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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

प्रार्थना

त्वमेव माता च पिता त्वमेव — समर्पण की प्रार्थना

ईश्वर को माता-पिता, बन्धु, सखा, विद्या और सर्वस्व कहने वाला एक संस्कृत प्रार्थना-श्लोक।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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त्वमेव माता च पिता त्वमेव । त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥

अर्थ

हे देवों के देव! आप ही मेरी माता और पिता हैं; आप ही मेरे अपने और मित्र हैं; आप ही मेरी विद्या तथा मेरा धन-संपदा हैं। मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं।

व्याख्या

इस प्रार्थना में बार-बार आने वाला त्वम् एव (त्वमेव) — “आप ही” — भक्त के अनेक संबंधों को एक सम्बोधन में समेटता है। माता से ममता और देखभाल का, पिता से सहारा और मार्गदर्शन का भाव जुड़ता है। बन्धु केवल भाई नहीं, बल्कि आत्मीय संबंधी भी है; सखा वह मित्र है जिस पर विश्वास किया जा सके। विद्या सीखने और विवेक का संकेत करती है, जबकि द्रविणम् धन, संसाधन या मूल्यवान सम्पत्ति का शब्द है। अंतिम चरण में सर्वं मम कहकर यह भाव आता है कि “मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं”; देव देव आदरपूर्ण सम्बोधन है—“हे देवों के देव!” पाण्डवगीता नामक स्तोत्र-संग्रह में यह पद गांधारी के कथन के रूप में रखा गया है; कुछ गुरुस्तोत्र संकलनों में यही पंक्तियाँ गुरु के प्रति श्रद्धा की प्रार्थना हैं। इनमें से कोई भी प्रस्तुति रचनाकार की ऐतिहासिक पहचान का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इस पद का तात्पर्य परिवार या वास्तविक मित्रों से नाता तोड़ना नहीं; भक्त इसे सभी सहारों में ईश्वर की उपस्थिति अनुभव करने की भाषा के रूप में भी पढ़ सकता है। यह शिवगोरक्ष की व्याख्या है, मूल पद में जोड़े गए शब्द नहीं। 1 2 3

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: पाण्डवगीता / प्रपन्नगीता के डिजिटल पाठ का पद २८। यह शैक्षिक संस्करण है; किसी ऐतिहासिक संस्करण से स्वतन्त्र, पूर्ण पाठ-मिलान अभी शेष है। 1

सम्पूर्ण मूल प्रार्थना — देवनागरी

त्वमेव माता च पिता त्वमेव । त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥

सरल अर्थ और विस्तृत व्याख्या

प्रार्थना १

सम्पूर्ण सरल हिन्दी अर्थ। हे देवों के देव! आप ही मेरी माता और पिता हैं; आप ही मेरे अपने और मित्र हैं; आप ही मेरी विद्या तथा मेरा धन-संपदा हैं। मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं। विस्तृत व्याख्या। इस प्रार्थना में बार-बार आने वाला त्वम् एव (त्वमेव) — “आप ही” — भक्त के अनेक संबंधों को एक सम्बोधन में समेटता है। माता से ममता और देखभाल का, पिता से सहारा और मार्गदर्शन का भाव जुड़ता है। बन्धु केवल भाई नहीं, बल्कि आत्मीय संबंधी भी है; सखा वह मित्र है जिस पर विश्वास किया जा सके। विद्या सीखने और विवेक का संकेत करती है, जबकि द्रविणम् धन, संसाधन या मूल्यवान सम्पत्ति का शब्द है। अंतिम चरण में सर्वं मम कहकर यह भाव आता है कि “मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं”; देव देव आदरपूर्ण सम्बोधन है—“हे देवों के देव!” पाण्डवगीता नामक स्तोत्र-संग्रह में यह पद गांधारी के कथन के रूप में रखा गया है; कुछ गुरुस्तोत्र संकलनों में यही पंक्तियाँ गुरु के प्रति श्रद्धा की प्रार्थना हैं। इनमें से कोई भी प्रस्तुति रचनाकार की ऐतिहासिक पहचान का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इस पद का तात्पर्य परिवार या वास्तविक मित्रों से नाता तोड़ना नहीं; भक्त इसे सभी सहारों में ईश्वर की उपस्थिति अनुभव करने की भाषा के रूप में भी पढ़ सकता है। यह शिवगोरक्ष की व्याख्या है, मूल पद में जोड़े गए शब्द नहीं। 1 2 3

एक-एक शब्द का अर्थ

मूल शब्दव्याकरण या अर्थसहज अर्थ
त्वमेवत्वम् + एव — केवल तुम/आप हीआप ही, आप ही तो
मातामाँ, जन्म देने या देखभाल करने वालीमाता
च पिताच = और; पिता = पिताऔर पिता
बन्धुश्चबन्धुः + च का संधि-रूपऔर आत्मीय संबंधी
सखामित्र, साथ निभाने वालामित्र
विद्याज्ञान, शिक्षा, समझ, विवेकविद्या
द्रविणंधन, सम्पत्ति, उपयोगी साधनसम्पदा या संसाधन
सर्वं ममसर्वं = सब कुछ; मम = मेरा/मेरे लिएमेरा सर्वस्व
देव देवआदरसूचक सम्बोधन; कभी देवदेव भी लिखा गया हैहे देवों के देव!

यह एक ही श्लोक है, जिसकी चार पंक्तियाँ (चार पाद) स्पष्ट पढ़ने के लिए अलग दिखाई गई हैं। इसे चार अलग-अलग मन्त्र नहीं समझना चाहिए। अंग्रेज़ी लेख के आरम्भ में इसी मूल संस्कृत को IAST रोमन लिपि में दिया गया है; वहाँ अंग्रेज़ी अनुवाद रखकर मूल शब्द नहीं बदले गए हैं।

चार पंक्तियों का भाव

पहली पंक्ति—माता और पिता। जब भक्त कहता है कि ईश्वर ही माता और पिता हैं, तो वह जीवन में मिलने वाले स्नेह, संरक्षण और दिशा का सर्वोच्च आधार स्मरण करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य की अपनी माता-पिता से जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं। यह संबंध की भाषा में व्यक्त श्रद्धा है। दूसरी पंक्ति—बन्धु और सखा। आत्मीयता केवल परिवार के औपचारिक रिश्तों में नहीं रहती; मित्रता, भरोसा और साथ भी जीवन के आधार हैं। बन्धु में अपना-पराया कम होने का भाव है और सखा में मित्रवत निकटता है। भगवान् को इन दोनों रूपों में याद करना भक्त के मन की आत्मीयता व्यक्त करता है। तीसरी पंक्ति—विद्या और द्रविण। पद केवल भावनात्मक आश्रय की बात नहीं करता। वह ज्ञान और जीवन के साधनों को भी पहचानता है। द्रविण का सरल अर्थ धन या संसाधन है; इसे अनिवार्य रूप से चमत्कारी धन-प्राप्ति या किसी परीक्षा में सफलता का दावा नहीं बनाना चाहिए। विद्या और सम्पदा के प्रति कृतज्ञता एक सम्भव भक्ति-अर्थ है। चौथी पंक्ति—आप ही सब कुछ। अंत में सर्वं शब्द पिछले सभी संबंधों और साधनों को एक साथ समेटता है। देव देव सम्बोधन है, किसी निश्चित देवता का छिपा हुआ नाम नहीं। पाठ जिस संकलन या परम्परा में बोला जाता है, उसके अनुसार उसका सम्बोधन समझा जाता है। 1 2

यह श्लोक किस ग्रन्थ में मिलता है? इस संस्करण का चयनित डिजिटल पाठ पाण्डवगीता, जिसे प्रपन्नगीता भी कहते हैं, के २८वें श्लोक से लिया गया है। इस संकलन में इसके पहले “गान्धारी उवाच” लिखा है, तथा २७वें और २९वें पद क्रमशः धृतराष्ट्र और द्रुपद के नाम से प्रस्तुत हैं। यहाँ “गान्धारी ने कहा” एक संग्रह के भीतर दिया गया वक्ता-नाम है; इससे यह सिद्ध नहीं होता कि इस श्लोक की ऐतिहासिक रचनाकार गांधारी थीं या यह महाभारत के किसी प्रमाणित अध्याय का पद है। 1 6

गुरुस्तोत्र के कुछ संग्रहों में वही प्रार्थना गुरु की स्तुति के अन्त में आती है। एक डिजिटल संग्रह में उसका क्रमांक १४ है और आख़िरी सम्बोधन देवदेव जुड़कर लिखा है। दूसरे गुरुस्तोत्र संस्करणों में अलग पद जोड़ने या क्रम बदलने के कारण गणना अलग दिखाई देती है। इसलिए पाण्डवगीता का २८ और गुरुस्तोत्र का १४ एक ही पुस्तक की प्रतिस्पर्धी क्रमसंख्याएँ नहीं हैं। 2 3 4

सम्पादकीय सावधानी: इस एक पद को बिना साक्ष्य भगवद्गीता का श्लोक, कोई निश्चित वैदिक मन्त्र, या महाभारत के किसी प्रमाणित अध्याय की पंक्ति बताना उचित नहीं होगा। इसके प्रथम रचनाकार, तिथि और प्राचीनतम उपलब्ध पाण्डुलिपि/मुद्रित पाठ की पुष्टि शेष है। किसी लोकप्रिय परम्परागत श्रेय को ऐतिहासिक तथ्य की तरह नहीं प्रस्तुत किया जा रहा।

एक प्रार्थना, अनेक उपासना-सन्दर्भ

मूल श्लोक में शिव, विष्णु, गुरु अथवा किसी विशिष्ट देवता का नाम सीधे नहीं आता; इसके अन्त में केवल देव देव सम्बोधन है। पाण्डवगीता के नारायण-भक्तिपरक वातावरण में इसे नारायण की प्रार्थना समझा जा सकता है। गुरुस्तोत्र में इसका पाठ श्रद्धेय गुरु के लिए किया जाता है। दूसरे घरों और मन्दिरों में यही शब्द सामान्य ईश्वर-प्रार्थना के रूप में भी सुनाई देते हैं। अलग-अलग प्रयोगों को स्वीकार करना और फिर भी पाठ की मूल शब्दरचना एक रखना सम्पादकीय रूप से अधिक ईमानदार है। 1 2 5

यह पद किसी व्यक्ति को अपने परिवार से दूरी बनाने, मित्रों पर अविश्वास करने, शिक्षा छोड़ने या आजीविका त्यागने की शिक्षा नहीं देता। “आप ही सर्वस्व हैं” एक भक्ति-भाव है; मनुष्य इसे उन सब रिश्तों और अवसरों में दैवी कृपा देखने की प्रेरणा के रूप में समझ सकता है। यह शिवगोरक्ष की सहज व्याख्या है, मूल संस्कृत के अतिरिक्त शब्द नहीं।

पाठभेद, वर्तनी और प्रमाण की सीमाएँ

  1. देव देव / देवदेव: चयनित पाण्डवगीता पाठ में दो शब्द हैं; गुरुस्तोत्र के एक साक्ष्य में संयुक्त रूप है। दोनों के अलग-अलग स्रोत स्पष्ट रखे गए हैं। 1 2
  2. २८ / १४ / अन्य क्रम: ग्रन्थ बदलने पर श्लोक की स्थिति बदलती है। किसी एक क्रमांक को सब जगह लागू करना गलत होगा। 1 2 3
  3. रचनाकार: “गान्धारी उवाच” वक्ता-लेबल है, मूल लेखक का निर्णायक प्रमाण नहीं। बिना पुष्ट प्रमाण के इसे शंकराचार्य, वेदव्यास या किसी अन्य व्यक्ति की मौलिक रचना घोषित नहीं किया गया।
  4. त्वमेव / त्वम् एव: देवनागरी में संधि-युक्त रूप और IAST में समझाने के लिए पृथक शब्द एक ही संस्कृत पद को व्यक्त करते हैं; यह अर्थ का पाठभेद नहीं।
  5. बन्धु / भाई: बन्धु का अर्थ रिश्तेदार या आत्मीय व्यक्ति भी है। इसे हर जगह केवल “भाई” अनुवाद करना अर्थ को संकुचित करता है।
  6. द्रविणम्: धन-संपदा का अर्थ शब्द से निकलता है; “आत्मिक समृद्धि” एक सम्भव भावार्थ है, उसी का शब्दशः पर्याय नहीं।
  7. उपास्य का संदर्भ: गुरु-भक्ति और नारायण-भक्ति का सन्दर्भ अलग-अलग संकलनों से आता है; दोनों को मूल श्लोक का एकमात्र मूल अर्थ घोषित नहीं किया गया।
  8. पुनर्प्रयोग के अधिकार: पुरानी प्रार्थना का पाठ और आधुनिक वेबसाइट पर स्वयंसेवकों द्वारा तैयार की गई पूरी डिजिटल फाइल, अनुवाद व टिप्पणियाँ अलग सामग्री हैं। आधुनिक प्रतिलिपि के पुनर्प्रकाशन संबंधी प्रतिबन्धों की कानूनी जाँच बाकी है। 1 2

सामान्य प्रश्न

त्वमेव माता च पिता त्वमेव का पूरा श्लोक क्या है? ऊपर दिया गया एक श्लोक ही चयनित सम्पूर्ण प्रार्थना है—त्वमेव माता च पिता त्वमेव से शुरू होकर त्वमेव सर्वं मम देव देव पर समाप्त होता है। त्वमेव का क्या अर्थ है? त्वम् अर्थात् आप/तुम और एव अर्थात् ही; साथ मिलकर “आप ही” का बल दिया गया है। क्या यह भगवद्गीता का श्लोक है? इस संस्करण में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला। चयनित साक्ष्य पाण्डवगीता नामक अलग स्तोत्र-संग्रह में है। 1

क्या इसे गुरु की प्रार्थना में पढ़ते हैं? हाँ, कुछ गुरुस्तोत्र संग्रहों में यही श्लोक आता है। फिर भी मूल रचनाकार की निश्चित पहचान स्थापित नहीं होती। 2

यह किस देवता की प्रार्थना है? इसके संस्कृत शब्द किसी एक देवता का विशिष्ट नाम नहीं देते। नारायण-भक्ति, गुरु-श्रद्धा अथवा सामान्य ईश्वर-प्रार्थना का भाव प्रसंग के अनुसार समझा जाता है। क्या इसके लिए निश्चित जप-संख्या या दीक्षा बताई गई है? इस पद में कोई संख्या या विशेष विधि नहीं है। यह लेख पाठ और अर्थ बताता है, अनिवार्य अनुष्ठान-सूची नहीं। क्या “आप ही मेरे सर्वस्व हैं” का अर्थ परिवार छोड़ना है? नहीं। यहाँ भक्ति और भरोसे का भाव है, सामाजिक जिम्मेदारियाँ छोड़ने का निर्देश नहीं।

सम्बन्धित विषय और सम्पादकीय स्थिति

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

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    tvam eva mātā ca pitā tvam eva | tvam eva bandhuś ca sakhā tvam eva | tvam eva vidyā draviṇaṃ tvam eva | tvam eva sarvaṃ mama deva deva ||

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