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दीपावली: दीपों के उत्सव की अनेक कथाएँ और परंपराएँ

अगली गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

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इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

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संदर्भ और स्रोत
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साँझ उतरते ही घर की देहरी पर रखा एक छोटा-सा दीप पूरे वातावरण को बदल देता है। कई दीप मिलकर स्वागत का संदेश देते हैं—घर लौटने वाले परिजनों का, मिलने आए पड़ोसियों का और अनेक हिन्दू परिवारों की आस्था में देवी लक्ष्मी का। लेकिन दीपावली केवल एक पूजा, एक कहानी या एक निश्चित रीति का नाम नहीं है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से लेकर नेपाल और प्रवासी समुदायों तक इसके अर्थ बदलते और विस्तृत होते हैं। इसी विविधता को समझना इस पर्व का वास्तविक परिचय है। 1, 2

एक नज़र में: दीवाली या दीपावली एक वार्षिक, अनेक दिनों से जुड़ा उत्सव-समूह है। उत्तर भारत की कई पंचांग परंपराओं में इसका मुख्य लक्ष्मी-पूजन कार्तिक अमावस्या की संध्या से जुड़ा है। अमान्त मास-गणना में इसी चंद्र-अवधि का नाम आश्विन भी हो सकता है। राम की अयोध्या-वापसी, लक्ष्मी-आराधना, कृष्ण की कथाएँ, काली पूजा, क्षेत्रीय नववर्ष और भाई-बहन के उत्सव—इन सबका अपना स्थान है। किसी खास वर्ष या नगर की सही अंग्रेज़ी तारीख और पूजन-समय इस लेख से नहीं, अलग से सत्यापित पंचांग-रिकॉर्ड से मिलने चाहिए। 1, 3, 12

दीपावली शब्द का अर्थ और अन्य नाम

संस्कृत के दीप और आवली अर्थात पंक्ति या श्रृंखला से दीपावली का अर्थ निकलता है—दीपों की पंक्ति। दीवाली, दीपावली और दीपावली के अलग-अलग उच्चारण एवं रोमन वर्तनियाँ प्रचलित हैं। दीप घर को प्रकाशित करता है, और भक्तिपरक अर्थ में ज्ञान, आशा, सत्कार तथा अंधकार से बाहर निकलने की इच्छा का प्रतीक भी बनता है। परंतु इस सामान्य प्रतीक का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक ही देवी-देवता या एक ही विधि की पूजा करते हैं। 1, 2

एक ही उत्सव-काल में कई धार्मिक अवसर आते हैं। बंगाल के अनेक परिवारों में काली पूजा विशेष महत्त्व रखती है; सिख परंपरा में बंदी छोड़ दिवस गुरु हरगोबिंद साहिब से संबंधित अलग ऐतिहासिक स्मरण है; जैन समुदाय के लिए महावीर निर्वाण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नेपाल का तिहार भी अपनी विशिष्ट परंपराओं वाला पर्व है। इन्हें केवल ‘दीवाली के दूसरे नाम’ बताना इनकी पहचान को छोटा कर देगा। 4, 5, 6, 7

दीपावली की उत्पत्ति: एक कथा से अधिक व्यापक इतिहास

आज की दीपावली जैसी अनेक परंपराओं वाले पर्व की शुरुआत किस एक घटना या किस एक वर्ष में हुई—इसका सर्वमान्य ऐतिहासिक उत्तर उपलब्ध नहीं है। समय के साथ पुराण-कथाएँ, राम-भक्ति, देवी-आराधना, कृषि और व्यापार से जुड़े नए आरंभ, घर-परिवार की प्रथाएँ तथा सार्वजनिक उत्सव एक बड़े पर्व-समूह में जुड़ते गए। कोई धर्मग्रंथ किसी कथा को समझा सकता है, किंतु उसी से आधुनिक उत्सव की सारी रस्मों का इतिहास और उनका आरंभिक समय प्रमाणित नहीं हो जाता। 1, 3

दीपावली आज एक जीवित सांस्कृतिक परंपरा भी है। यूनेस्को ने 2025 में ‘दीपावली’ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित किया। यह निर्णय परिवारों और समुदायों द्वारा पीढ़ियों से सहेजे गए ज्ञान, कला और उत्सव को मान्यता देता है; इससे किसी एक धार्मिक कथा की ऐतिहासिक सत्यता या किसी नगर की पंचांग-तिथि स्वतः सिद्ध नहीं होती। 1

श्रीराम का अयोध्या लौटना

उत्तर भारत के बहुत-से घरों में दीपोत्सव को राम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या-वापसी से जोड़ा जाता है। वनवास और रावण-विजय के बाद घर लौटने की रामायण-परंपरा न्याय, कर्तव्य और प्रियजनों से पुनर्मिलन की स्मृति जगाती है। महत्वपूर्ण अंतर यह है कि रामायण में वापसी की कथा का होना और आज की सभी दीपावली-विधियों का उसी प्राचीन पाठ में निर्धारित होना एक बात नहीं है। दीपों से सजी अयोध्या का उत्सवी संबंध लोकप्रिय एवं बाद की धार्मिक परंपराओं से विकसित हुआ है। वर्तमान अयोध्या दीपोत्सव भी इसी स्मृति को सार्वजनिक रूप देता है; वह अपने आप में प्राचीन काल की ठीक वैसी ही व्यवस्था का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। 3, 11

समुद्र-मंथन और देवी लक्ष्मी

एक प्रसिद्ध पुराण-कथा में देवताओं और असुरों के समुद्र-मंथन से श्रीलक्ष्मी का प्राकट्य होता है। विष्णु पुराण, प्रथम अंश, अध्याय 9 में मंथन, लक्ष्मी और शुभता की वापसी का विस्तृत प्रसंग मिलता है। इससे कथा का पाठीय आधार स्थापित होता है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वह घटना दीपावली के दिन ही हुई थी। लक्ष्मी की दीपावली-पूजा एक अलग, जीवित धार्मिक परंपरा है। कई परिवार समृद्धि को केवल धन नहीं, बल्कि सौहार्द, स्वच्छता, परिश्रम, आतिथ्य और दूसरों के कल्याण से भी जोड़कर देखते हैं। 10, 2

श्रीकृष्ण, सत्यभामा और नरकासुर

दक्षिण भारत और गोवा की अनेक परंपराओं में नरक चतुर्दशी का संबंध कृष्ण और सत्यभामा से जुड़ी नरकासुर-विजय कथा से है। भागवत पुराण 10.59 में श्रीकृष्ण, सत्यभामा के साथ जाते हैं और भौमासुर या नरक का वध करते हैं। अन्य कथाओं में सत्यभामा की भूमिका अलग ढंग से बताई जाती है; इसलिए हर पाठ को ‘सत्यभामा ने अकेले नरकासुर को मारा’ कहकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। प्रातः तेल-स्नान, नए वस्त्र और गोवा में नरकासुर के पुतलों की परंपरा इस प्रसंग के क्षेत्रीय रूप हैं। नरक चतुर्दशी और अमावस्या-संध्या की लक्ष्मी पूजा जुड़े हुए किंतु अलग अवसर हैं। 8, 9

गोवर्धन: संरक्षण और विनम्रता

भागवत पुराण 10.25 में श्रीकृष्ण के गोवर्धन उठाकर व्रज के लोगों और पशुओं को भीषण वर्षा से बचाने की कथा आती है। इससे दीवाली-काल के गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की धार्मिक पृष्ठभूमि समझने में सहायता मिलती है। कहीं विशेष भोग लगाया जाता है, कहीं गायों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है। कथा से यह विचार निकलता है कि अहंकार से अधिक महत्त्वपूर्ण समुदाय की रक्षा है। लेकिन यह अध्याय अकेले किसी वर्ष की गोवर्धन पूजा की तिथि चुनने का संपूर्ण नियम नहीं है। 13

राजा बलि और नए आरंभ की स्मृतियाँ

कुछ समुदायों में राजा बलि से संबंधित बलि प्रतिपदा का विशेष स्थान है। पश्चिम भारत में व्यापारिक वर्ष के समापन या शुभारंभ और पारिवारिक मेल-मिलाप का भी महत्त्व हो सकता है। अलग-अलग घटनाओं को जबरन एक ही राम-कथा में पिरो देने से पर्व का वास्तविक बहुरंगी स्वरूप खो जाता है। 1, 3

दीपावली कब आती है? पंचांग की मूल बात

उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-पद्धति में मुख्य लक्ष्मी पूजा प्रायः कार्तिक अमावस्या से जुड़ी मानी जाती है; अनेक अमान्त पंचांगों में वही चंद्र-अवधि आश्विन अमावस्या कहलाती है। ये नाम-भेद अपने-आप दो अलग रातों का प्रमाण नहीं हैं। तिथि सूर्य और चंद्रमा की आपसी कोणीय स्थिति से जुड़ी खगोलीय अवधि है; उसका प्रारंभ या अंत अंग्रेज़ी कैलेंडर की आधी रात से बँधा नहीं होता। 12

लक्ष्मी पूजा के लिए कई प्रचलित परंपराएँ अमावस्या का प्रदोषकाल, अर्थात स्थानीय सूर्यास्त के आसपास की संध्या-अवधि, महत्त्वपूर्ण मानती हैं। इसलिए केवल यह देखना कि सूर्योदय के समय कौन-सी तिथि थी, पर्याप्त नहीं है। कभी दो संध्याओं में अमावस्या का अंश आ सकता है; कभी स्थिति उलझी हो सकती है। ऐसे अवसरों पर विभिन्न पंचांग-ग्रंथों के निर्णय, परंपरा और क्षेत्रीय नियमों की विशेषज्ञ समीक्षा चाहिए। दूसरी ओर नरक चतुर्दशी के प्रातः-स्नान, गोवर्धन पूजा, धनतेरस और भाई दूज के अपने स्वतंत्र चयन-नियम हैं। 12

दीपावली सामान्यतः अक्टूबर–नवंबर के आसपास आती है, पर उसका कोई स्थायी ग्रेगोरियन दिनांक नहीं। भविष्य में शिवगोरक्ष के कैलेंडर पर समर्थित नगर और वर्ष के लिए सत्यापित तिथि, अपनाई गई गणना-पद्धति तथा निर्णय का कारण प्रदर्शित होना चाहिए।

धनतेरस से भाई दूज तक: पाँच दिनों को कैसे समझें?

दीवाली को ‘पाँच दिन का त्योहार’ कहना सुविधाजनक है; इसे हर राज्य का अनिवार्य और समान क्रम नहीं मानना चाहिए। कुछ अवसरों का विशेष धार्मिक महत्त्व होता है और उनकी गणना के नियम भी अलग हैं।

अवसरसामान्य रूप से जुड़ी बातेंआवश्यक अंतर
धनतेरस / धनत्रयोदशीआरोग्य, धन्वंतरि, तैयारी, व्यापार और दीपदानत्रयोदशी से जुड़ा स्वतंत्र अवसर
नरक चतुर्दशी / छोटी दीवालीनरकासुर कथा, प्रातः स्नान, दीपचतुर्दशी तथा क्षेत्रानुसार भिन्न प्रथाएँ
दीपावली / लक्ष्मी पूजाअमावस्या-संध्या, घरों में दीप, मिलना-जुलनाबहुत-से परिवारों का मुख्य पूजन, पर एकमात्र अर्थ नहीं
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट / बलि प्रतिपदा / नववर्षकृष्ण-भक्ति, अन्न-समर्पण, नए आरंभये सभी परस्पर समानार्थी नहीं हैं
भाई दूज / भैया दूज / भाई टीकाभाई-बहन का स्नेह, तिलक, उपहारक्षेत्रीय रूप और तिथि-विधियाँ अलग हो सकती हैं

दीपावली कैसे मनाई जाती है?

बहुत-से घर उत्सव से पहले सफाई और सजावट करते हैं। दरवाज़ों पर पुष्प, दीप और रंगोली बनाई जाती है; तमिल क्षेत्र में सजावटी भूमि-अलंकरण के लिए कोलम शब्द भी मिलता है। परिवार के सदस्य लक्ष्मी-गणेश का स्मरण या पूजा, भजन, प्रार्थना, मिठाइयों का आदान-प्रदान, रिश्तेदारों से भेंट और दान कर सकते हैं। अनेक व्यापारिक समुदाय नए हिसाब-किताब या बहियों को शुभ आरंभ का प्रतीक मानते हैं। ये प्रचलित व्यवहारों का वर्णन हैं, न कि हर व्यक्ति पर लागू कोई अनिवार्य विधान। 1, 2

दीप जलाने में सावधानी का अपना स्थान है—दीया स्थिर जगह पर रखा जाए, कपड़े और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर हो। पटाखों से जुड़ी ध्वनि, प्रदूषण और पशु-पक्षियों पर प्रभाव को लेकर भी समुदायों में चर्चा होती है। दीप, संगीत, साझा भोजन और बच्चों के साथ सृजनात्मक गतिविधियाँ भी उत्सव के सहज तरीके हैं। किसी विशेष आतिशबाज़ी को सभी के लिए धर्म का अनिवार्य अंग नहीं कहा जा सकता। 1

मंदिरों में सामूहिक दर्शन, दीपोत्सव और संगीत हो सकता है। घरों के संस्कार, मंत्र, पूजा की सामग्री और समय अलग-अलग होते हैं। विस्तृत कर्मकांड, दीक्षा-आधारित तांत्रिक विधियाँ या विशेष मुहूर्त केवल उपयुक्त, स्वतंत्र रूप से स्वीकृत मार्गदर्शिका में ही दिए जाने चाहिए। यहाँ धार्मिक आचरण का शैक्षिक परिचय है; किसी फल की गारंटी या अनधिकृत अनुष्ठान-निर्देश नहीं।

उत्तर भारत: श्रीराम, लक्ष्मी और परिवार

उत्तर प्रदेश सहित कई उत्तरी क्षेत्रों में राम की अयोध्या-वापसी और लक्ष्मी पूजा की कथाएँ प्रमुख हैं। घरों और बाज़ारों में दीप सजते हैं, लोग एक-दूसरे से मिलने जाते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। अयोध्या का सार्वजनिक दीपोत्सव इस भावना का आधुनिक सामूहिक रूप है; उसकी विशाल व्यवस्था को बिना प्रमाण अति-प्राचीन काल पर लागू नहीं करना चाहिए। 3, 11

गुजरात और पश्चिम भारत: नववर्ष तथा व्यापार

गुजरात के कई परिवारों में दीवाली व्यापारिक हिसाब-किताब और बेस्टु वर्ष / गुजराती नववर्ष से जुड़ी होती है। कुछ अन्य पश्चिमी क्षेत्रों में पाडवा या बलि प्रतिपदा महत्त्वपूर्ण हैं। ‘चौथे दिन’ जैसी सरलीकृत भाषा हर क्षेत्र के लिए ठीक नहीं होती, क्योंकि पर्व-क्रम और दिन चुनने की रीति में भिन्नता है। 1, 3

महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र

इन क्षेत्रों के अनेक परिवारों में नरक चतुर्दशी की सुबह विशेष महत्त्व रखती है। तेल-स्नान, नए कपड़े और कृष्ण–नरकासुर की स्मृति प्रमुख हो सकती है। इसके साथ घरों में दीप और लक्ष्मी-पूजा भी रहती है, लेकिन मुख्य उत्सवी समय उत्तर भारत जैसा होना आवश्यक नहीं। गोवा में नरकासुर के विशाल पुतले बनाकर उनके दहन की स्थानीय प्रथा एक विशिष्ट सामुदायिक रूप है। 3, 8

पश्चिम बंगाल: काली पूजा

बंगाल के अनेक स्थानों पर अमावस्या की रात माँ काली की आराधना प्रमुख होती है। पंडाल, प्रतिमाएँ, भक्ति-संगीत और पारिवारिक पूजा की परंपरा को केवल ‘बंगाली लक्ष्मी पूजा’ कहना गलत होगा। पश्चिम बंगाल सरकार का पूजा संबंधी आधिकारिक पोर्टल काली पूजा को राज्य के प्रमुख उत्सवों में दर्शाता है। विशिष्ट रात्रिकालीन या तांत्रिक विधियों पर विभिन्न परंपराओं की अलग सीमाएँ हैं; इस लेख में उनकी अप्रमाणित प्रक्रिया नहीं दी जाती। 4

नेपाल: तिहार और स्वन्ति

नेपाल का तिहार पाँच दिनों के विशिष्ट क्रम के लिए जाना जाता है। काग तिहार में कौओं का, कुकुर तिहार में कुत्तों का, गाई तिहार में गायों का सम्मान होता है; लक्ष्मी पूजा में घर प्रकाशित किए जाते हैं। इसके आगे बैलों से जुड़ी परंपराएँ, नेवार समुदाय की म्ह पूजा तथा भाई-बहन के भाई टीका का महत्त्व है। गीत, घर-घर शुभकामनाएँ और पशुओं के प्रति स्नेह भी इसके पहचानने योग्य भाग हैं। नेवार स्वन्ति की सांस्कृतिक पहचान को भारतीय पाँच-दिनी सूची की हूबहू नकल नहीं समझना चाहिए। 5

जैन परंपरा: भगवान महावीर का निर्वाण

अनेक जैन श्रद्धालुओं के लिए दीपावली भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति है, जिसे परंपरा पावापुरी से जोड़ती है। दीप ज्ञान के प्रकाश के बने रहने का प्रतीक हैं। जैन संगठनों के अपने विवरण इस अर्थ को सामने रखते हैं। इसे लक्ष्मी पूजा की कोई मात्र शाखा नहीं मानना चाहिए; इसके केंद्र में मोक्ष, आत्मसंयम और अहिंसा का विशिष्ट जैन दर्शन है। इतिहास की सटीक प्राचीन तिथियों पर विद्वत्-अनिश्चितता का सम्मान आवश्यक है। 6

सिख परंपरा: बंदी छोड़ दिवस

सिखों के लिए बंदी छोड़ दिवस गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई और अन्य बंदियों को मुक्त कराने की स्मृति से जुड़ा है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के विवरण में गुरु साहिब के अमृतसर आगमन और उस अवसर पर दीप जलाने की परंपरा का उल्लेख है। यह सिख धर्म के इतिहास में स्वतंत्रता, न्याय और सेवा का अपना अर्थ रखता है; इसे हिन्दू दीपावली का मात्र दूसरा नाम नहीं बताना चाहिए। 7

भारत के बाहर: नए रूपों में जीवित परंपरा

विदेशों में मंदिर, गुरुद्वारे, जैन संगठन, विद्यालय और सांस्कृतिक संस्थाएँ प्रकाश, भोजन, संगीत तथा धार्मिक सभाओं के माध्यम से पर्व-काल को जीवित रखते हैं। विभिन्न समुदाय साथ उपस्थित हो सकते हैं, लेकिन प्रत्येक की धार्मिक व्याख्या का सम्मान आवश्यक है। अमेरिकी नेशनल म्यूज़ियम ऑफ एशियन आर्ट भी दीपावली की अंतरराष्ट्रीय विविधता को रेखांकित करता है। 2

दीप, रंगोली और समृद्धि का प्रतीकात्मक अर्थ

दीप अज्ञान से समझ की ओर बढ़ने का प्रतीक हो सकता है। रंगोली और कोलम स्वागत तथा लोक-कला के रूप हैं। घर की सफाई नए आरंभ की तैयारी बन सकती है। मिठाई, दान और भेंट संबंधों की मधुरता बढ़ाते हैं। लक्ष्मी-भक्ति में समृद्धि का अर्थ केवल वस्तुओं का संग्रह नहीं, उनकी नैतिक और उदार उपयोगिता भी हो सकता है। काली-भक्ति में शक्ति, संरक्षण तथा रूपांतरण के अपने अर्थ हैं। ये आस्था और सांस्कृतिक व्याख्याएँ हैं, वैज्ञानिक रूप से सुनिश्चित धन या चमत्कार का दावा नहीं। 1, 2, 4

भोजन, प्रसाद और सामूहिकता

लड्डू, बर्फी, पेड़ा, खील-बताशे तथा घर की क्षेत्रीय मिठाइयाँ बहुत-से परिवारों की स्मृतियों का हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में चकली, चिवड़ा और फराळ की अनेक घरेलू परंपराएँ मिलती हैं। अन्नकूट में कहीं तरह-तरह के शाकाहारी व्यंजन अर्पित होते हैं, तो किसी परिवार का छोटा-सा साझा भोजन ही उत्सव का केंद्र होता है। प्रसाद और उपवास का स्वरूप आराध्य देवता, घर तथा परंपरा पर निर्भर रहता है। सभी हिन्दुओं, जैनों या सिखों के लिए कोई एक भोजन या व्रत अनिवार्य नहीं है। 1, 2

आध्यात्मिक दृष्टि: एक उत्सव, अनेक मार्ग

राम-भक्त को दीपावली में न्यायपूर्ण आचरण और घर लौटने का आश्वासन दिखाई दे सकता है; लक्ष्मी-भक्त के लिए उत्तरदायी समृद्धि; काली-भक्त के लिए साहस और परिवर्तन; जैन श्रद्धालु के लिए कर्म-बन्धन से मुक्ति का आदर्श; और सिख श्रद्धालु के लिए स्वतंत्रता तथा दूसरों के हित में खड़े होने का संदेश। इन विभिन्न मतों को एक जैसा बताने की आवश्यकता नहीं। शिवगोरक्ष में शिव–शक्ति और नाथ परंपराओं का विशेष महत्त्व है, फिर भी इस बहुधार्मिक पर्व को जबरन केवल शैव या नाथ उत्सव बताना अनुचित होगा। 3, 6, 7

ग्रंथ, आरती और पाठीय सावधानियाँ

रामायण की परंपराएँ राम की वापसी को कथात्मक आधार देती हैं, किंतु आधुनिक दीपावली के संबंध का प्रमाण अलग से देखना होता है। विष्णु पुराण 1.9 में लक्ष्मी-प्राकट्य, भागवत पुराण 10.59 में नरकासुर-वध और 10.25 में गोवर्धन-संरक्षण का प्रसंग है। परिवारों में लक्ष्मी की आरती, स्तोत्र, काली के भक्ति-गीत और अन्य प्रार्थनाएँ भी लोकप्रिय हैं, पर प्रत्येक रचना के पाठ, रचनाकार, संस्करण तथा पुनरुपयोग-अधिकार की जाँच करनी होगी। यहाँ असत्यापित श्लोक या आधुनिक अनुवाद की लंबी प्रतिलिपि नहीं दी गई है। 3, 9, 10, 13

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या दीवाली केवल श्रीराम के लौटने पर मनाई जाती है? नहीं। यह एक प्रमुख परंपरा है, लेकिन लक्ष्मी, काली, कृष्ण, जैन और सिख समुदायों के अन्य स्वतंत्र अर्थ भी हैं। 3, 6, 7

2. क्या हर जगह पाँच ही दिन मनाए जाते हैं? नहीं। पाँच दिनों की सूची प्रचलित है; नाम, क्रम और महत्त्व में क्षेत्रीय बदलाव हैं। 1, 5

3. क्या दीवाली हर वर्ष एक ही अंग्रेज़ी तारीख पर होती है? नहीं। तिथि का स्थानीय पंचांग-नियमों से निर्धारण होता है। 12

4. क्या नरक चतुर्दशी और अमावस्या की लक्ष्मी पूजा एक ही हैं? नहीं। दोनों संबंधित किंतु अलग अवसर हैं। 8, 12

5. कार्तिक और आश्विन—दोनों नाम क्यों मिलते हैं? पूर्णिमान्त और अमान्त मास-गणना एक ही चंद्र-अवधि को अलग नाम दे सकती हैं। 12

6. लक्ष्मी पूजा का समय सब नगरों में एक जैसा होता है? नहीं। स्थानीय सूर्यास्त तथा स्वीकृत परंपरा और चयन-नियम महत्त्व रखते हैं। 12

7. क्या काली पूजा और लक्ष्मी पूजा एक ही पूजा हैं? नहीं। अमावस्या-काल समान हो सकता है, आराध्य और विधियाँ अलग हो सकती हैं। 4

8. क्या बंदी छोड़ दिवस हिन्दू दीपावली का दूसरा नाम है? नहीं। उसका अपना सिख धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। 7

9. जैन समुदाय दीवाली क्यों मनाता है? अनेक जैन इसे भगवान महावीर के निर्वाण और उनके ज्ञान के प्रकाश से जोड़ते हैं। 6

10. क्या नेपाल का तिहार पूरी तरह भारतीय पाँच-दिवसीय क्रम जैसा है? नहीं। काग, कुकुर, गाय, म्ह पूजा और भाई टीका की अपनी परंपराएँ हैं। 5

11. क्या सोना खरीदना या पटाखे चलाना धार्मिक अनिवार्यता है? नहीं। परिवार और समुदाय दीप, प्रार्थना, कला, दान तथा साथ बैठकर भी त्योहार मनाते हैं। 1

12. क्या केवल धार्मिक कथा से किसी वर्ष की सही तिथि निकाली जा सकती है? नहीं। कथा का अर्थ और स्थानीय पंचांग का तिथि-निर्णय दो अलग प्रश्न हैं। 12

संदर्भ और स्रोत (13)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Decision 20.COM 7.b.24: inscription of Deepavali

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    UNESCO Intergovernmental Committee for the Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage
  2. Diwali

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    Smithsonian National Museum of Asian Art
  3. What is Diwali?

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    The Open University, OpenLearn
  4. SAHAJ Puja Permission Portal: Puja Calendar

    स्रोत खोलें 4

    रचनाकार
    Government of West Bengal
  5. Tihar

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    Nepal Tourism Board
  6. JAINA Diwali Special Newsletter

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    Federation of Jain Associations in North America (JAINA)
  7. Sri Guru Hargobind Sahib Ji

    स्रोत खोलें 7

    रचनाकार
    Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee (SGPC)
  8. Narak Chaturdashi in Goa

    स्रोत खोलें 8

    रचनाकार
    Incredible India, Ministry of Tourism, Government of India
  9. Śrīmad-Bhāgavatam Canto 10 Chapter 59: The Killing of the Demon Naraka

    स्रोत खोलें 9

    रचनाकार
    Bhaktivedanta Book Trust / Vedabase (hosted sectarian translation)
  10. Vishnu Purana, Book I, Chapter IX

    स्रोत खोलें 10

    रचनाकार
    H. H. Wilson (1840 translation), Internet Sacred Text Archive transcription
  11. Diwali: A Festival of Lights and Joy

    स्रोत खोलें 11

    रचनाकार
    Incredible India, Ministry of Tourism, Government of India
  12. Dīpāvalī-nirṇaya: The Śāstric Determination of Lakṣmī Pūjā Day

    स्रोत खोलें 12

    रचनाकार
    Pundit Mahesh Shastriji, Panchang Karta and Siddhanti
  13. Śrīmad-Bhāgavatam Canto 10 Chapter 25: Lord Krishna Lifts Govardhana Hill

    स्रोत खोलें 13

    रचनाकार
    Bhaktivedanta Book Trust / Vedabase (hosted sectarian translation)
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संबंधित अध्ययन और स्रोत

प्रमुख स्रोत: यूनेस्को का दीपावली-विरासत निर्णय 1; नेशनल म्यूज़ियम ऑफ एशियन आर्ट का परिचय 2; ओपन यूनिवर्सिटी का परंपरा-विवेचन 3; नेपाल पर्यटन बोर्ड का तिहार-विवरण 5; जैन संस्था JAINA और सिख संस्था SGPC के अपने विवरण 6, 7; तथा जाँचे गए पुराण-प्रसंग 9, 10, 13। प्रत्येक स्रोत की जाँच-सीमा, प्रकाशन-विवरण और अधिकार-संबंधी टिप्पणी स्रोत और संस्करण विवरण में उपलब्ध है।

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