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प्रदोष व्रत: भगवान शिव की आराधना का संध्या-पर्व

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दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

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दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

प्रदोष व्रत, प्रदोष, प्रदोषम् और प्रदोष पूजा ऐसे नाम हैं जो त्रयोदशी से संबंधित नियमित शिव-आराधना के लिए प्रयोग होते हैं। सामान्यतः एक चंद्रमास में दो अवसर आते हैं—एक शुक्ल पक्ष में और दूसरा कृष्ण पक्ष में।

एक नज़र में

प्रश्नसंक्षिप्त जानकारी
यह क्या है?प्रदोषकाल में भगवान शिव से जुड़ी आराधना और व्रत
कितनी बार?सामान्यतः प्रत्येक चंद्रमास में दो बार; तिथि का चयन पंचांग-नियम पर निर्भर
संबंधित तिथिशुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी
आराध्यमुख्यतः शिव; कई परंपराओं में पार्वती और नंदी भी
प्रचलित नामप्रदोष व्रत, प्रदोष, प्रदोषम्, प्रदोष पूजा
कहाँ?घरों तथा शिव मंदिरों में; दक्षिण भारत में विशिष्ट मंदिर-परंपराएँ भी

प्रदोष वर्ष में केवल एक बार आने वाला त्योहार नहीं है। इसके साथ ही प्रदोष को पूरी त्रयोदशी तिथि का दूसरा नाम समझना भी ठीक नहीं। त्रयोदशी चंद्र-पंचांग की तिथि है; प्रदोष संध्या से जुड़ा काल है; और प्रदोष व्रत उस उपयुक्त संयोग पर किया जाने वाला धार्मिक अनुष्ठान या संकल्प है। 1, 4

दिन ढलने पर बदलता वातावरण

दिन भर की हलचल के बाद मंदिर में संध्या होती है। कहीं दीपक जलते हैं, कहीं घंटियों के बीच दर्शन आरंभ होते हैं, तो कहीं श्रद्धालु नंदी के सामने ठहरकर भगवान शिव की ओर ध्यान लगाते हैं। कुछ परिवार मंदिर जाने के बजाय घर पर शांति से प्रार्थना करते हैं। इन सबके बीच एक समान भावना दिखाई देती है—कामकाज से हटकर कुछ समय आत्मचिंतन और आराधना को देना। 4, 5, 6

संस्कृत में प्रदोष शब्द का संबंध संध्या और रात्रि के आरंभ से है। इस व्रत में सूर्यास्त के आसपास की अवधि को विशेष महत्व दिया जाता है। व्रत केवल भोजन न करने का नाम नहीं; इसमें संकल्प, संयम, श्रद्धा और परंपरा के अनुसार आचरण भी हो सकता है। परिवार और संप्रदाय के अनुसार इसकी विधि बदलती है। 1, 2

त्रयोदशी, प्रदोषकाल और प्रदोष व्रत में अंतर

हिंदू पंचांग में तिथि सूर्य और चंद्रमा की आपसी स्थिति से निर्धारित होने वाली अवधि है। तिथि आवश्यक नहीं कि आधी रात को या सूर्योदय पर ही आरंभ हो। प्रत्येक पक्ष की तेरहवीं तिथि त्रयोदशी कहलाती है। अमावस्या से पूर्णिमा की ओर बढ़ने वाला पक्ष शुक्ल पक्ष, और पूर्णिमा से अमावस्या की ओर जाने वाला कृष्ण पक्ष है। 4, 7

प्रदोषकाल संध्या से संबंधित वह समय है जिसकी परिभाषा प्रयुक्त धार्मिक-पंचांग परंपरा में निश्चित की जाती है। प्रदोष व्रत उस त्रयोदशी और संध्या-अवधि के उपयुक्त संबंध से चुना गया उपासना-अवसर है। इसलिए किसी साधारण कैलेंडर पर 'त्रयोदशी' लिखा दिखने मात्र से उस दिन को स्वतः प्रदोष व्रत घोषित नहीं किया जा सकता। 4

कुछ प्रकाशित पंचांग प्रदोषकाल और त्रयोदशी के एक-दूसरे पर पड़ने को चयन का प्रमुख आधार बताते हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि अलग शहरों के सूर्यास्त में अंतर के कारण व्रत की तारीख भिन्न हो सकती है। यह एक प्रकाशित पंचांग की पद्धति का प्रमाण है; इसे बिना विशेषज्ञ समीक्षा के शिवगोरक्ष का अंतिम मान्य नियम नहीं माना जाएगा। 4

शिव-परंपरा में प्रदोष का महत्व

स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड के ब्रह्मोत्तरखण्ड में प्रदोषकालीन शिव-पूजा की महिमा का वर्णन है। सूत ऋषियों को बताते हैं कि उस समय देवगण भगवान शिव की स्तुति करते हैं और कैलास पर शिव के नृत्य का मनोहारी चित्र सामने आता है। ग्रंथ पूजा, स्मरण, स्तुति और धार्मिक अनुशासन का महत्व बताता है। ऐसे वर्णन को माहात्म्य साहित्य के रूप में समझना चाहिए—जिसमें किसी तीर्थ, समय या साधना की आध्यात्मिक महत्ता को विस्तार से व्यक्त किया जाता है। 1

ग्रंथ में बताए गए धन, संकट से रक्षा अथवा पुण्य के फल आस्था और धर्मग्रंथ के दावे हैं; इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य या आर्थिक परिणाम नहीं कहा जा सकता। आज के पाठक के लिए इसका एक सहज संदेश यह भी है कि व्यस्त जीवन में नियमित अंतराल पर विनम्रता, ध्यान और आत्मसंयम के लिए समय निकाला जाए।

यह मूलतः शैव उपासना है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अन्य हिंदू परंपराएँ इसी के अधीन हैं। एक ही परिवार अलग-अलग कारणों से एकादशी, प्रदोष और शिवरात्रि जैसे व्रतों का सम्मान कर सकता है।

संध्या में शिव का दिव्य नृत्य

स्कन्दपुराण में प्रदोष के समय कैलास पर शिव के नृत्य का वर्णन मिलता है। देवता उनकी स्तुति करते हैं और आगे के श्लोकों में दिव्य संगीत की कल्पना प्रस्तुत होती है। भक्तिपरक दृष्टि से यह नृत्य सृष्टि की गति, परिवर्तन और ईश्वरीय उपस्थिति का संकेत बन सकता है। इसे पृथ्वी पर हुई किसी ऐतिहासिक घटना की प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्ट नहीं मानना चाहिए। 1

राजा सत्यरथ, अनाथ शिशु और उमा

एक विस्तृत पौराणिक कथा में विदर्भ के राजा सत्यरथ युद्ध में मारे जाते हैं। उनकी गर्भवती रानी बच निकलती हैं, किंतु संतान जन्मने के बाद जलाशय में मगरमच्छ का शिकार हो जाती हैं। नवजात शिशु असहाय रह जाता है। उमा नाम की विधवा स्त्री उसे अपनाकर अपने पुत्र के साथ पालती है। बाद में ऋषि शाण्डिल्य उस बालक के कुल और पूर्वजन्म की कथा बताते हैं। 1

कथा में कहा गया है कि पूर्वजन्म में राजा प्रदोष-पूजा के बीच क्रोध और राजनीतिक संघर्ष में उलझ गए थे और पूजा अधूरी छोड़ दी थी। ग्रंथ अपनी कर्म-संबंधी दृष्टि से आगे के दुखों को उस आचरण से जोड़ता है। कहानी फिर संयम और शिव-भक्ति की ओर लौटने का संदेश देती है। इसे वास्तविक जीवन में किसी परिवार के दुख का कारण तय करने या पीड़ित लोगों को दोष देने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यह एक धार्मिक-नैतिक आख्यान है, आधुनिक इतिहास-लेखन नहीं।

शाण्डिल्य द्वारा व्रत की शिक्षा

अगले अध्याय में ऋषि शाण्डिल्य प्रदोष व्रत से संबंधित विधि बताते हैं। उसमें उपवास, शुद्धि, पूजा, अर्पण और कई विस्तृत तांत्रिक-आगमिक प्रकार के चरण मिलते हैं। इसे हर श्रद्धालु के लिए अनिवार्य, एकमात्र और सार्वभौमिक विधि बताना उचित नहीं। विशेष विधान या परंपरा-आधारित साधना की शिक्षा योग्य आचार्य और अलग से स्वीकृत मार्गदर्शिका का विषय है; यहाँ हम केवल उसका धार्मिक-साहित्यिक संदर्भ बताते हैं। 2, 3

समुद्र-मंथन और नीलकण्ठ की स्मृति

कुछ वर्तमान मंदिर-समुदाय प्रदोष को समुद्र-मंथन की उस कथा से भी जोड़ते हैं जिसमें शिव संसार की रक्षा के लिए विष को कंठ में धारण करते हैं और नीलकण्ठ कहलाते हैं। यह एक प्रचलित भक्तिपरक संबंध है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रदोष-माहात्म्य के उद्धृत अध्याय में वही घटना वर्णित है या उसके लिए किसी ऐतिहासिक तारीख का प्रमाण मिलता है। इस कथा का भावार्थ दूसरों के हित में करुणा और उत्तरदायित्व से जुड़ा है। 5

प्रदोष व्रत कब होता है?

हर सामान्य चंद्रमास में एक शुक्ल त्रयोदशी और एक कृष्ण त्रयोदशी आती है। इसलिए सामान्य रूप से महीने में दो प्रदोष व्रत माने जाते हैं। लेकिन इसका अर्थ हर महीने की दो स्थिर अंग्रेज़ी तारीखें नहीं है। तिथि का आरंभ और अंत बदलता रहता है; स्थान का सूर्यास्त, प्रदोषकाल की स्वीकृत परिभाषा तथा नियम-भेद मिलकर वास्तविक व्रत-दिन तय करते हैं। 4

यहाँ एक और अंतर समझना आवश्यक है। उत्तर भारत में पूर्णिमान्त नामकरण अधिक प्रचलित है, जबकि अनेक अन्य क्षेत्रों में अमान्त पद्धति मिलती है। इससे आकाशीय तिथि बदल नहीं जाती, पर कृष्ण पक्ष की तिथि को किस महीने के नाम से लिखा जाएगा, यह अलग हो सकता है। अतः पाठक को पंचांग का चयनित परंपरा-प्रोफ़ाइल भी देखना चाहिए। 7

कभी त्रयोदशी दो संध्याओं को छू सकती है; कभी सूर्यास्त के आसपास आरंभ या समाप्त हो सकती है। जिस दिन सूर्योदय पर त्रयोदशी न हो, उसके संध्याकाल में वह उपस्थित हो सकती है। उलटे, सूर्योदय के समय त्रयोदशी होने पर भी संध्या तक वह समाप्त हो सकती है। ऐसे मामलों में केवल 'सूर्योदय की तिथि' वाला आसान नियम पर्याप्त नहीं है। दो उपयुक्त संध्याएँ, छोटी अवधि, लुप्त अथवा पुनरावृत्त सूर्योदय-तिथि और स्थानीय अंतर जैसे मामलों की विशेषज्ञ समीक्षा आवश्यक है।

स्थान और वर्ष के अनुसार वास्तविक तिथि: इस लेख में अभी सत्यापित नहीं है। भविष्य में वेबसाइट का समीक्षा-प्राप्त कैलेंडर मॉड्यूल स्थानीय तारीख, संध्या-अवधि, समय-क्षेत्र, प्रयुक्त नियम और सत्यापन की स्थिति दिखाएगा। फिलहाल सही संदेश होगा—'इस शहर/वर्ष के लिए तारीख और समय अभी सत्यापित नहीं हैं।'

सोम, भौम और शनि प्रदोष क्या होते हैं?

सोमवार को पड़ने वाले प्रदोष को सोम प्रदोष, मंगलवार वाले को भौम प्रदोष और शनिवार वाले को शनि प्रदोष कहा जा सकता है। पंचांगों में रवि, बुध, गुरु और शुक्र प्रदोष जैसे नाम भी मिलते हैं। ये अलग-अलग तिथियों वाले सात स्वतंत्र त्योहार नहीं, बल्कि उसी आवर्ती उपासना के वार-आधारित नाम हैं। 4

लोक-विश्वास में किसी वार विशेष को अलग कामना या विशेष पुण्य से जोड़ा जा सकता है। ऐसी मान्यताओं को आस्था के रूप में बताना चाहिए, निश्चित स्वास्थ्य-लाभ, ऋण-मुक्ति या ग्रह-दोष के वैज्ञानिक उपचार के रूप में नहीं। किसी दिन का सही वार कौन-सा माना जाए, यह भी संबंधित स्थानीय चयन-नियम के साथ दर्ज होना चाहिए।

कैसे मनाया जाता है?

कई शिव मंदिरों में संध्या-दर्शन, अभिषेक, दीप-आरती, फूल और बिल्वपत्र अर्पण, भजन तथा सामूहिक प्रार्थना होती है। अमेरिका में Hindu Temple Society of New Mexico के अपने प्रदोषम् आयोजन-विवरण में ऐसी गतिविधियाँ दर्ज हैं। यह एक वास्तविक मंदिर-समुदाय का उदाहरण है, सभी मंदिरों के लिए लागू एक जैसी अनिवार्य विधि नहीं। 5

तमिल-भाषी शैव परंपराओं में प्रदोषम् के समय नंदी का विशेष महत्व दिखाई देता है। शिव और पार्वती का नंदी से संबंध कलाकृतियों में भी स्पष्ट है; मेट्रोपॉलिटन संग्रहालय की ऐतिहासिक चित्रकला इसका उदाहरण देती है। लेकिन केवल चित्र देखकर किसी मंदिर की आरती, अभिषेक या परिक्रमा की वर्तमान विधि सिद्ध नहीं की जा सकती। कुछ मंदिरों में नंदी, शिवलिंग अथवा उत्सवमूर्ति की विशेष पूजा या परिक्रमा का आयोजन हो सकता है, जिसकी पुष्टि उसी मंदिर की विश्वसनीय सूचना से की जानी चाहिए। 6, 8

घर में प्रदोष का स्वरूप बहुत सरल भी हो सकता है—शांत वातावरण, सुरक्षित ढंग से दीपक, स्मरण, परिवार में प्रचलित सार्वजनिक स्तोत्र और कुछ क्षण ध्यान। कुछ श्रद्धालु मंदिर जाते हैं, जबकि कुछ घर के संस्कार के अनुसार व्रत करते हैं। हर व्यक्ति के लिए कठिन मंत्र-विधान, निश्चित संख्या में परिक्रमा या गूढ़ साधना आवश्यक घोषित करने का आधार उपलब्ध नहीं है।

उपवास, प्रसाद और भोजन

व्रत में संयम और संकल्प का भाव भी है। कुछ लोग एक अवधि तक निराहार रहते हैं; कुछ फलाहार, दूध या सादा शाकाहारी भोजन लेते हैं। कुछ केवल पूजा करते हैं। धर्मग्रंथ के विस्तृत विधि-वर्णन से यह सिद्ध नहीं होता कि एक ही भोजन-नियम सब घरों पर समान रूप से लागू है। व्रत कब खोला जाए, यह भी संबंधित परंपरा की जानकारी और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर विषय है। 2

प्रदोष किसी एक विशेष पकवान का अखिल भारतीय पर्व नहीं है। फल, मिठाई, सादा भोग और प्रसाद स्थानीय तथा घरेलू रीति से बदलते हैं। जो लोग भोजन छोड़ने से स्वास्थ्य-संबंधी जोखिम में पड़ सकते हों, उनके लिए सामान्य ज्ञान-विषयक लेख को उपवास की बाध्यता नहीं समझना चाहिए। भोजन-त्याग और प्रार्थना में भाग लेना अलग बातें हैं।

शिवलिंग, नंदी, दीपक और बिल्वपत्र का प्रतीकात्मक महत्व

अनेक मंदिरों में शिवलिंग पूजा का मुख्य केंद्र है। शिव की ओर मुख किए नंदी को भक्ति, सेवा और स्थिर ध्यान का प्रतीक मानना एक प्रचलित व्याख्या है। मूर्तियाँ तथा चित्र शिव-नंदी के ऐतिहासिक कलात्मक संबंध को दर्शाते हैं, किंतु सभी परंपराओं में एक ही प्रतीकार्थ होना आवश्यक नहीं। 6

दीपक दिन से रात की ओर परिवर्तन के समय अंतर्मुख होने का संकेत दे सकता है। बिल्वपत्र, फूल, जल, भस्म और अन्य सामग्री अनेक शैव परंपराओं में दिखाई देती है, पर इनके नियम मंदिर और समुदाय के अनुसार बदलते हैं। त्रिशूल और चंद्रचिह्न शिव की व्यापक पहचान हैं; उनसे किसी प्रदोष की सटीक चंद्रतिथि नहीं निकाली जा सकती। उत्सव के लिए बनाई गई कलाकृति पंचांग-गणना का प्रमाण नहीं होती।

भारत और विदेश में क्षेत्रीय स्वरूप

दक्षिण भारत, विशेषतः तमिल शैव मंदिर-परंपरा में प्रदोषम् नाम और नंदी की विशेष उपासना परिचित हैं। उत्तर भारत के अनेक व्रत-कैलेंडरों तथा घरेलू बातचीत में प्रदोष व्रत या प्रदोष नाम अधिक सुनाई देता है। विदेशों में मंदिर अपने समुदाय और उपलब्ध व्यवस्था के अनुसार संध्या-पूजा का आयोजन कर सकते हैं; न्यू मेक्सिको का उल्लेखित मंदिर इसका एक सत्यापित उदाहरण है। 4, 5

ये सामान्य संदर्भ हैं, न कि हर तमिल परिवार, हर उत्तर भारतीय मंदिर या प्रत्येक प्रवासी समुदाय पर लागू एक जैसा नियम। किसी मंदिर का कार्यक्रम, प्रवेश-व्यवस्था या समय जानने के लिए उसकी अपनी वर्तमान सूचना आवश्यक होगी। इस लेख में ऐसी बदलती हुई जानकारियाँ नहीं दी गई हैं।

महाशिवरात्रि, मासिक शिवरात्रि और एकादशी से संबंध

प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक ही व्रत नहीं हैं। प्रदोष का संबंध त्रयोदशी की संबंधित संध्या से है, जबकि मासिक शिवरात्रि सामान्यतः कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तथा रात्रिकालीन आराधना से जुड़ी है। महाशिवरात्रि वर्ष का प्रमुख शिव-पर्व है; वह महीने के दो सामान्य प्रदोष अवसरों में से कोई अलग नाम भर नहीं। 4

एकादशी ग्यारहवीं तिथि से जुड़ा स्वतंत्र व्रत है और कई वैष्णव तथा स्मार्त परंपराओं में उसके अलग दिन-चयन एवं द्वादशी पारण के नियम होते हैं। एकादशी और प्रदोष पास-पास पड़ें तो बिना समीक्षा के दोनों को जोड़कर एक सार्वभौमिक उपवास-विधि नहीं बतानी चाहिए। इसी तरह धनतेरस कृष्ण त्रयोदशी से संबंधित अपने अलग दीपावली-पर्व संदर्भ में मनाया जाता है; हर प्रदोष धनतेरस नहीं है।

शिवगोरक्ष की अध्ययन-सामग्री में इस विषय के प्रमुख संबंध शिव (शिव), शंकर (शंकर) और पार्वती (पार्वती) से हैं। ये शैक्षिक संबंध हैं, किसी सार्वजनिक वेबसाइट-पृष्ठ के प्रकाशित होने का दावा नहीं।

आज के पाठक के लिए प्रदोष का संदेश

प्रदोष की विशेषता उसकी नियमित वापसी है। बड़े पर्व के लिए पूरे वर्ष की प्रतीक्षा हो सकती है, पर प्रदोष लगभग एक पक्ष बाद फिर आता है। धार्मिक दृष्टि से यह बार-बार भक्ति, आत्मसंयम और स्मरण को अवसर देता है। सामान्य मानवीय दृष्टि से कथा का एक संदेश यह भी निकल सकता है कि क्रोध से पहले रुकें, किसी असहाय व्यक्ति की सहायता करें और भागदौड़ में अपने मूल्यों को न भूलें।

यह समकालीन पाठकीय व्याख्या है; इसे शैव दर्शन की सभी शाखाओं का एकमात्र सिद्धांत नहीं कहा जा रहा। दीक्षा-आधारित या विशेष तांत्रिक अनुष्ठान अलग परंपरागत विशेषज्ञता और स्वीकृति की अपेक्षा रखते हैं। यह पृष्ठ केवल शैक्षिक परिचय देता है।

सामान्य भ्रम

  • 'त्रयोदशी और प्रदोष बिल्कुल एक हैं।' नहीं; चंद्रतिथि, संध्याकाल और व्रत का संबंध है, पर उनकी पहचान अलग है।
  • 'प्रदोष साल में एक बार आता है।' सामान्यतः महीने में दो बार आता है।
  • 'पूरे भारत के लिए अंग्रेज़ी तारीख एक होगी।' स्थानीय सूर्यास्त और पंचांग-पद्धति में अंतर संभव है।
  • 'सबको एक ही तरह निराहार रहना चाहिए।' घरेलू परंपरा और व्यक्तिगत क्षमता अलग-अलग हैं।
  • 'प्रदोष और मासिक शिवरात्रि एक हैं।' संबंधित तिथि और मुख्य समय अलग हैं।
  • 'पौराणिक कथा आधुनिक ऐतिहासिक प्रमाण है।' यह धार्मिक साहित्य है; उसका महत्व और ऐतिहासिक सत्यापन अलग विषय हैं।
संदर्भ और स्रोत (8)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Skanda Purana: The Importance of Pradoṣa, Brahma-khanda, Brahmottara-khanda, Chapter 6

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    Skanda Purāṇa; English translation credited online to G. V. Tagare; Wisdom Library hosting
  2. Skanda Purana: The Importance of Pradoṣa: The Procedure of Śiva’s Worship, Chapter 7

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    Skanda Purāṇa; English translation credited online to G. V. Tagare; Wisdom Library hosting
  3. Essence of Skanda Purana, Chapter 7: Pradosha Vrata—Procedure of Worship and Udyapan

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    V. D. N. Rao; Sri Kanchi Kamakoti Peetham
  4. Pradosham Days / Pradosh Vrat (location-based observance calendar)

    स्रोत खोलें 4

    रचनाकार
    Drik Panchang
  5. Pradosham: Significance, Rituals, and Schedule

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    Hindu Temple Society of New Mexico
  6. A Nobleman’s Vision of Shiva and Parvati

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    The Metropolitan Museum of Art
  7. Jyeshtha Month Festivals in Hindu Calendar

    स्रोत खोलें 7

    रचनाकार
    Drik Panchang
  8. Pradosha or Pradosham

    स्रोत खोलें 8

    रचनाकार
    Sri Venkateswara Cultural Center (SVCC Temple)
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे पढ़ें

  • 1 स्कन्दपुराण, ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तरखण्ड, अध्याय 6—प्रदोष माहात्म्य और राजा सत्यरथ की कथा; विज़डम लाइब्रेरी पर उपलब्ध अंग्रेज़ी अनुवाद।
  • 2 उसी ग्रंथ का अध्याय 7—प्रदोषकालीन शिव-पूजा का विस्तृत धार्मिक विधान; इसे अनुमोदित अनुष्ठान-पुस्तिका न समझें।
  • 3 श्री कांची कामकोटि पीठम्, वी. डी. एन. राव, Essence of Skanda Purana, अध्याय 7; संक्षिप्त परंपरा-विशेष विवरण।
  • 4 द्रिक पंचांग, Pradosham Days / Pradosh Vrat: द्विपाक्षिक आवृत्ति, संध्या-तिथि का संबंध और स्थान-आधारित अंतर।
  • 5 हिन्दू टेम्पल सोसाइटी ऑफ़ न्यू मेक्सिको, Pradosham: एक समकालीन मंदिर के अभ्यास का प्रमाण।
  • 6 मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, A Nobleman's Vision of Shiva and Parvati: शिव, पार्वती और नंदी की ऐतिहासिक चित्रकला।
  • 7 द्रिक पंचांग, Jyeshtha Month Festivals: अमान्त-पूर्णिमान्त मास-गणना का परिचय।
  • 8 श्री वेंकटेश्वर कल्चरल सेंटर, Pradosha or Pradosham: मंदिर-समुदाय का उल्लेख; मूल पृष्ठ का पूर्ण निरीक्षण अधूरा।

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