इस पूजा के बारे में
इस मार्गदर्शिका की सीमा
यह लेख किसी सार्वभौम ‘एकमात्र सही शिव-पूजा’ का दावा नहीं करता। इसका मुख्य क्रम द्रिक पंचांग की प्रकाशित Shiva Puja Vidhi / Shodashopachara Shiva Puja Vidhi 4 से लिया गया है, जिसमें २७ क्रमांकित उपचार मिलते हैं। यह समकालीन प्रकाशित विधि है; इससे प्रत्येक मन्त्र का सबसे पुराना ऐतिहासिक स्रोत या वैदिक उद्गम सिद्ध नहीं होता। हिन्दू अमेरिकन फ़ाउंडेशन 1, ? तीन, पाँच और सोलह उपचारों के घरेलू मार्गदर्शिका अलग से बताता है। वे संदर्भ हैं, यह दावा नहीं कि हमारा चयन उन्हीं का अक्षरशः रूप है।
यह मार्गदर्शिका घरेलू शिव-आराधना के चुने हुए अर्पण-क्रम को समझाती है। प्रार्थना और क्रिया में स्वागत, कृतज्ञता और देखभाल का भाव है; यह हर पूजास्थान और परिवार की एकमात्र विधि नहीं है।
शिवलिंग का स्वरूप और दर्शन
‘लिङ्ग’ का अर्थ ‘चिह्न’ या ‘प्रतीक’ भी है। अनेक शैव दृष्टियों में यह शिव के उस स्वरूप का ध्यान-केंद्र है जो किसी एक दृश्य आकृति में सीमित नहीं। कुछ परम्पराएँ निर्गुण/निराकार तत्त्व पर बल देती हैं, कुछ शिव-शक्ति, ईश्वरीय उपस्थिति और सृष्टि की गतिशीलता की व्याख्या करती हैं। इन्हें धार्मिक-दार्शनिक अर्थ समझना चाहिए, आधुनिक विज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं। विद्वत्तापूर्ण अध्ययन लिङ्ग की प्रतिमा-विज्ञान, पुराण-कथा, तीर्थ और आगमिक स्थापना परम्पराओं की चर्चा करता है ?। LACMA और मेट संग्रहालय ऐतिहासिक शिवलिंगों के भिन्न स्वरूपों का परिचय देते हैं ?, ?।
घरेलू शिवलिंग, स्थायी प्रतिष्ठित मंदिर-विग्रह तथा शिव की तस्वीर एक-जैसी अनुष्ठानिक स्थिति में नहीं आते। मंदिर के गर्भगृह और स्थापित विग्रह के स्पर्श, स्नान या मरम्मत के नियम उसके सेवायत और प्रबंधन तय करते हैं।
पूजा का आशय और अवसर
जलाभिषेक विनम्रता, शुद्धि और आदर की भावना व्यक्त कर सकता है। पत्र, पुष्प और सुगन्ध के द्वारा साधक अपना ध्यान तथा कृतज्ञता प्रकट करता है। दीप ज्ञान तथा जागरूकता का प्रतीक है; नैवेद्य बाँटना सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। ये भावार्थ हैं, सुनिश्चित अलौकिक फल की घोषणा नहीं। सोमवार, श्रावण, प्रदोष और महाशिवरात्रि में शिव-आराधना के विशेष रूप मिलते हैं। किसी वर्ष की स्थानीय तिथि, निशीथकाल अथवा शुभ-मुहूर्त यहाँ नहीं दिए गए हैं; ऐसे परिणाम अलग से सत्यापित ShivGoraksh Calendar के अधीन ही आएँगे।
सामग्री और वैकल्पिक उपचार
स्वच्छ जल, घरेलू शिवलिंग या शिव-चित्र, जल-संग्रह पात्र, छोटा अर्पण-पात्र, उपलब्ध और परम्परानुकूल बिल्वपत्र, मौसमी फूल, थोड़ा उपयुक्त चन्दन और स्वच्छ फल रखें। केवल ऐसी प्रतिमा पर जल दें जिसे धोना सुरक्षित हो; चित्र या नाजुक कला पर नहीं। हाथ पोंछने का कपड़ा और पीने का जल अभिषेक के बहते जल से अलग रखें।
अत्यधिक गरम जल, रसायन या तेज धार न लगाएँ। मन्दिर की रीति के विरुद्ध सामग्री न चढ़ाएँ। जहाँ प्रतिमा को छूना या धोना उचित न हो, वहाँ अलग पात्र में प्रतीकात्मक अर्पण किया जा सकता है।
परम्परागत क्रम और घरेलू चयन
नीचे 4 के २७ मूल उपचारों का क्रम यथावत् रखा गया है। सफाई, वैकल्पिक गणेश-वन्दना एवं गुरु-स्मरण 3, अलग शिवनाम-जप 6 तथा बाद की स्वच्छता को अतिरिक्त सम्पादकीय चरण कहकर चिह्नित किया गया है; इन्हें मूल प्रकाशित क्रम का गुप्त भाग नहीं बनाया गया। अब हर चरण में स्रोत में उसी उपचार के नाम से दिया गया अलग मूल संस्कृत श्लोक पूरा लिखा गया है; दोहराई जाने वाली अतिरिक्त लघु अर्पण-पंक्ति को अलग वर्ग माना गया है। सभी २७ क्रियाओं को अभिलेखित करना और सभी को घरेलू अनिवार्यता कहना अलग बातें हैं।
यह कोई सम्पूर्ण आगमिक प्रतिष्ठा-विधि नहीं है। प्राणप्रतिष्ठा, न्यास, विशिष्ट मुद्राएँ, स्वर-सहित वैदिक पाठ, होम, दीक्षा और मंदिर-पुरोहित के विशिष्ट विधान इसमें नहीं हैं। उत्तर भारतीय परिवार, दक्षिण भारतीय शैव मंदिर, स्मार्त परम्पराएँ और गुरु-परम्पराएँ मन्त्र तथा क्रम में भिन्न हो सकती हैं।
संकल्प, आचमन और आवाहन की सीमाएँ
संकल्प में कुछ परम्पराएँ स्थान, समय, गोत्र और उद्देश्य के नाम लेती हैं; यहाँ चुने गए प्रकाशित क्रम से किसी व्यक्तिगत विवरण का सुरक्षित, प्रमाणित संकल्प-पाठ स्थापित नहीं हुआ है, इसलिए हम उसे स्वयं गढ़ते नहीं। इस विधि में ‘आचमनीय’ मुख्यतः शिव को अर्पित जल है; यह साधक के वैदिक आचमन का आदेश नहीं। स्थायी गृह-मन्दिर में आवाहन को आदरयुक्त स्वागत समझना सम्भव है, लेकिन प्राणप्रतिष्ठा से उसका भेद और औपचारिक उपयोग विशेषज्ञ जाँच का विषय है।
मन्त्रों का पाठ और लिप्यन्तरण
देवनागरी पाठ के साथ रोमन पठन, अर्थ और व्याख्या दी गई है। विद्वत् IAST में दीर्घ स्वर, मूर्धन्य व्यंजन, अनुस्वार और विसर्ग अलग पहचाने जाते हैं; सरल रोमन कम तकनीकी रूप देता है। सामान्य शिव-प्रार्थना और दीक्षा-निर्भर मन्त्र-प्रयोग अलग हैं। किसी सूत्र के पठन से जप-संख्या या निश्चित फल का विधान नहीं बनता।
सुरक्षा, स्वास्थ्य और मर्यादा
धूप के धुएँ और कपूर/दीप की खुली लौ से आग या श्वसन-संवेदनशीलता का खतरा हो सकता है। ज्वलनशील वस्तुएँ तथा बच्चों/पालतुओं को दूर रखें, स्थिर पात्र प्रयोग करें, दीप बिना देखरेख न छोड़ें और स्थान छोड़ने से पहले पूरी तरह बुझाएँ 2, 7। धुएँ/लौ के बिना ध्यान करना सुरक्षित विकल्प हो सकता है, पर उसे अपने-आप स्रोत की वही धूप/दीप-विधि नहीं कहा जा सकता। दूध या घी के अवशेष से नाली या जलस्रोत गंदे न करें। अभिषेक से बहा जल पीने योग्य न मानें; धूल/कालिख से दूषित नैवेद्य को प्रसाद के रूप में न खिलाएँ।
घर की अग्नि-सुरक्षा और सामग्री का ध्यान रखें तथा मन्दिर या स्थापित प्रतिमा की देखभाल करने वाले समुदाय की मर्यादा का सम्मान करें।
सम्बद्ध ग्रन्थ और Devotion कार्य
गणेश और गुरु-स्मरण वैकल्पिक आरम्भिक प्रार्थनाएँ हैं। लिङ्गाष्टकम्, बिल्वाष्टकम् और शिव-आरती सम्बन्धित भक्ति-पाठ हैं; इन्हें किसी विशेष क्रिया के मन्त्र का विकल्प न मानें। «ॐ जय शिव ओंकारा» गीत और लघु आरती-अर्पण सूत्र अलग पाठ हैं। ?
सामान्य प्रश्न
क्या दूध से अभिषेक अनिवार्य है? नहीं। विस्तृत स्रोत में अलग-अलग पदार्थ-स्नान हैं; घर के लिए केवल जल वाले छोटे रूप की विशेषज्ञ स्वीकृति अभी शेष है।
क्या शुरुआती व्यक्ति मंदिर के शिवलिंग को छू सकता है? केवल स्पष्ट अनुमति मिलने पर। अन्यथा चित्र के सामने प्रतीकात्मक अर्पण करें।
क्या बिल्वपत्र के बिना पूजा नहीं होती? बिल्वपत्र शैव परम्परा में महत्त्वपूर्ण है, किन्तु उपलब्ध न होने पर मनगढ़ंत विकल्प या पूजा अमान्य होने का दावा उचित नहीं।
धुआँ अनुपयुक्त हो तो? धूप न जलाएँ। बिना धुएँ के भी प्रार्थना और मनन किया जा सकता है।
क्या २७ के २७ चरण हर घर में अनिवार्य हैं? नहीं। यह प्रकाशित विस्तृत विधि का दस्तावेज़ीकरण है, अभी अधिकृत संक्षिप्त दैनिक पूजा-विधान नहीं।
त्योहार का शुभ समय कहाँ मिलेगा? केवल भविष्य में स्वतंत्र रूप से सत्यापित स्थानीय पंचांग-परिणाम से।
क्या रुद्रम अथवा दीक्षा-मन्त्र सीखें? स्वर, पात्रता और गुरु-परम्परा के लिए योग्य मार्गदर्शक से सीखें। सामान्य शिवनाम-जप अन्य सभी विधियों का स्वतः अधिकार नहीं देता।
सामग्री का संदर्भ
- स्वच्छ पेय-योग्य जल और स्थिर जल-संग्रह पात्र
- स्वच्छ कपड़ा, छोटा अर्पण-पात्र और अलग जल-पात्र
- मौसमी फूल और परम्परानुकूल बिल्वपत्र
- थोड़ा उपयुक्त चन्दन
- रीति के अनुसार वैकल्पिक अक्षत, वस्त्र या यज्ञोपवीत
- प्रतिमा और घरेलू विधि के अनुकूल हो तभी दूध, दही, घी, मधु या शर्करा
- अलग थाली में स्वच्छ फल या भोजन
- उपयुक्त होने पर पान की सामग्री या दान
- अग्नि सुरक्षित हो तभी स्थिर, न जलने वाला दीपक या आरती-पात्र
- धूप और कपूर केवल अनुकूल परिस्थिति में
घरेलू आराधना: चरण और सन्दर्भ
चरण 1 · वैकल्पिक
स्थान, सामग्री और सुरक्षा
व्यक्तिगत पूजास्थान साफ करें; धोए जा सकने वाले घरेलू शिवलिंग के नीचे पात्र रखें। पीने के लिए स्वच्छ जल और अभिषेक से बहा जल अलग रखें। सामग्री जुटाएँ; मार्ग खुला रखें। मंदिर के प्रतिष्ठित विग्रह को अनुमति के बिना न छुएँ।
पूजा की तैयारी में स्वच्छता आवश्यक है; कमरे की सफाई के लिए कोई नया मन्त्र नहीं बनाया गया है।
चरण 2 · वैकल्पिक
वैकल्पिक गणेश स्मरण
शिव-ध्यान से पहले इच्छानुसार गणेश का स्मरण किया जा सकता है। यह अलग प्रार्थना है, स्रोत के क्रमांकित शिव-पूजा क्रम का हिस्सा नहीं।
शुभ आरम्भ और विघ्नों से मुक्त होकर कार्य करने की प्रार्थना।
मूल पाठ
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
रोमन लिप्यंतरण
vakratunda mahaakaaya sooryakotisamaprabha |
nirvighnam kuru me deva sarvakaaryeshu sarvadaa ||vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha |
nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||
अर्थ
शुभ आरम्भ और विघ्नों से मुक्त होकर कार्य करने की प्रार्थना।
व्याख्या
अलग वैकल्पिक प्रार्थना; चयनित शिव-विधि में अनिवार्य नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 3 · वैकल्पिक
वैकल्पिक गुरु-स्मरण
मुख्य पूजा के पूर्व गुरु-परम्परा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जा सकती है; इससे किसी प्रकार की दीक्षा का दावा नहीं होता।
ज्ञान-परम्परा के प्रति आदर; यह विशेषज्ञ अनुष्ठान-अनुमति का विकल्प नहीं।
मूल पाठ
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
रोमन लिप्यंतरण
gururbrahmaa gururvishnurgururdevo maheshvarah |
guruh saakshaat param brahma tasmai shreegurave namah ||gurur brahmā gurur viṣṇur gurur devo maheśvaraḥ |
guruḥ sākṣāt paraṃ brahma tasmai śrīgurave namaḥ ||
अर्थ
ज्ञान-परम्परा के प्रति आदर; यह विशेषज्ञ अनुष्ठान-अनुमति का विकल्प नहीं।
व्याख्या
अलग वैकल्पिक प्रार्थना; चयनित शिव-विधि में अनिवार्य नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 4
शिव का ध्यान
अपने घरेलू पूजास्थान के सामने शांत भाव से बैठकर शिव का स्मरण करें। यहाँ विशेष मुद्रा, प्राणायाम या दीक्षा-आधारित ध्यान विधि का निर्देश नहीं दिया जा रहा है।
ध्यान आराधना को केवल सामग्री चढ़ाने तक सीमित न रखकर सजगता और श्रद्धा का आधार देता है।
मूल पाठ
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
बन्धूकसन्निभं देवं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम्।
त्रिशूलधारिणं वन्दे चारुहासं सुनिर्मलम्॥
कपालधारिणं देवं वरदाभयहस्तकम्।
उमया सहितं शम्भुं ध्यायेत् सोमेश्वरं सदा॥
रोमन लिप्यंतरण
dhyaayennityam mahesham rajatagirinibham chaaruchandraavatamsam
ratnaakalpojjvalaangam parashumrigavaraabheetihastam prasannam|
padmaaseenam samantaat stutamamaraganairvyaaghrakrittim vasaanam
vishvaadyam vishvabeejam nikhilabhayaharam panchavaktram trinetram||
bandhookasannibham devam trinetram chandrashekharam|
trishooladhaarinam vande chaaruhaasam sunirmalam||
kapaaladhaarinam devam varadaabhayahastakam|
umayaa sahitam shambhum dhyaayet someshvaram sadaa||dhyāyennityaṃ maheśaṃ rajatagirinibhaṃ cārucandrāvataṃsaṃ
ratnākalpojjvalāṅgaṃ paraśumṛgavarābhītihastaṃ prasannam |
padmāsīnaṃ samantāt stutamamaragaṇairvyāghrakṛttiṃ vasānaṃ
viśvādyaṃ viśvabījaṃ nikhilabhayaharaṃ pañcavaktraṃ trinetram ||
bandhūkasannibhaṃ devaṃ trinetraṃ candraśekharam |
triśūladhāriṇaṃ vande cāruhāsaṃ sunirmalam ||
kapāladhāriṇaṃ devaṃ varadābhayahastakam |
umayā sahitaṃ śambhuṃ dhyāyet someśvaraṃ sadā ||
अर्थ
महेश्वर का ध्यान करें—रजत पर्वत के समान दीप्तिमान, सुंदर चन्द्रकला से सुशोभित, आभूषणधारी, परशु तथा मृग धारण किए हुए और अभय-वरदान प्रदान करने वाले। कमलासन पर स्थित, देवताओं से स्तुत, व्याघ्रचर्मधारी, विश्व के आदिकारण, पञ्चमुख तथा त्रिनेत्र रूप का वर्णन है। आगे चन्द्रशेखर, त्रिशूलधारी, प्रसन्न तथा उमा-सहित शम्भु को नमस्कार किया जाता है।
व्याख्या
ध्यान आराधना को केवल सामग्री चढ़ाने तक सीमित न रखकर सजगता और श्रद्धा का आधार देता है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 5
आवाहन
आवाहन स्थापित घरेलू पूजास्थान में पहले से आराध्य मानी गई उपस्थिति का आदरपूर्ण स्वागत है। इसे अपनी परम्परा-विशिष्ट शर्तों वाली प्राण-प्रतिष्ठा का पर्याय न मानें।
स्थायी और अस्थायी प्रतिष्ठाओं में आवाहन/विसर्जन की परम्पराएँ अलग हो सकती हैं।
मूल पाठ
आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव।
यावत्पूजां करिष्यामि तावत्त्वं सन्निधौ भव॥
रोमन लिप्यंतरण
aagachchha bhagavandeva sthaane chaatra sthiro bhava|
yaavatpoojaam karishyaami taavattvam sannidhau bhava||āgaccha bhagavandeva sthāne cātra sthiro bhava |
yāvatpūjāṃ kariṣyāmi tāvattvaṃ sannidhau bhava ||
अर्थ
हे भगवन्, इस पूजा के लिए यहाँ पधारकर स्थिर एवं सन्निहित रहें।
व्याख्या
स्थायी और अस्थायी प्रतिष्ठाओं में आवाहन/विसर्जन की परम्पराएँ अलग हो सकती हैं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 6
पाद्य अर्पण
अर्पण-पात्र में थोड़ा स्वच्छ जल समर्पित करें; किसी अचल मंदिर-विग्रह पर स्वयं जल डालना आवश्यक या अनुमत न समझें।
यह पूज्य अतिथि के स्वागत का पारम्परिक उपचार है।
मूल पाठ
महादेव महेशान महादेव परात्पर।
पाद्यं गृहाण मद्दतं पार्वतीसहितेश्वर॥
रोमन लिप्यंतरण
Mahadeva maheshaana Mahadeva paraatpara|
paadyam grihaana maddatam paarvateesahiteshvara||mahādeva maheśāna mahādeva parātpara |
pādyaṃ gṛhāṇa maddataṃ pārvatīsahiteśvara ||
अर्थ
हे महादेव, महेशान, परात्पर प्रभु! पार्वती-सहित मेरे द्वारा दिया गया चरण-प्रक्षालन जल स्वीकार करें।
व्याख्या
यह पूज्य अतिथि के स्वागत का पारम्परिक उपचार है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 7
अर्घ्य अर्पण
पाद्य से अलग थोड़ा जल अर्पित करें। कुछ विधियाँ इसे शिवलिंग के मस्तक पर चढ़ाती हैं, किन्तु इससे संरक्षित मंदिर-विग्रह छूने की अनुमति नहीं मिलती।
प्रमाणित विस्तृत क्रम में पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय अलग-अलग उपचार हैं।
मूल पाठ
त्र्यम्बकेश सदाचार जगदादिविधायक।
अर्घ्यं गृहाण देवेश साम्बसर्वार्थदायक॥
रोमन लिप्यंतरण
tryambakesha sadaachaara jagadaadividhaayaka|
arghyam grihaana devesha saambasarvaarthadaayaka||tryambakeśa sadācāra jagadādividhāyaka |
arghyaṃ gṛhāṇa deveśa sāmbasarvārthadāyaka ||
अर्थ
हे त्र्यम्बकेश्वर, जगत् के आदिकारण तथा देवाधिदेव, यह आदरपूर्वक दिया गया अर्घ्य स्वीकार करें।
व्याख्या
प्रमाणित विस्तृत क्रम में पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय अलग-अलग उपचार हैं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 8
प्रारम्भिक आचमनीय
अलग पात्र में स्वच्छ आचमनीय जल अर्पित करें। यह देवता के लिए प्रतीकात्मक जल है, साधक के विशिष्ट वैदिक आचमन का निर्देश नहीं।
देवता को आचमनीय देने और स्वयं आचमन करने में अंतर है।
मूल पाठ
त्रिपुरान्तक दीनार्तिनाश श्रीकण्ठशाश्वत।
गृहाणाचमनीयं च पवित्रोदककल्पितम्॥
रोमन लिप्यंतरण
tripuraantaka deenaartinaasha shreekanthashaashvata|
grihaanaachamaneeyam cha pavitrodakakalpitam||tripurāntaka dīnārtināśa śrīkaṇṭhaśāśvata |
gṛhāṇācamanīyaṃ ca pavitrodakakalpitam ||
अर्थ
हे त्रिपुरान्तक, दीन-दुखियों की पीड़ा दूर करने वाले शाश्वत श्रीकण्ठ! पवित्र जल से तैयार आचमनीय स्वीकार करें।
व्याख्या
देवता को आचमनीय देने और स्वयं आचमन करने में अंतर है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 9 · वैकल्पिक
वैकल्पिक दुग्ध-स्नान
स्रोत की विस्तृत विधि में दुग्ध-स्नान आता है; सरल केवल-जल घरेलू विकल्प में यह अनिवार्य नहीं। स्वच्छता, उपलब्धता या मंदिर-नियम अनुकूल न हों तो इसे न करें।
सिर्फ जल से स्नान सरल है और दुग्ध की अनावश्यक बर्बादी से बचाता है।
मूल पाठ
मधुरं गोपयः पुण्यं पटपूतं पुरस्कृतम्।
स्नानार्थं देव देवेश गृहाण परमेश्वर॥
रोमन लिप्यंतरण
madhuram gopayah punyam patapootam puraskritam|
snaanaartham deva devesha grihaana parameshvara||madhuraṃ gopayaḥ puṇyaṃ paṭapūtaṃ puraskṛtam |
snānārthaṃ deva deveśa gṛhāṇa parameśvara ||
अर्थ
हे देवाधिदेव परमेश्वर, स्नान के लिए श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत मधुर और छना हुआ गोदुग्ध स्वीकार करें।
व्याख्या
सिर्फ जल से स्नान सरल है और दुग्ध की अनावश्यक बर्बादी से बचाता है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 10 · वैकल्पिक
वैकल्पिक दधि-स्नान
विस्तृत क्रम में दधि-स्नान वर्णित है, पर सरल दैनिक घरेलू चयन में नहीं; किसी प्रमाणित विधि के बिना सामग्री न मिलाएँ।
यह आगे के शुद्ध-जल स्नान का विकल्प नहीं है।
मूल पाठ
दुर्लभं दिवि सुस्वादु दधि सर्वप्रियं परम्।
पुष्टिदं पार्वतीनाथ स्नानाय प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
durlabham divi susvaadu dadhi sarvapriyam param|
pushtidam paarvateenaatha snaanaaya pratigrihyataam||durlabhaṃ divi susvādu dadhi sarvapriyaṃ param |
puṣṭidaṃ pārvatīnātha snānāya pratigṛhyatām ||
अर्थ
हे पार्वतीनाथ, स्नान के लिए यह स्वादिष्ट, पुष्टिकर दधि स्वीकार करें।
व्याख्या
यह आगे के शुद्ध-जल स्नान का विकल्प नहीं है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 11 · वैकल्पिक
वैकल्पिक घृत-स्नान
स्रोत की विस्तृत पूजा में घृत-स्नान है। जलप्रधान घरेलू विधि में इसकी आवश्यकता नहीं; फिसलन और सफाई का ध्यान रखें।
परम्परा समझाना और हर सामग्री का प्रयोग करने के लिए कहना अलग बातें हैं।
मूल पाठ
घृतं गव्यं शुचि स्निग्धं सुसेव्यं पुष्टिमिच्छताम्।
गृहाण गिरिजानाथ स्नानाय चन्द्रशेखर॥
रोमन लिप्यंतरण
ghritam gavyam shuchi snigdham susevyam pushtimichchhataam|
grihaana girijaanaatha snaanaaya chandrashekhara||ghṛtaṃ gavyaṃ śuci snigdhaṃ susevyaṃ puṣṭimicchatām |
gṛhāṇa girijānātha snānāya candraśekhara ||
अर्थ
हे गिरिजानाथ चन्द्रशेखर, स्नान के लिए यह शुद्ध, स्निग्ध गोघृत ग्रहण करें।
व्याख्या
परम्परा समझाना और हर सामग्री का प्रयोग करने के लिए कहना अलग बातें हैं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 12 · वैकल्पिक
वैकल्पिक मधु-स्नान
स्रोत की पंचामृत-सदृश स्नान-शृंखला का अलग वैकल्पिक चरण; चिपचिपाहट, कीट और स्वच्छता की समस्याओं से बचें।
शिवकृपा के लिए मधु को अनिवार्य न बताएं।
मूल पाठ
मधुरं मृदु मोहघ्नं स्वरभङ्गविनाशनम्।
महादेवेदमुत्सृष्टं तव स्नानाय शङ्कर॥
रोमन लिप्यंतरण
madhuram mridu mohaghnam svarabhangavinaashanam|
mahaadevedamutsrishtam tava snaanaaya Shankara||madhuraṃ mṛdu mohaghnaṃ svarabhaṅgavināśanam |
mahādevedamutsṛṣṭaṃ tava snānāya śaṅkara ||
अर्थ
हे महादेव शंकर, यह मधुर एवं मृदु मधु आपके स्नान के लिए समर्पित है। श्लोक में आए आरोग्य-संबंधी विशेषण धार्मिक स्तुति हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं।
व्याख्या
शिवकृपा के लिए मधु को अनिवार्य न बताएं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 13 · वैकल्पिक
वैकल्पिक शर्करा-स्नान
प्रकाशित विस्तृत क्रम में सामग्री-स्नानों के अंत में शर्करा और उसके बाद जल-स्नान है; यह न्यूनतम घरेलू चयन के बाहर है।
यह सामग्री-स्नान सामान्य घरेलू आराधना की न्यूनतम शर्त नहीं है।
मूल पाठ
तापशान्तिकरी शीता मधुरास्वादसंयुता।
स्नानार्थं देवदेवेश शर्करेयं प्रदीयते॥
रोमन लिप्यंतरण
taapashaantikaree sheetaa madhuraasvaadasamyutaa|
snaanaartham devadevesha sharkareyam pradeeyate||tāpaśāntikarī śītā madhurāsvādasaṃyutā |
snānārthaṃ devadeveśa śarkareyaṃ pradīyate ||
अर्थ
हे देवदेवेश, शीतल और मधुर शर्करा स्नान हेतु अर्पित की जाती है।
व्याख्या
यह सामग्री-स्नान सामान्य घरेलू आराधना की न्यूनतम शर्त नहीं है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 14
शुद्ध जल से अभिषेक
अपने ऐसे घरेलू शिवलिंग पर जिसे धोना सुरक्षित हो, थोड़ा साफ और सामान्य तापमान का जल धीरे से चढ़ाकर नीचे पात्र रखें। स्थिर या नाजुक विग्रह के लिए अलग पात्र में प्रतीकात्मक अर्पण करें।
यह जलाभिषेक का मुख्य चरण है। स्रोत में इसका अलग लघु अर्पण-मन्त्र है; विस्तृत स्नान-स्तोत्र अलग वैकल्पिक विषय हैं।
मूल पाठ
गङ्गा गोदावरी रेवा पयोष्णी यमुना तथा।
सरस्वत्यादितीर्थानि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
gangaa godaavaree revaa payoshnee yamunaa tathaa|
sarasvatyaaditeerthaani snaanaartham pratigrihyataam||gaṅgā godāvarī revā payoṣṇī yamunā tathā |
sarasvatyāditīrthāni snānārthaṃ pratigṛhyatām ||
अर्थ
गङ्गा, गोदावरी, रेवा, पयोष्णी, यमुना, सरस्वती और अन्य तीर्थों का स्मरण करते हुए यह स्नान-जल स्वीकार करने की प्रार्थना है; सामान्य जल को उन नदियों का वास्तविक जल बताने का दावा नहीं है।
व्याख्या
यह जलाभिषेक का मुख्य चरण है। स्रोत में इसका अलग लघु अर्पण-मन्त्र है; विस्तृत स्नान-स्तोत्र अलग वैकल्पिक विषय हैं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 15 · वैकल्पिक
वैकल्पिक वस्त्र अर्पण
उपयुक्त स्वच्छ वस्त्र शिवलिंग को हानि पहुँचाए बिना रखा जा सके तो ही रखें; अन्यथा समीप प्रतीकात्मक रूप से अर्पित करें।
शिवलिंग के आकार और प्रतिष्ठा के अनुसार वस्त्र चढ़ाने की विधि बदलती है।
मूल पाठ
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे।
मयोपपादिते देव गृह्यतां वाससी शुभे॥
रोमन लिप्यंतरण
sarvabhooshaadhike saumye lokalajjaanivaarane|
mayopapaadite deva grihyataam vaasasee shubhe||sarvabhūṣādhike saumye lokalajjānivāraṇe |
mayopapādite deva gṛhyatāṃ vāsasī śubhe ||
अर्थ
आदर से प्रस्तुत यह शुभ वस्त्र, आवरण तथा अलंकरण के प्रतीक के रूप में स्वीकार करें।
व्याख्या
शिवलिंग के आकार और प्रतिष्ठा के अनुसार वस्त्र चढ़ाने की विधि बदलती है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 16
वैकल्पिक यज्ञोपवीत
स्रोत में यज्ञोपवीत का उपचार है, पर यह परम्परा-निर्भर है; सभी घरेलू पूजाओं पर अनिवार्य न करें।
इस प्रतीक के आधार पर जाति या धार्मिक पात्रता का अनुचित दावा न किया जाए।
मूल पाठ
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्।
उपवीतं चोत्तरीयं गृहाण पार्वतीपते॥
रोमन लिप्यंतरण
navabhistantubhiryuktam trigunam devataamayam|
upaveetam chottareeyam grihaana paarvateepate||navabhistantubhiryuktaṃ triguṇaṃ devatāmayam |
upavītaṃ cottarīyaṃ gṛhāṇa pārvatīpate ||
अर्थ
हे पार्वतीपते, नौ तन्तुओं और त्रिगुणात्मक रचना से युक्त बताए गए इस उपवीत को स्वीकार करें।
व्याख्या
इस प्रतीक के आधार पर जाति या धार्मिक पात्रता का अनुचित दावा न किया जाए। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 17
चन्दन/गन्ध अर्पण
अनुमत सतह पर थोड़ा उपयुक्त चन्दन लगाएँ; सीधा लगाना उपयुक्त न हो तो एक छोटे पात्र में चढ़ाएँ।
गन्ध सत्कार और श्रद्धा का संकेत है, किसी भौतिक लाभ की गारंटी नहीं।
मूल पाठ
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
shreekhandam chandanam divyam gandhaadhyam sumanoharam|
vilepanam surashreshtha chandanam pratigrihyataam||śrīkhaṇḍaṃ candanaṃ divyaṃ gandhāḍhyaṃ sumanoharam |
vilepanaṃ suraśreṣṭha candanaṃ pratigṛhyatām ||
अर्थ
हे देवश्रेष्ठ, यह दिव्य, मनोहर, सुगन्धयुक्त चन्दन-लेप स्वीकार करें।
व्याख्या
गन्ध सत्कार और श्रद्धा का संकेत है, किसी भौतिक लाभ की गारंटी नहीं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 18 · वैकल्पिक
वैकल्पिक अक्षत
शिव-पूजा स्रोत में अक्षत आते हैं, किंतु स्थानीय शैव आचार भिन्न हो सकते हैं। मंदिर/परिवार में मनाही हो तो छोड़ दें या अलग पात्र में प्रतीकात्मक अर्पण करें।
अक्षत के विषय में भिन्न आचार को सार्वभौम नियम की तरह न बताएं।
मूल पाठ
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ शुभ्रा धूताश्च निर्मलाः।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
रोमन लिप्यंतरण
akshataashcha surashreshtha shubhraa dhootaashcha nirmalaah|
mayaa niveditaa bhaktyaa grihaana parameshvara||akṣatāśca suraśreṣṭha śubhrā dhūtāśca nirmalāḥ |
mayā niveditā bhaktyā gṛhāṇa parameśvara ||
अर्थ
हे परमेश्वर, भक्ति से अर्पित स्वच्छ, साबुत अक्षत स्वीकार करें।
व्याख्या
अक्षत के विषय में भिन्न आचार को सार्वभौम नियम की तरह न बताएं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 19
ताजे पुष्प अर्पण
अनुमत स्थान पर साफ फूल या कुछ पंखुड़ियाँ धीरे से रखें। संरक्षित पौधे न तोड़ें, कांटे न रखें और जलनिकास न रोकें।
पुष्प श्रद्धा, सौन्दर्य तथा बाह्य रूप की क्षणभंगुरता याद दिलाते हैं।
मूल पाठ
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयाऽऽनीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर॥
रोमन लिप्यंतरण
maalyaadeeni sugandheeni maalatyaadeeni vai prabho|
mayaa’’neetaani pushpaani grihaana parameshvara||mālyādīni sugandhīni mālatyādīni vai prabho |
mayā''nītāni puṣpāṇi gṛhāṇa parameśvara ||
अर्थ
हे प्रभु परमेश्वर, पूजन के लिए लाए गए ये सुगन्धित पुष्प और मालाएँ स्वीकार करें।
व्याख्या
पुष्प श्रद्धा, सौन्दर्य तथा बाह्य रूप की क्षणभंगुरता याद दिलाते हैं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 20
बिल्वपत्र अर्पण
उपलब्ध और अनुमत हों तो साफ बिल्वपत्र लें और धीरे अर्पित करें। पत्ते की दिशा अथवा निश्चित संख्या का कोई सार्वभौम नियम यहाँ नहीं दिया गया है।
कई शैव परम्पराओं में बिल्वपत्र का विशेष स्थान है; बिल्वाष्टक अलग स्तोत्र है, यहाँ के अर्पण-मन्त्र से भिन्न।
मूल पाठ
बिल्वपत्रं सुवर्णेन त्रिशूलाकारमेव च।
मयाऽर्पितं महादेव बिल्वपत्रं गृहाण मे॥
रोमन लिप्यंतरण
bilvapatram suvarnena trishoolaakaarameva cha|
mayaa’rpitam Mahadeva bilvapatram grihaana me||bilvapatraṃ suvarṇena triśūlākārameva ca |
mayā'rpitaṃ mahādeva bilvapatraṃ gṛhāṇa me ||
अर्थ
हे महादेव, मेरे द्वारा अर्पित बिल्वपत्र स्वीकार करें। श्लोक उसकी त्रिशूल-जैसी आकृति का उल्लेख करता है; ‘‘सुवर्णेन’’ पाठ का व्याकरणिक एवं पाठालोचनात्मक परीक्षण शेष है।
व्याख्या
कई शैव परम्पराओं में बिल्वपत्र का विशेष स्थान है; बिल्वाष्टक अलग स्तोत्र है, यहाँ के अर्पण-मन्त्र से भिन्न। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 21 · वैकल्पिक
धूप अर्पण
यदि उपस्थित सभी के लिए धुआँ सुरक्षित हो तभी सुरक्षित धूपदानी में थोड़ी धूप दिखाएँ; अन्यथा धुआँ छोड़ दें और किसी अप्रमाणित विकल्प को वही विधि न कहें।
श्वसन-संवेदनशील व्यक्तियों और धूम्रपान-निषिद्ध स्थानों में धूप उचित नहीं हो सकती।
मूल पाठ
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
vanaspatirasodbhooto gandhaadhyo gandha uttamah|
aaghreyah sarvadevaanaam dhoopo’yam pratigrihyataam||vanaspatirasodbhūto gandhāḍhyo gandha uttamaḥ |
āghreyaḥ sarvadevānāṃ dhūpo'yaṃ pratigṛhyatām ||
अर्थ
वनस्पति-द्रव्यों से उत्पन्न सुगन्धयुक्त धूप, जो परम्परागत रूप में देवताओं के लिए प्रिय कही गई है, स्वीकार करें।
व्याख्या
श्वसन-संवेदनशील व्यक्तियों और धूम्रपान-निषिद्ध स्थानों में धूप उचित नहीं हो सकती। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 22 · वैकल्पिक
दीप दर्शन
केवल सुरक्षित और देखरेख वाली स्थिति में स्थिर दीपक का उपयोग करें; अन्यथा ज्योति न जलाएँ। विद्युत-प्रकाश सुरक्षित विकल्प है, लेकिन उसे अनिवार्यतः वही पारम्परिक दीप-विधि न मानें।
खुली लौ के लिए उपयुक्त स्थान और निरन्तर निगरानी आवश्यक है।
मूल पाठ
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥
रोमन लिप्यंतरण
saajyam cha vartisamyuktam vahninaa yojitam mayaa|
deepam grihaana devesha trailokyatimiraapaham||sājyaṃ ca vartisaṃyuktaṃ vahninā yojitaṃ mayā |
dīpaṃ gṛhāṇa deveśa trailokyatimirāpaham ||
अर्थ
हे देवेश, घृत/तेल और बत्ती से प्रज्वलित यह दीपक स्वीकार करें; इसके प्रकाश को तीनों लोकों का अन्धकार दूर करने वाला कहा गया है।
व्याख्या
खुली लौ के लिए उपयुक्त स्थान और निरन्तर निगरानी आवश्यक है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 23
नैवेद्य अर्पण
स्वच्छ फल अथवा उपयुक्त नैवेद्य को पहले पूजा-पात्र में रखें; धुएँ या अशुद्धि से बचाएँ। स्रोत में मिठाइयों का उल्लेख है, लेकिन चीनी अनिवार्य नहीं।
नैवेद्य कृतज्ञता तथा बाद में प्रसाद की स्वच्छता की जिम्मेदारी व्यक्त करता है।
मूल पाठ
शर्कराघृतसंयुक्तं मधुरं स्वादु चोत्तमम्।
उपहारसमायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
sharkaraaghritasamyuktam madhuram svaadu chottamam|
upahaarasamaayuktam naivedyam pratigrihyataam||śarkarāghṛtasaṃyuktaṃ madhuraṃ svādu cottamam |
upahārasamāyuktaṃ naivedyaṃ pratigṛhyatām ||
अर्थ
शर्करा और घृत से युक्त, स्वादिष्ट और अन्य उपहारों सहित नैवेद्य स्वीकार करने की प्रार्थना है। केवल फल अर्पित करने पर यह पूरा पदार्थ-वर्णन अक्षरशः लागू न हो; संशोधित विधि अभी अनुमोदित नहीं।
व्याख्या
नैवेद्य कृतज्ञता तथा बाद में प्रसाद की स्वच्छता की जिम्मेदारी व्यक्त करता है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 24
नैवेद्य के बाद आचमनीय
भोजन के बाद के सत्कार की तरह अलग स्वच्छ जल रखें। अभिषेक के निकले या दूषित जल को पीने में न लें।
वही छोटे शब्द पूजा-क्रम में दो बार आते हैं, लेकिन दोनों का स्थान अलग है।
मूल पाठ
एलोशीर-लवङ्गादि-कर्पूर-परिवासितम्।
प्राशनार्थं कृतं तोयं गृहाण गिरिजापते॥
रोमन लिप्यंतरण
elosheera-lavangaadi-karpoora-parivaasitam|
praashanaartham kritam toyam grihaana girijaapate||elośīra-lavaṅgādi-karpūra-parivāsitam |
prāśanārthaṃ kṛtaṃ toyaṃ gṛhāṇa girijāpate ||
अर्थ
हे गिरिजापते, इलायची, उशीर, लौंग और कपूर आदि से सुवासित बताया गया पानार्थ जल स्वीकार करें। ये स्रोत-वर्णित पदार्थ हैं, सामान्य गृहपूजा की अनिवार्य सामग्री नहीं।
व्याख्या
वही छोटे शब्द पूजा-क्रम में दो बार आते हैं, लेकिन दोनों का स्थान अलग है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 25 · वैकल्पिक
वैकल्पिक ताम्बूल
कुछ अर्पण-परम्पराओं में पान की सामग्री आती है; वह सबके लिए अनिवार्य नहीं। अनुपयुक्त सामग्री न लें और अर्पण को सुपारी चबाने या खाने की सलाह न समझें।
यह सुपारी चबाने या खाने का निर्देश नहीं है।
मूल पाठ
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
ऐलाचूर्णादिसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥
रोमन लिप्यंतरण
poogeephalam mahaddivyam naagavalleedalairyutam|
ailaachoornaadisamyuktam taamboolam pratigrihyataam||pūgīphalaṃ mahaddivyaṃ nāgavallīdalairyutam |
ailācūrṇādisaṃyuktaṃ tāmbūlaṃ pratigṛhyatām ||
अर्थ
सुपारी, नागवल्ली पत्र और सुगन्धित चूर्ण से युक्त पारम्परिक ताम्बूल अर्पण स्वीकार करें। यह ऐतिहासिक उपचार-वर्णन है, सेवन की सलाह नहीं।
व्याख्या
यह सुपारी चबाने या खाने का निर्देश नहीं है। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 26 · वैकल्पिक
वैकल्पिक दक्षिणा
घर में यह वैकल्पिक दान-भावना हो सकती है; स्रोत की दक्षिणा को अनिवार्य भुगतान की तरह न बताएं।
धनाभाव से पूजा अमान्य नहीं हो जाती।
मूल पाठ
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
रोमन लिप्यंतरण
hiranyagarbhagarbhastham hemabeejam vibhaavasoh|
anantapunyaphaladamatah shaantim prayachchha me||hiraṇyagarbhagarbhasthaṃ hemabījaṃ vibhāvasoḥ |
anantapuṇyaphaladamataḥ śāntiṃ prayaccha me ||
अर्थ
यह मन्त्र हिरण्यगर्भ और स्वर्ण से जुड़े प्रतीकों सहित दक्षिणा समर्पण तथा शान्ति की प्रार्थना करता है; समासार्थ की व्याख्या में अनिश्चितता है।
व्याख्या
धनाभाव से पूजा अमान्य नहीं हो जाती। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 27 · वैकल्पिक
आरती/नीराजन
कपूर की आरती में खुली ज्योति होती है। बिना देखरेख घर में प्रदर्शन के लिए कपूर न जलाएँ; ज्योति की क्रिया किए बिना आरती का भक्ति-पाठ पढ़ा जा सकता है।
चयनित स्रोत में कपूर/दीप से आरती करने का अलग श्लोक है; यह लोकप्रिय ‘‘ॐ जय शिव ओंकारा’’ गीत नहीं। अनुपयुक्त परिस्थिति में अग्नि या धुआँ न करें।
मूल पाठ
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं च प्रदीपितम्।
आरार्तिक्यमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥
रोमन लिप्यंतरण
kadaleegarbhasambhootam karpooram cha pradeepitam|
aaraartikyamaham kurve pashya me varado bhava||kadalīgarbhasambhūtaṃ karpūraṃ ca pradīpitam |
ārārtikyamahaṃ kurve paśya me varado bhava ||
अर्थ
प्रज्वलित कपूर से आरती प्रस्तुत कर वरद भगवान से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना है। यह आरती-उपचार का श्लोक है, किसी पूरे गाए जाने वाले आरती-गीत का पाठ नहीं।
व्याख्या
यह आरती का अर्पण-मन्त्र है, ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ गीत का सम्पूर्ण पाठ नहीं। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतप्रसंग 28
प्रदक्षिणा अथवा नमस्कार
प्रमाणित शिव-विधि में अर्ध-परिक्रमा का उल्लेख है। जलनिकास के समीप नियम भिन्न हो सकते हैं; पथ स्पष्ट न हो तो वहीं नमस्कार सुरक्षित है।
प्रत्येक शिवलिंग की पूरी गोल परिक्रमा को सार्वभौम निर्देश न समझें।
मूल पाठ
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि वै।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणां पदे पदे॥
रोमन लिप्यंतरण
yaani kaani cha paapaani janmaantarakritaani vai|
taani sarvaani nashyantu pradakshinaam pade pade||yāni kāni ca pāpāni janmāntarakṛtāni vai |
tāni sarvāṇi naśyantu pradakṣiṇāṃ pade pade ||
अर्थ
पूर्वजन्मों तक के पापों के नाश की प्रार्थना प्रदक्षिणा के प्रत्येक पद के साथ की जाती है। यह धार्मिक प्रार्थना है, प्रमाणित निश्चित फल का दावा नहीं।
व्याख्या
प्रत्येक शिवलिंग की पूरी गोल परिक्रमा को सार्वभौम निर्देश न समझें। यह इसी उपचार के लिए मुद्रित स्वतंत्र प्रार्थना-श्लोक है, बार-बार प्रयुक्त सामान्य अर्पण-सूत्र मात्र नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 29
अन्तिम पुष्पाञ्जलि
समापन के सम्मान में थोड़ा स्वच्छ पुष्प अर्पित करें; स्रोत में प्रदक्षिणा के बाद मन्त्रपुष्पाञ्जलि का अलग चरण है।
प्रमाण के बिना विस्तृत वैदिक मन्त्रपुष्पम् न जोड़ें।
इस संस्करण में 1923 के पूजा-समुच्चय की सोमेश्वर पुष्पाञ्जलि है।
मूल पाठ
हर विश्वाखिलाधार निराधार निराश्रय ।
पुष्पाञ्जलिं गृहाणेश सोमेश्वर नमोऽस्तु ते ॥
रोमन लिप्यंतरण
hara vishvaakhilaadhaara niraadhaara niraashraya |
pushpaanjalim grihaanesha someshvara namo’stu te ||hara viśvākhilādhāra nirādhāra nirāśraya |
puṣpāñjaliṃ gṛhāṇeśa someśvara namo’stu te ||
अर्थ
हे हर, समस्त जगत् के आधार, जिन्हें किसी आधार या आश्रय की आवश्यकता नहीं—यह पुष्पाञ्जलि स्वीकार करें। हे सोमेश्वर, आपको नमस्कार।
व्याख्या
इस संस्करण में पूजा-समुच्चय की सोमेश्वर पुष्पाञ्जलि-प्रार्थना है। यह आदर और आतिथ्य का भाव है; इससे कोई विशेष फूल अनिवार्य नहीं होता।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 30
क्षमा-प्रार्थना और नमस्कार
नमस्कार करके यहाँ दी गई संक्षिप्त क्षमा-प्रार्थना पढ़ें। मानवीय सीमाएँ विनम्रता से स्वीकार करें; अनुष्ठानिक विशेषज्ञता का दावा या अनिवार्य अलौकिक दण्ड का भय आवश्यक नहीं है।
क्षमा-प्रार्थना पूर्णतावाद के भय के बजाय विनय का भाव रखती है।
इस संस्करण में संक्षिप्त क्षमा-प्रार्थना है।
मूल पाठ
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥
रोमन लिप्यंतरण
mantraheenam kriyaaheenam bhaktiheenam sureshvara |
yatpoojitam mayaa deva paripoornam tadastu me ||mantrahīnaṃ kriyāhīnaṃ bhaktihīnaṃ sureśvara |
yatpūjitaṃ mayā deva paripūrṇaṃ tadastu me ||
अर्थ
हे देवेश, मन्त्र, क्रिया या भक्ति में कमी वाली मेरी पूजा को पूर्णता प्रदान करें।
व्याख्या
यह संक्षिप्त क्षमा-प्रार्थना बाहरी क्रिया की सीमाएँ स्वीकार करती है। यह विनम्र निवेदन है, त्रुटि या हानिकारक आचरण के परिणाम समाप्त होने की गारंटी नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 31 · वैकल्पिक
वैकल्पिक ‘ॐ नमः शिवाय’ नाम-जप
मूल स्रोत-क्रम के बाद वैकल्पिक भक्ति-अंग के रूप में अर्थ समझकर ‘ॐ नमः शिवाय’ जपें; जप-संख्या, माला या दीक्षा के बारे में कोई नया अनिवार्य नियम नहीं बनाया गया है।
इस छोटे शिवमन्त्र का सार्वजनिक पाठ मिलता है; विशेष वैदिक या तान्त्रिक जप-विधि अलग मार्गदर्शन का विषय है।
मूल पाठ
ॐ नमः शिवाय।
रोमन लिप्यंतरण
oṃ namah Shivaya|oṃ namaḥ śivāya
अर्थ
शिव को मेरा नमस्कार; मैं शिव के प्रति श्रद्धा निवेदित करता/करती हूँ।
व्याख्या
यह अलग वैकल्पिक नाम-जप है, किसी अप्रमाणित उपचार-मन्त्र के स्थान पर नहीं।
सम्बन्धित पाठ और स्रोतचरण 32
Prasāda and respectful cleanup
भोजन की स्वच्छता जाँचकर उपयुक्त प्रसाद बाँटें। देखरेख में जलाई लौ सुरक्षित रूप से बुझाएँ, पात्र ठंडे होने दें, पुराने पुष्प हटाएँ और जल की स्वच्छ एवं नियमसम्मत निकासी करें; दूध/घी प्राकृतिक जलस्रोत में न डालें।
यह व्यावहारिक स्वच्छता है, नया संस्कृत अनुष्ठान नहीं; कोई अलग मन्त्र गढ़ा नहीं गया।
पुनर्प्रयुक्त पाठों का श्रेय और लाइसेंस
पाठ और स्रोतMIT License
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लाइसेंसपाठ और स्रोतInherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.
The quoted passage is used for textual study, without conferring ritual authority.
पाठ और स्रोतTraditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.
पाठ और स्रोतTraditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.
पाठ और स्रोतTraditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.
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पाठ और स्रोतTraditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.
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लाइसेंसपाठ और स्रोतPuja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.
पाठ और स्रोतMaharshi Sandipani Rashtriya Veda Vidya Pratishthan, Purohit Kanishtha Sahayak. https://msrvvp.ac.in/skill_course/textbook/Purohit_Kanishtha_Sahayak_1_07_24.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. Selected traditional orthography and devotional-address variants are retained.
पाठ और स्रोतPuja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923. https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. Inherited Sanskrit offering text, distinguished from modern translations, explanations and arrangements. The historical/institutional comparison is not a claim that every spelling or deity-address is identical. This edition uses a separately attributed alternative; other devotional sequences use different prayers.
पाठ और स्रोतhindu-devotional-texts 0.8.0, Ishank Gupta and contributors. https://www.npmjs.com/package/hindu-devotional-texts/v/0.8.0. Selected reading adapted or quoted under MIT. MIT License
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