अनुवाद का उद्देश्य किसी ग्रन्थ के निर्दिष्ट मूल शब्दों का अर्थ दूसरी भाषा में यथासम्भव उत्तरदायी ढंग से व्यक्त करना है। टीका या भाष्य मूल पाठ की व्याख्या करता है और उसमें दार्शनिक तर्क, पाठान्तर, प्रसंग या किसी आचार्य की समझ सम्मिलित हो सकती है। अलग सरल व्याख्या पाठक को कठिन अवधारणा समझा सकती है, पर उसे शाब्दिक अनुवाद या प्राचीन टीका बताना उचित नहीं।
उदाहरणतः किसी संस्कृत शब्द को ‘आत्मा’ या ‘Self’ कहना अनुवाद का निर्णय है; किसी शैव या अद्वैत मत में उसका अर्थ क्यों ऐसा है, बताना व्याख्या का काम है। कई अनुवाद सम्भव हैं, पर वे एक ही मूल पाठ-साक्ष्य के विकल्प नहीं बन जाते। ShivGoraksh में संस्कृत मूल, हिन्दी अनुवाद, अंग्रेज़ी अनुवाद, सरल व्याख्या और नामित पारम्परिक टीका स्वतंत्र परतें हों, जिनका स्रोत, अधिकार और समीक्षा-स्तर अलग हो। AI-लिखित विवेचन को पारम्परिक भाष्य नहीं कहना चाहिए।



