ब्रह्मन् वेदान्त में परम तत्त्व या चरम वास्तविकता का एक महत्त्वपूर्ण नाम है। उपनिषद् विभिन्न प्रसंगों में उसे अस्तित्व का आधार, स्रोत या गहनतम सत्य बताते हैं। इन कथनों की बाद के दार्शनिक मतों में अलग-अलग व्याख्याएँ हुई हैं। छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7 आत्मन् और परम तत्त्व के सम्बन्ध पर विचार का प्रमुख सन्दर्भ है।
अद्वैत में ब्रह्मन् अन्ततः अद्वय है और आत्मन् की परम पहचान उससे भिन्न नहीं। विशिष्टाद्वैत में ब्रह्मन् सगुण, परमेश्वररूप है; जीव और जगत वास्तविक होकर उसी पर आश्रित हैं। माध्व-द्वैत में ब्रह्मन् विष्णु हैं; जीव तथा जड़ पदार्थ उनसे भिन्न एवं आश्रित हैं। ब्रह्मन् और देवता ब्रह्मा एक ही शब्द नहीं हैं, न ही इसका अर्थ सामाजिक वर्ग 'ब्राह्मण' है। किसी एक मत को सर्वमान्य परिभाषा के रूप में नहीं रखना चाहिए।



