आत्मन् (आत्मा) अनेक हिन्दू दर्शनों में उस स्व अथवा चेतन सत्ता का नाम है, जिसे केवल बदलते शरीर, विचारों या सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं माना जाता। उपनिषदों में यह प्रश्न प्रमुख है कि अनुभव करने वाला वास्तविक स्व कौन है। कठोपनिषद् 1.2.18 आत्मन् की अविनाशिता से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण पारम्परिक सन्दर्भ है। यह एक दार्शनिक-आध्यात्मिक प्रतिपादन है, आधुनिक विज्ञान द्वारा सिद्ध कोई निष्कर्ष नहीं।
सभी दर्शन आत्मन् को एक समान नहीं समझते। अद्वैत वेदान्त में आत्मन् की परम पहचान ब्रह्मन् से अभिन्न मानी जाती है। द्वैत वेदान्त में जीवात्माएँ वास्तविक, परस्पर भिन्न और परम सत्ता पर आश्रित हैं। दूसरे मतों में आत्मा, अनुभव, कर्तृत्व तथा मुक्ति की व्याख्या अलग हो सकती है। इसलिए आत्मन् की परिभाषा देते समय सम्बन्धित परम्परा बताना आवश्यक है।



