पाठ-सीमा: देवीमाहात्म्यम् (दुर्गासप्तशती), अध्याय ५ की ५.१४–५.८० तक की पूरी चयनित स्तुति। यह अध्याय ५ का पूरा आख्यान नहीं, बल्कि इक्कीस ‘या देवी’ आवृत्तियों, अलग ५.७७ श्लोक तथा अन्तिम ‘चिति’ नमस्कार वाला अंश है। पाठ का आधार शिवगोरक्ष का पूर्व-निर्मित अध्याय-५ शैक्षिक संस्करण है; आधुनिक डिजिटल पाठों से तुलना की गई है, पर १९१७ के ऐतिहासिक मुद्रण से अक्षरशः मिलान शेष है। यह अप्रमाणित-प्रकाशन प्रारूप है। 1 2 3
सभी २३ पाठ-खण्डों के हिन्दी भावार्थ और व्याख्या
ऊपर मूल संस्कृत पाठ है; नीचे उसके अलग से तैयार किए गए हिन्दी भावार्थ और व्याख्याएँ हैं। ५.१४–१६ जैसे अंक पूर्व-निर्मित अध्याय-५ के श्लोक/पाठ-गणना की पहचान हैं, कोई नए स्वतंत्र ग्रन्थ के क्रमांक नहीं। 1
5.14–5.16 — विष्णुमाया
भावार्थ: समस्त प्राणियों में विष्णुमाया नाम से कही जाने वाली देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘विष्णुमाया’ देवी की उस शक्ति का नाम है जो विष्णु से सम्बद्ध होकर जगत् के प्राकट्य और संचालन की कथा में आती है। ‘माया’ को केवल छल समझ लेना इस स्तुति का आशय छोटा कर देता है; यह भौतिक विज्ञान का सिद्धान्त भी नहीं है।
5.17–5.19 — चेतना
भावार्थ: सभी प्राणियों में चेतना के रूप में अभिहित देवी को पुनः-पुनः प्रणाम। व्याख्या: ‘चेतनेत्यभिधीयते’ का अर्थ है ‘चेतना कही जाती हैं’। यहाँ एक ही देवी के अनेक रूपों का वर्णन है, अनेक असम्बद्ध देवियों की सूची नहीं। यह आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, चेतना के वैज्ञानिक प्रश्न का निर्णायक उत्तर नहीं।
5.20–5.22 — बुद्धि
भावार्थ: सभी प्राणियों में बुद्धि और विवेक के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘बुद्धि’ केवल पढ़ी हुई जानकारी नहीं, विवेक और उचित-अनुचित पर विचार करने की क्षमता भी है। इस कथन से किसी की शैक्षिक योग्यता के आधार पर उसकी आध्यात्मिक महत्ता तय नहीं की जा सकती।
5.23–5.25 — निद्रा
भावार्थ: सभी प्राणियों में निद्रा के रूप में स्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: जागृत चेतना के साथ नींद को भी देवी का रूप कहना इस स्तुति की व्यापक दृष्टि दिखाता है। जीवन के साधारण विश्राम-चक्र को भी आदर दिया गया है; यहाँ निद्रा-संबंधी चिकित्सा या उपचार नहीं बताया गया।
5.26–5.28 — क्षुधा
भावार्थ: सब जीवों में भूख के रूप में विद्यमान देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘क्षुधा’ अर्थात् भूख, जीवन की वास्तविक आवश्यकता का स्मरण कराती है। इसका एक मानवीय भाव है कि भूखे प्राणी की पीड़ा समझी जाए, न कि अभाव को आवश्यक धार्मिक आदर्श बताया जाए।
5.29–5.31 — छाया
भावार्थ: सभी प्राणियों में छाया के रूप में स्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘छाया’ का अर्थ साया, परछाईं अथवा संरक्षण देने वाली छाया हो सकता है। यहाँ साधारण जगत् की सूक्ष्म अनुभूतियों तक देवी का स्मरण पहुँचता है; अँधेरे को अपने-आप पाप नहीं कहा गया है।
5.32–5.34 — शक्ति
भावार्थ: सभी प्राणियों में शक्ति और सामर्थ्य के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘शक्ति’ से कार्य करने और परिवर्तन लाने का सामर्थ्य प्रकट होता है। शाक्त परम्परा में यह दिव्य शक्ति का स्मरण है, किन्तु इसे आधुनिक भौतिकी की किसी मापी जाने वाली ऊर्जा के बराबर नहीं रखना चाहिए।
5.35–5.37 — तृष्णा
भावार्थ: सभी प्राणियों की प्यास और आकांक्षा के रूप में स्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘तृष्णा’ का अर्थ प्यास है और प्रसंग के अनुसार अत्यधिक चाह भी हो सकती है। देवी की व्यापकता बताने से हर प्रकार की लालसा को उचित ठहराने का आदेश नहीं निकलता।
5.38–5.40 — क्षान्ति
भावार्थ: सब प्राणियों में धैर्य, सहनशीलता और क्षमा की क्षमता के रूप में स्थित देवी को नमस्कार। व्याख्या: ‘क्षान्ति’ धैर्यपूर्ण सहन और क्षमा का भाव है, कमजोरी नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति को अन्याय, हिंसा या अपमान सहते रहना ही चाहिए।
5.41–5.43 — जाति
भावार्थ: सभी जीवों में जन्म अथवा जीव-समूह के भेद के रूप में उपस्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘जाति’ संस्कृत में जन्म, प्रकार या जीवों के वर्ग का बोध करा सकती है। यहाँ ‘सर्वभूतेषु’ की व्यापकता महत्त्वपूर्ण है; इस शब्द को जन्म-आधारित ऊँच-नीच का धार्मिक समर्थन बनाना अनुचित होगा।
5.44–5.46 — लज्जा
भावार्थ: सभी प्राणियों में लज्जा, मर्यादा या नैतिक संकोच के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘लज्जा’ का अर्थ संकोच, मर्यादा या अन्तःकरण की संवेदनशीलता हो सकता है। इससे किसी स्त्री या अन्य व्यक्ति को अनुचित शर्म में बाँधना अथवा अपनी बात कहने से रोकना उचित नहीं ठहरता।
5.47–5.49 — शान्ति
भावार्थ: सब प्राणियों में शान्ति के रूप में विराजमान देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘शान्ति’ मन और जीवन में संतुलन तथा कलह के शमन का भाव है। संकटग्रस्त देवताओं के प्रसंग में इसका अर्थ अन्याय के सामने निष्क्रिय मौन रहना नहीं है।
5.50–5.52 — श्रद्धा
भावार्थ: सब प्राणियों में श्रद्धा, सम्मान और निष्ठा के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘श्रद्धा’ आदर और निष्ठा से जुड़ी आस्था है। इसे विवेक-विहीन रूप से हर दावे को मान लेने की बाध्यता के रूप में नहीं समझना चाहिए।
5.53–5.55 — कान्ति
भावार्थ: सभी प्राणियों में कान्ति, आभा और सौन्दर्य के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘कान्ति’ केवल बाहरी रूप नहीं, चमक, तेज और आकर्षक उपस्थिति को भी व्यक्त करती है। इससे मनुष्यों का मूल्य किसी एक सौन्दर्य-मापदण्ड से नहीं आँका जाना चाहिए।
5.56–5.58 — लक्ष्मी
भावार्थ: सब प्राणियों में लक्ष्मी, मंगल और समृद्धि के रूप में स्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘लक्ष्मी’ को यहाँ स्तुत्य देवी के ही एक रूप के रूप में गाया गया है। समृद्धि में कल्याण और मंगल भी आते हैं; पाठ करने मात्र से निश्चित धनलाभ का वादा इस पंक्ति से नहीं बनता।
5.59–5.61 — वृत्ति
भावार्थ: सभी जीवों में वृत्ति, जीवन-व्यवहार या जीविका के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘वृत्ति’ का अर्थ केवल नौकरी नहीं; व्यवहार, प्रवृत्ति, चित्त की क्रिया या जीवन-निर्वाह भी हो सकता है। यहाँ जीवों के चलने-फिरने और जीवन धारण करने के अनेक ढंग याद किए जा सकते हैं।
5.62–5.64 — स्मृति
भावार्थ: सब प्राणियों में स्मृति और स्मरण-शक्ति के रूप में विद्यमान देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘स्मृति’ बीते अनुभव को याद करने की क्षमता है। इसका सम्बन्ध बुद्धि और चेतना से है, पर तीनों एक ही अर्थ के शब्द नहीं; स्तुति की अलग-अलग संज्ञाएँ इसी सूक्ष्मता को सम्भालती हैं।
5.65–5.67 — दया
भावार्थ: सभी प्राणियों में दया और करुणा के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘दया’ दूसरे की पीड़ा देखकर संवेदनशील प्रतिक्रिया देने का भाव है, ऊँचे स्थान से कृपा दिखाना मात्र नहीं। ‘सर्वभूतेषु’ शब्द करुणा की दृष्टि को विस्तृत करता है।
5.68–5.70 — तुष्टि
भावार्थ: सब प्राणियों में सन्तोष और तृप्ति के रूप में उपस्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘तुष्टि’ तृप्ति और संतोष को दर्शाती है; इससे पहले आई ‘तृष्णा’ से इसका सार्थक अन्तर है। संतोष का अर्थ जरूरी सुधार, न्याय या सुरक्षा की कोशिश छोड़ देना नहीं है।
5.71–5.73 — मातृ
भावार्थ: सभी जीवों में मातृभाव, पालन और ममता के रूप में स्थित देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: ‘मातृरूप’ में पालन, संरक्षण और ममता की अनुभूति है। यह हर स्त्री के लिए मातृत्व को अनिवार्य जीवन-भूमिका बनाने का विधान नहीं है; देखभाल अनेक सम्बन्धों में प्रकट होती है।
5.74–5.76 — भ्रान्ति
भावार्थ: सब प्राणियों में भ्रान्ति और भ्रम के अनुभव के रूप में स्थित देवी को बार-बार प्रणाम। व्याख्या: ‘भ्रान्ति’ का उल्लेख बताता है कि स्तुति केवल प्रिय गुणों तक सीमित नहीं है। देवी की सर्वव्यापकता का भाव छल, झूठ या गलत निर्णय को नैतिक स्वीकृति देने के समान नहीं है।
5.77 — इन्द्रियाधिष्ठात्री और व्यापक देवी
भावार्थ: इन्द्रियों की अधिष्ठात्री तथा सब प्राणियों में निरन्तर व्यापक देवी को नमस्कार। व्याख्या: ५.७७ में बार-बार आने वाला ‘या देवी सर्वभूतेषु’ आरम्भ नहीं है। यह अपने-आप में पूरा श्लोक है, जिसमें इन्द्रियों के अधिष्ठान और देवी की व्यापक उपस्थिति पर ध्यान दिया गया है; इसे हटाने से चयनित खण्ड अधूरा हो जाएगा।
5.78–5.80 — चिति और विश्वव्यापकता
भावार्थ: सम्पूर्ण जगत् में चिति या चेतन-स्वरूप से व्याप्त देवी को बार-बार नमस्कार। व्याख्या: अन्तिम त्रिक में ‘चिति’ के रूप में सम्पूर्ण जगत् की व्यापकता कही गई है। यह पहले आए ‘चेतना’ वाले चरण का शब्दशः दोहराव नहीं है; दोनों को अलग क्रम और पाठ में सुरक्षित रखना चाहिए।
‘नमस्तस्यै’ की पुनरावृत्ति को कैसे समझें?
‘या देवी सर्वभूतेषु’ अर्थात् ‘जो देवी सभी प्राणियों में हैं’। प्रत्येक नाम या गुण के बाद बार-बार ‘नमस्तस्यै’ आता है। यहाँ एक सुगम दो-पंक्ति पाठ के भीतर तीन परम्परागत गणना-इकाइयाँ जुड़ी हुई हैं। यह तीन अलग-अलग रचनाएँ नहीं, एक आवर्तन है। 1 2
५.१४–१६ से ५.७४–७६ तक इक्कीस ‘या देवी’ आरम्भ हैं। ५.७७ में अलग पूरा श्लोक है, जो इन्द्रियों की अधिष्ठात्री और व्यापक देवी का स्मरण करता है। ५.७८–८० में ‘चिति’ के साथ अंतिम त्रिक आता है। इसलिए इस पाठ-सीमा में ६७ परम्परागत गणना-इकाइयाँ और पाठक के लिए २३ व्यवस्थित खण्ड हैं। 1 2
स्तुति का कथा-सन्दर्भ और भाव
पाँचवें अध्याय की कथा में शुम्भ और निशुम्भ द्वारा देवताओं के अधिकार छिन जाने पर देवगण देवी का स्मरण करते हैं। स्तुति में निद्रा, भूख, स्मृति जैसे जीवन-व्यवहार के साथ दया, क्षमा, श्रद्धा और शान्ति का भी आदर है। ‘सर्वभूतेषु’ की आवृत्ति देवी की उपस्थिति को केवल किसी दूरस्थ लोक में नहीं, जीवन के अनेक रूपों में देखने की दृष्टि देती है। 2 3
तृष्णा तथा भ्रान्ति जैसे कठिन अनुभवों का उल्लेख भी है। देवी की व्यापकता को सभी इच्छाओं या भूलों की नैतिक स्वीकृति समझना सही नहीं। इसी प्रकार ‘जाति’ शब्द से किसी मनुष्य के साथ भेदभाव को उचित ठहराने का निष्कर्ष नहीं निकलता। ये सावधानीपूर्वक लिखी गई आधुनिक सम्पादकीय व्याख्याएँ हैं, किसी प्राचीन भाष्यकार की उद्धृत पंक्तियाँ नहीं।
सीमा, नाम और अन्य परम्पराएँ
इस पाठ को ‘या देवी स्तुति’ अथवा ‘तन्त्रोक्त देवीसूक्तम्’ भी कहा जाता है। इसे ऋग्वेद १०.१२५ के पृथक् वैदिक देवीसूक्त से नहीं मिलाना चाहिए। यहाँ ५.९–१३ की पूर्ववर्ती वन्दना और ५.८१–८२ की उपसंहार-प्रार्थना जोड़कर नया मिश्रित पाठ नहीं बनाया गया है। वे इसी अध्याय के बड़े प्रसंग का हिस्सा हैं, पर इस कार्य की निश्चित पाठ-सीमा ५.१४–८० है। 2 3
पाठभेद और सम्पादकीय सावधानियाँ
- लघु पाठ: कभी केवल ‘शक्तिरूपेण’ वाली पंक्ति, या ५.७६ तक का चयन गाया जाता है। वह छोटा चयन है; यहाँ परिभाषित ५.१४–८० का पूर्ण पाठ नहीं। 2
- क्रमांकन: इक्कीस ‘या देवी’ आवृत्तियाँ तथा अन्तिम ‘चिति’ आवृत्ति तीन-तीन गणना-इकाइयों में हैं। ५.७७ अलग श्लोक है। पाठक-खण्डों की सुविधा को मूल क्रमांक बदलने का कारण नहीं बनाया गया है। 1
- लिप्यन्तरण: ‘नमस्तस्यै’ और ‘नमस् तस्यै’ जैसी सन्धि-विभाजन पद्धतियाँ तथा ५.७७ में ‘व्याप्त्यै देव्यै’ का लेखन भिन्न रूपों में दिखता है। १९१७ की छवि-पाठ जाँच हुए बिना इस पाठ को उस मुद्रण का अक्षरशः प्रतिलेख नहीं कह सकते। 1 2 3
- शब्दान्तर: ‘चेतना’ (५.१७–१९) और ‘चिति’ (५.७८–८०) को अर्थ-विचार में पास रख सकते हैं, पर मूल संस्कृत में एक का स्थान दूसरे को नहीं दिया गया है।




