हिन्दू परम्पराओं में ‘धर्मग्रन्थ’ एक व्यापक शब्द है, जिसमें ऐसे ग्रन्थ आते हैं जिन्हें समुदाय श्रद्धा से पढ़ते, सुनते, समझते या प्रमाण मानते हैं। इनमें वेद, उपनिषद्, महाकाव्य, पुराण, आगम, तन्त्र और भक्तिपरक साहित्य सम्मिलित हो सकते हैं। ‘शास्त्र’ का अर्थ केवल एक प्रकार की पुस्तक नहीं, बल्कि किसी विषय की प्रामाणिक शिक्षा या विवेचन भी हो सकता है।
सभी हिन्दू परम्पराएँ प्रत्येक ग्रन्थ को समान अधिकार नहीं देतीं। किसी शैव परम्परा में विशिष्ट आगम महत्त्वपूर्ण हैं, किसी शाक्त धारा में देवीमाहात्म्य और किसी वेदान्त परम्परा में उपनिषद् तथा भगवद्गीता। किसी समुदाय के लिए पवित्र होना और सबके लिए एक-सा अनिवार्य प्रमाण होना अलग बातें हैं। इसलिए पूछना उपयोगी है: कौन-सा ग्रन्थ, किस परम्परा में और किस उद्देश्य से—दर्शन, कथा, उपासना या शिक्षा?



