काश्मीर शैव दर्शन आधुनिक अध्ययन में प्रचलित एक व्यापक नाम है, जिसके अन्तर्गत मध्यकालीन कश्मीर में विकसित परस्पर सम्बद्ध अद्वैत शैव दार्शनिक और तान्त्रिक परम्पराएँ रखी जाती हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थ-विचारों में त्रिक, स्पन्द और प्रत्यभिज्ञा सम्मिलित हैं। वसुगुप्त, सोमानन्द, उत्पलदेव, अभिनवगुप्त और क्षेमराज इस इतिहास के महत्त्वपूर्ण आचार्य माने जाते हैं।
अद्वैत व्याख्याओं में परम चैतन्य को शिव और अनुभव-जगत् को उनकी स्वाभाविक शक्ति की अभिव्यक्ति माना जाता है। कुछ ग्रन्थों में अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा पर विशेष बल है। किन्तु मध्यकालीन कश्मीर में द्वैतवादी शैव सिद्धान्त भी था; अतः वहाँ की सभी शैव परम्पराओं को एक ही अद्वैत दर्शन में नहीं समेटना चाहिए।



