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प्रार्थना

असतो मा सद्गमय — पवमान प्रार्थना

सत्, प्रकाश और अमृतत्व की ओर मार्गदर्शन की उपनिषद्-प्रार्थना।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय ॥

अर्थ

मुझे असत् से सत् की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो।

व्याख्या

बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८ में यह तीन खण्डों वाली एक ही प्रार्थना है। “मा … गमय” में साधक अपने लिए मार्गदर्शन माँगता है। इस अध्याय के मूल गद्य में असत् और अन्धकार को मृत्यु तथा सत् और ज्योति को अमृतत्व की दृष्टि से समझाया गया है; इसलिए इसे केवल नैतिक उपदेश कह देना भी अधूरा है। आधुनिक पाठक इसे अपने भ्रम की समीक्षा, सत्यनिष्ठ आचरण और जीवन की नश्वरता को विवेक से समझने की प्रेरणा के रूप में पढ़ सकता है। यह शिवगोरक्ष का व्याख्यात्मक विस्तार है, मूल मन्त्र में अतिरिक्त पंक्तियाँ नहीं। चुने गए स्रोत-स्थान पर प्रारम्भ में ॐ और अन्त में शान्तिः-पाठ जुड़ा हुआ नहीं है। 1 3 4

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८ के विस्तृत गद्यांश में स्थित पूरी तीन-पंक्तियों की प्रार्थना। तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय ॥

पूरा हिन्दी अर्थ और व्याख्या

प्रार्थना १

सरल सम्पूर्ण अर्थ: मुझे असत् से सत् की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो। विस्तृत व्याख्या: बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८ में यह तीन खण्डों वाली एक ही प्रार्थना है। “मा … गमय” में साधक अपने लिए मार्गदर्शन माँगता है। इस अध्याय के मूल गद्य में असत् और अन्धकार को मृत्यु तथा सत् और ज्योति को अमृतत्व की दृष्टि से समझाया गया है; इसलिए इसे केवल नैतिक उपदेश कह देना भी अधूरा है। आधुनिक पाठक इसे अपने भ्रम की समीक्षा, सत्यनिष्ठ आचरण और जीवन की नश्वरता को विवेक से समझने की प्रेरणा के रूप में पढ़ सकता है। यह शिवगोरक्ष का व्याख्यात्मक विस्तार है, मूल मन्त्र में अतिरिक्त पंक्तियाँ नहीं। चुने गए स्रोत-स्थान पर प्रारम्भ में ॐ और अन्त में शान्तिः-पाठ जुड़ा हुआ नहीं है। 1 3 4

तीन पंक्तियों को एक-एक करके समझें

पंक्ति 1: असतो मा सद्गमय । अर्थ: मुझे असत्—जो वास्तविक या स्थायी आधार नहीं है—से सत्, अर्थात् सत्य और वास्तविकता, की ओर ले चलो। व्याख्या: असतः का रूप सन्धि से “असतो” तथा सत् + गमय का रूप “सद्गमय” है। यहाँ “गमय” मार्गदर्शन की विनती है। सामान्य भाव में असत् को असत्य या अस्थिर प्रतीति तथा सत् को सत्य/वास्तविकता कह सकते हैं; लेकिन निकटवर्ती उपनिषद्-गद्य स्पष्ट करता है कि वहाँ असत् को मृत्यु और सत् को अमृतत्व से भी जोड़ा गया है।

पंक्ति 2: तमसो मा ज्योतिर्गमय । अर्थ: मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। व्याख्या: तमस् का सीधा अर्थ अन्धकार और ज्योतिस् का प्रकाश है। प्रार्थना में ज्योति को समझ और जागरूकता का रूपक मानना सहज है। स्रोत-गद्य में फिर से तमस् को मृत्यु और ज्योति को अमृतत्व से सम्बद्ध किया गया है। अपनी अज्ञानता से सीखने की ओर बढ़ना इसका उपयोगी भावार्थ है, कोई अतिरिक्त वैदिक वाक्य नहीं।

पंक्ति 3: मृत्योर्मामृतं गमय ॥

अर्थ: मुझे मृत्यु से अमृत अर्थात् अमृतत्व की ओर ले चलो। व्याख्या: मृत्योः सन्धि से “मृत्योर्” हुआ है। “मामृतं” में “मा” का आशय “मुझे” है और “अमृतम्” का आशय अमृतत्व; यहाँ “मा” निषेध नहीं है। उपनिषद् अपने संदर्भ में तीनों विनतियों का अन्तिम लक्ष्य अमृतत्व बताता है। इसे शारीरिक अमरता, बीमारी से अचूक सुरक्षा या चिकित्सा के विकल्प का वादा नहीं बनाना चाहिए।

शब्दार्थ और व्याकरण

मूल पदव्याकरण/सन्धिसरल समझ
असतोअसतः (असत् से), सन्धियुक्त रूपजो वास्तविक आधार नहीं, उससे
माप्रथम पुरुष सर्वनाम का रूप, “मुझे”इस प्रार्थना में निषेध “मत” नहीं
सद्गमयसत् + गमय, सन्धि से सद्गमयसत्य/वास्तविकता की ओर ले चलो
तमसोतमसः (अन्धकार से)अँधेरे से
ज्योतिर्गमयज्योतिः + गमयप्रकाश की ओर ले चलो
मृत्योर्मृत्योः, सन्धि का रूपमृत्यु से
मामृतंमा + अमृतम्मुझे अमृतत्व की ओर
गमय√गम् धातु का प्रेरणार्थक आज्ञार्थले चलो, मार्ग दिखाओ

उपनिषद् में यह प्रार्थना कहाँ आती है? बृहदारण्यक उपनिषद् के प्रथम अध्याय, तृतीय ब्राह्मण, २८वें गद्य-खण्ड में पवमान-अभ्यारोह का प्रसंग है। यहाँ सामगान और प्रस्तोता का उल्लेख आता है। तदेतानि जपेत् के बाद यही तीन विनतियाँ आती हैं। उनके बाद स्वयं स्रोत-गद्य अर्थ खोलता है: असत् को मृत्यु और सत् को अमृतत्व, तथा तमस् को मृत्यु और ज्योति को अमृतत्व से जोड़ा गया है। इसलिए मूल प्रसंग समझने के लिए केवल “झूठ से सच” कह देना पर्याप्त नहीं है। 1 3 4

इसका अर्थ यह नहीं कि आज के हर पाठक को वैदिक अनुष्ठान की पद्धति इसी लेख से ग्रहण करनी चाहिए। यह सामग्री पाठ, व्याकरण और भाव समझाती है; शास्त्रीय स्वर, निश्चित जप-संख्या, दीक्षा अथवा सामगान-विधि के निर्देश नहीं देती। उसके लिए स्वतंत्र परम्परा और विशेषज्ञ-समीक्षा चाहिए। 2

एक प्रार्थना, तीन दिशाएँ

असत् से सत् तक। साधारण जीवन में यह भ्रम या असत्य से अधिक विश्वसनीय समझ की ओर बढ़ने की पुकार लगती है। दर्शन में सत् केवल “सही तथ्य” नहीं, बल्कि सत्ता और वास्तविकता का गंभीर विचार भी है। स्रोत-गद्य में इस जोड़ी का मृत्यु-अमृतत्व सम्बन्ध प्रमुख है। तमस् से ज्योति तक। अँधेरा-अज्ञान और प्रकाश-बोध की व्याख्या सुबोध है। विद्यार्थी के लिए यह सीखने की इच्छा, कठिन समय में मनुष्य के लिए स्पष्टता की खोज बन सकती है। मगर ये जीवन-उदाहरण शिवगोरक्ष की आधुनिक व्याख्या हैं, मूल मन्त्र की नई पंक्तियाँ नहीं। मृत्यु से अमृत तक। तीसरी पंक्ति जीवन की नश्वरता की ओर ध्यान दिलाती है। अलग-अलग दर्शन अमृतत्व को भिन्न रूपों में समझते हैं। इसका आशय कोई चिकित्सकीय गारण्टी या शरीर को हमेशा जीवित रखने का दावा नहीं बताया जा सकता। शोक, भय और परिवर्तन को समझने का विवेकपूर्ण भाव इसमें देखा जा सकता है।

“मा” का अर्थ “मत” क्यों नहीं है? हिन्दी बोलने वाला पाठक मा देखकर “मत” समझ सकता है, पर यहाँ संस्कृत में यह मुझे का सर्वनाम है। इसलिए मृत्योर्मामृतं गमय का अर्थ “मृत्यु से मुझे अमृतत्व की ओर ले चलो” है—“मुझे अमर न बनाओ” नहीं। मामृतम् दो पदों मा और अमृतम् की सन्धि का रूप है। इसी तरह सद्गमय और ज्योतिर्गमय के पदों को शब्दार्थ में अलग करना मूल पाठ का बदलाव नहीं है। 1 3

पाठभेद, ॐ और शान्तिपाठ

  1. तीन पंक्तियाँ ही चुना गया पाठ: असतो…, तमसो…, मृत्योर्…। इनके पहले ॐ तथा बाद में ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः जोड़कर पाठ करने की परम्पराएँ हैं; वे चयनित स्रोत-स्थान के इन तीन वाक्यों का भाग नहीं हैं। 1 6
  2. मृत्योर्मामृतं / मृत्योर्मा अमृतं: पहला चुना हुआ सन्धियुक्त रूप है; दूसरा शब्दों को समझाने वाली पृथक प्रस्तुति। यह अपने-आप में नए वैदिक पद का प्रमाण नहीं है।
  3. सद्गमय / सद् गमय: वर्तनी-विभाजन और अर्थ-व्याख्या की भिन्नता, नया मूल मन्त्र नहीं।
  4. ज्योतिर्गमय / ज्योतिर् गमय: उच्चारण-सन्धि और विश्लेषण के दो प्रदर्शन।
  5. माध्यन्दिन तथा काण्व परम्परा: बृहदारण्यक के दो पाठ-सम्प्रदाय वर्णित हैं; यहाँ उनका पूर्ण साक्ष्य-आधारित तुलनात्मक सम्पादन नहीं हुआ है। 5
  6. वैदिक स्वर: एक उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य में स्वर-चिह्न हैं, पर शिवगोरक्ष ने बिना विशेषज्ञ पुष्टि उन्हें इस पाठ में नहीं जोड़ा। यह स्वर-सिद्ध जप-पुस्तिका नहीं है। 2
  7. अर्थ और पाठ का अन्तर: “असत् = झूठ” और “असत् = मृत्यु” के बीच संदर्भ-व्याख्या का अन्तर है। उसे बिना संस्कृत शब्द बदले स्रोत-टिप्पणी में रखना चाहिए।

सामान्य प्रश्न

असतो मा सद्गमय का पूरा मन्त्र क्या है? ऊपर तीनों पंक्तियाँ दी गई हैं। चयनित मूल प्रार्थना असतो मा सद्गमय से शुरू और मृत्योर्मामृतं गमय पर समाप्त होती है। यह किस उपनिषद् से है? बृहदारण्यक उपनिषद्, प्रथम अध्याय, तृतीय ब्राह्मण, खण्ड २८ से। 1

क्या अन्त में ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः कहना मूल श्लोक का भाग है? वह कई आधुनिक पाठ-रूपों का समापन हो सकता है; चुने गए स्रोत की इन तीन पंक्तियों में वह सम्मिलित नहीं है। सत् और ज्योति में क्या अन्तर है? एक ओर वास्तविकता या सत्ता की भाषा है, दूसरी ओर प्रकाश की। मूल प्रसंग दोनों को मृत्यु से अमृतत्व की ओर गति से भी समझाता है। क्या यह तीन अलग-अलग श्लोक हैं? नहीं। यह एक ही गद्य-स्थान की तीन प्रार्थना-विनतियाँ हैं, जिन्हें पठनीयता के लिए तीन पंक्तियों में रखा गया है। क्या इसे किसी एक देवता के नाम से जोड़ना सही है? इन तीन पंक्तियों में किसी विशिष्ट देवता का नाम नहीं है। इसलिए बिना स्रोत-प्रमाण इन्हें केवल शिव या विष्णु की रचना अथवा उपासना घोषित नहीं किया गया। क्या “अमृतं” से बीमारी और मृत्यु रुकने की गारण्टी मिलती है? नहीं। यहाँ दार्शनिक/वैदिक अमृतत्व का आशय है; कोई चिकित्सकीय प्रभाव सिद्ध नहीं किया गया। क्या यहाँ वेद-पाठ के स्वर और जप-विधि मिलेगी? नहीं। यह समझने के लिए मूल पाठ और अर्थ है। स्वर तथा अनुष्ठान की पुष्टि और परम्परा-समीक्षा अभी शेष है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, Chapter 1, third brāhmaṇa (unaccented online Sanskrit text). Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

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    asato mā sadgamaya | tamaso mā jyotirgamaya | mṛtyor māmṛtaṃ gamaya ||

स्रोत, सम्बन्ध और सम्पादकीय स्थिति

  1. Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, Chapter 1, third brāhmaṇa (unaccented online Sanskrit text) · स्रोत खोलें
  2. Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, Chapter 1 (accented digital presentation) · स्रोत खोलें
  3. The Bṛhadāraṇyaka Upanishad, Chapter I, The Superiority of the Vital Force Among All Functions · स्रोत खोलें
  4. Bṛhadaranyaka Upanishad 1.3.28 (Sanskrit passage and transliteration) · स्रोत खोलें
  5. Brihadaranyakopanishad — Vedic Heritage Portal · स्रोत खोलें
  6. Pavamāna / Asato Mā Sad Gamaya — independent reference entry · स्रोत खोलें