पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

कलश स्थापना और घटस्थापना

कलश-पूजा और घटस्थापना के प्रतीक, सामग्री तथा परम्परागत भेद समझें।

संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

इस पूजा के बारे में

कलश का महत्व

हिन्दू उपासना में जल से भरा कलश मंगल, आतिथ्य, जीवन-समृद्धि और देवस्मरण का प्रतीक हो सकता है। भिन्न समुदाय इसकी अलग व्याख्या करते हैं। कलश न केवल सजावटी बर्तन है और न ही समृद्धि की कोई भौतिक गारंटी। ‘कलशस्य मुखे विष्णुः’ जैसे पदों में वह देवताओं तथा पृथ्वी-जल की पवित्र उपस्थिति का प्रतीक है।

कलश स्थापना और घटस्थापना एक समान नहीं

सामान्य कलश अनेक शुभ कर्मों में स्थापित होता है और कुछ विधियों में वरुणदेव का आवाहन होता है। नवरात्रि में घटस्थापना के साथ जौ या सप्तधान्य बोना, पत्ते और नारियल लगाना, तथा देवी दुर्गा को पर्व की अवधि में प्रतीकात्मक रूप से आमंत्रित करना जुड़ सकता है। इसे प्रत्येक कलश पूजन की अनिवार्य विधि नहीं कहा जा सकता।

महत्त्व और परम्परा

इतिहास, स्रोत और सीमाएँ

कई मन्त्रों की वैदिक परंपराओं से संबद्धता है, लेकिन वर्तमान क्रम उत्तरकालीन कर्मकाण्ड-संकलनों और आधुनिक प्रस्तुतियों में मिलता है। किसी विधि में क्रमित होना यह सिद्ध नहीं करता कि सभी श्लोक एक ही प्राचीन ग्रन्थ की रचना हैं। विश्वविद्यालय की मुद्रित पृष्ठ-छवियाँ देखी गईं और द्रिक पंचांग के पाठभेद दर्ज किए गए हैं; फिर भी कोई सर्वमान्य पाठ या वैदिक स्वर प्रमाणित नहीं हुए।

क्षेत्रीय तथा पारिवारिक भिन्नताएँ

उत्तर भारत के कुछ घरों में धान्य-पात्र पर कलश, आम/अशोक के पत्ते तथा लाल वस्त्र में नारियल रखा जाता है। अन्य क्षेत्रों में पंचपल्लव, अन्न, पात्र तथा आवाह्य देवता अलग हो सकते हैं। वरुण-कलश की स्थापना किसी बड़े अनुष्ठान की पूर्व-क्रिया हो सकती है, जबकि नवरात्रि में देवी की प्रधानता है। किसी घर में केवल प्रतीकात्मक कलश भी रखा जा सकता है; एक विधि को सर्वत्र अनिवार्य न मानें।

आवश्यक सामग्री

स्वच्छ मिट्टी, पीतल या अन्य उपयुक्त धातु के पात्र में जल रखा जाता है। मिट्टी व धान्य उर्वरता और धैर्य के, पत्ते वनस्पति-जीवन के और नारियल पूर्णता एवं अर्पण के प्रतीक हैं। अक्षत, ऊपरी पूर्णपात्र, मौली, पुष्प, सुपारी और सिक्का स्रोत तथा कुलपरंपरा के अनुसार होते हैं। हर पदार्थ जुटाना आवश्यक बताने के बजाय स्वच्छ और स्थानीय रूप से उपयुक्त सामग्री का विवेकपूर्ण चयन करें।

आरम्भ करने से पहले

क्रिया के अनुरूप मन्त्र क्यों आवश्यक है

पृथ्वी की प्रार्थना, वरुण-आवाहन और नैवेद्य के मन्त्र अलग विषयों से जुड़े हैं। हर पाठ अपनी क्रिया के साथ अर्थ और व्याख्या सहित है। देवतानाम वाला छोटा अर्पण-वाक्य हर बार अलग वैदिक ऋचा नहीं होता। अलग पद्धतियाँ एक ही वनस्पति-मन्त्र को भिन्न सामग्री के साथ रख सकती हैं; इससे वे सामग्रियाँ परस्पर बदलने योग्य नहीं बन जातीं।

संकल्प एवं मुहूर्त

औपचारिक संकल्प में देवता, प्रयोजन, स्थान और पंचांग-संबंधी विवरण आ सकते हैं। कल्पित तिथि, गोत्र या स्थान भरकर मन्त्र नहीं बनाना चाहिए। प्रतिपदा एवं दिन के भागों के बारे में परंपरागत नियम मिलते हैं, पर उनके प्रयोग के लिए स्थान-विशिष्ट खगोलीय गणना, स्पष्ट नियमावली और स्वतंत्र जाँच जरूरी है। इस स्थिर लेख में कोई तिथि अथवा समय स्वीकृत नहीं।

तैयारी और क्रमबद्ध अध्ययन

चरण 1 · वैकल्पिक

विधि, पूजास्थल और समय की पहचान

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सामान्य वरुण-कलश पूजा और नवरात्रि घटस्थापना में अंतर समझें। कुलपरंपरा जाँचें; किसी प्रकाशित तिथि या मुहूर्त को अपने स्थान के लिए मान्य न मानें।

चरण 2 · वैकल्पिक

हाथ धोकर सामग्री व्यवस्थित करें

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स्थिर कलश, स्वच्छ जल, आवश्यक हो तो मिट्टी-धान्य, पुष्प और सुरक्षित आसन रखें। कपड़े के पास अग्नि न रखें। स्रोत में इस सफाई हेतु सर्वमान्य विशेष संस्कृत मन्त्र नहीं दिया गया।

चरण 3 · वैकल्पिक

गणेश एवं गुरु स्मरण (वैकल्पिक)

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कुछ परिवार गणेश की प्रार्थना या गुरु-स्मरण से आरम्भ करते हैं। यह वैकल्पिक शुरुआत है, हर कलश-परम्परा का एक ही अनिवार्य पाठ नहीं।

चरण 4 · वैकल्पिक

संकल्प और पर्व-सन्दर्भ

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संकल्प आराधना का उद्देश्य व्यक्त करता है। सरल व्यक्तिगत भाव अपनी भाषा में कहा जा सकता है। औपचारिक पाठ भिन्न होते हैं; गोत्र, अनुष्ठान की तारीख या मुहूर्त का अनुमान न लगाएँ।

प्रसंग 5 · वैकल्पिक

भूमि एवं आसन का स्पर्श

विस्तृत कलश-पद्धतियाँ पात्र को आधार देने वाली पृथ्वी का स्मरण करती हैं। यह प्रसंग उस प्रतीक को समझाता है, पूर्ण वैदिक पाठ नहीं देता।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह पृथिवीं मा हिंसीः॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ bhoorasi bhoomirasyaditirasi vishvadhaayaa vishvasya bhuvanasya dhartree| prithiveem yachchha prithiveem drimha prithiveem maa himseeh||oṃ bhūrasi bhūmirasyaditirasi viśvadhāyā viśvasya bhuvanasya dhartrī | pṛthivīṃ yaccha pṛthivīṃ dṛṃha pṛthivīṃ mā hiṃsīḥ ||

अर्थ

तुम पृथ्वी और विश्व को धारण करने वाली भूमि हो; पृथ्वी को स्थिर रखो, उसे हानि न पहुँचे।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 6 · वैकल्पिक

मिट्टी और धान्य रखना

अंश का लिंक

कुछ कलश-पद्धतियाँ आधार के अन्न के साथ धान्य-प्रार्थना जोड़ती हैं। चुना हुआ अंश विस्तृत वैदिक क्रम से छोटा है; इसे हर परम्परा का सम्पूर्ण पाठ न मानें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ dhaanyamasi dhinuhi devaan praanaaya tvodaanaaya tvaa vyaanaaya tvaa|oṃ dhānyamasi dhinuhi devān prāṇāya tvodānāya tvā vyānāya tvā |

अर्थ

तुम धान्य हो; देवताओं और प्राण, अपान, व्यान जैसी जीवन-शक्तियों के पोषण का प्रतीक हो।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 7 · वैकल्पिक

कलश का स्थापन

अंश का लिंक

पात्र को तैयार आसन पर रखते समय अलग कलश-स्थापन मन्त्र मिलता है; यह केवल किसी देवतानाम की पुनरावृत्ति नहीं।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ aa jighra kalasham mahyaa tvaa vishantvindavah| punaroorjaa nivartasva saa nah sahasram dhukshvorudhaaraa payasvatee punarmaa vishataadrayih||oṃ ā jighra kalaśaṃ mahyā tvā viśantvindavaḥ | punarūrjā nivartasva sā naḥ sahasraṃ dhukṣvorudhārā payasvatī punarmā viśatādrayiḥ ||

अर्थ

कलश में पोषणकारी बूँदें प्रवेश करें; ऊर्जा, समृद्धि और जीवनोपयोगी रस हमारे पास लौटें।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 8 · वैकल्पिक

कलश में स्वच्छ जल भरना

अंश का लिंक

पात्र में जल भरने के साथ वरुण-संबद्ध मन्त्र आता है; उसके पाठभेद और वैदिक स्वर की पुष्टि शेष है। स्वच्छ सुरक्षित जल उपयुक्त है; नदी-जल को अनिवार्य न बताएं।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ varunasyottambhanamasi varunasya skambhasarjanee stho varunasya ritasadanyasi varunasya ritasadanamasi varunasya ritasadanamaaseeda||oṃ varuṇasyottambhanamasi varuṇasya skambhasarjanī stho varuṇasya ṛtasadanyasi varuṇasya ṛtasadanamasi varuṇasya ṛtasadanamāsīda ||

अर्थ

यह पात्र वरुण तथा उनके द्वारा धारित ऋत अर्थात् धर्ममय विश्व-व्यवस्था से संबद्ध माना गया है।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 9 · वैकल्पिक

कलश पर मौली या वस्त्र बाँधना

अंश का लिंक

वस्त्र और आवरण की प्रार्थनाएँ अनुष्ठान-पद्धतियों में भिन्न हो सकती हैं। उनके शब्दों और अनुष्ठान में स्थान को परस्पर बदलने योग्य न मानें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः। वासो अग्ने विश्वरूपं सं व्ययस्व विभावसो॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ sujaato jyotishaa saha sharma varoothamaasadatsvah| vaaso agne vishvaroopam sam vyayasva vibhaavaso||oṃ sujāto jyotiṣā saha śarma varūthamāsadatsvaḥ | vāso agne viśvarūpaṃ saṃ vyayasva vibhāvaso ||

अर्थ

मंगलमय तेज, संरक्षण और आवरण का भाव; स्रोत में इसे कलश पर वस्त्र बाँधने से जोड़ा गया है।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 10 · वैकल्पिक

वैकल्पिक गन्ध या चन्दन

विस्तृत विधि में चन्दन या सुगन्ध मिलाते समय अलग मन्त्र है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर घर के जल में इत्र डालना अनिवार्य है।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ त्वां गन्धर्वा अखनंस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ tvaam gandharvaa akhanamstvaamindrastvaam brihaspatih| tvaamoshadhe somo raajaa vidvaanyakshmaadamuchyata||oṃ tvāṃ gandharvā akhanaṃstvāmindrastvāṃ bṛhaspatiḥ | tvāmoṣadhe somo rājā vidvānyakṣmādamucyata ||

अर्थ

वनस्पति से जुड़ी वैदिक प्रार्थना जिसमें देवताओं का स्मरण और पीड़ा से मुक्ति का भाव है; यह चिकित्सा का दावा नहीं।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 11 · वैकल्पिक

वैकल्पिक सर्वौषधि (रोक)

अंश का लिंक

कुछ परम्पराओं में कलश में चुनी हुई औषधियाँ रखी जाती हैं। इस मार्गदर्शिका में पूरी सामग्री और उसके सम्बद्ध मन्त्र का निर्धारण नहीं है; पौधों की पहचान या सामग्री का अनुमान न लगाएँ।

प्रसंग 12 · वैकल्पिक

सुपारी रखना (वैकल्पिक)

अंश का लिंक

एक विस्तृत पाठ में सुपारी के लिए वनस्पति-सूक्त का श्लोक है। दूसरे पाठ में वही नारियल के लिए भी मिलता है; इस समानता को दर्ज किया है।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ yaah phalineeryaa aphalaa apushpaa yaashcha pushpineeh| brihaspatiprasootaastaa no munchantvamhasah||oṃ yāḥ phalinīryā aphalā apuṣpā yāśca puṣpiṇīḥ | bṛhaspatiprasūtāstā no muñcantvaṃhasaḥ ||

अर्थ

फलवाली, फलरहित, पुष्परहित और पुष्पवाली वनस्पतियाँ—बृहस्पति से सम्बद्ध—हमारे संकट दूर करें।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 13 · वैकल्पिक

परंपरानुसार सिक्का रखना

अंश का लिंक

कुछ विधियों में सिक्के के साथ हिरण्यगर्भ ऋचा है; यह सृष्टि-संबद्ध स्तुति है, धन-लाभ की गारंटी नहीं।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ hiranyagarbhah samavartataagre bhootasya jaatah patireka aaseet| sa daadhaara prithiveem dyaamutemaam kasmai devaaya havishaa vidhema||oṃ hiraṇyagarbhaḥ samavartatāgre bhūtasya jātaḥ patireka āsīt | sa dādhāra pṛthivīṃ dyāmutemāṃ kasmai devāya haviṣā vidhema ||

अर्थ

आदि में हिरण्यगर्भ प्रकट हुए, जो प्राणियों के स्वामी कहे गए; उन्होंने पृथ्वी और द्युलोक को संभाला—हम किस देवता को हवि दें?

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 14 · वैकल्पिक

दूर्वा अर्पित करना

अंश का लिंक

दूर्वा रखते समय अलग वृद्धि-संबंधी मन्त्र मिलता है; इसमें गाँठ से उगने का उल्लेख है, दूर्वा की अनिवार्य संख्या नहीं बनाई गई।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ kaandaatkaandaatprarohantee parushah parushaspari| evaa no doorve pratanu sahasrena shatena cha||oṃ kāṇḍātkāṇḍātprarohantī paruṣaḥ paruṣaspari | evā no dūrve pratanu sahasreṇa śatena ca ||

अर्थ

हे दूर्वा, हर गाँठ से फिर उगने वाली, हमारे लिए सैकड़ों-हजारों रूपों में विस्तृत हो।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 15 · वैकल्पिक

कलश पर पल्लव रखना

कुछ परिवार आम या अशोक के पत्ते लेते हैं; दूसरी परम्पराओं में पाँच पत्तों का अलग समूह होता है। पौधों के नाम और पाठ भिन्न हैं; सुरक्षित पहचान वाली और अपनी घरेलू रीति के अनुकूल सामग्री ही लें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ ashvatthe vo nishadanam parne vo vasatishkritaa| gobhaaja itkilaasatha yatsanavatha poorusham||oṃ aśvatthe vo niṣadanaṃ parṇe vo vasatiṣkṛtā | gobhāja itkilāsatha yatsanavatha pūruṣam ||

अर्थ

मन्त्र में अश्वत्थ और पत्तों में निवास का उल्लेख है; शेष अर्थ की शास्त्रीय समीक्षा आवश्यक है।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 16 · वैकल्पिक

कुशा रखने की वैकल्पिक क्रिया (रोक)

अंश का लिंक

विस्तृत वैदिक पद्धतियों में कुशा और विशिष्ट पाठ का विधान मिलता है। यहाँ उस भेद का परिचय है; पूरा स्वरयुक्त पाठ अथवा स्वतंत्र घरेलू क्रियाविधि नहीं दी गई है।

प्रसंग 17 · वैकल्पिक

ऊपर पूर्णपात्र या ढक्कन रखना

अंश का लिंक

चावल/धान्य-युक्त पूर्णपात्र अथवा ऊपरी कटोरी रखते समय पृथक मन्त्र है; सामान्य ढक्कन और पूर्णपात्र में फर्क रखें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ पूर्णा दर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत। वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जं शतक्रतो॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ poornaa darvi paraapata supoornaa punaraapata| vasneva vikreenaavahaa ishamoorjam shatakrato||oṃ pūrṇā darvi parāpata supūrṇā punarāpata | vasneva vikrīṇāvahā iṣamūrjaṃ śatakrato ||

अर्थ

परिपूर्णता और पोषण लौटकर आएँ; इस मन्त्र को पूर्णपात्र के साथ जोड़ा जाता है।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 18 · वैकल्पिक

पूर्णपात्र पर नारियल रखना

अंश का लिंक

विश्वविद्यालय-पाठ में नारियल के साथ वही “याः फलिनीः” मन्त्र मिलता है जो अन्य स्रोत सुपारी हेतु देते हैं। अन्य विधि का “श्रीश्च ते” बिना मिश्रण के पाठभेद में है।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः॥

रोमन लिप्यंतरण

oṃ yaah phalineeryaa aphalaa apushpaa yaashcha pushpineeh| brihaspatiprasootaastaa no munchantvamhasah||oṃ yāḥ phalinīryā aphalā apuṣpā yāśca puṣpiṇīḥ | bṛhaspatiprasūtāstā no muñcantvaṃhasaḥ ||

अर्थ

हर प्रकार की फलने-फूलने वाली वनस्पतियाँ संकट से मुक्ति का साधन बनें।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 19 · वैकल्पिक

कलश में वरुण का आवाहन

अंश का लिंक

कलश के आवाहन की प्रार्थनाएँ और वरुण के वैदिक सूक्त अलग पाठ-रूप हैं। किसी सूक्त का होना हर स्थापना-परम्परा में उसका स्थान अपने-आप तय नहीं करता।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ भूर्भुवः स्वः। वरुण इहागच्छ, इह तिष्ठ, मम पूजां गृहाण।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ bhoorbhuvah svah| varuna ihaagachchha, iha tishtha, mama poojaam grihaana|oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ | varuṇa ihāgaccha, iha tiṣṭha, mama pūjāṃ gṛhāṇa |

अर्थ

हे वरुणदेव, यहाँ पधारें, यहाँ विराजें और यह पूजा स्वीकार करें।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 20 · वैकल्पिक

पवित्र नदियों का वैकल्पिक स्मरण

नदी-आह्वान के लिए अलग मन्त्र उपलब्ध है; यह पवित्र भूगोल का भाव है, इससे जल की वास्तविक स्वच्छता सुनिश्चित नहीं होती।

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मूल पाठ

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥

रोमन लिप्यंतरण

gange cha yamune chaiva godaavari sarasvati| narmade sindhu kaaveri jale’smin sannidhim kuru||gaṅge ca yamune caiva godāvari sarasvati | narmade sindhu kāveri jale’smin sannidhiṃ kuru ||

अर्थ

हे गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी, इस जल में अपनी पवित्र उपस्थिति दें।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 21 · वैकल्पिक

वरुणदेव को पुष्प देना

अंश का लिंक

स्रोत में पुष्प के लिए संक्षिप्त क्रिया-विशेष समर्पण वाक्य है, अलग लम्बी ऋचा नहीं। इसे देवी-पूजन से स्वतः एक न मानें।

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मूल पाठ

ॐ वरुणाय नमः पुष्पं समर्पयामि।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ varunaaya namah pushpam samarpayaami|oṃ varuṇāya namaḥ puṣpaṃ samarpayāmi |

अर्थ

वरुणदेव को नमस्कार; यह पुष्प अर्पित करता/करती हूँ।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 22 · वैकल्पिक

सुरक्षित होने पर धूप अर्पित करना

अंश का लिंक

धूप के लिए अलग समर्पण-वाक्य मिलता है। शिशु, धुएँ से संवेदनशील व्यक्ति या बंद स्थान में धूप न जलाएँ।

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मूल पाठ

ॐ वरुणाय नमः धूपं घ्रापयामि।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ varunaaya namah dhoopam ghraapayaami|oṃ varuṇāya namaḥ dhūpaṃ ghrāpayāmi |

अर्थ

वरुणदेव को नमस्कार; धूप की सुगन्ध अर्पित करता/करती हूँ।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 23 · वैकल्पिक

सुरक्षित होने पर दीप दिखाना

अंश का लिंक

दीप के लिए पृथक पाठ है। पत्तों, रुई तथा वस्त्र के पास लौ न रखें और दीप को अकेला न छोड़ें।

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मूल पाठ

ॐ वरुणाय नमः दीपं दर्शयामि।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ varunaaya namah deepam darshayaami|oṃ varuṇāya namaḥ dīpaṃ darśayāmi |

अर्थ

वरुणदेव को नमस्कार; दीप का प्रकाश दिखाता/दिखाती हूँ।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 24 · वैकल्पिक

फल या नैवेद्य अर्पित करना

अंश का लिंक

नैवेद्य मन्त्र में भोजन का स्पष्ट उल्लेख है; धूप या पुष्प-मन्त्र की पुनरावृत्ति नहीं। सामग्री स्वच्छ रखें।

अंश का लिंक

मूल पाठ

ॐ वरुणाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि।

रोमन लिप्यंतरण

oṃ varunaaya namah naivedyam samarpayaami|oṃ varuṇāya namaḥ naivedyaṃ samarpayāmi |

अर्थ

वरुणदेव को नमस्कार; नैवेद्य अर्पित करता/करती हूँ।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 25 · वैकल्पिक

कलश में दिव्य उपस्थिति का चिंतन

एक पद्य कलश के भागों में विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा और मातृगण का भाव बताता है; यह बड़े स्तवन का एक श्लोक है, संपूर्ण स्तवन नहीं।

अंश का लिंक

मूल पाठ

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥

रोमन लिप्यंतरण

kalashasya mukhe vishnuh kanthe rudrah samaashritah| moole tasya sthito Brahma madhye maatriganaah smritaah||kalaśasya mukhe viṣṇuḥ kaṇṭhe rudraḥ samāśritaḥ | mūle tasya sthito brahmā madhye mātṛgaṇāḥ smṛtāḥ ||

अर्थ

कलश के मुख में विष्णु, कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में मातृगण का स्मरण किया जाता है।

व्याख्या

यह पाठ निर्दिष्ट विधि में इसी क्रिया से जुड़ा है; वैदिक श्लोक का अर्थ केवल उस क्रिया तक सीमित नहीं।

सम्बन्धित पाठ और स्रोत

प्रसंग 26 · वैकल्पिक

नवरात्रि में दुर्गा आवाहन (अप्रमाणित)

अंश का लिंक

नवरात्रि की परम्पराओं में नौ दिनों के लिए कलश में दुर्गा का आवाहन किया जाता है। यहाँ उसका निश्चित संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; वरुण-आवाहन में नाम बदलकर दुर्गा-मन्त्र न बनाएँ।

प्रसंग 27 · वैकल्पिक

पर्व में प्रतिदिन कलश की देखभाल

अंश का लिंक

स्थापना स्थायी मूर्ति-प्रतिष्ठा नहीं है। परिवारों में दैनिक पुष्प/प्रार्थना और धान्य-देखभाल की भिन्न परंपरा है। अखण्ड ज्योति अकेली न छोड़ें; यहाँ एक पूर्ण दैनिक मन्त्र-माला प्रमाणित नहीं।

प्रसंग 28 · वैकल्पिक

पर्व का समापन और सम्मानपूर्ण देखभाल

अंश का लिंक

पारिवारिक पर्व के अंत में सम्मानपूर्ण विदाई और वितरण के लिए स्थानीय रीति का ध्यान रखें। प्लास्टिक, धातु, कपड़े या भोजन का कचरा नदियों में न डालें; पात्र का पुनः उपयोग करें और जल तथा वनस्पति-सामग्री का जिम्मेदारी से निस्तारण करें।

महत्त्वपूर्ण सावधानियाँ

दैनिक देखभाल, सुरक्षा और समापन

कई दिन रखे कलश में पानी व धान्य स्वच्छ रहें; फफूँद, कीट तथा छलकाव पर ध्यान दें। धुएँ या आग का जोखिम होने पर दीप-धूप को अनिवार्य न बनाएँ; ‘अखण्ड’ लौ भी बिना देखरेख न छोड़ें। पर्व के बाद सामग्री का परंपरा और पर्यावरण-नियमों के अनुसार पुनः उपयोग या उचित निस्तारण करें; प्लास्टिक या धातु को जलस्रोतों में न डालें। अप्रमाणित सार्वभौम विसर्जन-मन्त्र नहीं जोड़ा गया।

क्या सम्मिलित नहीं है

दीक्षा-विशिष्ट न्यास, बीज-प्रयोग और वैदिक स्वर-शिक्षण इस परिचय में नहीं हैं। दुर्गा-आवाहन या मुहूर्त का अनुमान न लगाएँ और वरुण-मन्त्र में नाम बदलकर उसे देवी का मन्त्र न मानें।

प्रश्न और आगे का अध्ययन

क्या नारियल अनिवार्य है?

नहीं। कुछ नवरात्रि/कलश विधियों में है, पर प्रत्येक कलश के लिए सार्वभौम नियम नहीं।

क्या निश्चित मुहूर्त बिना कर सकते हैं?

यह मार्गदर्शिका सामान्य छूट का दावा नहीं करता। पारिवारिक आचार्य से पूछें; पंचांग-जाँच पूर्ण हुए बिना मंच समय प्रमाणित नहीं कर सकता।

क्या हर क्रिया का अलग मन्त्र है?

हमेशा नहीं। कुछ क्रियाओं के अलग वैदिक पद्य हैं, अन्य में संक्षिप्त समर्पण-वाक्य। एक स्रोत में वही वनस्पति-पद्य दो क्रियाओं हेतु मिले अथवा पाठ न मिले तो उसे स्पष्ट लिखा गया है।

क्या अखण्ड ज्योति जला सकते हैं?

बिना निरंतर देखरेख की लौ की सलाह नहीं है; उचित आचार्य और अग्नि-सुरक्षा का विवेक अपनाएँ। बैटरी-दीप को औपचारिक अनुष्ठान का समान विकल्प नहीं कहा गया है।

कलश के जल का क्या करें?

परंपराएँ भिन्न हैं। स्थानीय रीति का पालन करते हुए पर्यावरण-सम्मत व्यवहार करें और जलस्रोतों को दूषित न करें।

क्या वरुण के मन्त्र से देवी का आवाहन कर सकते हैं?

नहीं। नाम बदलकर मन्त्र रचना नहीं की जाएगी; निर्दिष्ट देवी-आवाहन का पाठ स्वतंत्र रूप से सत्यापित होना चाहिए।

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. भूमि एवं आसन का स्पर्श

    oṃ bhūrasi bhūmirasyaditirasi viśvadhāyā viśvasya bhuvanasya dhartrī | pṛthivīṃ yaccha pṛthivīṃ dṛṃha pṛthivīṃ mā hiṃsīḥ ||

  2. मिट्टी और धान्य रखना

    oṃ dhānyamasi dhinuhi devān prāṇāya tvodānāya tvā vyānāya tvā |

  3. कलश का स्थापन

    oṃ ā jighra kalaśaṃ mahyā tvā viśantvindavaḥ | punarūrjā nivartasva sā naḥ sahasraṃ dhukṣvorudhārā payasvatī punarmā viśatādrayiḥ ||

  4. कलश में स्वच्छ जल भरना

    oṃ varuṇasyottambhanamasi varuṇasya skambhasarjanī stho varuṇasya ṛtasadanyasi varuṇasya ṛtasadanamasi varuṇasya ṛtasadanamāsīda ||

  5. कलश पर मौली या वस्त्र बाँधना

    oṃ sujāto jyotiṣā saha śarma varūthamāsadatsvaḥ | vāso agne viśvarūpaṃ saṃ vyayasva vibhāvaso ||

  6. वैकल्पिक गन्ध या चन्दन

    oṃ tvāṃ gandharvā akhanaṃstvāmindrastvāṃ bṛhaspatiḥ | tvāmoṣadhe somo rājā vidvānyakṣmādamucyata ||

  7. सुपारी रखना (वैकल्पिक)

    oṃ yāḥ phalinīryā aphalā apuṣpā yāśca puṣpiṇīḥ | bṛhaspatiprasūtāstā no muñcantvaṃhasaḥ ||

  8. परंपरानुसार सिक्का रखना

    oṃ hiraṇyagarbhaḥ samavartatāgre bhūtasya jātaḥ patireka āsīt | sa dādhāra pṛthivīṃ dyāmutemāṃ kasmai devāya haviṣā vidhema ||

  9. दूर्वा अर्पित करना

    oṃ kāṇḍātkāṇḍātprarohantī paruṣaḥ paruṣaspari | evā no dūrve pratanu sahasreṇa śatena ca ||

  10. कलश पर पल्लव रखना

    oṃ aśvatthe vo niṣadanaṃ parṇe vo vasatiṣkṛtā | gobhāja itkilāsatha yatsanavatha pūruṣam ||

  11. ऊपर पूर्णपात्र या ढक्कन रखना

    oṃ pūrṇā darvi parāpata supūrṇā punarāpata | vasneva vikrīṇāvahā iṣamūrjaṃ śatakrato ||

  12. पूर्णपात्र पर नारियल रखना

    oṃ yāḥ phalinīryā aphalā apuṣpā yāśca puṣpiṇīḥ | bṛhaspatiprasūtāstā no muñcantvaṃhasaḥ ||

  13. कलश में वरुण का आवाहन

    oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ | varuṇa ihāgaccha, iha tiṣṭha, mama pūjāṃ gṛhāṇa |

  14. पवित्र नदियों का वैकल्पिक स्मरण

    gaṅge ca yamune caiva godāvari sarasvati | narmade sindhu kāveri jale’smin sannidhiṃ kuru ||

  15. वरुणदेव को पुष्प देना

    oṃ varuṇāya namaḥ puṣpaṃ samarpayāmi |

  16. सुरक्षित होने पर धूप अर्पित करना

    oṃ varuṇāya namaḥ dhūpaṃ ghrāpayāmi |

  17. सुरक्षित होने पर दीप दिखाना

    oṃ varuṇāya namaḥ dīpaṃ darśayāmi |

  18. फल या नैवेद्य अर्पित करना

    oṃ varuṇāya namaḥ naivedyaṃ samarpayāmi |

  19. कलश में दिव्य उपस्थिति का चिंतन

    kalaśasya mukhe viṣṇuḥ kaṇṭhe rudraḥ samāśritaḥ | mūle tasya sthito brahmā madhye mātṛgaṇāḥ smṛtāḥ ||

पुनर्प्रयुक्त पाठों का श्रेय और लाइसेंस
पाठ और स्रोत

Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः १३, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=369793. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः ०१, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=401551. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः ०८, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=330337. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः ०४, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=333477. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः ११, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=369790. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Vedic comparative reading: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः १२, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=369832. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to adapted text and aligned meanings. Selected unaccented reading retained. Om and offering endings remain separate from the Vedic core; accents, sandhi, punctuation and letter variants are not silently replaced.

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Sanskrit comparative witness: ऋग्वेदः सूक्तं १०.९७, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=317292. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to this adapted reading and aligned meanings. The supplied Om prefix is retained separately; unaccented wording, punctuation and orthographic choices remain as provided. Not independent glyph collation or ritual certification.

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Sanskrit comparative witness: ऋग्वेदः सूक्तं १०.१२१, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=400427. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to this adapted reading and aligned meanings. The supplied Om prefix is retained separately; unaccented wording, punctuation and orthographic choices remain as provided. Not independent glyph collation or ritual certification.

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Sanskrit comparative witness: शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः १३, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=369793. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to this adapted reading and aligned meanings. The supplied Om prefix is retained separately; unaccented wording, punctuation and orthographic choices remain as provided. Not independent glyph collation or ritual certification.

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Sanskrit comparative witness: ऋग्वेदः सूक्तं १०.९७, Wikisource contributors, https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=317292. CC BY-SA 4.0; attribution and ShareAlike apply to this adapted reading and aligned meanings. The supplied Om prefix is retained separately; unaccented wording, punctuation and orthographic choices remain as provided. Not independent glyph collation or ritual certification.

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पाठ और स्रोत

Traditional prayer; comparative witness: Puja Samuccaya, Nirnaya Sagar Press, Bombay, 1923, https://sanskritdocuments.org/~sanskrit/doc_trial/fortransfer/Shankara/pUjAsamucchaya.pdf. The 1923 printed edition is used for inherited text, not modern website commentary, translations or arrangement. Traditional offering verse; the selected wording is retained, including sandhi, spelling and devotional-address variants. Comparative witness is not claimed identical.

संदर्भ और स्रोत (10)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. ShivGoraksh Puja & Practice Master Curriculum, edition 1.0
  2. Kalasha Sthapana Vidhi

    स्रोत खोलें 2

  3. Ghatasthapana Puja Vidhi — Puja Vidhi to Start Navratri

    स्रोत खोलें 3

  4. वैदिक कर्मकाण्ड एवं अनुष्ठान, BASL (N)-121

    स्रोत खोलें 4

  5. Kalash Sthapana

    स्रोत खोलें 5

  6. कलश स्थापना विधि और मंत्र

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  7. Navratri FAQ — about the Kalash after Navratri

    स्रोत खोलें 7

  8. Ghatasthapana

    स्रोत खोलें 8

  9. Ṛgveda 1.24.11: Varuṇa verse

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  10. Kalash Sthapana — research comparison

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इस लेख के बारे में

शैक्षिक पठन के लिए संस्थापक द्वारा समीक्षित संस्करण। स्वतंत्र विद्वत्-सत्यापन का दावा नहीं है। स्रोत-विशेष के पाठभेद और उपयोग की शर्तें ऊपर दिए गए संदर्भों में पढ़ें।

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