भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व में स्थित संस्कृत दार्शनिक और भक्तिपरक संवाद है। युद्ध से पहले कर्तव्य और नैतिक संकट से विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं। इस संवाद में कर्म, धर्म, आत्मज्ञान, भक्ति, योग, ईश्वरतत्त्व और मोक्ष पर चर्चा होती है।
गीता को अनेक हिन्दू परम्पराएँ श्रद्धा से पढ़ती हैं, किन्तु उसकी व्याख्या केवल एक आचार्य या मत तक सीमित नहीं। अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत तथा अन्य परम्पराएँ अनेक पदों की अलग व्याख्या करती हैं। गीता महाभारत का भाग है; इसे वेद की अलग संहिता नहीं माना जाता। किसी श्लोक का ठीक पाठ जाँचने के लिए उसका निर्दिष्ट संस्कृत संस्करण और अध्याय-श्लोक संख्या देखनी चाहिए; अलग डिजिटल अनुवादों को एक ही पाठ-साक्ष्य न मानें।



