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नवरात्रि: शक्ति, साधना और उत्सव की नौ रातें

चुने वर्ष की गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

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कुछ चयन अनिर्णीत हैं: चैत्र नवरात्रि.

कुछ तिथियाँ सूर्योदय पर नहीं आतीं; ऐसे व्रत-दिनों का चयन अभी अपूर्ण है।

केवल समर्थित पर्व-दिन दिखाए गए हैं; पूरे बहुदिवसीय पर्व का काल या घटस्थापना मुहूर्त यहाँ निर्धारित नहीं है।

इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
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एक नज़र में: नवरात्रि अथवा नवरात्र (Navratri) का सामान्य अर्थ है नवरात्रि अथवा नवरात्र (Navaratri) का सामान्य अर्थ है नौ रातें। हिंदू परंपराओं में चैत्र नवरात्रि वसंत में और शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में विशेष रूप से मनाई जाती हैं। अनेक समुदायों में माँ दुर्गा, अम्बा, पार्वती और शक्ति के अन्य स्वरूपों की उपासना होती है। इसी व्यापक उत्सवी समय में गुजरात का गरबा, बंगाल की दुर्गापूजा, तमिल समाज का गोलू तथा विजयादशमी से जुड़ी अनेक परंपराएँ दिखाई देती हैं। लेकिन सभी क्षेत्रों के लिए एक ही पूजा-विधान, एक ही नौ देवियाँ अथवा एक ही ग्रेगोरियन तिथि मान लेना ठीक नहीं है। 5, 6, 8

नवरात्रि क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है?

एक घर में नवरात्रि का स्वागत दीपक और फूलों से होता है। कहीं पूरी बस्ती देवी के भजनों से गूँज उठती है। गुजरात में नृत्य करने वाले लोग दीप के चारों ओर घूमते हैं; कोलकाता में मिट्टी की प्रतिमाओं और विशाल पंडालों के माध्यम से भक्ति सार्वजनिक कला का रूप लेती है। तमिल परिवारों में सीढ़ीनुमा मंच पर सजी गुड़ियाँ बच्चों से लेकर बड़ों तक को धार्मिक कथाएँ याद दिलाती हैं। ये दृश्य एक ही व्यापक उत्सवी परिवार से जुड़े हैं, फिर भी प्रत्येक की अपनी पहचान है। 5, 6, 7

इस पर्व के केंद्र में शक्ति की आराधना है—ऐसी दिव्य सामर्थ्य, जिसमें रक्षा करने का साहस भी है और जगत के प्रति माँ जैसा स्नेह भी। भक्त इस अवधि में आत्मसंयम, भक्ति, सेवा, ज्ञान, करुणा और अन्याय का सामना करने की प्रेरणा पाते हैं। कुछ शाक्त दर्शन देवी को परम सत्य के रूप में समझते हैं; दूसरी परंपराएँ देवी की महिमा को शिव, विष्णु अथवा अपने आराध्य के साथ संबंध में व्यक्त करती हैं। मतों का यह अंतर नवरात्रि की समृद्धि है, कोई ऐसी त्रुटि नहीं जिसे मिटा देना चाहिए। 1, 4

नवरात्रि को केवल नौ रंगों, एक विशेष भोजन-सूची या नौ उपवासों तक सीमित नहीं किया जा सकता। किसी परिवार के लिए प्रतिदिन की छोटी प्रार्थना ही इस पर्व का सबसे प्रिय भाग हो सकती है, तो किसी समुदाय के लिए सामूहिक उत्सव महत्वपूर्ण होता है।

नाम, अर्थ और वर्ष में आने वाली नवरात्रियाँ

संस्कृत में नव का अर्थ नौ और रात्रि का अर्थ रात है। यह नाम लगातार कई दिनों तक चलने वाली भक्ति और उत्सव की ओर संकेत करता है। शारदीय नवरात्रि मुख्यतः आश्विन मास के शुक्ल पक्ष से संबंधित है। चैत्र नवरात्रि, जिसे कुछ स्थानों पर वासंतिक या राम नवरात्रि भी कहते हैं, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आती है। कुछ उपासना-परंपराओं में माघ और आषाढ़ की गुप्त नवरात्रियों का भी उल्लेख मिलता है, किंतु उन्हें चैत्र और शारदीय नवरात्रि जितना सार्वजनिक उत्सव मानना उचित नहीं होगा। 8

नवरात्र, नवरात्रि, नवरात्री, नवराथ्रि, दुर्गा नवरात्रि जैसे नाम भाषा और क्षेत्र के अनुसार मिलते हैं। बंगाल में इसी ऋतु से जुड़ी सबसे प्रमुख पहचान दुर्गापूजा हो सकती है। दक्षिण भारत के कई परिवारों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—तीनों के प्रति आदर व्यक्त किया जाता है। नामों और तिथियों का मेल होने पर भी रीति-रिवाज समान नहीं हो जाते। 6, 7

प्राचीन ग्रंथ, देवी की कथाएँ और उत्सव का विकास

नवरात्रि का कोई एक ऐसा आरंभ-वर्ष नहीं बताया जा सकता जिसे ऐतिहासिक प्रमाण से सभी परंपराओं पर लागू किया जा सके। देवी-आराधना, ऋतु-पर्व, क्षेत्रीय मेले और अलग-अलग पूजा-विधियाँ लंबे समय में विकसित हुई हैं। देवीमाहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती या चंडी भी कहा जाता है, मार्कण्डेयपुराण से संबद्ध तेरह अध्यायों का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें देवी की शक्तिशाली कथाएँ और स्तुतियाँ हैं। नवरात्रि के अवसर पर अनेक भक्त इसका पाठ या श्रवण करते हैं; लेकिन यह ग्रंथ किसी एक ऐतिहासिक नवरात्रि की दिनांकवार स्थापना-रिपोर्ट नहीं है। 1, 2, 3, 4

आज उत्तर भारत में प्रचलित नवदुर्गा के नौ नामों का क्रम एक विशेष पूजा-परंपरा के अंतर्गत लोकप्रिय हुआ है। उसे देवीमाहात्म्य के तेरह अध्यायों की सूची समझना गलत होगा। अलग-अलग समुदायों के स्तोत्र, पाठ-क्रम और पारिवारिक नियम भी एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं। 8

आज के सामुदायिक उत्सवों का अपना प्रमाणित सामाजिक इतिहास भी है। यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को वर्ष 2023 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। कोलकाता की दुर्गापूजा को 2021 में स्थान मिला। ये मान्यताएँ नृत्य, हस्तकला, प्रतिमा-निर्माण और जन-सहभागिता जैसी जीवित परंपराओं का महत्व बताती हैं; इनसे समूची नवरात्रि की किसी एक कथित प्राचीन शुरुआत की पुष्टि नहीं होती। 5, 6

1. महिषासुर का वध: शक्ति और सामूहिक साहस

देवीमाहात्म्य के दूसरे और तीसरे अध्याय में कथा आती है कि महिषासुर के अत्याचार से देवता संकट में पड़ जाते हैं। देवताओं की शक्तियों के एकत्र होने से देवी का तेजस्वी रूप प्रकट होता है। उन्हें विविध आयुध प्राप्त होते हैं और अंततः महिषरूप धारण करने वाले असुर का वध होता है। यह पुराण की धार्मिक कथा है; इसे किसी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन नहीं कहा जा सकता। भक्त इसके भीतर अहंकार, उत्पीड़न और अव्यवस्था के विरुद्ध साहस का संदेश देखते हैं। 1, 2

इस कथा का महत्व यह भी है कि संकट का समाधान केवल बल से नहीं, बल्कि विभिन्न शक्तियों के एक उद्देश्य के लिए संगठित होने से सामने आता है। यह व्याख्या पाठकों के लिए उपयोगी हो सकती है, पर इसे हर परंपरा द्वारा स्वीकृत एकमात्र अर्थ नहीं कहना चाहिए।

2. चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज: लगातार बढ़ती चुनौती

ग्रंथ की बाद की कथा में शुम्भ-निशुम्भ और उनके सहयोगियों का वर्णन है। सातवें अध्याय में काली के द्वारा चण्ड और मुण्ड के वध के बाद चामुण्डा नाम का प्रसंग आता है। आठवें अध्याय में रक्तबीज का ऐसा रूप वर्णित है जिसकी रक्त-बूँदों से नए शत्रु उत्पन्न होते हैं। देवी और उनकी शक्तियाँ मिलकर इस संकट का अंत करती हैं। इस दृश्य को कई पाठक उन बुरी प्रवृत्तियों का रूपक मानते हैं जो बिना रोक-टोक के फैलती जाती हैं। 3, 14

कथा का पाठ हिंसा का व्यवहारिक निर्देश नहीं है। इसी तरह इसे नवदुर्गा के सभी नामों की मूल सूची बताना भी ग्रंथों के भेद को मिटाना होगा।

3. नारायणी स्तुति: युद्ध के बाद करुणा का स्वर

देवीमाहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय की नारायणी स्तुति में देवता देवी की विश्वधारिणी शक्ति, रक्षा और शरण देने वाली महिमा की प्रशंसा करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि देवी की उपासना केवल रणभूमि के दृश्य पर आधारित नहीं है। परिवारों में शांति, कृतज्ञता, मंगल-कामना और सेवा को भी इसी भाव से जोड़ा जाता है। 4

कुछ लोग देवी को परम सत्ता के रूप में देखते हैं, तो कुछ मातृरूप में अपने जीवन की प्रेरणा मानते हैं। दोनों को समझते समय श्रद्धा और पाठ-आधारित जानकारी के बीच भेद बनाए रखना आवश्यक है।

4. श्रीराम की देवी-आराधना और अकाल-बोधन

कुछ बंगाली धार्मिक कथाओं में रावण से संघर्ष से पहले श्रीराम द्वारा देवी के आह्वान का प्रसंग आता है। इस संदर्भ में अकाल-बोधन, अर्थात सामान्य समय से अलग देवी का आवाहन, विशेष महत्व रखता है। यह एक क्षेत्रीय और बाद की भक्तिपरक परंपरा है। इसे रामायण के सभी रूपों में समान शब्दों में मिलने वाला प्रसंग अथवा शारदीय नवरात्रि की एकमात्र उत्पत्ति-कथा नहीं बताना चाहिए। इसमें रामभक्ति और देवीभक्ति के बीच एक सुंदर धार्मिक संवाद दिखाई देता है। 8, 6

नवरात्रि कब होती है? हिंदू पंचांग का नियम

सबसे प्रसिद्ध नवरात्रियाँ चंद्र पंचांग से जुड़ी हैं, इसलिए उनकी कोई स्थायी अंग्रेज़ी तारीख नहीं होती। साधारण परिचय में चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक और शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक कही जाती है। इसके बाद अनेक परंपराओं में दशमी या विजयादशमी मनाई जाती है। वास्तविक स्थानीय तारीख चुनने के लिए शहर, समय-क्षेत्र और मान्य पंचांग-पद्धति का ध्यान रखना पड़ता है। 8, 9

तिथि सूर्योदय से शुरू होकर अगले सूर्योदय तक चलने वाला सामान्य दिन नहीं है। यह सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित एक समय-अंतराल है, जो किसी भी घड़ी शुरू और समाप्त हो सकता है। कभी कोई तिथि लगातार दो सूर्योदयों पर हो सकती है, तो कभी दो सूर्योदयों के बीच समाप्त हो सकती है। इसी कारण नौ तिथियों का क्रम हमेशा ठीक नौ नागरिक तारीखों में समा जाए, यह आवश्यक नहीं। अलग पंचांग-पद्धति या उत्सव-कार्यक्रम के अनुसार दिन-गणना भी बदल सकती है।

बहुत-से स्थानों में पहले दिन घटस्थापना/कलशस्थापना होती है। उसकी उपयुक्त समयावधि निर्धारित करने में केवल “प्रतिपदा सूर्योदय पर है” इतना देखना पर्याप्त नहीं माना जाता; कुछ प्रचलित निर्णय-पद्धतियों में दिन का समय, तिथि की उपलब्धता और अन्य पंचांग-संबंधी शर्तों की चर्चा होती है। इनका अंतिम नियम विशेषज्ञ-जाँच के बाद ही वेबसाइट के कैलेंडर में लागू किया जाना चाहिए। 9, 12

जब किसी शहर और वर्ष का अनुमोदित उत्सव-रिकॉर्ड उपलब्ध न हो, तो वेबसाइट पर साफ़ लिखा जाना चाहिए: “इस शहर/वर्ष के लिए तिथि और समय अभी सत्यापित नहीं हैं।” किसी चित्र में बना चाँद अथवा खोज परिणाम में दिखाई दी तारीख धार्मिक निर्णय का प्रमाण नहीं है।

नौ दिनों में क्या होता है?

बहुत-से परिवारों में पूजा-स्थल की सफाई, दीप-प्रज्वलन, फूल अर्पित करना, आरती, स्तोत्र-पाठ या मंदिर-दर्शन किया जाता है। किसी जगह प्रथम दिन कलश स्थापित होता है; किसी जगह परिवार की परंपरा के अनुसार केवल सामान्य पूजा होती है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी का महत्व समुदाय के अनुसार बदलता है। कुछ उत्तर भारतीय घरों में कन्या-पूजन के माध्यम से बालिकाओं के भीतर देवीभाव का सम्मान किया जाता है। इसे सभी के लिए अनिवार्य, एकसमान धार्मिक विधि न समझें। 8, 9

उत्तर भारत में बहुत प्रचलित नवदुर्गा क्रम इस प्रकार समझाया जाता है:

परंपरागत दिन-संबंधदेवी का नामसहज भावार्थ
1शैलपुत्रीपर्वत जैसी स्थिरता
2ब्रह्मचारिणीतप, अनुशासन और संकल्प
3चन्द्रघण्टाजागरूकता और साहस
4कूष्माण्डासृजन की ऊर्जा
5स्कन्दमाताममता में निहित शक्ति
6कात्यायनीअन्याय के विरुद्ध दृढ़ता
7कालरात्रिभय का सामना
8महागौरीनिर्मलता और नई शुरुआत
9सिद्धिदात्रीसाधना की पूर्णता

यह लोकप्रिय शिक्षण-क्रम है, समस्त हिंदू समुदायों का अपरिवर्तनीय विधान नहीं। कुछ दक्षिण भारतीय परंपराओं और विभिन्न सम्प्रदायों में आराध्य देवियों के क्रम भिन्न मिलते हैं। ऊपर दिए गए भावार्थ सामान्य पाठक के लिए व्याख्याएँ हैं, किसी एक संस्कृत श्लोक के शाब्दिक अनुवाद नहीं। 8

दुर्गाष्टमी (दुर्गाष्टमी: उत्तर भारत में कन्या पूजन, महागौरी और नवरात्र की परंपरा) का संबंध इसी समय से है, फिर भी उसका अपना धार्मिक महत्व और तारीख-चयन होता है। बंगाल की कुछ परंपराओं में संधि-पूजा अष्टमी और नवमी के संधिकाल में की जाती है। महानवमी तथा विजयादशमी (दशहरा और विजयादशमी: महत्व, कथाएँ और विविध परंपराएँ) भी अलग अवसर हैं। केवल पूरे उत्सव को नौ दिनों का कह देने से इनके विशिष्ट विधान समाप्त नहीं हो जाते। 6, 8

गुजरात: गरबा, संगीत और केंद्र में दीपक

गुजरात के गरबा में नृत्य करने वाले समूह देवी के प्रतीक, दीपयुक्त मिट्टी के पात्र अथवा अम्बा की प्रतिमा के आसपास घूमते हैं। गीत, ताली और लय से भक्ति एक साझा उत्सव बन जाती है। डांडिया रास संबंधित नृत्य-परंपरा है, पर प्रत्येक गरबा का अनिवार्य अंग नहीं। गुजरात से बाहर और प्रवासी समुदायों में भी ऐसे आयोजन होते हैं। यूनेस्को की मान्यता गरबा की सांस्कृतिक जीवंतता को पहचानती है; इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सभी नवरात्रि भक्तों को गरबा करना चाहिए। 5

पश्चिम बंगाल: दुर्गापूजा का कला और समुदाय से संबंध

कोलकाता की दुर्गापूजा में शिल्पकार मिट्टी की प्रतिमाएँ बनाते हैं। पंडालों की सज्जा, ढाक की ध्वनि, सामूहिक पूजा और सार्वजनिक कला उत्सव के विशिष्ट अंग हैं। अंतिम चरण में प्रतिमा-विसर्जन तथा मायके आई देवी की विदाई जैसे सांस्कृतिक भाव जुड़े हैं। शारदीय नवरात्रि के साथ इसका समय मिलता है, फिर भी बंगाली दुर्गापूजा के आयोजन और विशेष पूजा-विधि को पूरे भारत की नौ दैनिक क्रियाओं के बराबर नहीं मानना चाहिए। 6

तमिलनाडु: गोलू, अतिथि-सत्कार और शिक्षा का सम्मान

तमिल घरों में गोलू/कोलू/बोम्मई गोलू के अंतर्गत सीढ़ियों पर देवी-देवताओं, मनुष्यों, पशुओं और कथाओं को दर्शाने वाली गुड़ियाँ सजती हैं। पड़ोसी और मित्र देखने आते हैं, गीत गाते हैं और अक्सर दालों या चनों से बना सुंडल प्रसाद मिलता है। कई घरों में पुस्तकों, संगीत-यंत्रों और ज्ञान की पूजा को विशेष स्थान मिलता है। मदुरै के मीनाक्षी मंदिर जैसे स्थलों पर भी नवरात्रि का अपना क्षेत्रीय रूप दिखाई देता है। सिंगापुर के राष्ट्रीय पुस्तकालय के सांस्कृतिक लेख में प्रवासी तमिल परिवारों के गोलू की परंपरा दर्ज है। सजावट की सीढ़ियों और सामग्री की संख्या हर घर में एक जैसी नहीं होती। 7, 10

कर्नाटक: मैसूर में चामुण्डेश्वरी और दशहरा

मैसूर का दशहरा नवरात्रि से जुड़ी एक विशिष्ट सार्वजनिक परंपरा है। देवी चामुण्डेश्वरी की आराधना, राजकीय विरासत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और समापन की शोभायात्रा इसके प्रमुख पक्ष हैं। इसकी ऐतिहासिक व्यवस्था और कार्यक्रम अलग से समझने योग्य हैं। किसी विशेष वर्ष की सरकारी कार्यक्रम-सूची उस वर्ष के आयोजन का प्रमाण हो सकती है, लेकिन उसे हमेशा के लिए लागू उत्सव-तिथि का गणितीय नियम नहीं बनाना चाहिए। 11

तेलंगाना: बथुकम्मा और मौसमी फूलों का उत्सव

तेलंगाना की बथुकम्मा परंपरा विशेष रूप से महिलाओं के सामुदायिक गीतों और फूलों से बने सुंदर क्रमबद्ध सजावटी रूपों के लिए पहचानी जाती है। यह शरद ऋतु के व्यापक देवी-उत्सव समय से संबंधित है। लेकिन इसकी शुरुआत को हमेशा नवरात्रि की शुक्ल प्रतिपदा ही मान लेना गलत होगा; राज्य की सांस्कृतिक जानकारी में इसे महालया अमावस्या के आसपास प्रारंभ होने वाले क्रम के रूप में बताया जाता है। इसलिए बथुकम्मा और नवरात्रि को सांस्कृतिक रूप से संबंधित, किंतु अलग उत्सव-परंपराएँ समझना चाहिए। 13

उत्तर भारत: घर की पूजा, भजन और कन्या-पूजन

उत्तर भारत के अनेक परिवारों में प्रतिदिन देवी की आराधना, भजन, दीप, धार्मिक पाठ, संयमित भोजन और कन्या-पूजन जैसी प्रथाएँ मिलती हैं। चैत्र नवरात्रि का संबंध कई स्थानों पर वसंत और रामनवमी से जुड़ता है। किसी घर में अष्टमी प्रधान होती है, दूसरे में नवमी; कई लोग प्रतिदिन मंदिर जाते हैं जबकि अन्य लोग घर पर सहज प्रार्थना करते हैं। एक ही राज्य के भीतर विविधता होने के कारण किसी एक अनुभव को सार्वभौमिक मान लेना ठीक नहीं। 8

व्रत, भोजन और प्रसाद

नवरात्रि का भोजन केवल निषेधों की सूची नहीं है। कुछ लोग अनाज या विशेष सामग्री छोड़ते हैं; कुछ फलाहार करते हैं; कुछ एक-दो दिनों का व्रत रखते हैं और अनेक लोग व्रत नहीं रखते। उत्तर भारत की कुछ परंपराओं में फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन प्रचलित हैं। ये उदाहरण हैं, सभी समुदायों के लिए बनाए गए एकमात्र नियम नहीं। दक्षिण के गोलू में अतिथियों को दिया जाने वाला सुंडल भोजन, अतिथि-सत्कार और भक्ति का सुंदर मेल है। 7, 8

उपवास श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा का विषय है; यह किसी व्यक्ति की आस्था को मापने का पैमाना नहीं। बच्चों या विशेष स्वास्थ्य-परिस्थिति वाले लोगों के लिए इस लेख को चिकित्सकीय सलाह या उपवास का दबाव नहीं समझना चाहिए। यहां किसी भोजन-पद्धति के चमत्कारी स्वास्थ्य-फल का दावा नहीं किया गया है।

कलश, दीप, सिंह और देवी की प्रतीक-भाषा

दीपक को प्रकाश और जागरूकता से, कलश को मंगल और स्वागत से, तथा फूलों को ऋतु और आदर से जोड़ा जा सकता है। देवी के साथ सिंह या बाघ उनकी रक्षक-शक्ति का संकेत देते हैं। महिषासुर की कथा में आयुध एक धार्मिक प्रतीकात्मक भाषा के अंग हैं; हर घर की पूजा में एक निश्चित संख्या में अस्त्र या वस्तुएँ होना आवश्यक नहीं। गरबा के केंद्र का दीप और गोलू की गुड़ियों का क्रम, शक्ति के प्रति भक्ति को दो अत्यंत भिन्न लेकिन अर्थपूर्ण रूप देते हैं। 1, 5, 7

कोई भक्त देवी की जीत में अन्याय का विरोध देखता है; कोई अपनी नकारात्मक आदतों से जूझने की प्रेरणा। शाक्त दर्शन में देवी सृष्टि की मूल चेतना या परम शक्ति हो सकती हैं। शैव विचार में शिव और शक्ति का संबंध विशेष महत्व रखता है। वहीं किसी बच्चे के लिए नवरात्रि माँ के साथ पूजा में बैठने, गीत सीखने और परिवार के अनुभव सुनने का अवसर है। इन व्याख्याओं को सम्मान से साथ रखा जा सकता है, बिना यह कहे कि नाथ, वैष्णव, शाक्त और सभी अन्य समुदायों में एक ही धार्मिक विधान है।

दुर्गासप्तशती, स्तोत्र और जिम्मेदार धार्मिक जानकारी

देवीमाहात्म्य/दुर्गासप्तशती नवरात्रि से संबंधित प्रमुख पठनीय ग्रंथों में है। उसकी कथाओं और स्तुतियों को केवल नौ नामों की सूची में बदलने के बजाय उनके प्रसंग में पढ़ना बेहतर है। देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक जैसे पाठ कुछ प्रचलित पारायण-क्रमों का अंग हैं। उनका पाठ-क्रम और संस्करण बदल सकता है। तेरह अध्याय, नवदुर्गा के नौ नाम और स्थानीय पूजा-पुस्तिकाएँ तीन अलग प्रकार की सामग्री हैं। 1, 4

दीप जलाना, सार्वजनिक आरती देखना, भजन सुनना, मंदिर जाना या पंडाल-दर्शन जैसे कार्यों की सामान्य जानकारी सार्वजनिक रूप से दी जा सकती है। लेकिन विशिष्ट चंडी होम, तांत्रिक साधना, दीक्षा-संबंधी मंत्र और मुहूर्त-निर्णय के लिए संबंधित परंपरा तथा विशेषज्ञ की समीक्षा आवश्यक है। यहाँ किसी गोपनीय विधि, सफलता की गारंटी या सबके लिए अनिवार्य अनुष्ठान का निर्देश नहीं है।

संबंधित पर्व और आगे का अध्ययन

संदर्भ और स्रोत (14)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) / Durgā Saptashatī, chapter 2 (slaying of Mahishasura’s armies)

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    रचनाकार
    Mārkaṇḍeya Purāṇa; Devi Red Zambala online Sanskrit and English presentation
  2. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) / Durgā Saptashatī, chapter 3 (slaying of Mahishasura)

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    Mārkaṇḍeya Purāṇa; Devi Red Zambala online Sanskrit and English presentation
  3. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) / Durgā Saptashatī, chapter 8 (Raktabija)

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    Mārkaṇḍeya Purāṇa; Devi Red Zambala online Sanskrit and English presentation
  4. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati), chapter 11 (Nārāyaṇī-stuti); Divine Life Society edition overview

    स्रोत खोलें 4

    रचनाकार
    Mārkaṇḍeya Purāṇa; Devi Red Zambala chapter 11; Divine Life Society edition edited/trans. Swami Sivananda
  5. Garba of Gujarat

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    रचनाकार
    UNESCO Intangible Cultural Heritage, Representative List No. 01962
  6. Durga Puja in Kolkata

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    रचनाकार
    UNESCO Intangible Cultural Heritage, Representative List No. 00703
  7. Navaratri Golu: The Hindu Festival of Dolls

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    रचनाकार
    National Library Board, Singapore / BiblioAsia (2019)
  8. Navratri | Navaratri: Overview

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    रचनाकार
    Drik Panchang educational overview
  9. Shardiya Navratri Ghatasthapana date-selection discussion

    स्रोत खोलें 9

    रचनाकार
    Drik Panchang
  10. Navarathiri Festival (Tamil Nadu)

    स्रोत खोलें 10

    रचनाकार
    Ministry of Tourism, Government of India; Utsav portal
  11. Mysuru Dasara: Official festival programme and overview

    स्रोत खोलें 11

    रचनाकार
    Mysuru Dasara organising website (mysoredasara.gov.in)
  12. Hindu Calendar & Panchang Overview
    रचनाकार
    ShivGoraksh
  13. Bathukamma: Telangana floral festival

    स्रोत खोलें 13

    रचनाकार
    Government of Telangana, Vikarabad District; corroborating Incredible India portal
  14. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati) / Durgā Saptashatī, chapter 7 (Chanda and Munda)

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    रचनाकार
    Mārkaṇḍeya Purāṇa; Devi Red Zambala online Sanskrit and English presentation
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

नीचे दिए गए SRC-### संकेतों का विस्तृत विवरण, उपलब्धता, प्रमाण-सीमाएँ और उपयोग-अधिकार संबंधी जानकारी स्रोत और संस्करण विवरण में है। आधुनिक अनुवादों या अनुष्ठान-पाठों की लंबी नकल यहाँ नहीं की गई है।

  • 1 देवीमाहात्म्य, अध्याय 2—महिषासुर की सेना का प्रसंग।
  • 2 देवीमाहात्म्य, अध्याय 3—महिषासुर-वध।
  • 3 देवीमाहात्म्य, अध्याय 8—रक्तबीज का प्रसंग; अध्याय 7 अलग से 14 के अंतर्गत जाँचा गया।
  • 4 देवीमाहात्म्य, अध्याय 11—नारायणी स्तुति; डिवाइन लाइफ़ सोसायटी का संस्करण-परिचय।
  • 5 यूनेस्को—Garba of Gujarat।
  • 6 यूनेस्को—Durga Puja in Kolkata।
  • 7 सिंगापुर राष्ट्रीय पुस्तकालय—Navaratri Golu: The Hindu Festival of Dolls।
  • 8 दृक पंचांग—नवरात्रि का परिचय।
  • 9 दृक पंचांग—शारदीय घटस्थापना के नियमों का तुलनात्मक विवरण; अपनाया हुआ वेबसाइट-नियम नहीं।
  • 10 भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय—तमिलनाडु का नवराथ्रि उत्सव।
  • 11 मैसूर दशहरा की आधिकारिक कार्यक्रम-सामग्री—केवल क्षेत्रीय आयोजन का प्रमाण।
  • 12 शिवगोरक्ष हिन्दू कैलेंडर और पंचांग: तिथि, पक्ष, नक्षत्र एवं पर्व-निर्णय की संपूर्ण समझ—पंचांग पर पूर्वनिर्मित संपादकीय सामग्री; स्वयं में कैलेंडर स्वीकृति नहीं।
  • 13 तेलंगाना की बथुकम्मा संबंधित सरकारी/पर्यटन जानकारी—क्षेत्रीय प्रमाण, विवरणों में अंतर संभव।
  • 14 देवीमाहात्म्य, अध्याय 7—चण्ड-मुण्ड का प्रसंग और चामुण्डा नाम।
इस लेख के बारे में

शैक्षिक पठन के लिए संस्थापक द्वारा समीक्षित संस्करण। स्वतंत्र विद्वत्-सत्यापन का दावा नहीं है। स्रोत-विशेष के पाठभेद और उपयोग की शर्तें ऊपर दिए गए संदर्भों में पढ़ें।

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