सम्पादकीय स्रोत-सूचना। नीचे चयनित पूरी एक ऋग्वैदिक ऋचा का मूल देवनागरी पाठ है, हिन्दी अनुवाद नहीं। ऋग्वेद शाकल संहिता ३.६२.१० की संहिता तथा पदपाठ की दो डिजिटल प्रस्तुतियों से इसकी तुलना की गई है। अध्ययन में सुविधा के लिए वैदिक स्वर-चिह्न हटाए गए हैं। ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस मूल ऋचा का आरम्भ नहीं है; वह प्रचलित जप-रूप से सम्बन्धित अलग पाठ-परम्परा है। ऐतिहासिक मुद्रित प्रति का मिलान, स्वर-विज्ञान समीक्षा, उपयोगाधिकार और विशेषज्ञ स्वीकृति अभी शेष हैं। 1 2 3
सम्पूर्ण मूल मन्त्र — देवनागरी (स्वररहित)
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
सरल हिन्दी अर्थ और विस्तृत व्याख्या
मूल मन्त्र (ऋग्वेद ३.६२.१०)
सरल हिन्दी अर्थ। हम देव सविता के उस वरणीय, प्रकाशमय तेज को अपने भीतर ग्रहण करें; वे हमारी बुद्धियों और प्रेरित विचारों को स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ाएँ। विस्तृत व्याख्या। इस वैदिक ऋचा में उपासक सविता की ओर उन्मुख हैं—ऐसी देवता-संज्ञा, जिसका सम्बन्ध प्रेरित करने और गति देने से है। वे उनके भर्गस् अर्थात् वरणीय दीप्ति को ग्रहण करने की कामना करते हैं। अन्तिम चरण में प्रार्थना है कि सविता हमारी धियः—विचार-शक्ति, प्रेरित समझ अथवा काव्यात्मक प्रज्ञा—को आगे बढ़ाएँ। भक्ति में “धीमहि” का प्रसिद्ध अर्थ “हम ध्यान करते हैं” है; किन्तु आरम्भिक वैदिक भाषा के भाषाशास्त्रीय अध्ययन में “हम अपने भीतर धारण करें/अपना बनाएँ” भी विशेष महत्त्व रखता है। इस प्रकार मूल वैदिक अर्थ और बाद के ध्यानपरक अर्थ को एक-दूसरे के स्थान पर चुपचाप नहीं रखा गया है। “हम” और “हमारी” का प्रयोग सामूहिक प्रार्थना का भाव दिखाता है; इससे किसी निश्चित चमत्कारी परिणाम का दावा नहीं बनता। गायत्री मूलतः छन्द का नाम है, जो बाद के धार्मिक इतिहास में इस सावित्री ऋचा का प्रसिद्ध नाम भी बना। 2 4
सावित्री और गायत्री में क्या अन्तर है? सावित्री नाम सविता देवता से सम्बन्धित मन्त्र के लिए आता है; वैदिक साहित्य में सविता से जुड़ी अन्य ऋचाएँ भी हैं। गायत्री मूलतः छन्द का नाम है। कालान्तर में ऋग्वेद ३.६२.१० की प्रसिद्ध सावित्री ऋचा को विशेष रूप से ‘गायत्री मन्त्र’ कहा जाने लगा। बाद की उपासना में गायत्री देवी का दिव्य व्यक्तित्व, विग्रह और भक्ति-पद्धति भी विकसित हुई। छन्द, मन्त्र और देवी-रूप का परस्पर सम्बन्ध है, पर उन्हें मूल ऋग्वैदिक काल से बिल्कुल एक-जैसा मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं। 4 5
क्या ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ मूल ऋग्वेद मन्त्र का हिस्सा है? नहीं। ऋग्वेद ३.६२.१० का आरम्भ ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ से होता है। बहुत-सी आधुनिक उपासना-पद्धतियों में इससे पहले ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ बोला जाता है। ‘भूर्, भुवः, स्वः’ को व्याहृतियाँ कहा जाता है और इनका मन्त्र से पूर्व प्रयोग अन्य वैदिक पाठ-सन्दर्भों में मिलता है—उदाहरणार्थ वाजसनेयी काण्व संहिता ३६.३, जिसमें गायत्री ऋचा के पहले ‘भूर्भुवः स्वः’ मिलता है। उस दूसरे स्रोत का पाठ मूल ऋग्वेद ३.६२.१० में सीधे सम्मिलित नहीं किया जाएगा। ‘ॐ’ सहित आज के पूरे विस्तृत रूप के लिए अलग पाठ-परम्परा और स्रोत-सूचना चाहिए। 1 3
यह मन्त्र केवल सूर्य के प्रकाश की बात क्यों नहीं है? मन्त्र में तेज की बात है, पर अन्त में हमारी धियः, अर्थात् विचार और विवेक को प्रेरित करने की प्रार्थना है। इस प्रकार बाह्य प्रकाश की अनुभूति और अन्तःप्रेरणा का सुन्दर काव्यात्मक सम्बन्ध बनता है। श्रद्धालु के लिए सूर्य दिव्य प्रेरणा का सहज प्रतीक हो सकता है; पर मन्त्र यह दावा नहीं करता कि धूप में बैठने से बुद्धि अपने-आप बढ़ जाएगी। एक साधारण चिंतन यह हो सकता है कि हम अपनी समझ को स्पष्ट करें, सत्य के प्रति सजग रहें और अधिक विवेकपूर्ण निर्णय लें। यह अन्तिम बात हमारी आधुनिक व्याख्या है, मूल पाठ का अतिरिक्त वाक्य नहीं। 4
गायत्री छन्द और वरेण्यं की विशेषता
गायत्री छन्द का सामान्य ढाँचा आठ-आठ अक्षरों के तीन पाद है। वर्तमान संहिता के प्रत्यक्ष पाठ में पहले पाद में एक अक्षर कम गिना जाता है; इसीलिए निचृद् गायत्री का उल्लेख होता है। शोध में कभी ‘वरेणियम्’ जैसे छन्द-आधारित पुनर्निर्माण पर विचार किया जाता है। यहाँ मूल पाठ वरेण्यं ही रखा गया है। कोई पुनर्निर्मित अक्षर या वैदिक स्वर-चिह्न चुपचाप जोड़ना पाठनिष्ठा नहीं होगा। 2 4
ऋग्वैदिक सन्दर्भ, ऋषि-परम्परा और बाद की उपासना
ऋग्वेद ३.६२ में कुल १८ ऋचाएँ हैं, जिनके समूहों की देवताएँ भिन्न हैं; १०–१२वीं ऋचाओं का सम्बन्ध सविता से है। पारम्परिक सूचक-सूचियों में विश्वामित्र गाथिन की ऋषि-परम्परा का उल्लेख मिलता है। इसे आधुनिक अर्थ में लेखक के हस्ताक्षर का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कहेंगे। बाद के धार्मिक इतिहास में गायत्री मन्त्र का सम्बन्ध उपनयन, संध्या और विभिन्न उपासना-पद्धतियों से बढ़ा। इसी मन्त्र को कुछ आधुनिक सुधार-आन्दोलन और समुदाय व्यापक सार्वजनिक अध्ययन का विषय भी बनाते हैं। 1 4 5
वैदिक पाठ, दीक्षा, लिंग, जाति और धार्मिक अधिकार सम्बन्धी परम्पराओं के नियम अलग कालों और समुदायों में अलग रहे हैं। यह अध्ययन-पृष्ठ किसी ऐतिहासिक प्रतिबन्ध को सबके लिए शाश्वत नियम नहीं बनाता और न सभी संप्रदायों के औपचारिक अनुष्ठान-नियम एक समान बताता है। विधिपूर्वक जप की संख्या, प्राणायाम, विशेष समय, दीक्षा अथवा वेदस्वर-अध्यापन जैसे विषय विशेषज्ञ द्वारा जाँचे गए अलग पूजा एवं अभ्यास कार्यक्षेत्र में आएँगे। यहाँ केवल भाषा, अर्थ और स्रोत समझाए गए हैं। 4 5
उच्चारण, वैदिक स्वर और अभ्यास की सीमा
देवनागरी का यह स्वररहित अध्ययन-पाठ है। रोमन IAST में लम्बे स्वर, नासिक्य-ध्वनि तथा अन्य चिह्न पहचानने में सहायता मिलती है, लेकिन उदात्त, अनुदात्त और स्वरित जैसे वैदिक संगीतात्मक स्वर यहाँ नहीं लिखे गए। इसे औपचारिक वेदपाठ अथवा प्रमाणित मन्त्र-उच्चारण मार्गदर्शिका समझना गलत होगा। किसी विशेष मन्त्र-साधना, न्यास, होम, श्वास रोकने के क्रम, उपवास या फल की गारंटी के निर्देश इसमें नहीं हैं। 1 2
पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय
- संहिता बनाम पदपाठ: ‘तत्सवितुर्’ का पद-विभाजन ‘तत्’ और ‘सवितुः’ है। इसी तरह ‘भर्गो’ का ‘भर्गः’ और ‘धियो यो’ का ‘धियः / यः’ है। यह संधि का अन्तर है, अलग श्लोक नहीं। 2
- ॐ और व्याहृतियाँ: प्रचलित विस्तारित आरम्भ पूजन-पद्धति में मान्य हो सकता है, पर मूल ऋग्वेद ३.६२.१० की पंक्ति नहीं। काण्व ३६.३ अलग वैदिक साक्ष्य है। 3
- वैदिक स्वर: मूल डिजिटल साक्ष्यों में स्वर मिलते हैं; इस अध्ययन में हटाने की सूचना है। औपचारिक वेदपाठ के लिए अलग जाँच आवश्यक है। 1
- छन्द-संशोधन: ‘वरेणियम्’ जैसा पुनर्निर्माण केवल छन्द-चर्चा में है, मूल पाठ में शामिल नहीं। 4
- अर्थभेद: ‘धीमहि’ के ‘धारण करें’ और ‘ध्यान करें’ अर्थ ऐतिहासिक तथा भक्तिपरक व्याख्या हैं; यह शब्द-पाठभेद नहीं है। 4
- ऐतिहासिक छापे का मिलान: मैक्स मूलर-सम्पादित १८५४ का मुद्रित ग्रन्थ पहचाना गया है, लेकिन उसके ३.६२.१० वाले पृष्ठ का इस संस्करण में प्रत्यक्ष मिलान नहीं हुआ। यह परीक्षण अपूर्ण ही दर्ज है। 7
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ऋग्वेद का मूल गायत्री मन्त्र कौन-सा है? एक पूरी ऋचा—‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥’। इस चयनित पाठ के आरम्भ में ‘ॐ’ नहीं है। 1
सविता कौन हैं? प्रेरणा और गति से जुड़ी वैदिक देवता-संज्ञा, जिसके साथ सूर्य-प्रकाश का सम्बन्ध भी है। बाद की गायत्री-देवी उपासना उसका अलग धार्मिक विकास है। 4 5
गायत्री छन्द है या देवी? दोनों प्रयोग अलग सन्दर्भों में मिलते हैं। ऋग्वेद का मन्त्र सविता को सम्बोधित है और गायत्री छन्द से सम्बन्धित है; बाद में नाम और देवी-रूप के विकास का इतिहास है। 4 5
क्या ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ गलत है? नहीं। वह कई जप-परम्पराओं में प्रयुक्त है, पर ऋग्वेद ३.६२.१० के शब्दों में नहीं है। 3
‘धीमहि’ का अर्थ केवल ‘ध्यान करते हैं’ है? भक्तिपरक भाषा में यह प्रसिद्ध अर्थ है। आरम्भिक वैदिक व्याकरण में ‘ग्रहण करें/अपने भीतर धारण करें’ जैसे अर्थ भी मुख्य हैं। शब्द वही है; व्याख्या के काल और प्रसंग अलग हैं। 4
क्या इस पृष्ठ से वेदस्वर का सही पाठ सीखा जा सकता है? नहीं। यह स्वर-चिह्न रहित पठन है; इससे वैदिक स्वर का सही अभ्यास नहीं सिखाया जाता। क्या सभी परम्पराओं में दीक्षा और पात्रता के नियम एक हैं? नहीं। ऐतिहासिक और वर्तमान समुदायों में भिन्नता है; यहाँ किसी एक नियम को सार्वभौम नहीं घोषित किया गया है। क्या जप से परीक्षा, नौकरी, रोग-मुक्ति या कोई अन्य परिणाम निश्चित है? ऐसा कोई निश्चित परिणाम इस ऋचा से प्रमाणित नहीं होता। श्रद्धा का व्यक्तिगत महत्त्व हो सकता है, पर सामान्य प्रयत्न और युक्तिसंगत निर्णय आवश्यक रहते हैं।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
तत्। ‘वह’—उस वरणीय तेज की ओर संकेत, जिसकी कामना की गई है। यहाँ किसी वस्तु-विशेष पर पूजा का नया आदेश नहीं दिया गया है। 2
सवितुः। सविता का—यह सवितृ नामक वैदिक देवता का षष्ठी-विभक्ति रूप है। उनका सम्बन्ध गति देने और प्रेरित करने से है। सूर्य से जुड़ा दिव्य रूप इस मन्त्र के वैदिक भावजगत् में महत्त्वपूर्ण है; पर केवल आधुनिक खगोलीय सूर्य अथवा बाद की गायत्री-देवी की पूरी प्रतिमा को इस एक शब्द का मूल अर्थ नहीं मानना चाहिए। 4
वरेण्यम्। वरण करने योग्य, श्रेष्ठ, अभिलषित। संहिता में यह ‘वरेण्यं’ के रूप में जुड़ता है। छन्द-विचार में प्रथम पाद के उच्चरित रूप में एक मात्रा नहीं, बल्कि एक अक्षर कम होने की चर्चा मिलती है; इसलिए इसे निचृद् गायत्री कहा जाता है। ‘वरेणियम्’ जैसी सम्भावित छन्द-संशोधना को मूल पाठ में चुपचाप नहीं जोड़ेंगे। 2 4
भर्गः। दीप्ति, तेज या तेजस्विता; संहिता-सन्धि में ‘भर्गो’। बाद की व्याख्याओं में इसे अज्ञान दूर करने वाली पवित्र ज्योति कहा जा सकता है, पर यह एक व्याख्यात्मक विस्तार है, मन्त्र में छिपा कोई अतिरिक्त पद नहीं। 2 6
देवस्य। देव के, दैवी सत्ता के। ‘सवितुः’ के साथ यह सविता की दिव्यता बताता है। विभिन्न धार्मिक परम्पराओं के ‘परमेश्वर’ सम्बन्धी विचारों को एकमात्र शाब्दिक वैदिक अर्थ बताना सावधानी के विरुद्ध होगा। 4
धीमहि। ‘हम अपने भीतर धारण करें’, ‘हम प्राप्त करें’ या ‘हम अपना बनाएँ’—ये आरम्भिक वैदिक प्रयोग पर विचार करने वाले भाषावैज्ञानिक अर्थ हैं। लोकभक्ति में ‘हम ध्यान करते हैं’ अत्यन्त प्रसिद्ध अर्थ है। दोनों अर्थों का इतिहास अलग है; किसी एक को बिना सूचना सभी युगों पर लागू नहीं करेंगे। 4
धियः। ‘धी’ का बहुवचन—विचार, प्रज्ञा, प्रेरित समझ, काव्य-दृष्टि अथवा प्रार्थनामय चिंतन। संहिता में ‘धियो’ रूप मिलता है। इसे आज की केवल परीक्षा-सम्बन्धी बुद्धि या अंक बढ़ाने की क्षमता तक सीमित नहीं करना चाहिए। 2 4
यः नः। ‘जो … हमारी’। ‘यः’ प्रेरक सविता को सूचित करता है; ‘नः’ प्रार्थना करने वालों के सामूहिक सम्बन्ध को प्रकट करता है। 2
प्रचोदयात्। ‘प्रेरित करें’, ‘आगे बढ़ाएँ’, ‘चेतना जगाएँ’। यह एक इच्छार्थक प्रार्थना है, किसी परिणाम की वैज्ञानिक अथवा चमत्कारी गारंटी नहीं। 4