण 1

सरल पूजास्थान की तैयारी

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स्थिर और स्वच्छ चौकी पर दुर्गा का चित्र अथवा पहले से प्रतिष्ठित घरेलू विग्रह रखें। स्वच्छ जल, अलग अर्पण-पात्र, भोग की थाली और कपड़ा रखें। फ्रेम वाले चित्र पर जल न डालें और चन्दन/रोली न लगाएँ।

स्थान-सफाई हेतु चुनी हुई विधि में कोई पृथक् अनिवार्य संस्कृत मन्त्र प्रमाणित नहीं है।

चरण 2 · वैकल्पिक

वैकल्पिक गणेश-स्मरण

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यदि घर की परंपरा में हो तो देवी-पूजा से पहले गणेशजी का स्मरण करें। यह अलग भक्ति-स्रोत पर आधारित विकल्प है, दुर्गा-पूजा की मुख्य क्रमसूची का अनिवार्य भाग नहीं।

प्रार्थना शुभ कार्यों में विघ्न दूर होने की विनती करती है।

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मूल पाठ

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

रोमन लिप्यंतरण

vakratunda mahaakaaya sooryakotisamaprabha | nirvighnam kuru me deva sarvakaaryeshu sarvadaa ||vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||

अर्थ

हे वक्रतुण्ड, विशालकाय और असंख्य सूर्यों के समान प्रभायुक्त देव, मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न हों।

व्याख्या

प्रार्थना शुभ कार्यों में विघ्न दूर होने की विनती करती है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 3 · वैकल्पिक

वैकल्पिक गुरु-वन्दना

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परिवार-परम्परा में प्रचलित हो तो अपने गुरुजनों और शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें; इससे दीक्षा का दावा नहीं बनता।

गुरु को सृजन, पालन और परिवर्तनकारी विवेक का माध्यम मानकर आदर किया जाता है।

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मूल पाठ

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

रोमन लिप्यंतरण

gururbrahmaa gururvishnurgururdevo maheshvarah | guruh saakshaat param brahma tasmai shreegurave namah ||gururbrahmā gururviṣṇurgururdevo maheśvaraḥ | guruḥ sākṣāt paraṃ brahma tasmai śrīgurave namaḥ ||

अर्थ

गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के तुल्य तथा प्रत्यक्ष परब्रह्म मानकर नमस्कार किया गया है।

व्याख्या

गुरु को सृजन, पालन और परिवर्तनकारी विवेक का माध्यम मानकर आदर किया जाता है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 4 · वैकल्पिक

तिथि-कल्पना के बिना वैकल्पिक संकल्प

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अपनी भाषा में कहें—“मैं श्रद्धा और कृतज्ञता से माँ दुर्गा का सरल पूजन करता/करती हूँ।” अप्रमाणित गोत्र, तिथि, नक्षत्र अथवा स्थान को जोड़कर संस्कृत संकल्प नहीं बनाया गया है।

संकल्प साधक के उद्देश्य की स्पष्टता है; किसी फल की निश्चित गारंटी नहीं।

चरण 5

ध्यान: मंगलमयी देवी का स्मरण

हाथ जोड़कर देवी की करुणा, अभय और धर्मरक्षा का ध्यान करें। यह शास्त्रीय स्तुति-पद्य है, जिसे चुनी गयी आधुनिक विधि आरम्भिक स्मरण में रखती है; इसे तान्त्रिक दीक्षा का ध्यानमन्त्र न समझें।

देवी को मंगलमयी, कल्याणकारिणी, शरण देने वाली, त्र्यम्बका गौरी और नारायणी कहकर नमस्कार है।

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मूल पाठ

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

रोमन लिप्यंतरण

sarvamangalamaangalye shive sarvaarthasaadhike | sharanye tryambake gauri naaraayani namo’stu te ||sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ||

अर्थ

हे समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगलमयी, कल्याणकारिणी, शरण्ये, त्र्यम्बके गौरी, नारायणी! आपको नमस्कार है।

व्याख्या

देवी को मंगलमयी, कल्याणकारिणी, शरण देने वाली, त्र्यम्बका गौरी और नारायणी कहकर नमस्कार है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 6

आवाहन: देवी का आदरपूर्वक निमन्त्रण

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घरेलू चित्र या पहले से पूजित विग्रह के सामने देवी को आदरणीय उपस्थिति के रूप में स्मरण करें। यह भक्ति-आवाहन है, प्राण-प्रतिष्ठा अथवा मंदिर-विग्रह स्थापित करने की प्रक्रिया नहीं।

मन्त्र में दुर्गादेवी को नमस्कार कर पूजन में पधारने की प्रार्थना है।

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मूल पाठ

आगच्छ वरदे देवि दैत्यदर्पनिषूदिनि । पूजां गृहाण सुमुखि नमस्ते शङ्करप्रिये ॥

रोमन लिप्यंतरण

aagachchha varade devi daityadarpanishoodini | poojaam grihaana sumukhi namaste shankarapriye ||āgaccha varade devi daityadarpaniṣūdini | pūjāṃ gṛhāṇa sumukhi namaste śaṅkarapriye ||

अर्थ

हे वर देने वाली देवी, दैत्यों के दर्प का नाश करने वाली, कृपया पधारकर यह पूजा स्वीकार करें; हे शङ्करप्रिये, आपको नमस्कार।

व्याख्या

मन्त्र में दुर्गादेवी को नमस्कार कर पूजन में पधारने की प्रार्थना है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 7 · वैकल्पिक

आसन: प्रतीकात्मक आसन-अर्पण

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चित्र के सामने एक ताजा पुष्प रखकर आदरपूर्वक आसन अर्पित करें। श्लोक रत्नजटित आसन की भावनात्मक कल्पना करता है; वास्तव में रत्न आवश्यक नहीं।

हे देवी, कृपया रत्नों से अलंकृत दिव्य आसन स्वीकार करें।

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मूल पाठ

अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् । कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥

रोमन लिप्यंतरण

anekaratnasamyuktam naanaamaniganaanvitam | kaartasvaramayam divyamaasanam pratigrihyataam ||anekaratnasaṃyuktaṃ nānāmaṇigaṇānvitam | kārtasvaramayaṃ divyamāsanaṃ pratigṛhyatām ||

अर्थ

अनेक रत्नों और मणियों से युक्त स्वर्णमय दिव्य आसन स्वीकार कीजिए।

व्याख्या

हे देवी, कृपया रत्नों से अलंकृत दिव्य आसन स्वीकार करें।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 8 · वैकल्पिक

पाद्य: चरणों के लिए जल

अंश का लिंक

अलग छोटी कटोरी में स्वच्छ जल रखकर देवी के चरण-प्रक्षालन के लिए प्रतीकात्मक रूप से अर्पित करें; चित्र पर जल न डालें।

पाद्य में पूजनीय अतिथि के चरण धोने जैसा आदर प्रकट होता है।

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मूल पाठ

गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्यो मया प्रार्थनयाहृतम् । तोयमेतत्सुखस्पर्शं पाद्यार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥

रोमन लिप्यंतरण

gangaadisarvateerthebhyo mayaa praarthanayaahritam | toyametatsukhasparsham paadyaartham pratigrihyataam ||gaṅgādisarvatīrthebhyo mayā prārthanayāhṛtam | toyametatsukhasparśaṃ pādyārthaṃ pratigṛhyatām ||

अर्थ

पवित्र तीर्थों से लाया हुआ माना गया यह सुखस्पर्श जल अपने चरणों के लिए स्वीकार करें।

व्याख्या

पाद्य में पूजनीय अतिथि के चरण धोने जैसा आदर प्रकट होता है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 9 · वैकल्पिक

अर्घ्य: सत्कारार्थ जल

अंश का लिंक

थोड़ा स्वच्छ जल रखें। सुगन्ध, पुष्प या अक्षत परिवार की रीति तथा सामग्री के अनुकूल होने पर ही मिलाएँ; चित्र को भिगोने के बजाय पात्र में अर्पण करें।

अर्घ्य विशेष रूप से तैयार जल के द्वारा सत्कार है।

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मूल पाठ

गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया । गृहाण त्वं महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा ॥

रोमन लिप्यंतरण

gandhapushpaakshatairyuktamarghyam sampaaditam mayaa | grihaana tvam mahaadevi prasannaa bhava sarvadaa ||gandhapuṣpākṣatairyuktamarghyaṃ sampāditaṃ mayā | gṛhāṇa tvaṃ mahādevi prasannā bhava sarvadā ||

अर्थ

हे महादेवि, सुगन्ध, फूल और अक्षत से युक्त मेरा अर्घ्य स्वीकार कर प्रसन्न हों।

व्याख्या

अर्घ्य विशेष रूप से तैयार जल के द्वारा सत्कार है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 10 · वैकल्पिक

आचमनीय जल: मुख-शुद्धि का जल

देवी के लिए अलग छोटे पात्र में जल रखकर प्रतीकात्मक आचमनीय अर्पित करें। यहाँ साधक के विशेष वैदिक आचमन की आज्ञा नहीं दी जा रही।

देवी से आचमनीय जल स्वीकार कर स्थिर भक्ति देने की विनती है।

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मूल पाठ

आचम्यतां त्वया देवि भक्तिं मे ह्यचलां कुरु । ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥

रोमन लिप्यंतरण

aachamyataam tvayaa devi bhaktim me hyachalaam kuru | eepsitam me varam dehi paratra cha paraam gatim ||ācamyatāṃ tvayā devi bhaktiṃ me hyacalāṃ kuru | īpsitaṃ me varaṃ dehi paratra ca parāṃ gatim ||

अर्थ

हे देवि, यह आचमनीय जल स्वीकार कर मुझे अचल भक्ति, उचित वर और परम कल्याण प्रदान करें।

व्याख्या

देवी से आचमनीय जल स्वीकार कर स्थिर भक्ति देने की विनती है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 11

स्नान: स्वच्छ जल का प्रतीकात्मक अर्पण

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प्रतीकात्मक स्नान केवल उपयुक्त धुलने योग्य घरेलू प्रतिमा के सन्दर्भ में है; फ्रेम वाले चित्र या नाजुक कलाकृति पर जल न डालें। जल-स्नान के पद का आरम्भिक समास अनिश्चित है; यहाँ पूर्ण स्नान-विधि नहीं सिखाई गई है।

स्वच्छ जल सत्कार और शुद्धता का प्रतीक है; इसे पूर्ण वैदिक स्नपन अथवा प्राण-प्रतिष्ठा न मानें।

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मूल पाठ

परमानन्दबोधाब्धिनिमग्नानिजमूर्तये । साङ्गोपाङ्गमिदं स्नानं कल्पयामि सुरेश्वरि ॥

रोमन लिप्यंतरण

paramaanandabodhaabdhinimagnaanijamoortaye | saangopaangamidam snaanam kalpayaami sureshvari ||paramānandabodhābdhinimagnānijamūrtaye | sāṅgopāṅgamidaṃ snānaṃ kalpayāmi sureśvari ||

अर्थ

हे सुरेश्वरि, परम आनन्द और बोध के सागर में स्थित आपके दिव्य स्वरूप के लिए यह सम्पूर्ण स्नानोपचार मानसिक रूप से अर्पित है। प्रथम समास के पाठ को लेकर अनिश्चितता है।

व्याख्या

स्वच्छ जल सत्कार और शुद्धता का प्रतीक है; इसे पूर्ण वैदिक स्नपन अथवा प्राण-प्रतिष्ठा न मानें।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 12 · वैकल्पिक

वैकल्पिक वस्त्र या चुनरी

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परम्परा हो तो देवी के चित्र के पास साफ कपड़ा या चुनरी रखें; दीपक के पास वस्त्र न बाँधें। सरल घरेलू संस्करण में यह वैकल्पिक है।

वस्त्र सम्मान, गरिमा और सत्कार का संकेत है; महंगे अलंकरण का बन्धन नहीं।

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मूल पाठ

वस्त्रं च सोमदैवत्यं लज्जायास्तु निवारणम् । मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ॥

रोमन लिप्यंतरण

vastram cha somadaivatyam lajjaayaastu nivaaranam | mayaa niveditam bhaktyaa grihaana parameshvari ||vastraṃ ca somadaivatyaṃ lajjāyāstu nivāraṇam | mayā niveditaṃ bhaktyā gṛhāṇa parameśvari ||

अर्थ

हे परमेश्वरि, लज्जा-निवारण और आदर के लिए भक्तिपूर्वक अर्पित वस्त्र स्वीकार करें।

व्याख्या

वस्त्र सम्मान, गरिमा और सत्कार का संकेत है; महंगे अलंकरण का बन्धन नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 13

गन्ध/चन्दन अर्पण

अंश का लिंक

सुरक्षित चन्दन का थोड़ा लेप कटोरी में अर्पित करें अथवा उपयुक्त धोए जा सकने वाले विग्रह पर ही लगाएँ। कागज़, चित्र, नाजुक रंग या किसी व्यक्ति की त्वचा पर बिना सहमति न लगाएँ।

सुगन्ध को सौम्यता, सुसंस्कृति और स्वागत का प्रतीक समझें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

परमानन्दसौभाग्यं परिपूर्णं दिगन्तरे । गृहाण परमं गन्धं कृपया परमेश्वरि ॥

रोमन लिप्यंतरण

paramaanandasaubhaagyam paripoornam digantare | grihaana paramam gandham kripayaa parameshvari ||paramānandasaubhāgyaṃ paripūrṇaṃ digantare | gṛhāṇa paramaṃ gandhaṃ kṛpayā parameśvari ||

अर्थ

हे परमेश्वरि, कृपया आनन्द और सौभाग्य से सम्बन्धित यह उत्तम गन्ध स्वीकार करें।

व्याख्या

सुगन्ध को सौम्यता, सुसंस्कृति और स्वागत का प्रतीक समझें।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 14 · वैकल्पिक

वैकल्पिक कुमकुम / रोली

अंश का लिंक

जहाँ कुल-परम्परा में कुमकुम अर्पण होता हो, वहाँ थोड़ा रोली-पाउडर चित्र के आगे रखें या उपयुक्त विग्रह पर लगाएँ। यह हर शाक्त या स्मार्त परिवार की अनिवार्य रीति नहीं।

कुमकुम सौभाग्य और श्रद्धा का लोक-प्रचलित संकेत है; इसे सब साधकों पर वैवाहिक स्थिति का नियम न बनाएँ।

अंश का लिंक

मूल पाठ

कुङ्कुमं कान्तिदं दिव्यं कामिनीकामसम्भवम् । कुङ्कुमेनार्चिते देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥

रोमन लिप्यंतरण

kunkumam kaantidam divyam kaamineekaamasambhavam | kunkumenaarchite devi praseeda parameshvari ||kuṅkumaṃ kāntidaṃ divyaṃ kāminīkāmasambhavam | kuṅkumenārcite devi prasīda parameśvari ||

अर्थ

हे परमेश्वरि, शोभा प्रदान करने वाले कुमकुम से पूजित होकर प्रसन्न हों।

व्याख्या

कुमकुम सौभाग्य और श्रद्धा का लोक-प्रचलित संकेत है; इसे सब साधकों पर वैवाहिक स्थिति का नियम न बनाएँ।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 15

पुष्पाञ्जलि: फूल अर्पण

स्वच्छ ताजे फूल श्रद्धा से अर्पित करें। विस्तृत पद्य में कई विशेष पुष्पों के नाम हैं; वे न हों तो स्रोत के छोटे पुष्पाञ्जलि-सूत्र को चुनें। फूल थाली में रखे जा सकते हैं।

फूल सौन्दर्य, कोमलता, क्षणभंगुरता और हृदय की भक्ति के प्रतीक हैं।

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मूल पाठ

मन्दारपारिजातादि-पाटलीकेतकानि च । जातीचम्पकपुष्पाणि गृहाणेमानि शोभने ॥

रोमन लिप्यंतरण

mandaarapaarijaataadi-paataleeketakaani cha | jaateechampakapushpaani grihaanemaani shobhane ||mandārapārijātādi-pāṭalīketakāni ca | jātīcampakapuṣpāṇi gṛhāṇemāni śobhane ||

अर्थ

हे शोभने, मन्दार, पारिजात, पाटली, केतकी, जाती और चम्पा जैसे फूल स्वीकार करें।

व्याख्या

फूल सौन्दर्य, कोमलता, क्षणभंगुरता और हृदय की भक्ति के प्रतीक हैं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 16 · वैकल्पिक

वैकल्पिक धूप अर्पण

अंश का लिंक

पद्य में गुग्गुल, चन्दन और अगरु-मिश्रित धूप का वर्णन है। धुएँ से असुविधा हो तो इसे छोड़ें; इसे हर तरह की अगरबत्ती या घर में धुआँ जलाने का आदेश न मानें।

धूप सुगन्धित सत्कार है; घना धुआँ आवश्यक नहीं।

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मूल पाठ

दशाङ्गगुग्गुलं धूपं चन्दनागरुसंयुतम् । समर्पितं मया भक्त्या महादेवि प्रतिगृह्यताम् ॥

रोमन लिप्यंतरण

dashaangaguggulam dhoopam chandanaagarusamyutam | samarpitam mayaa bhaktyaa mahaadevi pratigrihyataam ||daśāṅgaguggulaṃ dhūpaṃ candanāgarusaṃyutam | samarpitaṃ mayā bhaktyā mahādevi pratigṛhyatām ||

अर्थ

हे महादेवी, गुग्गुल, चन्दन और अगरु से युक्त वर्णित भक्ति-अर्पित धूप स्वीकार करें।

व्याख्या

धूप सुगन्धित सत्कार है; घना धुआँ आवश्यक नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 17 · वैकल्पिक

दीप: प्रकाश अर्पण

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इस पद्य में घृत-बत्ती का दीप्त दीपक है। उसके भावार्थ का अध्ययन करें; बैटरी दीपक या असुरक्षित लौ को इस स्रोत-विधि के समान न कहें।

दीप विवेक और आदर का प्रतीक है; किसी चमत्कारी सुरक्षा की गारंटी नहीं।

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मूल पाठ

घृतवर्त्तिसमायुक्तं महातेजो महोज्ज्वलम् । दीपं दास्यामि देवेशि सुप्रीता भव सर्वदा ॥

रोमन लिप्यंतरण

ghritavarttisamaayuktam mahaatejo mahojjvalam | deepam daasyaami deveshi supreetaa bhava sarvadaa ||ghṛtavarttisamāyuktaṃ mahātejo mahojjvalam | dīpaṃ dāsyāmi deveśi suprītā bhava sarvadā ||

अर्थ

हे देवेशि, घृतबाती से प्रज्वलित तेजस्वी दीप अर्पित करता/करती हूँ, कृपया प्रसन्न हों।

व्याख्या

दीप विवेक और आदर का प्रतीक है; किसी चमत्कारी सुरक्षा की गारंटी नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 18

नैवेद्य: सरल भोग

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उद्धृत प्रार्थना छह रसों वाले चार प्रकार के भोजन का वर्णन करती है। एक फल अलग अर्पण है; इस पद को केवल फल के भोजन का शाब्दिक विवरण न मानें।

भोग कृतज्ञता और बाँटने की भावना है; इससे स्वच्छ भोजन का नियम समाप्त नहीं होता।

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मूल पाठ

अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम् । नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ॥

रोमन लिप्यंतरण

annam chaturvidham svaadu rasaih shadbhih samanvitam | naivedyam grihyataam devi bhaktim me hyachalaam kuru ||annaṃ caturvidhaṃ svādu rasaiḥ ṣaḍbhiḥ samanvitam | naivedyaṃ gṛhyatāṃ devi bhaktiṃ me hyacalāṃ kuru ||

अर्थ

हे देवी, छः रसों से युक्त स्वादिष्ट चतुर्विध अन्नरूपी नैवेद्य स्वीकार करके मेरी भक्ति को अचल बनाइए।

व्याख्या

भोग कृतज्ञता और बाँटने की भावना है; इससे स्वच्छ भोजन का नियम समाप्त नहीं होता।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 19 · वैकल्पिक

नैवेद्य के बाद जल (वैकल्पिक)

अंश का लिंक

नैवेद्य के बाद अलग छोटी कटोरी में पीने योग्य जल प्रतीकात्मक रूप से रखा जा सकता है। भोग में जल न उड़ेलें।

भोजन के बाद जल देना आदरणीय अतिथि-सत्कार की पूर्णता दर्शाता है।

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मूल पाठ

कामारिवल्लभे देवि कुर्वाचमनमम्बिके । निरन्तरमहं वन्दे चरणौ तव चण्डिके ॥

रोमन लिप्यंतरण

kaamaarivallabhe devi kurvaachamanamambike | nirantaramaham vande charanau tava chandike ||kāmārivallabhe devi kurvācamanamambike | nirantaramahaṃ vande caraṇau tava caṇḍike ||

अर्थ

हे शिवप्रिया अम्बिके, आचमन कीजिए; मैं आपके चरणों में निरन्तर प्रणत हूँ।

व्याख्या

भोजन के बाद जल देना आदरणीय अतिथि-सत्कार की पूर्णता दर्शाता है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 20 · वैकल्पिक

वैकल्पिक देवीमाहात्म्य स्तुति-पाठ

अर्पणों के बाद यह शास्त्रीय नमस्कार-पद्य पढ़ सकते हैं अथवा देवीमाहात्म्य का प्रमाणित अंश देख सकते हैं। शास्त्रपाठ प्रत्येक उपचार-मन्त्र का विकल्प नहीं और इससे विशेष अनुष्ठान की पात्रता नहीं मिलती।

देवी को महादेवी, मंगलमयी प्रकृति और कल्याणकारी शक्ति के रूप में नमस्कार है।

अंश का लिंक

मूल पाठ

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥

रोमन लिप्यंतरण

namo devyai mahaadevyai shivaayai satatam namah | namah prakrityai bhadraayai niyataah pranataah sma taam ||namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ | namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām ||

अर्थ

देवी, महादेवी और मंगलमयी स्वरूप को नमस्कार; प्रकृति तथा भद्राशक्ति को हम संयमपूर्वक प्रणाम करते हैं।

व्याख्या

देवी को महादेवी, मंगलमयी प्रकृति और कल्याणकारी शक्ति के रूप में नमस्कार है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 21 · वैकल्पिक

वैकल्पिक आरती/नीराजन

अंश का लिंक

यह प्रार्थना कपूर-नीराजन से सम्बद्ध है। इसका प्रसंग अध्ययन के लिए है, घर के भीतर कपूर प्रज्वलित करने का निर्देश नहीं।

नीराजन प्रकाश द्वारा नमस्कार है; इस मार्गदर्शिका में परिक्रमा-संख्या मन से निर्धारित नहीं की गयी।

अंश का लिंक

मूल पाठ

नीराजनं सुमाङ्गल्यं कर्पूरेण समन्वितम् । चन्द्रार्कवह्निसदृशं महादेवि नमोऽस्तु ते ॥

रोमन लिप्यंतरण

neeraajanam sumaangalyam karpoorena samanvitam | chandraarkavahnisadrisham mahaadevi namo’stu te ||nīrājanaṃ sumāṅgalyaṃ karpūreṇa samanvitam | candrārkavahnisadṛśaṃ mahādevi namo’stu te ||

अर्थ

हे महादेवी, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि की तरह प्रकाशमान, कपूरयुक्त इस मंगल नीराजन द्वारा आपको नमस्कार है।

व्याख्या

नीराजन प्रकाश द्वारा नमस्कार है; इस मार्गदर्शिका में परिक्रमा-संख्या मन से निर्धारित नहीं की गयी।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 22 · वैकल्पिक

नमस्कार एवं प्रतीकात्मक प्रदक्षिणा

अंश का लिंक

हाथ जोड़कर नमस्कार करें। स्रोत की औपचारिक प्रदक्षिणा का संकेत प्रार्थना द्वारा किया जा सकता है; छोटी घरेलू चौकी के चारों ओर तीन फेरे लगाना अनिवार्य नहीं।

प्रार्थना में अम्बिका के सामने आदरपूर्वक प्रदक्षिणा समर्पित है।

अंश का लिंक

इस संस्करण में सामान्य प्रदक्षिणा-प्रार्थना है।

मूल पाठ

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च । तानि तानि विनश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥

रोमन लिप्यंतरण

yaani kaani cha paapaani janmaantarakritaani cha | taani taani vinashyantu pradakshinapade pade ||yāni kāni ca pāpāni janmāntarakṛtāni ca | tāni tāni vinaśyantu pradakṣiṇapade pade ||

अर्थ

इस या पूर्व जन्मों में किए गए पाप प्रदक्षिणा के हर पद के साथ दूर हों—यह प्रार्थना है।

व्याख्या

यह सामान्य प्रदक्षिणा-प्रार्थना अनुचित आचरण से दूर होने की आकांक्षा व्यक्त करती है। इसमें तीन परिक्रमाओं का विधान या कर्म के परिणाम मिटने की गारंटी नहीं है; पारिवारिक रीति और शारीरिक क्षमता भिन्न होती हैं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 23

क्षमा-प्रार्थना: त्रुटियों के लिए विनय

अंश का लिंक

पूजा के अन्त में सामग्री, स्मरण या ध्यान की त्रुटियों के लिए विनयपूर्वक क्षमा माँगें; किसी अशुभ भय का दावा न करें। स्थायी घरेलू पूजास्थान में हर दिन कल्पित विसर्जन आवश्यक नहीं।

जाने-अनजाने दोषों पर क्षमा की प्रार्थना तथा अन्तिम नमस्कार।

अंश का लिंक

इस संस्करण में देवी की क्षमा-प्रार्थना है।

मूल पाठ

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥

रोमन लिप्यंतरण

aavaahanam na jaanaami na jaanaami visarjanam | poojaam chaiva na jaanaami kshamyataam parameshvari ||āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam | pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamyatāṃ parameśvari ||

अर्थ

मैं आवाहन, विसर्जन और यथाविधि पूजा नहीं जानता; हे परमेश्वरि, मुझे क्षमा करें।

व्याख्या

यह क्षमा-प्रार्थना देवी के प्रति विनम्रता व्यक्त करती है। अपनी जानकारी की सीमा मानना सावधानी, करुणा और सुरक्षा की जिम्मेदारी का विकल्प नहीं है।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

चरण 24

भोग के बाद प्रसाद और स्वच्छता

अंश का लिंक

परिवार की रीति के अनुसार भोग कुछ देर रखें, फिर स्वच्छता बनाए रखते हुए बाँटें। दीप पूर्णतः बुझाएँ, धूप सुरक्षित हटाएँ और पुष्पों का उचित निस्तारण करें। चुनी हुई विधि में सफाई के लिए अलग अनिवार्य संस्कृत मन्त्र नहीं मिला।

प्रसाद कृतज्ञता और साझा करने की भावना है; इससे उपचार का कोई चिकित्सकीय दावा नहीं जुड़ता।

महत्त्वपूर्ण सावधानियाँ

औपचारिक प्राण-प्रतिष्ठा, न्यास, दीक्षासापेक्ष बीजमन्त्र-साधना, हवन, विशिष्ट व्रत-विधि, अनिवार्य वैवाहिक नियम, महंगे अलंकार, अखण्ड ज्योति और अप्रमाणित पर्व-मुहूर्त इस पाठ में नहीं जोड़े गए हैं। मंदिर के प्रतिष्ठित विग्रह पर मंदिर के सेवकों की ही व्यवस्था लागू होगी। किसी एक घरेलू परम्परा के नियम सभी स्त्री-पुरुष और बच्चों पर न थोपें।

नवार्ण का विशेष जप

मन्त्र को पढ़ना और किसी दीक्षा-परम्परा में उसका विशिष्ट प्रयोग अलग विषय हैं। यहाँ मनमानी जप-संख्या या बीज-न्यास की विधि नहीं दी जाती।

आरती के गीत

सम्बन्धित आरती भक्ति-संग्रह में पढ़ी जा सकती है। कपूर-नीराजन एक अलग अग्नि-सम्बन्धी क्रिया है; उसे इस शैक्षिक पाठ से अनुमति प्राप्त विधि न मानें।

सम्बन्धित आरती भक्ति-संग्रह में पढ़ी जा सकती है। कपूर-नीराजन एक अलग अग्नि-सम्बन्धी क्रिया है; उसे इस शैक्षिक पाठ से अनुमति प्राप्त विधि न मानें।

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नवरात्रि, तिथि और घटस्थापना

देवी की दैनिक भक्ति पर्व तक सीमित नहीं। चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि, नवदुर्गा, कलश और स्थानानुसार मुहूर्त का विश्लेषण गाइड 003–004 में अलग होगा। इस स्थायी लेख में कोई कल्पित तिथि या मुहूर्त नहीं दिया गया।

प्रश्न और आगे का अध्ययन

क्या धूप अनिवार्य है? नहीं। धुआँ असुविधाजनक या असुरक्षित हो तो धूप छोड़ दें।

क्या तस्वीर पर जल चढ़ाएँ? नहीं; अलग जल-पात्र से प्रतीकात्मक अर्पण करें।

क्या दुर्गा, काली, लक्ष्मी और नौ दुर्गाओं के हर मन्त्र समान हैं? नहीं; विशिष्ट नाम, सन्दर्भ और कुल-परम्परा देखें।

क्या कठिन संस्कृत संकल्प अनिवार्य है? सरल घरेलू भक्ति में अपनी भाषा में उद्देश्य कहा जा सकता है। गोत्र या पंचांग का विवरण अनुमान से न जोड़ें।

क्या रोज प्राण-प्रतिष्ठा और विसर्जन करना पड़ता है? स्थायी घरेलू चित्र और अस्थायी उत्सव-विग्रह की रीति अलग है।

क्या नवार्ण मन्त्र सब अर्पणों का विकल्प है? बिना परम्परा-साक्ष्य नहीं; हर उपचार का अपना सम्बद्ध पाठ है।

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. वैकल्पिक गणेश-स्मरण

    vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||

  2. वैकल्पिक गुरु-वन्दना

    gururbrahmā gururviṣṇurgururdevo maheśvaraḥ | guruḥ sākṣāt paraṃ brahma tasmai śrīgurave namaḥ ||

  3. ध्यान: मंगलमयी देवी का स्मरण

    sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ||

  4. आवाहन: देवी का आदरपूर्वक निमन्त्रण

    āgaccha varade devi daityadarpaniṣūdini | pūjāṃ gṛhāṇa sumukhi namaste śaṅkarapriye ||

  5. आसन: प्रतीकात्मक आसन-अर्पण

    anekaratnasaṃyuktaṃ nānāmaṇigaṇānvitam | kārtasvaramayaṃ divyamāsanaṃ pratigṛhyatām ||

  6. पाद्य: चरणों के लिए जल

    gaṅgādisarvatīrthebhyo mayā prārthanayāhṛtam | toyametatsukhasparśaṃ pādyārthaṃ pratigṛhyatām ||

  7. अर्घ्य: सत्कारार्थ जल

    gandhapuṣpākṣatairyuktamarghyaṃ sampāditaṃ mayā | gṛhāṇa tvaṃ mahādevi prasannā bhava sarvadā ||

  8. आचमनीय जल: मुख-शुद्धि का जल

    ācamyatāṃ tvayā devi bhaktiṃ me hyacalāṃ kuru | īpsitaṃ me varaṃ dehi paratra ca parāṃ gatim ||

  9. स्नान: स्वच्छ जल का प्रतीकात्मक अर्पण

    paramānandabodhābdhinimagnānijamūrtaye | sāṅgopāṅgamidaṃ snānaṃ kalpayāmi sureśvari ||

  10. वैकल्पिक वस्त्र या चुनरी

    vastraṃ ca somadaivatyaṃ lajjāyāstu nivāraṇam | mayā niveditaṃ bhaktyā gṛhāṇa parameśvari ||

  11. गन्ध/चन्दन अर्पण

    paramānandasaubhāgyaṃ paripūrṇaṃ digantare | gṛhāṇa paramaṃ gandhaṃ kṛpayā parameśvari ||

  12. वैकल्पिक कुमकुम / रोली

    kuṅkumaṃ kāntidaṃ divyaṃ kāminīkāmasambhavam | kuṅkumenārcite devi prasīda parameśvari ||

  13. पुष्पाञ्जलि: फूल अर्पण

    mandārapārijātādi-pāṭalīketakāni ca | jātīcampakapuṣpāṇi gṛhāṇemāni śobhane ||

  14. वैकल्पिक धूप अर्पण

    daśāṅgaguggulaṃ dhūpaṃ candanāgarusaṃyutam | samarpitaṃ mayā bhaktyā mahādevi pratigṛhyatām ||

  15. दीप: प्रकाश अर्पण

    ghṛtavarttisamāyuktaṃ mahātejo mahojjvalam | dīpaṃ dāsyāmi deveśi suprītā bhava sarvadā ||

  16. नैवेद्य: सरल भोग

    annaṃ caturvidhaṃ svādu rasaiḥ ṣaḍbhiḥ samanvitam | naivedyaṃ gṛhyatāṃ devi bhaktiṃ me hyacalāṃ kuru ||

  17. नैवेद्य के बाद जल (वैकल्पिक)

    kāmārivallabhe devi kurvācamanamambike | nirantaramahaṃ vande caraṇau tava caṇḍike ||

  18. वैकल्पिक देवीमाहात्म्य स्तुति-पाठ

    namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ | namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām ||

  19. वैकल्पिक आरती/नीराजन

    nīrājanaṃ sumāṅgalyaṃ karpūreṇa samanvitam | candrārkavahnisadṛśaṃ mahādevi namo’stu te ||

  20. नमस्कार एवं प्रतीकात्मक प्रदक्षिणा

    yāni kāni ca pāpāni janmāntarakṛtāni ca | tāni tāni vinaśyantu pradakṣiṇapade pade ||

  21. क्षमा-प्रार्थना: त्रुटियों के लिए विनय

    āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam | pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamyatāṃ parameśvari ||

पुनर्प्रयुक्त पाठों का श्रेय और लाइसेंस
पाठ और स्रोत

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Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced. The quoted passage is used for textual study, without conferring ritual authority.

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Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced. The quoted passage is used for textual study, without conferring ritual authority.

पाठ और स्रोत

Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

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Inherited Devi Mahatmyam Sanskrit; exact quoted words compared with the currently released Nirnaya Sagara historical-source educational edition. Original ShivGoraksh bilingual meanings. Source remains provisional, not independently certified.

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Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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Mahidhara, Mantramahodadhi with Nauka, Khemraj Sanskrit reprint. https://archive.org/details/mantra-mahodadhi-with-tika-khemraj. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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Mahidhara, Mantramahodadhi with Nauka, Khemraj Sanskrit reprint. https://archive.org/details/mantra-mahodadhi-with-tika-khemraj. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.

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hindu-devotional-texts 0.8.0, Ishank Gupta and contributors. https://www.npmjs.com/package/hindu-devotional-texts/v/0.8.0. Selected reading adapted or quoted under MIT. MIT License Copyright (c) 2026 Ishank Gupta and contributors to hindu-devotional-texts Permission is hereby granted, free of charge, to any person obtaining a copy of this software and associated documentation files (the "Software"), to deal in the Software without restriction, including without limitation the rights to use, copy, modify, merge, publish, distribute, sublicense, and/or sell copies of the Software, and to permit persons to whom the Software is furnished to do so, subject to the following conditions: The above copyright notice and this permission notice shall be included in all copies or substantial portions of the Software. THE SOFTWARE IS PROVIDED "AS IS", WITHOUT WARRANTY OF ANY KIND, EXPRESS OR IMPLIED, INCLUDING BUT NOT LIMITED TO THE WARRANTIES OF MERCHANTABILITY, FITNESS FOR A PARTICULAR PURPOSE AND NONINFRINGEMENT. IN NO EVENT SHALL THE AUTHORS OR COPYRIGHT HOLDERS BE LIABLE FOR ANY CLAIM, DAMAGES OR OTHER LIABILITY, WHETHER IN AN ACTION OF CONTRACT, TORT OR OTHERWISE, ARISING FROM, OUT OF OR IN CONNECTION WITH THE SOFTWARE OR THE USE OR OTHER DEALINGS IN THE SOFTWARE. This edition uses a separately attributed alternative; other devotional sequences use different prayers.

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संदर्भ और स्रोत (21)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Durga Puja Vidhi | Shodashopachara Durga Puja Vidhi during Navratri

    स्रोत खोलें 1

  2. Puja at Home — A Practical Guide for Hindu Americans

    स्रोत खोलें 2

  3. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) / Durgā Saptaśatī, chapter 11 Nārāyaṇī Stuti

    स्रोत खोलें 3

  4. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) chapter 5, hymn to the Goddess

    स्रोत खोलें 4

  5. Durgā pūjā (community compiled Sanskrit puja)

    स्रोत खोलें 5

  6. Religious Candle Safety

    स्रोत खोलें 6

  7. Vakratunda Mahakaya
  8. Guru Brahma Guru Vishnu
  9. ShivGoraksh Edited V3 — Ambe Tu Hai Jagdambe Kali
  10. Navarna Navakshari Mantra
  11. Durga Slays the Buffalo Demon at Mamallapuram

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  12. Śaradarcāprayoga (Durgāpūjāpaddhati), manuscript EAP781/1/1/123

    स्रोत खोलें 12

  13. Bījātmaka Tantra Durgā Saptaśatī, Śrī Durgā Ṣoḍaśopacāra Pūjana Vidhi section

    स्रोत खोलें 13

  14. Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923

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  15. Mahidhara, Mantramahodadhi with Nauka, Khemraj Sanskrit reprint

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  16. Mahidhara, Mantramahodadhi with Nauka, Khemraj Sanskrit reprint

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  17. Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923

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  18. Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923

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  19. Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923

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  20. hindu-devotional-texts 0.8.0, Ishank Gupta and contributors

    स्रोत खोलें 20

  21. Kshamaprarthana, Wikisource contributors

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इस लेख के बारे में

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