पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

रक्षाबंधन: स्नेह, विश्वास और जिम्मेदारी का पावन बंधन

चुने वर्ष की गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

पंचांग में देखें
इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

एक नज़र में

रक्षाबंधन, जिसे सामान्य बोलचाल में राखी भी कहते हैं, परिवार और संबंधों में स्नेह, शुभकामना तथा पारस्परिक संरक्षण की भावना व्यक्त करने वाला वार्षिक हिंदू पर्व है। इसकी सबसे पहचानी जाने वाली परंपरा में बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और उसके सुख-कल्याण की कामना करती है। भाई भी आदर, उपहार या कठिन समय में साथ निभाने के संकल्प के माध्यम से अपना स्नेह व्यक्त करता है। यह पर्व सामान्यतः श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा से जुड़ा है। किसी नगर में इसकी वास्तविक अंग्रेज़ी तारीख और परंपरानुसार उपयुक्त समय अलग पंचांग-जाँच का विषय है। 1, 2

राखी केवल भाई-बहन का उत्सव नहीं, बल्कि रक्षासूत्र, आशीर्वाद, सामाजिक मेल-मिलाप और स्वेच्छा से निभाए जाने वाले रिश्तों की व्यापक परंपरा से भी जुड़ी है। उत्तर भारत के अनेक घरों में यह उत्सव विशेष रूप से लोकप्रिय है; वहीं कुछ वैष्णव संस्थाओं में श्रद्धालुओं को भी रक्षासूत्र बाँधा जाता है। उसी पूर्णिमा के आसपास देश के दूसरे क्षेत्रों और नेपाल में अपने अलग नामों और विधानों वाले पर्व मिलते हैं। उन सभी को रक्षाबंधन की बिल्कुल एक जैसी रस्म मानना उचित नहीं होगा। 1, 3, 9

एक साधारण धागा इतना अर्थपूर्ण क्यों है?

कभी राखी सूती धागे की छोटी-सी डोरी होती है, तो कभी रंगीन मोतियों और सजावट से बनी हुई। लेकिन उसका अर्थ कीमत में नहीं, उस व्यक्ति के प्रति अपनत्व में निहित होता है जिसके हाथ पर वह बाँधी जाती है। कोई परिवार पूजा और आरती के साथ यह अवसर मनाता है, कोई मिठाई खिलाकर; कहीं दूर रहने वाले भाई-बहन वीडियो कॉल पर पुरानी शरारतों को याद करते हैं। उत्सव का भाव इन सबमें जीवित रह सकता है। 1, 4

संस्कृत के 'रक्षा' शब्द में सुरक्षित रखने और कल्याण की कामना का भाव है, तथा 'बंधन' संबंध जोड़ने का। आधुनिक जीवन में इसे एकतरफा जिम्मेदारी मानने के बजाय परस्पर सहयोग के रूप में समझना अधिक सार्थक है। बहन भी भाई का सहारा बनती है, उसे समझाती है और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रक्षा करती है। भाइयों और बहनों के बीच आदर बराबरी पर आधारित हो सकता है। हर परिवार में इस अवसर को एक ही तरह से मनाना या महँगा उपहार देना आवश्यक नहीं। 3, 4

नाम, अर्थ और ऐतिहासिक विकास

इस पर्व के लिए रक्षाबंधन, रक्षा बंधन, राखी, राखी पूर्णिमा और रक्षा पूर्णिमा जैसे नाम प्रचलित हैं। कुछ भाषायी क्षेत्रों में राखड़ी, राखड़ी/राखडी और रक्षासूत्र जैसी बोलियाँ सुनाई देती हैं। बहन द्वारा बाँधी गई सजावटी राखी और पुरोहित द्वारा आशीर्वादस्वरूप बाँधा गया रक्षासूत्र समान प्रतीक का प्रयोग कर सकते हैं, पर दोनों की धार्मिक भूमिका हर जगह एक नहीं है। 1, 3

रक्षाबंधन की शुरुआत को किसी एक निश्चित कथा और एक ऐतिहासिक वर्ष से जोड़ना आकर्षक लग सकता है, पर विश्वसनीय प्रमाण इतने सीधे नहीं हैं। रक्षासूत्र बाँधने की धार्मिक क्रियाएँ, पारिवारिक संबंधों से जुड़ी लोकपरंपराएँ और आधुनिक भाई-बहन वाला सामाजिक उत्सव अलग-अलग संदर्भों में विकसित हुए हैं। कोई पौराणिक कथा आज के उत्सव का भाव समझा सकती है; इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि उसी घटना के दिन से वर्तमान रीति ठीक इसी रूप में आरंभ हुई। 1, 3, 5

राखी ने सार्वजनिक जीवन में भी नए अर्थ ग्रहण किए। भारत के राष्ट्रपति के औपचारिक संदेशों में इसे परिवार के साथ-साथ विश्वास, संवेदनशीलता और समाज में परस्पर सहयोग का प्रतीक कहा गया है। बंगाल के 1905 के विभाजन-विरोधी आंदोलन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा राखी को एकता के प्रतीक के रूप में उपयोग करने की परंपरा भी दर्ज है। यह प्राचीन उत्पत्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि एक परिचित प्रतीक के नए सामाजिक प्रयोग का उदाहरण है। 4, 1

इंद्र और शची: संकट के समय रक्षा की प्रार्थना

भविष्य पुराण से संबद्ध रक्षाबंधन कथाओं में देवताओं के युद्ध-संकट का वर्णन मिलता है। ऐसी कथाओं के अनुसार इंद्र की पत्नी शची अथवा इंद्राणी उनके लिए रक्षासूत्र तैयार करती हैं या बाँधती हैं और विजय तथा कल्याण की प्रार्थना करती हैं। कुछ कथनों में बृहस्पति द्वारा धागे को आशीर्वाद दिए जाने का उल्लेख भी आता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस कथा में पत्नी अपने पति के लिए रक्षाबंधन करती है, बहन भाई के लिए नहीं। इस प्रकार यह रक्षासूत्र की व्यापक धार्मिक भूमिका को दर्शाती है। 3, 8

इसे श्रद्धापरक पौराणिक आख्यान के रूप में पढ़ना चाहिए, किसी प्रमाणित ऐतिहासिक युद्ध-वृत्तांत के रूप में नहीं। अलग-अलग पुराण संस्करणों में पाठ और श्लोक-संख्या की तुलना अभी आवश्यक है; इसलिए यहाँ बिना जाँच कोई संस्कृत श्लोक या निश्चित श्लोकांक उद्धृत नहीं किया गया है। इस कथा से आधुनिक भाई-बहन वाले पर्व की पूरी ऐतिहासिक उत्पत्ति भी स्वतः सिद्ध नहीं होती। 3, 8

लक्ष्मी और राजा बलि: नए रिश्ते से जन्मा विश्वास

लोकप्रिय वैष्णव कथन में भगवान विष्णु राजा बलि की रक्षा के लिए उनके लोक में रहते हैं। देवी लक्ष्मी वहाँ पहुँचकर बलि को राखी बाँधती हैं और उन्हें अपना भाई मानती हैं। बलि जब उपहार अथवा वर माँगने के लिए कहते हैं, तो लक्ष्मी भगवान विष्णु के उनके साथ लौटने की इच्छा प्रकट करती हैं। कथा में बलि उदारता से उस संबंध का सम्मान करते हैं। 1, 3

इस प्रसंग की विशेषता यह है कि रक्त-संबंध न होने पर भी अपनाया गया रिश्ता जिम्मेदारी पैदा करता है। यहाँ कथा का महत्व दान, विश्वास और वचन निभाने में है। विष्णु और बलि का प्रसंग अनेक वैष्णव आख्यानों में मिलता है, लेकिन हर संस्करण में राखी बाँधने की घटना नहीं होती। अतः इस लोकप्रिय रक्षाबंधन कथा को बिना पाठ-जाँच सीधे भागवत पुराण के किसी निश्चित श्लोक से जोड़ना उचित नहीं होगा। 1, 3

कृष्ण और द्रौपदी: सहायता को याद रखने की कथा

बहुत प्रचलित कथानक में श्रीकृष्ण की उँगली घायल होती है और द्रौपदी अपनी साड़ी का एक छोटा टुकड़ा फाड़कर उस पर बाँध देती हैं। कृष्ण उस अपनत्व को याद रखते हैं और कठिन अवसर पर उनकी रक्षा का भाव व्यक्त करते हैं। यह प्रसंग बताता है कि दूसरे का दुःख देखकर तुरंत सहायता देना किसी महँगी वस्तु से अधिक मूल्यवान हो सकता है। 1, 5

अक्सर इस पूरे प्रसंग को महाभारत का प्रमाणित मूल पाठ कह दिया जाता है। लेकिन इस विशिष्ट राखी-संबंधी वर्णन को यहाँ महाभारत के किसी जाँचे हुए आलोचनात्मक संस्कृत संस्करण से पुष्ट नहीं किया गया है। इसलिए इसे लोकप्रिय उत्तरवर्ती भक्तिपरक कथा कहा गया है। इससे द्रौपदी और कृष्ण के महाभारत में महत्व को कम नहीं किया जा रहा; केवल लोककथा और सत्यापित ग्रंथ-पाठ के बीच आवश्यक अंतर रखा जा रहा है। 1

रानी कर्णावती का प्रसंग और इतिहास की सावधानी

रानी कर्णावती द्वारा मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजने की कथा भी लोकप्रिय है। इसका संदेश राजनीतिक सीमा से परे सहायता और विश्वास का माना जाता है। किंतु समकालीन ऐतिहासिक साक्ष्यों में इस कथित राखी-प्रसंग का स्पष्ट, निर्विवाद आधार नहीं मिलता; विवरणों को लेकर इतिहासकारों में संदेह रहा है। इसे पर्व की स्थापित ऐतिहासिक शुरुआत कहना उचित नहीं। 5

इसके विपरीत, 1905 के बंग-भंग विरोधी जनांदोलन में राखी को सामाजिक एकता के लिए अपनाए जाने की घटना आधुनिक इतिहास से जुड़ी है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के आह्वान को कई विवरणों में हिंदू-मुस्लिम एकजुटता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। यह घटना बताती है कि रक्षा और अपनेपन का प्रतीक बदलती परिस्थितियों में नए अर्थ भी ग्रहण कर सकता है। 1

रक्षाबंधन कब मनाया जाता है?

रक्षाबंधन की मुख्य पंचांगीय पहचान श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है। तिथि सूर्य और चंद्रमा के कोणीय अंतर पर आधारित चंद्र-दिन की गणना है; उसका प्रारंभ और अंत किसी भी घड़ी-समय पर हो सकता है। पूर्णिमा तिथि का संबंध पूर्ण चंद्र की अवस्था से है, पर तिथि को आकाश में पूर्ण चंद्र होने के किसी एक खगोलीय क्षण के समान मानना ठीक नहीं। इसीलिए केवल सामान्य अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख देखकर उत्सव का प्रमाणित समय नहीं निकाला जा सकता। 7

उत्तर भारतीय पूर्णिमांत और अनेक दूसरे क्षेत्रों में प्रयुक्त अमांत मास-गणना चंद्रमास की सीमाएँ अलग ढंग से निर्धारित करती हैं। पूर्णिमा से जुड़े अनेक पर्व परिचित नामों के साथ मनाए जाते हैं, लेकिन पंचांग में मास-नाम समझने के लिए संबंधित क्षेत्र की प्रणाली जानना आवश्यक है। शिवगोरक्ष का भावी कैलेंडर यह स्पष्ट करेगा कि किस गणना-पद्धति का प्रयोग हुआ है। 7

कई परंपरागत पंचांग राखी बाँधने के लिए अपराह्न का विचार करते हैं तथा भद्रा अर्थात् विष्टि करण से जुड़े समय से बचने की सलाह देते हैं। कुछ परंपराओं में उचित अपराह्न उपलब्ध न होने पर प्रदोष का भी उल्लेख मिलता है। ये धार्मिक मुहूर्त-संबंधी मान्यताएँ हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित शुभ-अशुभ प्रभाव का दावा नहीं। भद्रा के मुख-पुच्छ खंड और विशेष परिस्थितियों के निर्णय में मतांतर हैं। इसलिए यहाँ किसी दिन का एक सार्वदेशिक मुहूर्त नहीं बताया गया है। 7

किसी विशिष्ट नगर की गणना के लिए स्थानीय समय-क्षेत्र, सूर्योदय, पूर्णिमा आरंभ-अंत, भद्रा अवधि, दिन के प्रासंगिक खंड और चुनी हुई परंपरा के निर्णय नियमों की विशेषज्ञ समीक्षा आवश्यक है। यदि जाँचा हुआ परिणाम उपलब्ध नहीं है तो साइट को स्पष्ट दिखाना चाहिए: “इस नगर/वर्ष की तारीख या समय अभी सत्यापित नहीं है।” 7

घरों में रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता है?

उत्तर भारत के बहुत-से परिवारों में रक्षाबंधन से पहले राखियाँ चुनी जाती हैं, रिश्तेदारों से मिलने की योजना बनती है और मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं। उत्सव के अवसर पर बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है, मंगलकामना करती है, कलाई पर राखी बाँधती है और मिठाई खिलाती है। कहीं आरती होती है, तो कहीं सरल शुभकामनाओं के साथ ही उत्सव पूरा होता है। भाई अपनी बहन को उपहार दे सकता है या आवश्यकता में साथ निभाने का आश्वासन व्यक्त करता है। यह सामान्य वर्णन है, सभी घरों के लिए अनिवार्य विधि नहीं। 1, 3

कई परिवार चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, भाभी, छोटे सदस्यों या आत्मीय मित्रों के साथ भी राखी का संबंध जोड़ते हैं। कुछ धार्मिक समुदायों में गुरु अथवा पुरोहित श्रद्धालुओं को रक्षासूत्र बाँधते हैं। इन सभी अवसरों का धार्मिक और सामाजिक अर्थ पूरी तरह एक समान नहीं होता। किसी विशेष मंत्र, विस्तृत पूजा या संप्रदाय की विधि का पालन करना हो तो मान्य परंपरा और विशेषज्ञ-समीक्षित मार्गदर्शिका का सहारा लेना बेहतर है। 1, 3

क्या व्रत जरूरी है? रक्षाबंधन के लिए सभी परिवारों पर लागू एक अनिवार्य उपवास का नियम नहीं बताया जा सकता। कुछ घरों में स्थानीय व्रत या दूसरे धार्मिक नियम हो सकते हैं। व्यक्ति की स्वास्थ्य-स्थिति, क्षमता और सुविधा का सम्मान करना जरूरी है; उपवास न रखने से स्नेह और प्रार्थना का मूल्य कम नहीं होता। 1, 3

उत्तर भारत: भाई-बहन और विस्तृत परिवार

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में भाई-बहन के बीच राखी बाँधने की घरेलू परंपरा विशेष दिखाई देती है। विवाहित बहन का मायके पहुँचना, भाइयों का बहनों से मिलने जाना, बच्चों का बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद लेना और सामूहिक भोजन करना कई घरों की स्मृतियों का हिस्सा है। फिर भी रीति, बोली, उपहार और पूजा की व्यवस्था हर घर में अलग हो सकती है। 1, 4

गुजरात और स्वामिनारायण परंपरा

गुजरात में पारिवारिक राखी के साथ कुछ वैष्णव समुदायों में रक्षासूत्र का आध्यात्मिक अर्थ भी महत्वपूर्ण है। बीएपीएस स्वामिनारायण संस्था के विवरण में राखड़ी, कुमकुम, अक्षत, परिजनों के लिए प्रार्थना तथा साधुओं द्वारा भक्तों को रक्षासूत्र बाँधने की बात आती है। संस्था इसे आध्यात्मिक मार्ग में संरक्षण और अनुशासन की याद के रूप में भी समझती है। यह एक विशिष्ट संप्रदाय का विवरण है, गुजरात के प्रत्येक परिवार का सार्वभौम नियम नहीं। 3

महाराष्ट्र और कोंकण: नारळी पूर्णिमा

महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में, विशेष रूप से मछुआरा समुदायों के बीच, नारळी पूर्णिमा का महत्व है। समुद्र के प्रति सम्मान व्यक्त करने, जल-देवता वरुण को याद करने तथा समुद्री आजीविका में सुरक्षा की कामना के लिए नारियल अर्पित करने की परंपरा दर्ज है। नारियल से बना मीठा चावल, नारळी भात, इसके साथ जुड़ा भोजन है। उसी मौसम में राखी भी मनाई जा सकती है, लेकिन समुद्र को नारियल अर्पित करना और भाई की कलाई पर राखी बाँधना दो अलग उद्देश्यों वाली रस्में हैं। 6

नेपाल: जनै पूर्णिमा और गुन्हि पुन्हि

नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार जनै पूर्णिमा पर कई समुदायों में जनेऊ का नवीनीकरण, पुरोहित द्वारा रक्षासूत्र, तीर्थयात्रा और सामूहिक भोजन का महत्व है। गोसाइँकुंड और पाटन के कुम्भेश्वर जैसे स्थानों में विशेष गतिविधियाँ होती हैं। काठमांडू घाटी के नेवार समुदाय में गुन्हि पुन्हि तथा अंकुरित दालों का पौष्टिक व्यंजन क्वाटी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन परंपराओं को केवल उत्तर भारतीय राखी का दूसरा नाम मानना उनकी विविधता को कम करके देखना होगा। 9

ओडिशा और दक्षिण के संबंधित पूर्णिमा पर्व

ओडिशा की गम्हा पूर्णिमा परंपरा में बलभद्र से जुड़ा जन्मोत्सव और राखी का उल्लेख मिलता है; कुछ स्थानीय उत्सव कृषि और पशुधन से भी संबंध रखते हैं। दक्षिण भारत की कई वैदिक परिवार-परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा के आसपास उपाकर्म अथवा यज्ञोपवीत-नवीनीकरण का स्थान है। अलग वैदिक शाखाओं में तिथि-निर्णय भिन्न हो सकता है। ये सभी पर्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हो सकते हैं, पर इनके नामों और धार्मिक प्रयोजनों को यांत्रिक रूप से समान नहीं करना चाहिए। 10, 9

राखी, मिठाई, उपहार और प्रतीक

राखी की डोरी रिश्ते का दृश्य चिह्न है। साधारण सूत, रंगीन धागे, मोतियों और सजावटी आकृतियों वाली राखियों में अपने-अपने सौंदर्य हैं; इनमें किसी की आर्थिक कीमत से उसके स्नेह का स्तर नहीं मापा जा सकता। कई घरों में तिलक, फूल, दीपक या मिठाई का प्रयोग होता है, पर सभी के लिए एक ही निश्चित सामग्री-सूची जरूरी नहीं है। हाथ से लिखे संदेश और साथ बिताया समय भी उपहार हो सकते हैं। 1, 3

लड्डू, बर्फी, खीर और घर में बने दूसरे मिष्ठान अनेक क्षेत्रों में मिलते हैं। राजस्थान में बरसात के मौसम के पारिवारिक उत्सवों के साथ घेवर का नाम लोकप्रिय है, हालांकि हर रक्षाबंधन थाली में वही होना आवश्यक नहीं। कोंकण का नारळी भात और नेपाल का क्वाटी उसी पूर्णिमा के आसपास की अलग भोजन-परंपराओं से जुड़े हैं। इस विविधता को समझना सारे भारत के लिए एक काल्पनिक निश्चित मेन्यू बताने से अधिक उपयोगी है। 1, 6, 9

आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश

राखी बाँधने के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—रक्षा और साथ निभाने का अर्थ रोजमर्रा के जीवन में क्या है? धार्मिक दृष्टि से इसमें ईश्वर का आशीर्वाद और मंगलकामना जुड़ सकती है। पारिवारिक जीवन में यही भावना एक-दूसरे की बात सुनने, निर्णयों का सम्मान करने, कठिन परिस्थिति में मदद करने और संबंध को बराबरी से निभाने में दिखाई देती है। सिर्फ धागा बाँध देने से व्यवहार की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। 3, 4

लक्ष्मी और बलि की कथा स्वेच्छा से स्वीकार किए गए भाई-बहन के रिश्ते और वचन के मान का स्मरण कराती है। शची-इंद्र कथा संकट में आशीर्वाद और सहयोग का भाव दर्शाती है। इन कथाओं का धार्मिक महत्व हो सकता है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति को बीमारी, दुर्घटना या विपत्ति से निश्चित चमत्कारिक सुरक्षा मिलने का वैज्ञानिक दावा नहीं किया जा सकता। 3, 8

शिवगोरक्ष के शैव-शाक्त और नाथ पाठक भी इस उत्सव में भरोसे, सेवाभाव और गुरु-शिष्य के प्रति उत्तरदायित्व जैसे मानवीय मूल्यों पर विचार कर सकते हैं। पर केवल इतना आधार लेकर किसी विशेष नाथ रक्षाबंधन विधि का आविष्कार नहीं किया जाना चाहिए। किसी स्थानीय नाथ परंपरा की विशिष्ट रस्म का विवरण तभी जोड़ा जाना चाहिए जब उसके प्रमाण अलग से उपलब्ध हों। 3, 9

सामान्य भ्रांतियाँ

“रक्षा केवल भाई करता है, बहन नहीं।” परंपरा में भाई की भूमिका प्रमुख बताई जाती है, किंतु जीवित रिश्तों में सहायता और सम्मान दोनों ओर से आते हैं। “श्रावण पूर्णिमा पर हर जगह बिल्कुल एक ही पर्व होता है।” नहीं; कोंकण की नारळी पूर्णिमा, नेपाल की जनै पूर्णिमा और कुछ समुदायों का उपाकर्म अपने स्वतंत्र अर्थ रखते हैं। “राखी की हर प्रसिद्ध कथा मूल महाभारत में ज्यों की त्यों मिलती है।” बिना निश्चित पाठ-जाँच ऐसा कहना ठीक नहीं। 1, 4, 6, 9

“भद्रा से बचने का समय सारे देश में समान है।” स्थानीय समय, पंचांग और अपनाई गई परंपरा की समीक्षा आवश्यक है। “बड़ी रकम का उपहार ही अच्छे रिश्ते का प्रमाण है।” ऐसी कोई अनिवार्य धार्मिक शर्त नहीं। “रक्षासूत्र हर विपत्ति से निश्चित सुरक्षा की गारंटी देता है।” यह श्रद्धा से जुड़ी मंगलकामना हो सकती है, प्रमाणित वैज्ञानिक परिणाम नहीं। 7, 4

संदर्भ और स्रोत (10)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Raksha Bandhan: Strengthening the bonds of sibling love

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    Ministry of Tourism, Government of India / Incredible India
  2. Raksha Bandhan

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    University of Kansas, Office of Civil Rights & Title IX
  3. Raksha Bandhan

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    BAPS Swaminarayan Sanstha
  4. President of India’s Greetings on the Eve of Raksha Bandhan (27 August 2026)

    स्रोत खोलें 4

    रचनाकार
    President’s Secretariat / Rashtrapati Bhavan
  5. History of Medieval India

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    Satish Chandra
  6. Narali Pournima Maharashtra

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    Ministry of Tourism / Incredible India; content attributed to Maharashtra Tourism
  7. Raksha Bandhan date and auspicious time: explanatory notes

    स्रोत खोलें 7

    रचनाकार
    Drik Panchang
  8. Raksha Bandhan legends: Indra and Shachi

    स्रोत खोलें 8

    रचनाकार
    Drik Panchang
  9. Janai Purnima

    स्रोत खोलें 9

    रचनाकार
    Nepal Tourism Board
  10. Fairs and Festivals of Lord Jagannath, Odisha Review (June–July 2019)

    स्रोत खोलें 10

    रचनाकार
    Odisha Review, Government of Odisha
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

संबंधित अध्ययन और स्रोत

शिवगोरक्ष में हिंदू कैलेंडर एवं पंचांग (हिन्दू कैलेंडर और पंचांग: तिथि, पक्ष, नक्षत्र एवं पर्व-निर्णय की संपूर्ण समझ) तथा पूर्णिमा (पूर्णिमा: हर महीने आने वाली चंद्र-तिथि और उसके पर्व) इस पर्व का पंचांगीय आधार समझाने वाले संबंधित विषय हैं। लक्ष्मी (लक्ष्मी) और विष्णु (विष्णु) से बलि की कथा का प्रसंग जुड़ता है। ये फिलहाल संपादकीय संबंध हैं, प्रकाशित वेबसाइट लिंक होने का दावा नहीं।

प्रमुख संदर्भ: भारत सरकार का अतुल्य भारत पर्व-विवरण 1, कैनसस विश्वविद्यालय का परिचय 2, बीएपीएस परंपरा-विवरण 3, राष्ट्रपति सचिवालय का संदेश 4, महाराष्ट्र पर्यटन का नारळी पूर्णिमा विवरण 6, द्रिक पंचांग के प्रकाशित चयन-सिद्धांत 7 और नेपाल पर्यटन बोर्ड की जनै पूर्णिमा सामग्री 9। सत्यापन की सीमा, स्रोत-अधिकार और विवादित दावों का विस्तृत विवरण स्रोत और संस्करण विवरण में है। इस लेख में किसी नगर/वर्ष की स्वीकृत तारीख या मुहूर्त प्रकाशित नहीं किया गया है।

इस लेख के बारे में

शैक्षिक पठन के लिए संस्थापक द्वारा समीक्षित संस्करण। स्वतंत्र विद्वत्-सत्यापन का दावा नहीं है। स्रोत-विशेष के पाठभेद और उपयोग की शर्तें ऊपर दिए गए संदर्भों में पढ़ें।

संपादकीय नीति

पंचांग और पर्व-चयन की पद्धति

श्रेय और पुनः उपयोग की शर्तें

विषय-सूची पर लौटें