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भक्ति-परम्पराओं में जप क्या है?

English

जप का अर्थ है किसी देव-नाम, मन्त्र या प्रार्थना की बार-बार आवृत्ति द्वारा स्मरण और मन को एकाग्र करना। यह सामान्य भक्ति का भाग भी हो सकता है और किसी गुरु-निर्देशित साधना का अंग भी। विभिन्न परम्पराओं में उच्च स्वर, धीमे स्वर या मन में की जाने वाली आवृत्ति मिलती है। अनेक भक्तिधाराओं में जप का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्मरण, श्रद्धा और एकाग्रता विकसित करना है।

योगसूत्र १.२८ में पहले बताए गए पवित्र प्रणव के जप को उसके अर्थ के चिंतन से जोड़ा गया है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हिन्दू धर्म की सभी परम्पराओं के लिए एक ही जप-विधि अनिवार्य है। किसी विशिष्ट मन्त्र की पात्रता और अनुशासन उसके स्रोत तथा परम्परा पर निर्भर हो सकते हैं। यहाँ केवल अवधारणा का परिचय है, कोई निर्धारित जप-साधना नहीं।

संदर्भ और स्रोत

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  1. Yoga Sūtra 1.27–1.28 with traditional commentary
  2. Yoga Sūtra 1.28 in Sanskrit with Vyāsa-bhāṣya
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