मोक्ष अथवा मुक्ति का सामान्य अर्थ कर्म, अविद्या और जन्म-मरण के चक्र (संसार) से जुड़े बन्धन से मुक्ति है। अनेक हिन्दू परम्पराओं में यह जीवन का प्रमुख आध्यात्मिक लक्ष्य माना गया है। किन्तु बन्धन क्या है और मुक्ति में क्या प्राप्त होता है, इसकी व्याख्या सभी दर्शन एक समान नहीं करते।
अद्वैत में ब्रह्मन् और आत्मन् के अभेद का साक्षात्कार प्रमुख है। कुछ भक्तिपरक वेदान्त मतों में जीव की पृथक् सत्ता बने रहते हुए परमेश्वर से शाश्वत सम्बन्ध पर बल है। सांख्य-योग में विवेकजन्य कैवल्य की चर्चा होती है, जिसे हर सन्दर्भ में मोक्ष का पूर्ण पर्याय मानना उचित नहीं। मोक्ष केवल सुख, सफलता या तुरन्त दुःख-समाप्ति का सामान्य वादा नहीं है। उसकी प्रकृति और साधन बताते समय ग्रन्थ तथा परम्परा स्पष्ट होनी चाहिए।



