दीक्षा किसी विशिष्ट शैव गुरु-परम्परा या अनुष्ठानिक प्रणाली में औपचारिक प्रवेश या धार्मिक संस्कार की अवधारणा है। इसमें प्रायः अधिकृत शिक्षक, निश्चित दायित्व और उस परम्परा के मन्त्र या उपासना-संबन्धी नियम जुड़े होते हैं। दीक्षा का आशय तथा फल हर सम्प्रदाय में एक जैसे नहीं हैं। शास्त्रीय शैव तन्त्र और शैव सिद्धान्त में बन्धन, अनुग्रह और मुक्ति की चर्चा के साथ इसका विशेष स्थान रहा है।
वेबसाइट पर मन्त्र पढ़ लेना, वीडियो देख लेना या स्वयं को दीक्षित कह देना औपचारिक दीक्षा के समान नहीं है। डिजिटल सहायक किसी वंश-परम्परा का अधिकार भी प्रदान नहीं कर सकता। सार्वजनिक परिचय में दीक्षा का उद्देश्य, इतिहास और धार्मिक अर्थ समझाए जा सकते हैं। किन्तु वास्तविक दीक्षा-विधि, परम्परा-विशेष मन्त्र, पात्रता तथा प्रतिबन्धित साधना को अधिकृत गुरु और पृथक् सामग्री-समीक्षा की सीमा में ही रखना चाहिए।



