अष्टावक्रगीता, जिसे अष्टावक्रसंहिता भी कहते हैं, संस्कृत का दार्शनिक संवादग्रन्थ है। इसका प्रमुख संवाद ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच है। इसमें आत्मस्वरूप, चेतना, आसक्ति, स्वतंत्रता और अद्वैत ज्ञान जैसे विषयों पर विचार मिलता है। अद्वैताभिमुख पाठकों के लिए यह विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि अनेक स्थलों पर मुक्ति का विवेचन बाहरी अनुष्ठान के विस्तार के बजाय प्रत्यक्ष आत्मबोध के संदर्भ में होता है।
प्रचलित संस्करणों में इसके 20 अध्याय मिलते हैं, पर ठीक पाठ और श्लोक-गणना किसी विशिष्ट साक्ष्य से मिलानी चाहिए। परम्परागत अष्टावक्र-नाम से इसका निश्चित ऐतिहासिक लेखक या काल अपने-आप सिद्ध नहीं होता। ShivGoraksh में SARIT से लिया गया 1.1–1.8 का सीमित नमूना केवल आन्तरिक तकनीकी परीक्षण के लिए है, प्रकाशित करने के लिए अधिकार-सत्यापित स्रोत नहीं।



