कहीं कुम्हार के हाथों मिट्टी से गणपति की छोटी-सी प्रतिमा बन रही है। किसी घर में पूजा की जगह सजाई जा रही है। पास की बस्ती में लोग मिलकर उत्सव-मंडप तैयार कर रहे हैं। गणेश चतुर्थी आने पर इन अलग-अलग तैयारियों में एक भाव जुड़ जाता है—श्रीगणेश का स्वागत। कोई परिवार सादगी से पूजन करता है, तो कहीं कई दिनों तक भजन, आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक प्रसाद का आयोजन होता है। त्योहार का यही वैविध्य उसकी जीवंतता है; हर घर में एक ही विधि होना आवश्यक नहीं। 4, 5
गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी, गणेशोत्सव, विनायक चविती/चविथी, विनायगर चतुर्थी तथा कुछ क्षेत्रों में चवथ भी कहा जाता है। यह भगवान गणेश के सम्मान में मनाया जाने वाला वार्षिक हिंदू पर्व है। श्रद्धालु उन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि-विवेक के अधिष्ठाता और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजते हैं। उनकी दिव्य उत्पत्ति के प्रसंग आस्था और पुराणकथा का विषय हैं; उन्हें स्वतः ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना या किसी निश्चित प्राचीन वर्ष की तिथि नहीं मानना चाहिए। 1, 3, 4
एक नज़र में
| प्रश्न | सामान्य जानकारी |
|---|---|
| किसकी आराधना? | भगवान गणेश—जिन्हें बुद्धि, मंगल और विघ्नों से उबरने की प्रेरणा से जोड़ा जाता है। |
| हिंदू पंचांग में कब? | सामान्यतः भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी; किसी नगर और वर्ष की नागरिक तारीख़ निर्धारित करने के लिए सत्यापित पंचांग नियम आवश्यक हैं। |
| क्या उत्सव हमेशा दस दिन का होता है? | नहीं। बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव प्रायः अनंत चतुर्दशी के आसपास समाप्त होते हैं, किंतु घरों में डेढ़ दिन सहित अलग-अलग अवधियाँ प्रचलित हैं। |
| प्रमुख रूप | गणपति का स्वागत, आरती, पूजा, नैवेद्य, परिजनों व समुदाय का मिलन और परंपरा के अनुसार विदाई या विसर्जन। |
| ध्यान देने योग्य अंतर | वार्षिक गणेश चतुर्थी को प्रत्येक मास की विनायक चतुर्थी या संकष्टी चतुर्थी के समान न मानें। |
एक पुराणकथा हमें धार्मिक अर्थ बताती है, इतिहास सार्वजनिक पर्व के विस्तार को समझाता है और पंचांग स्थानीय पर्व-दिन के चयन में सहायता करता है। इन तीनों तरह के प्रमाणों की भूमिकाएँ अलग हैं। 1, 5, 6, 11
गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?
गणेशजी की वंदना अनेक हिंदू परिवारों में पढ़ाई, यात्रा, विवाह, धार्मिक कार्य या किसी नए प्रयास से पहले की जाती है। श्रद्धालु उनसे प्रार्थना करते हैं कि निर्णय लेते समय विवेक बना रहे और कठिनाइयों का सामना धैर्य से कर सकें। यह भक्ति का भाव और नैतिक प्रेरणा है, किसी कार्य में सफलता मिलने की वैज्ञानिक गारंटी नहीं। शिवपुराण में गणेश को गणों के अधिपति और अग्रपूज्य होने का जो स्थान दिया गया है, वह उनकी विशेष प्रतिष्ठा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथीय संदर्भ है। 3
यह पर्व एक साथ रहने और कुछ मिलकर बनाने का अवसर भी है। शिल्पकार प्रतिमाएँ बनाते हैं, परिवार पूजा और भोजन की तैयारी करते हैं, बच्चे गीत सीखते हैं, पड़ोसी उत्सव का संचालन करते हैं। कहीं संगीत और नाटक होते हैं, तो कहीं सेवा एवं सामुदायिक गतिविधियाँ। विशेषकर महाराष्ट्र में इसका सार्वजनिक रूप बहुत दिखाई देता है, लेकिन इस पर्व को केवल एक प्रदेश तक सीमित करना उचित नहीं। 4, 5
शिव–शक्ति परंपरा से जुड़कर देखने पर गणेश चतुर्थी में माता पार्वती की सृजनशक्ति, पुत्र का कर्तव्य, संघर्ष और पुनर्मिलन के प्रश्न भी सामने आते हैं। इससे शिवगोरक्ष के व्यापक अध्ययन-संदर्भ में त्योहार को समझा जा सकता है; इसका अर्थ यह नहीं कि गणेशोत्सव मूलतः या सर्वत्र कोई विशिष्ट नाथ-संप्रदाय का पर्व है। 1, 2
गणेशजी की उत्पत्ति की कथा: पुराण क्या कहता है?
शिवपुराण के रुद्रसंहिता, कुमारखंड, अध्याय 13 से 18 में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। देवी पार्वती अपने लिए एक बालक का सृजन करती हैं और उसे द्वार की रक्षा का कार्य देती हैं। बालक माता की आज्ञा का पालन करते हुए शिवजी को भीतर जाने से रोक देता है, क्योंकि वह उन्हें पहचानता नहीं। संघर्ष बढ़ने पर उसका सिर काट दिया जाता है। पार्वती दुख और रोष के साथ पुत्र को पुनर्जीवित करने तथा उचित सम्मान देने की माँग करती हैं। बाद की कथा में हाथी का सिर लगाकर बालक को जीवन दिया जाता है और देवताओं के बीच उसका विशेष स्थान स्वीकार होता है। यह ग्रंथ में वर्णित धार्मिक आख्यान है, किसी आधुनिक ऐतिहासिक घटना का अभिलेख नहीं। 1, 2, 3
यहाँ एक बात अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिवपुराण स्वयं गणेशजी की उत्पत्ति के एक से अधिक वर्णनों का उल्लेख करता है, जिन्हें अलग-अलग कल्पों के संदर्भ में रखा गया है। इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि हिंदू परंपराओं में बस एक ही, हर जगह समान कथा उपलब्ध है। कुमारखंड के अध्याय 18 में एक विशेष व्रत-प्रसंग और भाद्र मास के कृष्ण पक्ष का भी उल्लेख है। उस प्रसंग को बिना समीक्षा के आज के वार्षिक भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी नियम का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। 1, 3
इस कथा से अनेक अर्थ निकाले जाते हैं। पार्वती का अपने पुत्र के लिए अडिग खड़ा होना मातृशक्ति की भूमिका दिखाता है। बालक की निष्ठा कर्तव्य का पक्ष सामने रखती है, लेकिन द्वार पर हुआ विवाद यह प्रश्न भी उठाता है कि अधूरी जानकारी में संघर्ष कैसे पैदा हो सकता है। अंत में जीवन की पुनर्स्थापना और सम्मान रिश्तों में सुधार का प्रतीक बन सकते हैं। ये विवेचनात्मक अर्थ हैं; इन्हें किसी एक अनिवार्य मत के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 1, 2, 3
गणपति, विनायक और विघ्नहर्ता का अर्थ
सामान्य धार्मिक व्याख्या में गणपति अथवा गणेश गणों के स्वामी या अधिपति हैं। विनायक उनका एक अन्य प्रसिद्ध नाम है। हाथी का सिर बुद्धि और सूझबूझ, बड़े कान ध्यानपूर्वक सुनने और साथ दिखाया जाने वाला मूषक चंचल प्रवृत्तियों को साधने की प्रेरणा के रूप में समझाया जाता है। अलग-अलग गुरु, परिवार और समुदाय इन प्रतीकों पर अलग अर्थ भी बताते हैं। यह मानना सही नहीं होगा कि हर चित्र का केवल एक ही सर्वमान्य गूढ़ अर्थ है। 3, 4
प्रतिमाओं में गणेशजी एकदंत, बड़े उदर, विविध आयुध और मिठाइयों के साथ दिखाई दे सकते हैं। कला से धार्मिक भाव समझने में सहायता मिलती है, पर किसी चित्र से अपने-आप त्योहार की तारीख़, पुराण के पाठांतर या पूजा-विधि की शुद्धता सिद्ध नहीं होती। 1, 4
गणेश चतुर्थी कब आती है?
वार्षिक गणेश चतुर्थी का सामान्य आधार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है। तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच कोणीय स्थिति पर आधारित पंचांगीय इकाई है। इसका आरंभ और अंत हमारी आधी रात से शुरू होने वाली नागरिक तारीख़ से अलग समय पर हो सकता है। इसलिए इस लेख में किसी एक वर्ष की सभी नगरों पर लागू तारीख़ बताना उचित नहीं होगा। 4, 11
कई पंचांग परंपराओं में मध्याह्न काल को गणेश पूजा के लिए विशेष महत्त्व दिया जाता है। किंतु जिस वर्ष चतुर्थी दो नागरिक दिनों को छूती हो, या मध्याह्न के आरंभ अथवा अंत के आसपास बदले, उस वर्ष कौन-सा दिन चुनना है—यह स्वीकृत एवं विशेषज्ञ-समीक्षित निर्णय-नियम से ही तय होगा। स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त, तिथि की सही अवधि, नगर की स्थिति, समय-क्षेत्र तथा चयन की शर्तें महत्त्वपूर्ण हैं। केवल “सूर्योदय पर कौन-सी तिथि थी?” पूछ लेना हर कठिन मामले में पर्याप्त नहीं। 11
उत्तर और दक्षिण भारत में प्रचलित पूर्णिमांत और अमांत मास-गणना को भी बिना जाँच एक जैसा नहीं मानना चाहिए। मास का स्थानीय नाम, अधिक मास जैसी जटिल परिस्थितियाँ और संबंधित गणना-पद्धति कैलेंडर विशेषज्ञ द्वारा अलग से सत्यापित होनी चाहिए। जब शिवगोरक्ष का शहर-विशेष कैलेंडर अनुमोदित परिणाम उपलब्ध कराएगा, तभी निश्चित दिन और पूजा-अवधि दिखाई जानी चाहिए। तब तक सही सूचना है: “इस शहर/वर्ष के लिए पर्व की तारीख़ और समय अभी सत्यापित नहीं हैं।” 11
मासिक विनायक चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी को भी समझना उपयोगी है। सामान्यतः पहले नाम का संबंध शुक्ल पक्ष की चतुर्थी और दूसरे का कृष्ण पक्ष की चतुर्थी से जोड़ा जाता है। ये बार-बार आने वाले व्रत या उपासनाएँ हैं; इन्हें प्रत्येक महीने होने वाला वही वार्षिक गणेशोत्सव नहीं समझना चाहिए। इनके चंद्रदर्शन और व्रत-समापन के अलग नियम हो सकते हैं। 11
गणेशोत्सव कैसे मनाया जाता है?
गणेशोत्सव के विविध रूपों को भगवान के स्वागत से सम्मानपूर्वक विदाई तक की यात्रा के रूप में समझना सुविधाजनक है। यह किसी एक परिवार के लिए अनिवार्य, सब पर लागू होने वाली पूजा-पुस्तिका नहीं है। 4, 8
1. घर और मंडप की तैयारी
परिवार पूजा का स्वच्छ स्थान तैयार करते हैं। कोई मिट्टी की नई प्रतिमा लाता है; कोई अपने पुराने आराध्य-स्वरूप, चित्र या मंदिर में पूजा करता है। फूल, दीप, पत्र, सरल सजावट और आसन जैसे तत्व घर की परंपरा के अनुसार चुने जाते हैं। सामूहिक मंडलों में आयोजन की जिम्मेदारियाँ बाँटी जाती हैं। प्रतिमा का बहुत बड़ा होना या महँगी सजावट करना धार्मिक अनिवार्यता नहीं। 4, 8
2. गणपति का स्वागत और पूजन
अस्थायी प्रतिमा स्थापित करने वाले घरों में आमंत्रण, पूजन, आरती, स्तुति और नैवेद्य का क्रम देखने को मिलता है। दूर्वा, फूल, फल और मिठाई चढ़ाने की परंपरा प्रसिद्ध है। कहीं षोडशोपचार का विस्तृत क्रम होता है, तो कहीं सरल पारिवारिक आरती। मंत्र, क्रम, संख्या और विशेष व्रत-विधि परंपरानुसार बदल सकते हैं। यहाँ उनका वर्णन किया जा रहा है; किसी दीक्षा-आधारित या पारिवारिक विधि का विकल्प नहीं दिया जा रहा। 3, 4
3. उत्सव के दिन
जब तक गणपति की उत्सवी प्रतिमा घर या मंडप में रहती है, कई परिवार नियमित पूजा-आरती और प्रसाद रखते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर संगीत, नाटक, शिल्प, व्याख्यान और सेवा-कार्य हो सकते हैं। बच्चे और बुजुर्ग मिलकर उत्सव की तैयारी तथा देखभाल करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में दिन-गणना अलग है; किसी एक नगर की अवधि को सर्वभारतीय नियम नहीं मानना चाहिए। 4, 5
4. उत्तरपूजा और गणेश विसर्जन
उत्सव के अंत में अनेक परिवार उत्तरपूजा द्वारा गणपति को विदाई देते हैं। जहाँ प्रथा है वहाँ अस्थायी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। सार्वजनिक उत्सवों का एक प्रमुख समापन अनंत चतुर्दशी से जुड़ा है, किंतु घरों में विसर्जन इससे पहले भी हो सकता है। विदाई को मिट्टी के अस्थायी रूप का प्रकृति में लौटना और भक्ति के भाव का बने रहना समझा जाता है। गोवा पर्यटन का विवरण भी घरेलू विदाई-पूजा और विसर्जन का उल्लेख करता है। 4, 8
विसर्जन का अर्थ जलस्रोत को दूषित करना नहीं है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की दिशानिर्देश सामग्री प्राकृतिक मिट्टी, कम हानिकारक रंगों, सजावट के अपशिष्ट के पृथक्करण और नियोजित विसर्जन व्यवस्थाओं पर बल देती है। परिवार और मंडल स्थानीय प्रशासन की वर्तमान व्यवस्था एवं पर्यावरण-सुरक्षा नियमों का पालन करें। जहाँ अनुमति और सुविधा हो वहाँ कृत्रिम टैंक या सुरक्षित घरेलू विसर्जन व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। यह पर्यावरण-संबंधी सलाह है, किसी नई धार्मिक बाध्यता का दावा नहीं। 12
महाराष्ट्र: घर के बप्पा और सार्वजनिक गणेशोत्सव
महाराष्ट्र में घर पर गणपति की स्थापना के साथ-साथ सार्वजनिक गणेश मंडल विशेष पहचान रखते हैं। पुणे तथा मुंबई जैसे नगरों में आरती, भजन, सजे मंडप, कला-प्रदर्शन और विसर्जन-यात्राएँ प्रसिद्ध हैं। कई जगह पड़ोस के लोग मिलकर आयोजन का खर्च और काम सँभालते हैं। प्रसाद में उकडीचे मोदक—चावल के आटे में नारियल और गुड़ की भरावन वाले भाप में पके मोदक—विशेष पहचान रखते हैं, हालांकि सभी घरों का भोजन एक समान नहीं होता। 4
सार्वजनिक पर्व का इतिहास बताते समय सावधानी जरूरी है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से पहले भी गणेश-आराधना और सामूहिक कार्यक्रम होते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के 1890 के दशक में तिलक ने बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव का प्रचार-प्रसार किया और उसे औपनिवेशिक भारत के नागरिक तथा राष्ट्रवादी जीवन से जोड़ा। शोधकर्ता रामिंदर कौर के अध्ययन का निष्कर्ष है कि उन्हें सार्वजनिक पर्व का अकेला आविष्कारक कह देना इतिहास का अतिसरलीकरण होगा; दूसरे स्थानीय आयोजकों की भूमिका भी रही। इस इतिहास को गणेशजी की पुराणकथा से अलग रखना चाहिए। 5, 6
गोवा: चवथ, मातोळी और परिवार का मिलन
गोवा में उत्सव चवथ/चवोथ (Chovoth) नाम से जाना जाता है। कई परिवार पुश्तैनी घर में साथ आने की कोशिश करते हैं। पूजा-स्थल पर मातोळी या मातोव की सजावट में मौसमी फल, पत्ते, सब्जियाँ और अन्य प्राकृतिक उपज रखी जाती हैं। मोदक के साथ नेवरी जैसी स्थानीय मिठाइयाँ भी बनती हैं। यह त्योहार गोवा के पारिवारिक संबंधों, खेती-बाड़ी और भोजन-संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है; इसे केवल मुंबई के विशाल सार्वजनिक मंडलों का छोटा रूप समझना ठीक नहीं। 8, 13
कर्नाटक: गौरी–गणेश हब्बा
कर्नाटक में गौरी हब्बा माता गौरी, अर्थात पार्वती, की उपासना का पर्व है और प्रायः गणेश चतुर्थी से पहले मनाया जाता है। इसलिए संयुक्त संदर्भ में गौरी गणेश हब्बा नाम भी मिलता है। कर्नाटक पर्यटन के विवरण में घरों की गौरी-पूजा और बागिना नाम से परंपरागत वस्तुओं के आदान-प्रदान का उल्लेख है। इस परंपरा से त्योहार में माता पार्वती का विशेष स्थान समझ आता है, पर हर परिवार की प्रक्रिया बिल्कुल एक-सी मान लेना उचित नहीं। 7
आंध्र प्रदेश: विनायक चविती
तेलुगु क्षेत्रों में विनायक चविती नाम जाना-पहचाना है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् की प्रकाशित सूचनाओं में तिरुपति के श्री कपिलेश्वर स्वामी मंदिर में गणेशजी के अभिषेक, अर्चन और मूषक वाहन से शोभायात्रा जैसे आयोजन दर्ज हैं। यह संबंधित मंदिर में होने वाली पूजा का प्रमाण है; इससे किसी दूसरे मंदिर या आने वाले वर्ष का निश्चित कार्यक्रम नहीं निकाला जा सकता। 9
तेलंगाना: हैदराबाद का सार्वजनिक आयोजन
हैदराबाद के सार्वजनिक गणेशोत्सव में अनेक मंडल भाग लेते हैं। खैरताबाद गणपति एक ज्ञात आयोजन है। तेलंगाना सरकार के सार्वजनिक विवरण में वहाँ पूजा तथा विसर्जन के लिए नगर-प्रशासन की तैयारियों का उल्लेख है। इससे आयोजन के अस्तित्व और स्वरूप का आधार मिलता है, लेकिन किसी विशेष वर्ष की भीड़, कार्यक्रम या विसर्जन-व्यवस्था को सदा के लिए तय तथ्य मानना सही नहीं। 10
अन्य भारतीय क्षेत्रों और विदेश में बसे हिंदू समुदायों में भी अपने-अपने ढंग से गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। जिन प्रथाओं का किसी विश्वसनीय स्रोत से अलग सत्यापन नहीं हुआ है, उनके बारे में अनावश्यक स्थान-विशेष दावे करने से बचना चाहिए। 4
मोदक, नैवेद्य और प्रसाद
गणेशोत्सव के साथ मोदक का विशेष संबंध है। महाराष्ट्र में भाप में पके, नारियल-गुड़ के मोदक लोकप्रिय हैं। फल, नारियल और दूसरी मिठाइयाँ भी चढ़ाई जा सकती हैं। गोवा में मोदक के साथ नेवरी की परंपरा भी मिलती है। प्रसाद के माध्यम से परिजनों और पड़ोसियों के बीच स्नेह बाँटा जाता है; किसी एक व्यंजन को हर भक्त के लिए आवश्यक नहीं बताया जा सकता। 4, 8
कुछ श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखते हैं, कुछ हल्का भोजन करते हैं और कुछ सामान्य उत्सवी भोजन के साथ पूजा में भाग लेते हैं। व्रत की विधि, समय और समापन विभिन्न घरों व धार्मिक परंपराओं में बदल सकते हैं। स्वास्थ्य या आहार-संबंधी आवश्यकता वाले व्यक्ति भी प्रार्थना, सेवा और सहभागिता द्वारा पर्व मना सकते हैं; कठिन उपवास को अनिवार्य समझना आवश्यक नहीं। विशेष व्रत-विधान को योग्य परंपरागत मार्गदर्शन के बिना यहाँ निर्धारित नहीं किया गया है। 11
चंद्रदर्शन से जुड़ी मान्यता क्या है?
कुछ परंपराओं में गणेश चतुर्थी के एक निर्धारित समय में चंद्रमा के दर्शन से बचने की मान्यता है। पंचांग की एक व्याख्या इसे भगवान कृष्ण, स्यमंतक मणि और झूठे आरोप से जुड़ी कथा के माध्यम से समझाती है। चंद्रमा देखने से अनिष्ट होगा—यह धार्मिक विश्वास है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित प्रभाव नहीं। सभी परिवार यह मान्यता नहीं निभाते। यदि भविष्य में शिवगोरक्ष पर कोई चंद्रदर्शन-संबंधी समय दिखाया जाए, तो उसे बिना जाँचे या पूरे भारत के लिए एक जैसा प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए। 11
इस कथा को पढ़ते समय इतना ध्यान रखना उपयोगी है कि एक क्षेत्र का अनुष्ठान पूरे त्योहार की परिभाषा नहीं है। गणपति के स्वागत, प्रार्थना और लोक-सहभागिता का महत्त्व उससे कहीं व्यापक है। 11
गणेश चतुर्थी हमें क्या सिखा सकती है?
गणपति का स्वागत जीवन में नई शुरुआत के प्रति सजग होने का अवसर बन सकता है। विवेक केवल जानकार होना नहीं, दूसरों को ध्यान से सुनना भी है। समुदाय केवल बड़ी भीड़ नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी और पड़ोसियों का सम्मान भी है। विसर्जन से यह विचार जुड़ सकता है कि बाहरी रूप बदलता है, लेकिन श्रद्धा और अच्छे संबंध बने रह सकते हैं।
शिव–शक्ति के संदर्भ में पार्वती और शिव की कथा से मातृशक्ति, मर्यादा, निष्ठा और पुनर्मिलन पर विचार किया जा सकता है। वहीं अनेक गणेश-भक्तों के लिए गणपति स्वयं आराध्य देव हैं और वही इस उत्सव का केंद्र हैं। शैव, शाक्त, स्मार्त, गणपत्य और क्षेत्रीय दृष्टियों को बिना अनावश्यक श्रेष्ठता-क्रम बनाए सम्मान देना ही उचित है। 1, 3
कुछ सामान्य भ्रम
क्या गणेश चतुर्थी हर जगह दस दिन चलती है? नहीं, घरेलू और सार्वजनिक अवधियाँ बदलती हैं। क्या तिलक ने गणेश पूजा शुरू की थी? नहीं, उनका योगदान बड़े आधुनिक सार्वजनिक रूप को लोकप्रिय बनाने में था; उसके पहले की परंपराएँ और दूसरे आयोजक भी महत्त्वपूर्ण हैं। क्या शिवपुराण से बिना किसी अन्य जाँच के आज का चतुर्थी-चयन नियम तय हो जाता है? नहीं, ग्रंथ के विभिन्न आख्यान और व्रत-विवरण अपने संदर्भ में पढ़ने होंगे। क्या हर परिवार नई प्रतिमा का विसर्जन करता है? नहीं, कुछ परिवार स्थायी विग्रह, चित्र या मंदिर में पूजा करते हैं। 3, 4, 6, 11




