श्रुति का सामान्य अर्थ है ‘जो सुना गया’ और स्मृति का ‘जो स्मरण या परम्परा से संप्रेषित हुआ’। पारम्परिक वर्गीकरण में श्रुति मुख्यतः वेद-साहित्य को कहा जाता है, जिसमें वेदों से जुड़े उपनिषद् भी आते हैं। अनेक आस्तिक दर्शन-परम्पराएँ श्रुति को विशेष प्रमाण मानती हैं, क्योंकि उसे ऋषियों द्वारा अनुभूत अथवा सुनी गई शिक्षा के रूप में समझा जाता है।
स्मृति की व्यापक श्रेणी में महाभारत, अनेक धर्मशास्त्र और पुराण जैसे ग्रन्थ आते हैं। भगवद्गीता का अत्यन्त उच्च धार्मिक स्थान होते हुए भी उसे सामान्यतः स्मृति-साहित्य से जोड़ा जाता है, क्योंकि वह महाभारत का भाग है। इस भेद का महत्त्व है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी शैव, शाक्त, वैष्णव या अन्य समुदाय हर ग्रन्थ की प्रतिष्ठा बिल्कुल एक जैसी मानते हों।



