शैव सिद्धान्त आगमों, मन्दिर-अनुष्ठानों और दार्शनिक विचार की एक प्रभावशाली शैव परम्परा है। ऐतिहासिक रूप से इसका आधार शैव आगमों में मिलता है। बाद के तमिल शैव सिद्धान्त में तमिल भक्तिकाव्य और दार्शनिक ग्रन्थों को भी विशेष महत्त्व मिला। इसके प्राचीन संस्कृत सिद्धान्तों में प्रायः शिव (पति), जीव (पशु) और बन्धन (पाश) का भेद प्रतिपादित किया जाता है। मुक्ति का सम्बन्ध शिव की कृपा तथा अनेक परम्परागत संदर्भों में उपासना और विधिवत् दीक्षा से जोड़ा जाता है।
यह कहना सही नहीं कि शैव सिद्धान्त का आरम्भ केवल तमिल देश में हुआ; उसका आरम्भिक ग्रन्थीय और संस्थागत इतिहास अन्य क्षेत्रों तक जाता है। फिर भी दक्षिण भारत के मन्दिरों और भक्ति-संस्कृति में उसका जीवित प्रभाव विशेष है। पुराने संस्कृत शैव सिद्धान्त और बाद के तमिल दार्शनिक प्रतिपादनों में कुछ महत्त्वपूर्ण अन्तर हैं।



