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श्रावण सोमवार: सावन के सोमवार, शिवभक्ति और अलग-अलग पंचांगों की परंपरा

चुने वर्ष की गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

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इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
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बरसात की हल्की आवाज़, मंदिर के प्रांगण में बजती घंटी और शिवलिंग के सामने रखा एक छोटा-सा जलपात्र—सावन के सोमवार की पहचान केवल बड़े आयोजनों से नहीं बनती। अनेक परिवारों के लिए यह हर सप्ताह लौटने वाला ऐसा अवसर है, जब व्यस्त जीवन के बीच कुछ समय भगवान शिव को समर्पित किया जाता है। कोई जल चढ़ाता है, कोई नाम-स्मरण करता है, कोई मंदिर जाता है और कोई अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखता है। 1 3 4

श्रावण सोमवार या सावन सोमवार का अर्थ है—जिस क्षेत्रीय पंचांग में श्रावण महीना माना जा रहा है, उस महीने में आने वाले सोमवार। यह किसी एक तिथि को होने वाला अखिल भारतीय वार्षिक पर्व नहीं, बल्कि महीने के भीतर बार-बार आने वाली उपासना-श्रृंखला है। इसके आराध्य शिव हैं, जिन्हें महादेव, शंकर, शंभु, भोलेनाथ, रुद्र और नीलकंठ जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। अनेक घरों में पार्वती की आराधना भी साथ होती है। 1 4

एक नज़र में श्रावण सोमवार

विषयसरल जानकारी
किस दिन?चुनी गई क्षेत्रीय श्रावण-मास पद्धति के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक योग्य सोमवार को।
प्रमुख आराध्यभगवान शिव; अनेक पारिवारिक परंपराओं में माता पार्वती भी।
क्या कोई एक निश्चित तिथि है?नहीं। हर सोमवार को समान पक्ष या समान तिथि होना आवश्यक नहीं।
किन पंचांगों में अंतर?उत्तर भारत का पूर्णिमांत, अनेक पश्चिमी-दक्षिणी क्षेत्रों का अमांत और कुछ क्षेत्रों का सौर श्रावण।
कुल कितने सोमवार?प्रायः चार या पाँच; हर वर्ष और हर परंपरा के लिए चार की संख्या निश्चित नहीं।
सामान्य उपासनादर्शन, जलाभिषेक, बिल्वपत्र, प्रार्थना, स्वैच्छिक व्रत, दान और सेवा।
क्या यह महाशिवरात्रि है?नहीं। महाशिवरात्रि की चतुर्दशी-आधारित अलग वार्षिक परंपरा है।
अगली तारीख?इस लेख में कोई नगर-विशेष या वर्ष-विशेष तारीख प्रमाणित नहीं की गई है।

सोमवार और शिव का संबंध क्यों माना जाता है?

भारतीय नाम-पद्धति में सोमवार का संबंध सोम अर्थात चंद्रमा से है। शिव की जटाओं में सुशोभित अर्धचंद्र उनकी प्रसिद्ध प्रतीक-छवियों में एक है। इसी कारण सोमवार, चंद्र और शिव के बीच भक्तिपूर्ण अर्थ-संबंध बनाया जाता है। किंतु इससे किसी ग्रह या उपवास के वैज्ञानिक रूप से निश्चित परिणाम का दावा नहीं किया जा सकता।

इस संबंध का एक उल्लेखनीय ग्रंथाधार शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता, अध्याय 38, श्लोक 14 में मिलता है। वहाँ शिव-व्रतों की चर्चा के बीच दोनों पक्षों के सोमवारों के लिए आहार-संयम का उल्लेख है। इससे सोमवार-व्रत की शैव परंपरा का प्रमाण मिलता है, पर यह श्लोक अपने आप में आज के हर प्रदेश के श्रावण-सोमवार की पूरी पूजा-विधि, अनिवार्य निर्जल-व्रत या किसी खास तारीख की घोषणा नहीं करता। उसी अध्याय में शिवरात्रि जैसे दूसरे नियम भी हैं; उन्हें सोमवार के नियम में मिला देना उचित नहीं होगा। 1

शिवभक्तों के लिए सावन वर्षा, हरियाली, जल और नई शुरुआत का महीना भी है। अनेक लोकव्याख्याओं में यह समय समुद्र-मंथन और नीलकंठ की कथा से जोड़ा जाता है। भागवतपुराण के अष्टम स्कंध, सातवें अध्याय में वर्णन है कि विश्व के कल्याण के लिए शिव ने उत्पन्न विष को स्वीकार किया और उनका कंठ नीला हुआ। मूल कथानक का ग्रंथाधार स्पष्ट है, लेकिन इसी अध्याय में यह नहीं कहा गया कि घटना ठीक 'पहले सावन सोमवार' को हुई थी या उससे आज की चार-सोमवार वाली गणना शुरू हुई। सावन से उसका संबंध भक्तिपरंपरा की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 2 10

इस कथा का एक सुंदर नैतिक अर्थ भी है—दूसरों की रक्षा के लिए जिम्मेदारी लेना। भक्त इसके माध्यम से दया, संयम और लोककल्याण का चिंतन कर सकते हैं। यह श्रद्धापरक अर्थ है, किसी ऐतिहासिक प्रयोग या चिकित्सकीय सिद्धांत का प्रमाण नहीं।

सावन कब शुरू होता है? यही प्रश्न तारीख बदल देता है

यहाँ सबसे जरूरी बात समझनी चाहिए: सभी पंचांग एक ही अवधि को 'श्रावण' नहीं कहते। पूर्णिमांत गणना में महीना पूर्णिमा की सीमा से संबंधित होता है, जबकि अमांत पद्धति में अमावस्या की सीमा से। इसलिए इनके श्रावण महीने का आरंभ और अंत लगभग एक पक्ष आगे-पीछे हो सकता है। शुक्ल पक्ष के महीने का नाम कई प्रसंगों में समान रहता है, जबकि कृष्ण पक्ष को किस महीने में गिनेंगे, यह बदल सकता है। परिणामतः सोमवारों की सूची भी बदलती है। 3 4

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान तथा उत्तर भारत के अनेक स्थानों में प्रचलित पंचांग प्रायः पूर्णिमांत श्रावण मानते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अनेक समुदायों में अमांत श्रावण मिलता है। यह कोई कठोर राज्य-सीमा नहीं है; परिवार, मंदिर और संप्रदाय की स्थानीय परंपरा भी देखनी पड़ती है। दूसरी ओर नेपाल तथा कुछ हिमालयी क्षेत्रों में सौर श्रावण का अपना संदर्भ है, जिसे चुपचाप किसी एक चंद्र-मास में नहीं बदला जा सकता। 3 4 8

इसलिए इंटरनेट पर दिखाई देने वाली दो अलग सोमवार-सूचियों में से एक को बिना जाँच 'गलत' बताना उचित नहीं। संभव है कि दोनों अलग मान्य परंपराओं की गणना बता रही हों। सही प्रश्न हैं: आपका क्षेत्र कौन-सा है, आपका परिवार कौन-सी मास-पद्धति अपनाता है और उस स्थान के स्वीकृत पंचांग में श्रावण की सीमाएँ क्या हैं?

वार और तिथि को एक न समझें

सोमवार सप्ताह का वार है। तिथि सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के अंतर से निर्धारित होने वाली अवधि है, जो किसी भी घड़ी शुरू या समाप्त हो सकती है। श्रावण सोमवार के लिए प्राथमिक बात यह है कि सोमवार चुने गए श्रावण-मास की अवधि में आता है या नहीं। इसके लिए हर बार त्रयोदशी, चतुर्दशी या कोई एक तिथि होना जरूरी नहीं। मास की सीमाएँ, सूर्योदय और विशेष दूसरे व्रतों के संयोग के लिए तिथि-सूचना फिर भी महत्वपूर्ण हो सकती है। 3 4

सामान्यतः किसी चयनित मास में चार या पाँच सोमवार मिल सकते हैं। अधिक मास आने पर मास-नाम और धार्मिक गणना और जटिल हो सकती है। अतिरिक्त श्रावण के सोमवारों को किस तरह वर्गीकृत करना है, इसका निर्णय धार्मिक-पंचांग विशेषज्ञ करेंगे। इसी तरह सोलह सोमवार सोलह सप्ताहों तक चलने वाली अलग संकल्प-परंपरा है; यह नहीं मान लेना चाहिए कि सावन में सोलह सोमवार होते हैं। 4

घर पर श्रावण सोमवार कैसे मनाया जाता है?

अनेक भक्त पहले घर का पूजास्थान साफ करते हैं, फिर भगवान शिव का स्मरण करते हैं। किसी स्थापित शिवलिंग पर थोड़ा स्वच्छ जल, स्थानीय परंपरा के अनुसार बिल्वपत्र या फूल चढ़ाए जाते हैं। कहीं दीपक जलता है, कहीं नाम-जप होता है और कहीं परिवार मिलकर कथा या स्तोत्र सुनता है। शिवपुराण में जल, बिल्व, जप तथा अन्य उपासना-सामग्रियों का उल्लेख शैव अनुष्ठानों के प्रसंग में मिलता है, लेकिन हर विवरण को अनिवार्य 'सावन सोमवार की सार्वभौमिक विधि' कहना सही नहीं। 1

घर की सामान्य, सार्वजनिक भक्ति का उदाहरण इस प्रकार समझा जा सकता है:

  1. शांत मन से भगवान शिव का प्रणाम और परिवार की परंपरा में हो तो पार्वती का स्मरण।
  2. स्वच्छ जल तथा उपलब्धता और स्थानीय रीति के अनुसार फूल या बिल्वपत्र अर्पित करना।
  3. परिचित सार्वजनिक भजन, स्तुति अथवा शिवनाम का स्मरण करना; गुरु-प्रदत्त मंत्रों की विशिष्ट विधि का स्वयं अनुमान न लगाना।
  4. भोजन, दान, सेवा और आचरण में संयम का कोई छोटा, व्यवहारिक संकल्प लेना।
  5. यदि व्रत रखना चाहें तो पारिवारिक-धार्मिक मार्गदर्शन और स्वास्थ्य की जरूरतों का ध्यान रखना।

यह PUBLIC स्तर की सामान्य पूजा का विवरण है। दीक्षा से संबंधित मंत्र, विशेष प्रतिष्ठा, तांत्रिक प्रयोग या परंपरा-विशिष्ट कर्मकांड को परम्परा-विशिष्ट अथवा गुरु-दीक्षा पर निर्भर की समीक्षा के बिना निर्देश के रूप में नहीं देना चाहिए। कई मंदिरों में अभिषेक स्वयं भक्त नहीं, अधिकृत पुजारी करते हैं। बड़ी मात्रा में दूध बहाना, प्लास्टिक की वस्तुएँ छोड़ना या जलस्रोतों को दूषित करना भक्ति की अनिवार्य शर्त नहीं है।

सोमवार व्रत का अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं

व्रत का सामान्य अर्थ चुना हुआ धार्मिक संकल्प है। कुछ परिवार उपासना के बाद एक बार भोजन करते हैं, कुछ फलाहार लेते हैं, कुछ विशिष्ट पदार्थ नहीं खाते और बहुत से भक्त भोजन का कठोर नियम अपनाए बिना पूजा करते हैं। किसी एक रीति को हर उम्र और स्वास्थ्य-स्थिति के लिए अनिवार्य बताना अनुचित है। बच्चे, गर्भवती व्यक्ति, बीमार लोग और नियमित दवा लेने वाले लोग उपवास संबंधी पारिवारिक दबाव के बजाय अपनी स्वास्थ्य-आवश्यकताओं को प्राथमिकता दें।

कुछ कथाओं में सोमवार-व्रत को विवाह, पारिवारिक सुख या मनोकामना से जोड़ा जाता है। ये श्रद्धा की मान्यताएँ हैं, निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं। किसी भक्त के लिए व्रत का अर्थ क्रोध में कमी लाने, सेवा करने, ज़रूरतमंद की सहायता करने या जीवन में नियमितता रखने का प्रयास भी हो सकता है।

सोलह सोमवार व्रत को सावन के सोमवारों से अलग पहचानना आवश्यक है। कोई साधक सावन में सोलह सोमवार का संकल्प आरंभ करे, तो आगे आने वाले सोमवार भी उस व्यक्तिगत व्रत का भाग हो सकते हैं; वे सभी श्रावण मास के सोमवार नहीं बन जाते। समापन, उद्यापन अथवा भोजन-नियम की एक सार्वदेशिक घड़ी इस लेख से निर्धारित नहीं की जा सकती। 4

जलाभिषेक, बिल्वपत्र और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी

बरसात के दिनों में जलाभिषेक का प्रतीक बहुत सहज लगता है। अनेक श्रद्धालु इसे नीलकंठ कथा की शीतलता और करुणा से जोड़ते हैं। लेकिन यह एक धार्मिक प्रतीकात्मक व्याख्या है, किसी शारीरिक रोग-उपचार या वैज्ञानिक असर का दावा नहीं। 1 2

बेल या बिल्वपत्र शिवोपासना की परिचित सामग्री है। बहुत-से भक्त उपलब्ध थोड़ी सामग्री से ही पूजा करते हैं। सामग्री की संख्या या कीमत को पूजा का अकेला मापदंड बनाना आवश्यक नहीं। मंदिर में प्रवेश, प्रसाद या जल चढ़ाने की रीति स्थानीय व्यवस्था से समझनी चाहिए।

घरों में फल और साधारण सात्त्विक भोजन का प्रसाद बन सकता है, पर हर प्रदेश की भोजन-संबंधी रीति एक जैसी नहीं। पर्यावरण की रक्षा, स्वच्छता और सार्वजनिक स्थानों का सम्मान इस ऋतु में विशेष महत्त्व रखते हैं।

उत्तर भारत और कांवड़ यात्रा

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और आसपास के बहुत-से क्षेत्रों में शिव-मंदिरों में जल चढ़ाना, परिवार का सोमवार-व्रत और सावन के गीत-भजन देखने को मिलते हैं। पर उत्तराखंड तथा हिमालय के कुछ समुदायों में अलग सौर श्रावण परंपरा होने के कारण तिथि-सूची को केवल 'सारा उत्तर भारत' कहकर नहीं चलाया जा सकता। 4

कांवड़ यात्रा इस मौसम का प्रसिद्ध तीर्थ-अनुष्ठान है। हरिद्वार जिला प्रशासन के अनुसार शिवभक्त हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री आदि से गंगाजल लेकर शिवमंदिरों में अर्पित करते हैं। उत्तराखंड पर्यटन विभाग भी इसका उल्लेख करता है। किंतु कांवड़ यात्रा और प्रत्येक सोमवार का गृह-व्रत एक ही अनुष्ठान नहीं हैं; अनेक भक्त बिना यात्रा किए सावन की पूजा करते हैं। 5 11

उज्जैन की महाकाल सवारी

उज्जैन में महाकाल सवारी सावन के सार्वजनिक उत्सव का अलग रूप है। भारत सरकार के पर्यटन-विवरण में महाकाल की सवारी, नगर-परिक्रमा और क्षिप्रा तट से संबंधित कार्यक्रमों का उल्लेख है। यह उज्जैन की विशिष्ट मंदिर-परंपरा है; किसी भी शहर के शिवमंदिर में ऐसी ही सवारी होना आवश्यक नहीं। यात्रा या दर्शन की वास्तविक व्यवस्था अलग से जाँचनी चाहिए। 6

महाराष्ट्र: शिवमूठ और मंगला गौरी

महाराष्ट्र के अनेक घरों में अमांत श्रावण के सोमवार विशेष माने जाते हैं। राज्य के पुराने गजेटियर में कुछ विवाहित स्त्रियों द्वारा शिव को शिवमूठ—अन्न का एक छोटा अंश—अर्पित करने की परंपरा दर्ज है। यह ऐतिहासिक रूप से वर्णित स्थानीय रीति है, न कि महाराष्ट्र की हर महिला के लिए एक समान आदेश। इसी महीने में मंगलवार की मंगला गौरी पूजा भी कई परिवारों में होती है; वह पार्वती से जुड़ी अलग परंपरा है। 7 9

तेलुगु और कन्नड़ परंपराएँ

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा कर्नाटक के अनेक घरों में श्रावण मासम / श्रावण सोमवारा के नाम से सोमवार की शिव-आराधना की जाती है। अमांत महीना होने के कारण इसकी सोमवार-सूची उत्तर भारतीय पूर्णिमांत गणना से अलग हो सकती है। परिवार के लोग दीप, प्रार्थना, शिवदर्शन या व्रत अपनाते हैं, लेकिन हर घर की पूजा-सामग्री और पारण-नियम समान नहीं हैं। यहाँ किसी मंदिर की अनदेखी समय-सारिणी नहीं बनाई गई है। 3 4

नेपाल: साउने संक्रान्ति और पशुपतिनाथ

नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार साउने संक्रान्ति के साथ नेपाली श्रावण का शुभ महीना आरंभ होता है। इस दौरान शिव-शक्ति की पूजा, हरे वस्त्र, व्रत, बोल बम यात्रा और काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन की परंपरा वर्णित है। यहाँ 'श्रावण' की पहचान नेपाली सौर-मास की पद्धति से जुड़ सकती है। इसलिए नेपाली सोमवारों को भारतीय पूर्णिमांत या अमांत सूची में बिना जाँच नहीं मिलाना चाहिए। 8

सोमवार, शिवरात्रि और प्रदोष में क्या अंतर है?

मासिक शिवरात्रि (मासिक शिवरात्रि: व्रत, निशीथ काल, पूजा, तिथि और धार्मिक महत्त्व) कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तथा रात्रि-पूजा से संबंधित है। प्रदोष व्रत (प्रदोष व्रत: त्रयोदशी, प्रदोषकाल और शिव आराधना) त्रयोदशी से जुड़े सायंकालीन उपासना-काल पर केंद्रित है। महाशिवरात्रि (महाशिवरात्रि: भगवान शिव की महान रात्रि) शिवरात्रि का विशिष्ट वार्षिक उत्सव है। सावन शिवरात्रि भी कुछ क्षेत्रों में श्रावण से जुड़ी चतुर्दशी का नाम है; उसका अर्थ 'सावन के सारे सोमवार' नहीं है। कभी एक सोमवार पर अन्य कोई तिथि-पर्व भी आ जाए, तो उसके नियम अलग जाँचने होंगे। 1 4

इसी प्रकार मंगला गौरी मंगलवार की देवी-पूजा है, और सोलह सोमवार सोलह सप्ताह का व्यक्तिगत संकल्प हो सकता है। कैलेंडर में इन सबकी अलग पहचान और स्पष्ट संबंध होने चाहिए, न कि एक ही आयोजन के दोहराए हुए नाम। 4 9

शिवगोरक्ष कैलेंडर में अगला सोमवार कैसे दिखना चाहिए?

जब शिवगोरक्ष की स्वीकृत कैलेंडर सेवा उपलब्ध हो, तब चुने गए नगर, समय-क्षेत्र, वर्ष और क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार श्रावण-मास की सीमा ज्ञात की जाएगी। उसके बाद योग्य स्थानीय सोमवारों की सूची, उनका क्रम, अपनाई गई पूर्णिमांत/अमांत/सौर पद्धति और सत्यापन-स्थिति दिखाई जानी चाहिए। यह एक संपादकीय लेख है, तिथि निकालने का प्रमाणित प्रोग्राम नहीं। 3 4 8

यदि किसी शहर, वर्ष या परंपरा के लिए गणना अभी प्रमाणित नहीं हुई है, तो साफ संदेश होना चाहिए: “इस शहर/वर्ष के लिए तिथि या समय अभी सत्यापित नहीं है।” अनुमान, दूसरी जगह का दिन अथवा किसी बाहरी पंचांग की नकल को स्वीकृत परिणाम न बताएं।

संदर्भ और स्रोत (11)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Shiva Purana, Kotirudra Samhita, Chapter 38: Greatness of Shivaratri

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    Traditional Shaiva Purana; Wisdom Library digital rendering of an English translation
  2. Bhagavata Purana, Canto 8, Chapter 7: Shiva Drinks Poison

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    रचनाकार
    Traditional Bhagavata Purana; translation/purports on Vedabase by Bhaktivedanta Book Trust
  3. Shravan Lunar Month / Sawan Masa

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    Drik Panchang
  4. Sawan Somwar Vrat Dates and Calendar Profiles

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    रचनाकार
    Drik Panchang
  5. Kanwar Yatra

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    District Haridwar, Government of Uttarakhand
  6. Mahakal Sawari

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    Incredible India / Ministry of Tourism, Government of India; Madhya Pradesh Tourism attribution
  7. Buldhana Gazetteer: People and Festivals

    स्रोत खोलें 7

    रचनाकार
    Gazetteers Department, Government of Maharashtra
  8. Sawane Sankranti

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    रचनाकार
    Nepal Tourism Board
  9. Mangalagaur

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    रचनाकार
    Department of Tourism, Government of Maharashtra
  10. Kanwar Yatra (Ministry of Tourism event summary)

    स्रोत खोलें 10

    रचनाकार
    Ministry of Tourism, Government of India / Utsav
  11. Voices and Culture: Kanwar Yatra

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    रचनाकार
    Uttarakhand Tourism Development Board
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे का अध्ययन

इस मौलिक हिंदी विवेचन में शिवपुराण (1), भागवतपुराण (2), क्षेत्रीय पंचांग के तुलनात्मक विवरण (3, 4), हरिद्वार प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन की कांवड़ संबंधी जानकारी (5, 11), उज्जैन की महाकाल सवारी (6), महाराष्ट्र के गजेटियर तथा पर्यटन स्रोत (7, 9) और नेपाल पर्यटन बोर्ड की साउने संक्रान्ति संबंधी सूचना (8) का उपयोग किया गया है। विस्तृत लिंक, सत्यापन-स्थिति, अधिकार संबंधी टिप्पणियाँ और शेष प्रश्न स्रोत और संस्करण विवरण में हैं। ये स्रोत किसी भविष्य की ग्रेगोरियन तारीख की अंतिम पंचांग-स्वीकृति नहीं हैं।

इस लेख के बारे में

शैक्षिक पठन के लिए संस्थापक द्वारा समीक्षित संस्करण। स्वतंत्र विद्वत्-सत्यापन का दावा नहीं है। स्रोत-विशेष के पाठभेद और उपयोग की शर्तें ऊपर दिए गए संदर्भों में पढ़ें।

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