पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

प्रार्थना

सर्वे भवन्तु सुखिनः — सबके कल्याण की प्रार्थना

सबके सुख, निरोगता, मंगल और दुःख से मुक्ति की कामना करने वाला संक्षिप्त संस्कृत आशीर्वचन।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥

अर्थ

सभी सुखी हों, सब निरोग रहें, सबको शुभ और कल्याणकारी स्थितियाँ देखने को मिलें, तथा कोई भी दुःख का भागी न हो।

व्याख्या

यह चार चरणों वाली मंगलकामना अपने निजी सुख से आगे बढ़कर सबके कल्याण की बात करती है। पहले सुख, फिर निरोगता, उसके बाद शुभ का दर्शन और अन्त में यह इच्छा कि एक भी व्यक्ति दुःख का भागी न बने—इस प्रकार भाव विस्तार पाता है। अन्तिम वाक्य की विशेषता यह है कि अधिकांश लोगों का सुख पर्याप्त नहीं माना गया; एक भी उपेक्षित व्यक्ति का कष्ट महत्त्व रखता है। यह संस्कृत रचना शुभेच्छा व्यक्त करती है, किसी अपरिहार्य चमत्कारी परिणाम की घोषणा नहीं। इसे पढ़कर हम बीमार व्यक्ति की सहायता, अकेले व्यक्ति का हाल पूछना, दयापूर्ण आचरण या सुविधाओं के न्यायपूर्ण बँटवारे जैसी बातों पर विचार कर सकते हैं। ये शिवगोरक्ष द्वारा प्रस्तुत आधुनिक नैतिक उदाहरण हैं, मूल श्लोक के अतिरिक्त संस्कृत पद नहीं। इस प्रसिद्ध पाठ का सबसे प्राचीन और निश्चित ग्रन्थ-स्रोत अभी स्थापित नहीं है। १९११ के एक सुभाषित-संग्रह में “आशीर्वचनम्” के अन्तर्गत इसका मुद्रण बताया जाता है; इससे इसे बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रमाणित मन्त्र नहीं कहा जा सकता। 1 2 3

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: प्रचलित संस्कृत आशीर्वचन का एक पूरा चार-चरणों वाला श्लोक। १९११ के सुभाषितरत्नभाण्डागारम् में “आशीर्वचनम्” शीर्षक से इसके मुद्रित होने का उल्लेख मिलता है, पर उस स्कैन-पृष्ठ को इस संस्करण के लिए स्वतंत्र रूप से नहीं पढ़ा जा सका है। रचनाकार और सबसे पुराना निश्चित मूल-स्रोत अज्ञात हैं। 1 2 3

सम्पूर्ण मूल प्रार्थना — देवनागरी

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥

इस चुने गए पाठ में चार चरणों की एक ही प्रार्थना है। कुछ आधुनिक पाठों का प्रारम्भिक ॐ और अन्तिम ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः यहाँ मूल श्लोक में नहीं जोड़ा गया है। 1 4

पूरा हिन्दी अर्थ और विस्तृत व्याख्या

प्रार्थना १

सम्पूर्ण भावार्थ। सभी सुखी हों, सब निरोग रहें, सबको शुभ और कल्याणकारी स्थितियाँ देखने को मिलें, तथा कोई भी दुःख का भागी न हो। विस्तृत व्याख्या। यह चार चरणों वाली मंगलकामना अपने निजी सुख से आगे बढ़कर सबके कल्याण की बात करती है। पहले सुख, फिर निरोगता, उसके बाद शुभ का दर्शन और अन्त में यह इच्छा कि एक भी व्यक्ति दुःख का भागी न बने—इस प्रकार भाव विस्तार पाता है। अन्तिम वाक्य की विशेषता यह है कि अधिकांश लोगों का सुख पर्याप्त नहीं माना गया; एक भी उपेक्षित व्यक्ति का कष्ट महत्त्व रखता है। यह संस्कृत रचना शुभेच्छा व्यक्त करती है, किसी अपरिहार्य चमत्कारी परिणाम की घोषणा नहीं। इसे पढ़कर हम बीमार व्यक्ति की सहायता, अकेले व्यक्ति का हाल पूछना, दयापूर्ण आचरण या सुविधाओं के न्यायपूर्ण बँटवारे जैसी बातों पर विचार कर सकते हैं। ये शिवगोरक्ष द्वारा प्रस्तुत आधुनिक नैतिक उदाहरण हैं, मूल श्लोक के अतिरिक्त संस्कृत पद नहीं। इस प्रसिद्ध पाठ का सबसे प्राचीन और निश्चित ग्रन्थ-स्रोत अभी स्थापित नहीं है। १९११ के एक सुभाषित-संग्रह में “आशीर्वचनम्” के अन्तर्गत इसका मुद्रण बताया जाता है; इससे इसे बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रमाणित मन्त्र नहीं कहा जा सकता। 1 2 3

चारों चरण समझें

चरण 1: सर्वे भवन्तु सुखिनः

अर्थ: सभी सुखी हों और कल्याणपूर्ण जीवन जी सकें। व्याख्या: “सर्वे” अर्थात् सभी; “भवन्तु” शुभकामना का भाव व्यक्त करता है—“हों”; “सुखिनः” सुख और कल्याण से युक्त। प्रार्थना का दायरा किसी एक परिवार, समुदाय या सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है।

चरण 2: सर्वे सन्तु निरामयाः

अर्थ: सभी रोग और पीड़ा से मुक्त रहें। व्याख्या: “सन्तु” का अर्थ “हों” और “निरामयाः” का अर्थ रोग या व्याधि से मुक्त है। प्रार्थना आरोग्य की आकांक्षा रखती है; यह उपचार या चिकित्सा के परिणाम की गारंटी नहीं देती।

चरण 3: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

अर्थ: सभी को शुभ, मंगल और कल्याणकारी स्थितियाँ देखने और अनुभव करने को मिलें। व्याख्या: “भद्राणि” शुभ और कल्याणकारी वस्तुओं या अवस्थाओं के लिए है; “पश्यन्तु” का अर्थ “देखें” है। इसका आशय दुःख को अनदेखा करना नहीं, बल्कि सबके सामने कल्याण के अवसर आने की कामना है।

चरण 4: मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्

अर्थ: किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। व्याख्या: यहाँ “मा” निषेधसूचक है—“ऐसा न हो”; यह “असतो मा सद्गमय” के “मुझे” अर्थ वाले “मा” से अलग है। “कश्चित्” अर्थात् कोई भी; “दुःखभाग्” दुःख का भागी; “भवेत्” हो। अन्तिम चरण कहता है कि किसी एक को भी बाहर न छोड़ा जाए।

सरल शब्दार्थ और व्याकरण

संस्कृत शब्दव्याकरण या मूल रूपभावार्थ
सर्वेसर्व का बहुवचन रूपसभी
भवन्तुभू धातु का आज्ञार्थक, यहाँ मंगलकामनाहों
सुखिनःसुखी का बहुवचनसुख से युक्त
सन्तुअस् धातु का आज्ञार्थकहों
निरामयाःनिर् + आमय; बहुवचनरोग से मुक्त
भद्राणिभद्र का नपुंसकलिङ्ग बहुवचनशुभ और कल्याणकारी विषय
पश्यन्तुदृश्/पश् से “देखना”, आज्ञार्थकदेखें / अनुभव करें
मानिषेध की प्रार्थनान हो, ऐसा न हो
कश्चिद्अनिश्चित सर्वनामकोई भी
दुःखभाग्दुःख में भागीदुःख का अनुभव करने वाला
भवेत्भू धातु का विधिलिङ्हो / बन जाए

“कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्” में पदों का सन्धियुक्त मेल है। विश्लेषण के लिए “कश्चित्”, “दुःखभाग्” और “भवेत्” अलग लिख सकते हैं। केवल पद-विभाजन को अलग प्रामाणिक पाण्डुलिपि-पाठ नहीं मानना चाहिए। 1 4

सबके लिए मंगलकामना का महत्व

प्रार्थना बार-बार “सर्वे” शब्द का उपयोग करती है। इसमें सुख केवल अपने लिए नहीं माँगा गया है। व्यक्ति के स्वास्थ्य, उसकी परिस्थितियों और उसकी जीवन-यात्रा के मंगल की इच्छा भी समान रूप से की गई है। किसी विशेष देवता, जाति, वंश, सम्प्रदाय या भौगोलिक समूह का नाम लेकर श्लोक अपने दायरे को संकुचित नहीं करता। इसलिए इसे सभी के प्रति शुभेच्छा व्यक्त करने वाली प्रार्थना के रूप में पढ़ना स्वाभाविक है। अन्त में “मा कश्चित्”, यानी “एक भी नहीं”, कहकर प्रार्थना अधिक संवेदनशील बन जाती है। “सब सुखी हों” में कोई व्यक्ति हमारी नज़र से छूट सकता है, लेकिन “कोई भी दुःख का भागी न हो” उस भूले हुए व्यक्ति की भी चिंता सामने रखता है। हम इसे बीमार की देखभाल, असहाय की सहायता, विनम्र व्यवहार, एकाकी व्यक्ति का साथ और न्यायपूर्ण अवसरों की चाह के रूप में अपने जीवन में उतार सकते हैं। ये आधुनिक आचरणगत उदाहरण हैं, संस्कृत रचना के अतिरिक्त पंक्तियाँ नहीं।

“भद्राणि पश्यन्तु” का आशय

भद्र का अर्थ केवल किसी उत्सव में शुभ समाचार मिलना नहीं है। इसका प्रयोग शुभ, हितकारी या मंगलकारी वस्तु और स्थिति के लिए होता है। इसलिए यह चरण केवल “अच्छा ही अच्छा दिखे” कहकर कठिन सच्चाइयों से आँखें फेरने को नहीं कहता। आशय यह समझ सकते हैं कि लोगों के जीवन में ऐसी स्थितियाँ और अवसर आएँ जो उनका कल्याण करें। यह मूल शब्द से प्रेरित व्याख्या है; इसे किसी पुरातन टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं कहा गया है।

१९११ के सुभाषित-संग्रह से क्या जानकारी मिलती है? इंटरनेट आर्काइव में सुभाषितरत्नभाण्डागारम् की १९११ में प्रकाशित एक प्रति का अभिलेख उपलब्ध है; प्रकाशक तुकाराम जावजी अंकित हैं। एक अलग ऑनलाइन प्रस्तुति का दावा है कि उसी पुस्तक में स्कैन-पत्र ४०५, “आशीर्वचनम्” के अन्तर्गत यह चार-चरणीय प्रार्थना, आरम्भिक ॐ और अन्तिम शान्ति-पाठ के बिना, छपी है। पुस्तक का अभिलेख देखना और विशेष पृष्ठ को स्वयं पढ़कर मिलाना दो अलग सत्यापन स्तर हैं। इस संस्करण में दूसरा चरण शेष है। किसी सुभाषित-संग्रह में पाठ का मिलना भी उसके मूल लेखक का प्रमाण नहीं है। 1 2

ॐ तथा तीन बार शान्तिः क्यों जोड़ी जाती है? कुछ प्रचलित सामूहिक पाठों में प्रार्थना पहले ॐ से और बाद में ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः से जुड़ती है। ऐसा पाठ धार्मिक अनुभव का सम्माननीय भाग हो सकता है; लेकिन यह चयनित चार चरणों की संहितागत या पाण्डुलिपिगत पहचान का प्रमाण नहीं। हमने दोनों रूपों का भेद स्रोत-सूची में दर्ज किया है। शान्ति-पाठ को हटाने का अर्थ किसी समुदाय की प्रथा को नकारना नहीं, बल्कि स्रोत-पाठ और बाद के पाठ-प्रयोग में अन्तर बनाए रखना है। 1 4

पाठभेद और सावधानियाँ

  1. अनिश्चित प्राचीन स्रोत: इस श्लोक को बिना प्रमाण किसी वेद, उपनिषद् या पुराण का मन्त्र नहीं कहा जाना चाहिए। 3 6
  2. मूल और पाठ-प्रयोग: चुने हुए पाठ के चार चरण हैं। “ॐ” और तीन बार “शान्तिः” अलग पाठ-परम्परा के अंग हैं। 1 4
  3. मिलती-जुलती प्रार्थनाएँ: “सर्वे कुशलिनः सन्तु” या “सर्वेषां मङ्गलं भूयात्” जैसी पंक्तियाँ तुलनात्मक उदाहरण हैं, इस पाठ का प्रमाणित अनिवार्य विकल्प नहीं। 3 5
  4. “मा” का भेद: यहाँ “मा” निषेध का सूचक है; “असतो मा सद्गमय” में यही ध्वनि “मुझे” के अर्थ में आती है। 6
  5. आरोग्य: निरोग रहने की कामना किसी बीमारी के चिकित्सकीय उपचार की जगह नहीं लेती।
  6. अधिकार और प्रकाशन: प्राचीन मूल शब्द, किसी मुद्रित संस्करण का पाठ, डिजिटल लिप्यन्तरण, अनुवाद, व्याख्या और चित्र—इनके अधिकार अलग हो सकते हैं।

सामान्य प्रश्न

सर्वे भवन्तु सुखिनः का पूरा पाठ क्या है? ऊपर दिया गया दो पंक्तियों वाला संस्कृत पाठ पूरा चयनित श्लोक है। आरम्भ “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और अन्त “मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्” से होता है। क्या यह वैदिक मन्त्र है? इसे प्रायः शान्ति-मन्त्र कहा जाता है, लेकिन इस ठीक पाठ का कोई प्रमाणित वैदिक संहिता-सन्दर्भ यहाँ स्थापित नहीं है। क्या यह बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१४ में है? नहीं। उस स्थान पर धर्म और सत्य का विवेचन है। 6

क्या ‘सब’ में हर समुदाय आता है? श्लोक का शब्द “सर्वे” किसी समूह को अलग नहीं करता। इसे सर्वसमावेशी शुभेच्छा के रूप में समझना स्वाभाविक है। क्या अन्त में ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ अवश्य लिखना चाहिए? कुछ पाठ-परम्पराओं में यह जोड़ा जाता है, लेकिन चुने हुए मूल चार चरणों से इसे अलग रखा गया है। 4

क्या यह रोग ठीक कर देता है? नहीं। यह निरोगता की प्रार्थना है, कोई चिकित्सकीय दावा नहीं। इसका रचयिता कौन है? उपलब्ध प्रमाणों से मूल रचयिता निश्चित नहीं हुआ है। ‘असतो मा सद्गमय’ और इससे क्या अन्तर है? वह बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८ की अलग प्रार्थना है। यह सबके कल्याण का एक अलग, प्रचलित आशीर्वचन है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

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    sarve bhavantu sukhinaḥ sarve santu nirāmayāḥ | sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścid duḥkhabhāg bhavet ||

स्रोत, सम्बन्ध और सम्पादकीय स्थिति

  1. Sarv Kalyan Mantra — verse and printed-witness note · स्रोत खोलें
  2. Subhashita-Ratna-Bhandagaram (1911 edition record) · स्रोत खोलें
  3. sarve bhavantu sukhinaḥ — INDOLOGY correspondence by Dominik Wujastyk · स्रोत खोलें
  4. Sarve Bhavantu Sukhinah — Yoga Bharati · स्रोत खोलें
  5. What is the origin or source of Sarve Bhavantu Sukhinaha? · स्रोत खोलें
  6. Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad 1.4.14 — Sanskrit passage · स्रोत खोलें
  7. Sarve Bhavantu Sukhinah — ReSanskrit source note · स्रोत खोलें