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हिन्दू कैलेंडर और पंचांग: समय को समझने की एक परंपरा

पंचांग को समझें

यह पंचांग का परिचय है, किसी एक तारीख पर होने वाला पर्व नहीं।

दैनिक पंचांग देखें
इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

पर्वों की अंग्रेज़ी तारीख क्यों बदलती है? एक ही व्रत अलग-अलग स्थानों पर अलग दिन क्यों पड़ सकता है? और पंचांग में लिखी तिथि का वास्तविक अर्थ क्या है?

एक नज़र में

विषय: हिन्दू कैलेंडर एवं पंचांग। प्रकार: कैलेंडर की बुनियादी जानकारी देने वाला लेख; यह कोई वार्षिक त्योहार नहीं है। मुख्य विषय: सूर्य–चंद्रमा की गति, तिथि, पक्ष, मास, पंचांग के पाँच अंग, क्षेत्रीय परंपराएँ और पर्वों के दिन का निर्णय। निश्चित पर्व-तारीख: लागू नहीं होती। किसी विशिष्ट व्रत या उत्सव की स्थानीय तारीख उसके अलग नियमों तथा सत्यापित कैलेंडर-आँकड़ों से निर्धारित होगी।

एक दिन, लेकिन उसे समझने के अनेक तरीके

सामान्य दीवार-कैलेंडर बताता है कि आज सोमवार है और महीने की कौन-सी तारीख है। पंचांग कुछ दूसरे प्रश्न पूछता है: इस समय कौन-सी तिथि चल रही है? चंद्रमा बढ़ते पक्ष में है या घटते पक्ष में? किस नक्षत्र की गणना हो रही है? सूर्योदय और सूर्यास्त के समय कौन-सी स्थिति है? दोनों कैलेंडर समय की अलग-अलग परतों को बताते हैं; उनमें अपने-आप कोई विरोध नहीं है।

हिन्दू कैलेंडर वास्तव में कई जुड़ी हुई कालगणना-परंपराओं का परिवार है। अनेक उत्सवों का आधार चंद्र-मास होता है, लेकिन ऋतु तथा सूर्य की गति भी महत्त्व रखती है। कुछ प्रदेशों में सौर मास प्रमुख हैं, कुछ में चांद्र मास। स्थानीय परिवार, मंदिर और संप्रदाय अपने प्रचलित नियम भी अपनाते हैं। इसी कारण भारत के सभी समुदायों के लिए एक ही रूप का पंचांग मान लेना उचित नहीं होगा। 1, 4, 7

सबसे आवश्यक अंतर यह है: खगोलीय घटना का समय निकालना और किस दिन पूजा या व्रत मनाया जाए, इसका धार्मिक नियम लागू करना दो अलग कार्य हैं। शिवगोरक्ष के कैलेंडर में इन दोनों को अलग रखा जाएगा।

पंचांग का शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ

‘पंचांग’ अर्थात पाँच अंगों वाला विवरण—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। परंपरागत रूप से इनसे किसी दिन अथवा क्षण का काल-संबंधी परिचय मिलता है। भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचांग सूर्य-चंद्रमा की स्थिति, तिथि, नक्षत्र और सूर्योदय-सूर्यास्त जैसे खगोलीय विवरण भी प्रकाशित करता है। इससे स्पष्ट होता है कि पारंपरिक शब्दावली के साथ आधुनिक खगोलीय गणना का उपयोग संभव है। 1, 4

अंगसरल अर्थव्यवहार में उपयोग
तिथिसूर्य और चंद्रमा की सापेक्ष कोणीय स्थिति से तय चांद्र दिनअनेक व्रत और पर्व
वारसप्ताह का दिन; अनेक पंचांगों में धार्मिक दिन की सीमा सूर्योदय से जुड़ी होती हैसोमवार आदि विशेष व्रत
नक्षत्रचंद्रमा के निरयन मार्ग के 27 पारंपरिक विभागों में से एकनक्षत्र-आधारित परंपराएँ
योगसूर्य और चंद्रमा के निर्धारित देशांतरों के योग से बनने वाले 27 विभागपंचांग-विवरण और कुछ मुहूर्त पद्धतियाँ
करणएक तिथि का आधा भाग; पारंपरिक चक्र में 11 नामित करणसमय का सूक्ष्म वर्गीकरण

यहाँ ‘योग’ का अर्थ आसन या प्राणायाम वाला योग नहीं है। इसी तरह करण पूरी तिथि का पर्याय नहीं है। इन्हें निकालने के लिए कौन-सी खगोलीय पद्धति अपनाई गई है, यह तकनीकी कैलेंडर में स्पष्ट होना चाहिए। 4

तिथि क्या है और वह चौबीस घंटे की क्यों नहीं होती?

साधारण तारीख आधी रात बदलती है, लेकिन तिथि हमेशा आधी रात नहीं बदलती। सामान्य खगोलीय परिभाषा के अनुसार सूर्य और चंद्रमा के क्रांतिवृत्तीय देशांतरों का आपसी अंतर हर 12 अंश बढ़ने पर अगली तिथि आती है। ऐसे तीस विभाग मिलकर एक चंद्र-चक्र बनाते हैं—पंद्रह शुक्ल पक्ष और पंद्रह कृष्ण पक्ष के। चंद्रमा की गति पूर्णतः एक-सी नहीं रहती, इसलिए तिथियों की अवधि भी समान नहीं होती। 4, 7

उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए कि सूर्योदय के समय नवमी है, जबकि दोपहर बाद दशमी आरंभ हो जाती है। सुबह के पंचांग में नवमी का उल्लेख सही हो सकता है, लेकिन शाम की किसी विधि के लिए दशमी प्रासंगिक हो सकती है। यह केवल समझाने के लिए काल्पनिक उदाहरण है, किसी वर्ष या नगर की वास्तविक गणना नहीं। ऐतिहासिक कालगणना साहित्य में भी दैनिक तिथि-नाम और किसी धार्मिक कार्य के विशिष्ट समय का यह भेद मिलता है। 8

दोनों पक्षों में तिथियों के नाम क्रम से चलते हैं: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी; फिर संबंधित पक्ष के अंत में पूर्णिमा अथवा अमावस्या। इसलिए एकादशी केवल साल में एक बार आने वाला त्योहार नहीं है; वह बार-बार आने वाली तिथि है, जिस पर विविध व्रत-परंपराएँ आधारित हैं।

शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष, पूर्णिमा और अमावस्या

एक पक्ष चंद्र-मास का लगभग आधा चरण है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा का दिखाई देने वाला प्रकाशित भाग बढ़ता है और क्रम पूर्णिमा की ओर जाता है। कृष्ण पक्ष में वह घटता है और क्रम अमावस्या की ओर जाता है। पूर्णिमा तथा अमावस्या तिथि के नाम हैं; ऐसा नहीं कि किसी नागरिक तारीख के पूरे चौबीस घंटे चंद्रमा ठीक पूर्ण अथवा अमावस्या की खगोलीय दशा में रहता है। 4, 5

नासा के अनुसार एक अमावस्या से अगली अमावस्या तक चंद्र कलाओं का चक्र औसतन लगभग 29.5 दिन का होता है। यह ग्रेगोरियन महीने की निश्चित लंबाई जैसा नहीं है। चंद्रमा की कलाएँ सूर्य के प्रकाश और पृथ्वी से दिखाई देने वाले प्रकाशित भाग से संबंधित वास्तविक खगोलीय घटनाएँ हैं। 5

पूर्णिमा और अमावस्या दोनों हर चांद्र महीने में आती हैं, पर उनसे जुड़े सभी पर्वों के नियम एक-जैसे नहीं हैं। उदाहरण के लिए सामान्य पूर्णिमा की जानकारी और गुरु पूर्णिमा का विशेष इतिहास अलग विषय हैं। इसी प्रकार प्रत्येक अमावस्या पर एक जैसी पूजा या श्राद्ध-प्रथा सभी लोगों द्वारा मानना उचित नहीं होगा।

हिन्दू चांद्र महीने और उनके नाम

प्रचलित बारह मासों के नाम हैं—चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। बोलचाल में श्रावण को सावन, भाद्रपद को भादो और कार्तिक को कातिक भी कहा जा सकता है। ऐतिहासिक ग्रंथों में इन नामों का संबंध नक्षत्रों और सूर्य की गति से समझाया गया है। परन्तु सभी आधुनिक प्रदेशों में एक समान नामांकन प्रणाली लागू नहीं होती। 7

अमांत पद्धति: मास का अंत अमावस्या पर माना जाता है। एक नामित मास में सामान्यतः पहले शुक्ल पक्ष और फिर कृष्ण पक्ष आते हैं।

पूर्णिमांत पद्धति: मास का अंत पूर्णिमा पर माना जाता है। नामित मास में सामान्यतः पहले कृष्ण पक्ष और फिर शुक्ल पक्ष आते हैं।

दोनों पद्धतियों में आकाश में दो अलग चंद्रमा नहीं चलते! अंतर मुख्यतः मास की सीमा और उसके नाम का है। विशेषकर कृष्ण पक्ष की तिथियाँ दोनों प्रणालियों में अलग नाम वाले मास में बताई जा सकती हैं। इसीलिए महाशिवरात्रि के चांद्र मास को लेकर दो परंपरागत विवरण मिलते हैं; यह आवश्यक नहीं कि वे दो अलग उत्सव-दिन बताते हों। 7

उत्तर भारत की बहुत-सी परंपराओं में पूर्णिमांत और पश्चिमी-दक्षिणी भारत की अनेक चांद्र परंपराओं में अमांत पद्धति प्रचलित है। फिर भी केवल प्रदेश का नाम जान लेने से हर मंदिर और परिवार का नियम तय नहीं हो जाता। तमिल, बंगाली, मलयालम आदि सौर तथा मिश्रित क्षेत्रीय प्रणालियों को अलग समझना चाहिए।

सूर्य की गणना, संक्रांति और अधिक मास

संक्रांति सूर्य के किसी निर्धारित राशि-विभाग में प्रवेश का काल है। इस अर्थ में मकर संक्रांति, एकादशी जैसे चांद्र-तिथि वाले व्रत से अलग प्रकृति की है। सायन और निरयन राशिचक्र, तथा दोनों के संबंध में प्रयुक्त अयनांश, तकनीकी गणना में स्पष्ट होने चाहिए। भारत सरकार की खगोलीय प्रकाशन-परंपरा में सूर्य, चंद्रमा तथा अन्य संबंधित स्थितियों की गणना उपलब्ध कराई जाती है। 2, 4

बारह चांद्र चक्रों की कुल अवधि सौर वर्ष से कम होती है। ऋतुओं और चांद्र मासों का संबंध बनाए रखने के लिए कुछ वर्षों में अधिक मास जोड़ा जाता है। यह कोई मनमाने ढंग से बढ़ाया गया ग्रेगोरियन महीना नहीं है; चांद्र मास और सौर संक्रांति के आपसी संबंध से इसकी पारंपरिक गणना समझी जाती है। क्षय मास जैसी दुर्लभ स्थिति को समझने के लिए भी विशेष गणना आवश्यक है। ऐतिहासिक ग्रंथों में इन स्थितियों का विवरण मिलता है। 7

इसका व्यावहारिक अर्थ है कि “हर तीसरे साल एक अतिरिक्त महीना जोड़ दें” जैसे सरल अनुमान से विश्वसनीय पंचांग नहीं बन सकता। विशिष्ट वर्ष और पद्धति की वास्तविक गणना आवश्यक है।

सूर्योदय और मध्यरात्रि: दिन की दो सीमाएँ

मोबाइल या दीवार-कैलेंडर में तारीख सामान्यतः आधी रात को बदलती है। अनेक पारंपरिक पंचांगों में धार्मिक दिन का संबंध एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक माना जाता है। लेकिन वास्तविक तिथि, नक्षत्र या योग का परिवर्तन दिन के किसी भी समय हो सकता है। अतः पंचांग में “सूर्योदय के समय कौन-सी तिथि थी” और “तिथि कब समाप्त होगी” दोनों बातें महत्त्वपूर्ण हैं। 8

सूर्योदय की गणना भी किसी नगर की स्थिति और चुनी हुई खगोलीय परिभाषा पर निर्भर करती है। अमेरिकी नौसैनिक वेधशाला के विवरण के अनुसार सूर्य के ऊपरी किनारे, क्षितिज और वायुमंडलीय अपवर्तन के मान निर्धारित करके समय निकाला जाता है। ऊँचे पहाड़, स्थानीय क्षितिज और मौसम वास्तविक दर्शन के समय को थोड़ा बदल सकते हैं। 6

इसलिए दो शहरों में तिथि-परिवर्तन का खगोलीय क्षण एक ही हो सकता है, लेकिन उनके सूर्योदय अलग हो सकते हैं। परिणामस्वरूप सूर्योदय के आधार पर उस तिथि का संबंध अलग स्थानीय दिनों से हो सकता है। भारत से बाहर समय-क्षेत्र और डेलाइट सेविंग व्यवस्था का भी ध्यान रखना होगा। सही कैलेंडर को पहले समय का निर्विवाद क्षण संभालना चाहिए, फिर उसे स्थानीय घड़ी में दिखाना चाहिए।

क्षय तिथि और वृद्धि तिथि को समझें

कभी कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है। तब सूर्योदय-आधारित दिन-नाम में वह क्षय या लुप्त तिथि कहलाती है। कभी वही तिथि लगातार दो सूर्योदय पर चल रही होती है; तब उसे दो दिनों पर दर्शाया जाता है और वृद्धि या पुनरावृत्त तिथि कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि चंद्रमा ने कोई वास्तविक कला छोड़ दी, या समय पीछे चला गया। यह तिथि-अंतराल और सूर्योदय से दिन निर्धारित करने के नियम के बीच का संबंध है। 8

ऐसी स्थितियाँ बताती हैं कि प्रत्येक अंग्रेज़ी तारीख पर तिथि का अंक बस एक बढ़ा देने वाला प्रोग्राम गलत परिणाम दे सकता है। किस पर्व के लिए लुप्त अथवा दो सूर्योदयों पर बनी तिथि में कौन-सा दिन चुनना है, यह अलग धार्मिक नियम से निर्धारित होता है।

प्रत्येक व्रत के लिए ‘सूर्योदय की तिथि’ पर्याप्त क्यों नहीं?

अलग पर्वों में दिन अथवा रात के अलग भाग महत्त्वपूर्ण होते हैं। कुछ उदाहरण देखें:

विषयसमीक्षा योग्य विशेष बात
प्रदोष व्रतसंबंधित त्रयोदशी और सायंकालीन प्रदोष अवधि का मेल; मात्र त्रयोदशी कहना पर्याप्त नहीं
महाशिवरात्रि / मासिक शिवरात्रिकृष्ण चतुर्दशी और रात्रि का उपयुक्त अंतराल; परंपरा-विशेष के नियम
श्रीकृष्ण जन्माष्टमीअष्टमी, मध्यरात्रि तथा स्मार्त–वैष्णव पद्धति से जुड़े भेद
एकादशीव्रत के दिन का चयन और द्वादशी में पारण का अलग समय
नवरात्रिकई दिनों की क्रमबद्धता और घटस्थापना आदि के विशेष नियम
मकर संक्रांतिसूर्य की संक्रांति; इसे चांद्र तिथि से तय नहीं किया जाता

यह तालिका पर्व की वास्तविक तारीख निकालने वाला सूत्र नहीं है। इसमें उन प्रश्नों का परिचय है जिन्हें सत्यापित निर्णय-नियम में अलग-अलग सुलझाना होगा। उदाहरण के लिए प्रदोष व्रत महीने में सामान्यतः दो बार आता है और उसे प्रत्येक त्रयोदशी की पूरी अवधि का पर्याय मानना गलत होगा। 8

घर, मंदिर और समुदाय में पंचांग का स्थान

कई परिवार पर्व, व्रत, संस्कार, यात्राएँ, पितृ-स्मरण और सामुदायिक आयोजनों में पंचांग देखते हैं। दैनिक आराधना के साथ कुछ नियम हर पक्ष, हर मास अथवा निश्चित ऋतु में लौटते हैं। मंदिर अपनी परंपरा तथा प्रतिष्ठित पंचांग-प्रणाली का अनुसरण कर सकते हैं। परंपरा में किसी समय को शुभ मानना एक धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि है; उससे स्वास्थ्य, धन या सफलता का वैज्ञानिक रूप से सुनिश्चित परिणाम सिद्ध नहीं होता।

व्रत का अर्थ केवल भोजन न करना नहीं, बल्कि संकल्प, संयम, प्रार्थना या निर्धारित धार्मिक आचरण भी हो सकता है। सभी व्रतों में एक-सा उपवास नहीं रखा जाता। जिन लोगों के लिए उपवास स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुपयुक्त हो, उनके लिए किसी सामान्य जानकारी वाले लेख से अनिवार्य उपवास का आदेश निकालना उचित नहीं है। मुहूर्त भी अलग विशेषज्ञता और परंपरा-समीक्षा वाला विषय है; पंचांग देखकर अपने-आप किसी कार्य के लिए निर्विवाद ‘सबसे श्रेष्ठ समय’ घोषित नहीं किया जा सकता।

शिवगोरक्ष पर सावन के सोमवार, मासिक शिवरात्रि, प्रदोष और महाशिवरात्रि जैसे शिव-संबंधित प्रसंगों का स्वाभाविक संबंध समझाया जाएगा। इसी तरह नवरात्रि में शक्ति की आराधना तथा गुरु पूर्णिमा में नाथ-संप्रदाय सहित गुरु-शिष्य परंपराओं का महत्व दिखाया जा सकता है। लेकिन इससे यह दावा नहीं बनता कि पूरे हिन्दू कैलेंडर की प्रत्येक परंपरा शैव या नाथ ही है।

दैनिक पंचांग कैसे पढ़ें?

सबसे पहले देखें कि पंचांग किस शहर, किस समय-क्षेत्र और किस परंपरा के लिए बना है। इसके बाद सूर्योदय की तिथि और तिथि-समाप्ति का समय अलग-अलग पढ़ें। पक्ष के साथ तिथि को जोड़ें; केवल ‘अष्टमी’ कहने से यह स्पष्ट नहीं होता कि शुक्ल अष्टमी है या कृष्ण अष्टमी। मास के नाम के साथ अमांत या पूर्णिमांत पद्धति भी देखें। नक्षत्र, योग और करण सूर्योदय पर दर्ज स्थिति हैं या पूरे दिन में बदलते रहने वाले अंतराल—यह स्पष्ट करें।

फिर विशेष व्रत का नियम देखें। खगोलीय आँकड़ा अपने-आप नहीं बताता कि किसी परिवार, संप्रदाय या मंदिर की धार्मिक परंपरा क्या मानती है। एक विश्वसनीय वेबसाइट को अपने चुने हुए नियम का परिचय देना चाहिए और जहाँ जानकारी या समर्थन उपलब्ध न हो, वहाँ सीमा स्वीकार करनी चाहिए।

सामान्य भ्रम और उनके उत्तर

भ्रम: हर पर्व सूर्योदय की तिथि से ही तय होता है। वास्तविकता: कुछ पर्वों के लिए संध्या, मध्यरात्रि, चंद्रोदय अथवा अन्य विशिष्ट अवधि निर्णायक हो सकती है।

भ्रम: अमांत और पूर्णिमांत में चंद्रमा की गति अलग होती है। वास्तविकता: उनका प्रमुख अंतर मास की सीमा और नामांकन का है; अन्य स्थानीय भिन्नताओं की जाँच अलग विषय है।

भ्रम: पूर्णिमा का अर्थ पूरे दिन चंद्रमा का ठीक पूर्ण होना है। वास्तविकता: पूर्ण चंद्रमा की खगोलीय अवस्था एक विशेष क्षण के आसपास होती है, चौबीस घंटे एक-सी नहीं रहती। 5

भ्रम: पंचांग में सब कुछ विज्ञान द्वारा प्रमाणित भविष्यवाणी है। वास्तविकता: ग्रह-स्थितियाँ और समय खगोल विज्ञान से निकाले जा सकते हैं; धार्मिक शुभता, भविष्यफल और चमत्कार के दावे अलग प्रकृति के हैं।

भ्रम: राष्ट्रीय पंचांग का होना हर स्थानीय धार्मिक मतभेद को समाप्त कर देता है। वास्तविकता: सरकारी मानकीकृत संदर्भ उपयोगी है, लेकिन स्थानीय पर्व-निर्णय में परंपरा और विशिष्ट नियम की पहचान अभी भी आवश्यक है। 1

शब्दावली

पंचांग: पाँच अंग वाला परंपरागत अल्मनैक। तिथि: चांद्र दिन। पक्ष: चंद्र-मास का आधा चरण। पूर्णिमा: पूर्ण चंद्रमा से संबद्ध तिथि। अमावस्या: नवचंद्र से संबद्ध तिथि। नक्षत्र: चंद्रपथ का परंपरागत विभाग। करण: आधी तिथि। योग: सूर्य और चंद्रमा के निर्धारित देशांतर-योग का विभाग। अमांत/पूर्णिमांत: चांद्र-मास के समापन की पद्धतियाँ। अधिक मास: समायोजन के लिए अतिरिक्त चांद्र मास। संक्रांति: सूर्य का राशि-प्रवेश। व्रत: धार्मिक संकल्प/आचरण। पारण: व्रत का समापन। अयनांश: सायन और निरयन राशिचक्रों के संदर्भों का कोणीय अंतर।

संदर्भ और स्रोत (9)

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  1. Rashtriya Panchang

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    Positional Astronomy Centre, India Meteorological Department, Government of India
    संस्करण
    Government publication series; webpage describes scope and publication history, not an inspected specific annual volume
  2. The Indian Astronomical Ephemeris

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    Positional Astronomy Centre, India Meteorological Department, Government of India
    संस्करण
    Official annual series; overview webpage inspected, not a particular annual printed volume
  3. Positional Astronomy

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    India Meteorological Department / Positional Astronomy Centre
    संस्करण
    Government service overview
  4. VedicDateTime: An R package to implement Vedic calendar system

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    रचनाकार
    Neeraj Dhanraj Bokde; Prajwal Kailasnath Patil; Saradindu Sengupta; Manisha Sawant; Andrés E. Feijóo-Lorenzo
    संस्करण
    Multimedia Tools and Applications, volume 83, pages 32141–32157 (2024); published online 19 September 2023; DOI 10.1007/s11042-023-16553-w
  5. Moon Phases

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    NASA Science / Jet Propulsion Laboratory
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    NASA Science explanatory page; not a Hindu calendar source
  6. Rise, Set, and Twilight Definitions

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    रचनाकार
    Astronomical Applications Department, U.S. Naval Observatory
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    Official astronomical reference webpage
  7. The Indian Calendar: With Tables for the Conversion of Hindu and Muhammadan into A.D. Dates, and Vice Versa

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    रचनाकार
    Robert Sewell and Sankara Balakrishna Dikshit; with eclipse tables by Robert Schram
    संस्करण
    London: Swan Sonnenschein & Co., 1896; Part I, article 45, printed page 25 (Wikisource scan transcription)
  8. The Indian Calendar, Part I: Expunged and repeated Tithis

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    रचनाकार
    Robert Sewell and Sankara Balakrishna Dikshit
    संस्करण
    1896; Part I, articles 31–34, printed page 18 (Wikisource page transcription)
  9. Drik Panchang: Online Hindu Almanac and Calendar

    स्रोत खोलें 9

    रचनाकार
    Drik Panchang (tradition-specific commercial almanac provider)
    संस्करण
    Provider methodology and public service description; examples are not adopted as approved ShivGoraksh data
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे का अध्ययन

यहाँ प्रयुक्त संकेतों का विस्तृत विवरण, पहुँच-सीमा और अधिकार-संबंधी स्थिति स्रोत और संस्करण विवरण में दर्ज है। 1 भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचांग; 2 इंडियन एस्ट्रोनॉमिकल एफेमेरिस; 3 पोज़िशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर; 4 बोखडे तथा सहलेखकों का पंचांग-कंप्यूटिंग अध्ययन; 5 नासा का चंद्रकलाओं पर विवरण; 6 अमेरिकी नौसैनिक वेधशाला की सूर्योदय-सूर्यास्त परिभाषाएँ; 7 सिवेल और दीक्षित, द इंडियन कैलेंडर (1896); 8 उसी ऐतिहासिक ग्रंथ में सूर्योदय और तिथि की पुनरावृत्ति का विवेचन; 9 स्थान-आधारित पंचांग सेवा का व्यावहारिक विवरण। ये खगोल विज्ञान, ऐतिहासिक अध्ययन, आधुनिक तकनीकी शोध तथा जीवित परंपरा के अलग-अलग प्रकार के स्रोत हैं; इन्हें एक ही धार्मिक प्रामाणिकता का पर्याय नहीं मानना चाहिए।

इस लेख के बारे में

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