शिव का तीसरा नेत्र सामान्य दृष्टि से परे ज्ञान और अन्तर्दृष्टि का प्रतीक माना जाता है। भक्ति तथा प्रतिमा-विज्ञान की व्याख्याओं में इसका सम्बन्ध सजग चेतना, विवेक और अज्ञान के निवारण से जोड़ा जाता है। तीसरे नेत्र से जुड़ी कथाएँ शिव की उग्र, रूपान्तरणकारी शक्ति को भी व्यक्त करती हैं—ऐसी शक्ति जो मोह और भ्रम को दूर कर सकती है।
ये परस्पर सम्बद्ध अर्थ हैं, किन्तु हर ग्रन्थ या प्रतिमा के लिए एक ही अनिवार्य व्याख्या नहीं। ऐतिहासिक शिव-मूर्तियों में तीसरा नेत्र उनकी पहचान का विशिष्ट लक्षण भी है। इसलिए ‘प्रायः इसका प्रतीक माना जाता है’ कहना अधिक सटीक है। प्रतिमा में तीसरा नेत्र दिखना किसी उन्नत योग-अभ्यास की प्रत्यक्ष विधि नहीं बताता।



