ऐतिहासिक शैव धाराओं में पाशुपत परम्परा (पशुपति की प्राचीन संगठित तपस्वी उपासना), शैव सिद्धान्त (आगमिक अनुष्ठान और दर्शन), तथा काश्मीर की अद्वैत शैव परम्पराएँ प्रमुख हैं, जिनमें त्रिक, स्पन्द और प्रत्यभिज्ञा के ग्रन्थ-विचार शामिल हैं। इनके अतिरिक्त कौल तथा भैरव-संबद्ध तान्त्रिक धाराएँ, तमिल शैव भक्ति और वीरशैव/लिंगायत जैसी क्षेत्रीय धार्मिक परम्पराएँ भी उल्लेखनीय हैं।
ये नाम किसी एक सर्वमान्य वर्गीकरण के स्तर नहीं हैं। कुछ दार्शनिक मतों के नाम हैं, कुछ अनुष्ठानिक वंश-परम्पराएँ हैं और कुछ व्यापक धार्मिक समुदाय या क्षेत्रीय आन्दोलन हैं। इनमें ऐतिहासिक सम्पर्क तथा आपसी प्रभाव भी रहे हैं। इसलिए किसी संक्षिप्त सूची को शैव मत के सभी सम्प्रदायों की अन्तिम और निर्विवाद सूची नहीं कहना चाहिए।



