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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा): विद्या की आराधना और ऋतु का उल्लास

चुने वर्ष की गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

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इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
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किसी घर में देवी के समीप रखी पुस्तकें हैं, किसी विद्यालय में बच्चे पहली बार अक्षर लिखना सीख रहे हैं, कहीं संगीत के वाद्य आदर से सजाए जा रहे हैं और कहीं दूर तक फैले सरसों के खेत पीले फूलों से चमक रहे हैं। ये दृश्य वसंत पंचमी के विविध रूपों की याद दिलाते हैं। इसे बसंत पंचमी, श्रीपंचमी और अनेक स्थानों पर सरस्वती पूजा भी कहते हैं। यह दिन बहुत-से हिंदू परिवारों में ज्ञान, वाणी, संगीत और कलाओं की अधिष्ठात्री मानी जाने वाली माँ सरस्वती को समर्पित है। कई क्षेत्रों में इसके साथ ऋतु, लोक-संस्कृति, गीत और सामुदायिक मेल-मिलाप का भी विशेष महत्त्व है। 1, 3, 5

इस पर्व का संदेश केवल परीक्षा में सफलता की प्रार्थना करना नहीं है। यह सोचने का अवसर भी है कि हम जो सीखते हैं, उसका प्रयोग कैसे करते हैं; अपनी वाणी में कितनी संवेदनशीलता रखते हैं; और शिक्षकों तथा ज्ञान बाँटने वाले लोगों के प्रति कितनी कृतज्ञता अनुभव करते हैं। धर्म और संस्कृति से जुड़ी यह व्याख्या आस्था का विषय है, किसी निश्चित परिणाम का वैज्ञानिक दावा नहीं।

वसंत पंचमी कब मनाई जाती है?

प्रचलित हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से संबंधित है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा का प्रकाशित भाग सामान्यतः बढ़ता दिखाई देता है। तिथि सूर्य और चंद्रमा की कोणीय स्थिति पर आधारित होती है; उसका आरंभ और अंत घड़ी के अनुसार आधी रात को होना आवश्यक नहीं। इसलिए किसी अंग्रेज़ी तारीख से पाँच दिन जोड़कर वसंत पंचमी का सही दिन निकालना संभव नहीं है। सामान्य रूप से यह पर्व शीतकाल के अंतिम हिस्से से जुड़ा माना जाता है, लेकिन ऋतु का यह वर्णन दिन तय करने का गणितीय नियम नहीं है। 1, 2

सरस्वती पूजा के लिए प्रकाशित एक उत्तर भारतीय पंचांग-पद्धति में पूर्वाह्न—दिन के पहले भाग—का विशेष ध्यान रखा गया है। संबंधित दिन पूर्वाह्न में पंचमी तिथि की स्थिति और उसकी समय-अवधि महत्त्वपूर्ण हो सकती है। स्थानीय सूर्योदय, पंचमी के वास्तविक आरंभ-अंत तथा पंचांग की परंपरा से चुनी हुई नागरिक तारीख प्रभावित होती है। कुछ परिस्थितियों में चुने गए दिन सूर्योदय पर पंचमी के बजाय दूसरी तिथि भी हो सकती है। अतः केवल ‘सूर्योदय पर पंचमी होनी चाहिए’ जैसा सरल नियम बिना विशेषज्ञ जाँच के लागू नहीं किया जा सकता। बंगाल, असम या अन्य स्थानीय पंजिका की पद्धतियों की तुलना भी ज़रूरी है। 1, 2

शिवगोरक्ष पंचांग में: किसी समर्थित नगर और वर्ष के लिए अगले पर्व की वास्तविक अंग्रेज़ी तारीख तथा पूजा का समय तभी दिखना चाहिए, जब अलग से तैयार कैलेंडर प्रणाली का परिणाम विशेषज्ञ द्वारा सत्यापित हो। ऐसी स्वीकृति न होने पर स्पष्ट सूचना दिखाई जाएगी—“इस शहर/वर्ष के लिए तिथि और समय अभी सत्यापित नहीं हैं।” लेख स्वयं कोई अप्रमाणित मुहूर्त या अनुमानित समय प्रकाशित नहीं करता।

माँ सरस्वती कौन हैं?

देवी सरस्वती को हिंदू परंपराओं में विद्या, विवेक, वाणी, भाषा, साहित्य, संगीत और कलाओं से जोड़ा जाता है। उनके अनेक चित्रों और प्रतिमाओं में वीणा, पुस्तक या पांडुलिपि, जपमाला, कमल तथा हंस दिखाई देते हैं। फिर भी हर चित्र में सभी चिह्न हों, यह आवश्यक नहीं है। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में सुरक्षित ऐतिहासिक चित्रों में वीणा और पुस्तक का ज्ञान तथा संगीत से संबंध स्पष्ट दिखता है; साथ ही हंस और मोर जैसे चित्रणों का अंतर भी सामने आता है। 3, 4

सरस्वती की परंपरा को किसी एक ‘जन्म-कथा’ तक सीमित करना ठीक नहीं होगा। ऋग्वेद के छठे मंडल का 61वाँ सूक्त सरस्वती की स्तुति करता है और उसमें प्रवाह, सामर्थ्य, संरक्षण तथा प्रेरक शक्ति की छवियाँ दिखाई देती हैं। इस सूक्त में यह नहीं कहा गया कि वसंत पंचमी सरस्वती का जन्मदिन है। उत्तरवर्ती भक्ति-परंपराओं में देवी की विद्या और वाणी से जुड़ी पहचान विशेष रूप से उभरी। कुछ भक्त समुदाय इस दिन को सरस्वती जयंती और देवी के प्राकट्य का दिन मानते हैं। ऐसे विश्वासों को संबंधित परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि ऋग्वेद का सीधा कथन अथवा प्रमाणित इतिहास बताकर। 6, 3, 1

श्रीपंचमी भी इस अवसर का मान्य प्रचलित नाम है। लेकिन ‘सरस्वती पूजा’ का अर्थ हर क्षेत्र में केवल माघ पंचमी की पूजा नहीं है। दक्षिण भारत की कई परंपराओं में शारदीय नवरात्रि, आयुध पूजा और विजयादशमी के समय भी देवी सरस्वती तथा विद्या के साधनों की विशेष आराधना होती है। दोनों परंपराओं का सम्मान करते हुए उनकी अलग-अलग तिथियाँ और संदर्भ समझना चाहिए। 1

विद्या, वाणी और संगीत के लिए यह दिन विशेष क्यों है?

आस्था रखने वाले भक्त देवी सरस्वती से समझ, एकाग्रता, अध्ययन-शीलता तथा सृजनशीलता का आशीर्वाद माँगते हैं। घर में पुस्तकें सम्मानपूर्वक रखी जाती हैं, विद्यालयों में विद्यार्थियों और शिक्षकों की सहभागिता होती है तथा संगीत सीखने वाले अपने वाद्यों को आदर देते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि ज्ञान केवल सूचना जमा करना नहीं है; उसका सही उपयोग, निरंतर अभ्यास और जिम्मेदार वाणी भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि पूजा से निश्चित अंक, नौकरी या कलात्मक सफलता की गारंटी मिल जाती है। 1, 3

वीणा से संगीत और संतुलन का, पुस्तक से अध्ययन का तथा हंस से विवेक का अर्थ जोड़ा जाता है। देवी के श्वेत वस्त्रों को पवित्रता, सादगी या निर्मलता के प्रतीक के रूप में समझाया जाता है। ये धार्मिक-सांकेतिक व्याख्याएँ हैं; हर परंपरा में उनके अर्थ बिल्कुल एक जैसे नहीं मिलते। सरस्वती को दिव्य शक्ति के व्यापक विचार से भी जोड़ा जा सकता है, किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वसंत पंचमी मुख्यतः नाथ संप्रदाय या किसी एक शैव पूजा-पद्धति का पर्व है। 3, 4

विद्या के प्रति आदर का सरल रूप भी उपयोगी है—किसी शिक्षक का धन्यवाद करना, किसी बच्चे को धैर्य से पढ़ाना, स्वयं नियमित अभ्यास करना या अपनी भाषा में शिष्टता रखना। जिन परिवारों में पूजा होती है, उनके लिए ये अच्छे कार्य आराधना की भावना को दैनिक जीवन में उतारने के माध्यम बन सकते हैं।

घर, विद्यालय और कला-संस्थानों में सरस्वती पूजा कैसे होती है?

बहुत-से परिवार पूजा के स्थान की सफ़ाई करके देवी सरस्वती का चित्र या प्रतिमा स्थापित करते हैं और फूल, फल, मिठाई अथवा अन्य स्थानीय सामग्री अर्पित करते हैं। पुस्तकों, कॉपियों, कलम और वाद्ययंत्रों को देवी के समीप रखना भी कहीं-कहीं प्रचलित है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में सामूहिक पूजा, प्रार्थना, सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत या कविता-पाठ का आयोजन हो सकता है। इन परंपराओं का स्वरूप स्थान के अनुसार बदलता है। 1, 5

बच्चों को पहली बार अक्षर-ज्ञान से परिचित कराने की परंपरा विद्यारंभ या अक्षराभ्यास कही जाती है। बंगाल की कुछ परंपराओं में इसे हाते खोरी कहते हैं—अर्थात बच्चे का पहली बार लिखने की सामग्री पकड़ना और अक्षर लिखना सीखना। यह बहुत अर्थपूर्ण सांस्कृतिक अवसर हो सकता है, लेकिन हर परिवार और हर क्षेत्र में वही विधि तथा वही दिन अपनाया जाए, ऐसा नियम नहीं है। 1

कहीं लोग सुबह पुष्पांजलि अर्पित करते हैं, कहीं घरों में देवी की वंदना होती है और कहीं केवल मिल-जुलकर उत्सव मनाया जाता है। कुछ परिवार पूजा के दौरान पुस्तकें अलग रखकर उस दिन उन्हें फिर न खोलने की परंपरा का पालन कर सकते हैं; अनेक दूसरे परिवार नियमित अध्ययन करते रहते हैं। इसे सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य निषेध के रूप में नहीं बताना चाहिए। सादगी से किया गया सम्मान भी भक्ति का सम्मानजनक रूप है। 1

पूजा के साथ सरस्वती वंदना, आरती या स्तोत्र-पाठ भी जुड़ सकता है। किंतु मंत्रों की शुद्ध पाठ-परंपरा, विशेष दीक्षा और विस्तृत अनुष्ठान को बिना प्रमाणित स्रोत और योग्य परामर्श के इस सामान्य जानकारी वाले लेख में निर्देश के रूप में नहीं दिया जा रहा है। विशिष्ट पूजा-विधि और प्रमाणित स्तोत्र अलग समीक्षा-स्वीकृत सामग्री में प्रस्तुत किए जाने चाहिए।

उपवास के बारे में: वसंत पंचमी पर कुछ लोग व्यक्तिगत या पारिवारिक नियम के अनुसार हल्का भोजन, फलाहार अथवा उपवास करते हैं; कई परिवार सामान्य भोजन करते हैं। सभी लोगों के लिए एक ही अनिवार्य उपवास या पारणा-विधि बताना उचित नहीं। बच्चों अथवा ऐसे व्यक्तियों पर उपवास का दबाव नहीं होना चाहिए जिनके लिए भोजन छोड़ना उचित नहीं है।

वसंत पंचमी पर पीला रंग क्यों दिखाई देता है?

उत्तर भारत में इस समय सरसों के पीले फूल खेतों को विशेष रूप देते हैं। गेंदे जैसे फूल भी उत्सवी सजावट का हिस्सा बनते हैं। इसी अनुभव से बसंती रंग का संबंध नई उमंग, स्फूर्ति, शुभारंभ और प्रकृति के बदलाव से जोड़ा जाता है। बिहार सरकार का उत्सव-वर्णन भी सरसों के खेतों, पीले वस्त्रों, भोजन और माँ सरस्वती की उपासना का उल्लेख साथ-साथ करता है। 5

लेकिन ऐसा नहीं कि सरस्वती का केवल पीला रंग ही मान्य है। अनेक ऐतिहासिक और आधुनिक चित्रों में देवी श्वेत वस्त्र धारण किए दिखाई देती हैं। कुछ पूजा-परंपराओं में श्वेत पुष्प भी प्रयुक्त होते हैं। ऋतु-उत्सव का पीला रंग और देवी की श्वेतवर्णी प्रतिमा—दोनों अपनी-अपनी प्रतीकात्मक भूमिका रखते हैं। इनके बीच विरोध मानना आवश्यक नहीं है। 1, 3, 4

भोजन और प्रसाद भी क्षेत्रानुसार अलग होते हैं। कहीं केसरयुक्त या पीले चावल, कहीं मौसमी फल, दूध से बनी मिठाइयाँ और कहीं सादा सामूहिक भोजन मिलता है। बंगाल में सरस्वती पूजा के अवसर पर कुल (बेर), फल तथा खिचुड़ी और सब्ज़ियों का भोजन कुछ समुदायों में लोकप्रिय है। इन व्यंजनों का उल्लेख क्षेत्रीय परंपरा के उदाहरण के रूप में है, सार्वभौमिक प्रसाद-सूची के रूप में नहीं। 1, 5

बिहार और उत्तर भारत: शिक्षा, श्रद्धा और पीला वसंत

बिहार में देवी सरस्वती की आराधना, विद्यार्थियों की सहभागिता और बसंती वातावरण को विशेष स्थान मिलता है। राज्य सरकार की सांस्कृतिक जानकारी में ज्ञान की देवी, पीले वस्त्र और सरसों के फूल साथ आते हैं। घरों, विद्यालयों और स्थानीय संस्थानों में पूजा के कई रूप दिखाई दे सकते हैं। उत्तर भारत के सभी क्षेत्रों में एक जैसी प्रतिमा, प्रसाद, गीत या उपवास-विधि है—ऐसा दावा नहीं करना चाहिए। 5

पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में बसंत पंचमी पर ऋतु-स्वागत, पीले परिधान, लोक-उत्साह और कहीं-कहीं पतंगबाजी का महत्त्व भी है। यह उल्लेख किसी जिले में हर वर्ष लगने वाले अनिवार्य मेले या एक-सी परंपरा का दावा नहीं है। कई परिवार पूजा भी करते हैं, तो अन्य लोग इसे वसंत की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की तरह मनाते हैं। इस क्षेत्रीय विविधता को जानना त्योहार की समृद्धि समझने में सहायता करता है। 1

पश्चिम बंगाल: विद्यार्थियों का उत्सव और हाते खोरी

पश्चिम बंगाल में सरस्वती पूजा या श्रीपंचमी विशेष परिचित नाम हैं। विद्यार्थी देवी की प्रतिमाओं के सामने पुस्तकें, लेखन-सामग्री, रंग-तूलिकाएँ तथा वाद्य रख सकते हैं। पीले या हल्के रंग के पारंपरिक कपड़े, सुबह की पुष्पांजलि, विद्यालय की पूजा, मोहल्ले के पंडाल और कुछ स्थानों पर प्रतिमाओं का विसर्जन भी उत्सव का हिस्सा हो सकते हैं। हाते खोरी में बच्चे के प्रारंभिक अक्षर-लेखन का भावनात्मक महत्त्व है। प्रतिमा विसर्जन का दिन अथवा हर घर की विधि समान मानना उचित नहीं। राज्य के उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद की अवकाश-सूची में भी ‘Saraswati Puja (Sree Panchami)’ नाम मिलता है, जो स्थानीय नाम की पुष्टि करता है; उससे सभी परिवारों की एक जैसी पूजा-विधि सिद्ध नहीं होती। 1, 8

असम: शिक्षा-संस्थानों में श्रद्धा

असम में भी सरस्वती पूजा का संबंध विद्यार्थी जीवन से प्रकट होता है। राज्य से जुड़ी शासकीय सूचनाओं में महाविद्यालयों तथा शैक्षिक कार्यक्रमों में सरस्वती पूजा के उल्लेख मिलते हैं। इससे विद्यालय-महाविद्यालयों में इस पर्व की उपस्थिति का प्रमाण मिलता है, लेकिन इसे असम के सभी परिवारों की समान पूजा-पद्धति नहीं मानना चाहिए। स्थानीय भाषाओं, समुदायों और प्रथाओं की अपनी विशिष्टता बनी रहती है। 9

ब्रजभूमि: कृष्ण-भक्ति और होली के रंगों की शुरुआत

मथुरा–वृंदावन तथा व्यापक ब्रज क्षेत्र में वसंत पंचमी का एक रूप राधा-कृष्ण भक्ति से भी जुड़ता है। कहीं ठाकुरजी को बसंती वस्त्र पहनाए जाते हैं, ऋतु के गीत गाए जाते हैं और होली के भावी उत्सव का संकेत देने के लिए गुलाल का प्रयोग किया जाता है। श्री बाँकेबिहारी मंदिर के अपने विवरण में बसंत पंचमी से प्रतीकात्मक होली की शुरुआत कही गई है, जबकि मंदिर का वार्षिक उत्सव-पंचांग रंगों वाली होली की शुरुआत के लिए आगे के एक अलग अवसर का उल्लेख भी करता है। इनमें विरोध मानने की जगह अलग-अलग उत्सवी चरणों को समझना आवश्यक है। वसंत पंचमी, रंगभरी एकादशी, होली और होलिका दहन को कैलेंडर में अलग विषय बने रहने चाहिए। 10, 11

नेपाल: स्वयम्भू क्षेत्र में विद्या की प्रार्थना

काठमांडू में नेपाल पर्यटन बोर्ड का विवरण स्वयम्भू क्षेत्र की एक मंजुश्री/सरस्वती-सम्बद्ध उपासना-स्थली का उल्लेख करता है। बसन्त पंचमी पर विद्यार्थियों और अभिभावकों के वहाँ पहुँचने तथा छोटे बच्चों को अक्षर लिखाना शुरू करवाने की प्रथा का वर्णन मिलता है। यह नेपाल की एक स्थानीय एवं विशिष्ट परंपरा है; पूरे देश के लिए एक ही पूजा-विधि या भारतीय नगरों के साथ हमेशा समान अंग्रेज़ी तारीख मान लेना उचित नहीं। 7

दक्षिण भारत में सरस्वती उपासना का अलग समय

दक्षिण भारतीय अनेक परिवारों में शारदीय नवरात्रि, आयुध पूजा और विजयादशमी के आसपास विद्या, पुस्तकों तथा उपकरणों का पूजन विशेष महत्त्व रखता है। यह माघ शुक्ल पंचमी से संबंधित वसंत पंचमी का अनिवार्य प्रतिरूप नहीं है। वेबसाइट के पाठक जब ‘सरस्वती पूजा कब है?’ पूछें, तो यह स्पष्ट करना उपयोगी होगा कि प्रश्न वसंत पंचमी की पूजा का है या शारदीय नवरात्रि की पूजा का। 1

क्या वसंत पंचमी ही बसंत ऋतु का वैज्ञानिक आरंभ है?

'वसंत' शब्द सुनते ही ऋतु का सौंदर्य, फूल, संगीत और नई ऊर्जा का भाव आता है। साहित्य तथा लोक-परंपरा में इसका महत्त्व स्वाभाविक है। फिर भी वसंत पंचमी की तिथि खगोलीय वसंत विषुव की तारीख नहीं है और भारत के सभी क्षेत्रों में मौसम भी एक दिन में समान रूप से नहीं बदलता। यह पर्व मुख्यतः चंद्र तिथि से जुड़ा है; इसे सौर संक्रांति या मौसम-विज्ञान के किसी निश्चित दिन से नहीं मिलाना चाहिए। 1, 5

इसी तरह ब्रज में बसंत पंचमी को होली का सांकेतिक रंग आरंभ होना, होलिका दहन की तिथि तय होने का नियम नहीं है। और दक्षिण में शरद नवरात्रि पर सरस्वती पूजा होने से माघ शुक्ल पंचमी का पर्व अपने-आप शरद ऋतु में स्थानांतरित नहीं हो जाता। क्षेत्रीय नामों का सम्मान करना और अलग अवसरों के कैलेंडर-अर्थ अलग रखना दोनों आवश्यक हैं। 10, 11

ज्ञान के प्रति नम्रता: पर्व का स्थायी संदेश

वसंत पंचमी बच्चों तक सीमित पर्व नहीं है। नया अक्षर लिखता बालक, कठिन राग का अभ्यास करता कलाकार, भाषा सीखता वयस्क और वर्षों बाद फिर से पुस्तक खोलता पाठक—सब इस उत्सव के संदेश से जुड़ सकते हैं। माँ सरस्वती की आराधना के पीछे निहित विचार यह है कि ज्ञान विनम्रता, समझ तथा सदुपयोग से जुड़ना चाहिए।

शिवगोरक्ष की विषय-वस्तु में इस दिन का सबसे निकट संबंध सरस्वती (सरस्वती) की शैक्षिक परिचय-सामग्री से है। शक्ति (शक्ति) से व्यापक धार्मिक संवाद संभव है, पर इस कारण इस पर्व को मुख्यतः नाथ अथवा शैव उत्सव घोषित नहीं किया जाना चाहिए। ब्रज की मान्यताओं के लिए होली (होली: कथा, रंग, परंपराएँ और धार्मिक महत्व) और होलिका दहन (होलिका दहन: प्रह्लाद की कथा और होली से पहले की अग्नि-परंपरा) संबंधित विषय हैं। इन नामों का उल्लेख संपादकीय संबंध बताता है; यह वेबसाइट पर उनके पन्नों के प्रकाशित होने की पुष्टि नहीं है।

संदर्भ और स्रोत (11)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Vasant Panchami | Shree Panchami: Saraswati Puja on Vasant Panchami

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    रचनाकार
    Drik Panchang
  2. Vasant Panchami Saraswati Puja Date and Time for New Delhi (example almanac rules page)

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    रचनाकार
    Drik Panchang
  3. Goddess Sarasvati (West Bengal Calcutta lithograph, 1878–1883)

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    The Metropolitan Museum of Art
  4. Saraswati, goddess of learning (Ravi Varma-era chromolithograph)

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    रचनाकार
    The Metropolitan Museum of Art
  5. Festivals: Basant Panchami

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    Information and Public Relations Department, Government of Bihar
  6. The Hymns of the Rigveda, Book 6, Hymn 61 (Griffith historical English rendering)

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    Ralph T. H. Griffith (translator); Wikisource transcriber
  7. Pilgrimage Sites (Swayambhu / Manjushree shrine)

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    रचनाकार
    Nepal Tourism Board
  8. List of Holidays: Saraswati Puja (Sree Panchami)

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    रचनाकार
    West Bengal Council of Higher Secondary Education
  9. All Events: Saraswati Puja Celebration

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    रचनाकार
    Diphu Medical College & Hospital, Government of Assam
  10. Holika Dahan: temple observance description

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    रचनाकार
    Shri Banke Bihari Mandir, Vrindavan (temple-administered page)
  11. Major Festivals (temple calendar)

    स्रोत खोलें 11

    रचनाकार
    Shri Banke Bihari Mandir, Vrindavan (temple-administered page)
लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे का अध्ययन

कोष्ठकों में दिए गए `` संकेतों की पूरी जानकारी साथ संलग्न स्रोत और संस्करण विवरण में है। प्रमुख संदर्भ हैं: 1 द्रिक पंचांग का वसंत पंचमी विवरण; 2 उसका स्थानीय पूर्वाह्न-नियम संबंधी विवरण (केवल शोध की दृष्टि से); 3, 4 मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम की सरस्वती चित्र-सामग्री; 5 बिहार सरकार की उत्सव-सूचना; 6 ऐतिहासिक ग्रिफ़िथ अनुवाद में ऋग्वेद 6.61; 7 नेपाल पर्यटन बोर्ड का स्वयम्भू विवरण; 8 पश्चिम बंगाल शिक्षा परिषद का स्थानीय नाम; 9 असम में शैक्षिक संस्था का प्रलेखित समारोह; 10, 11 श्री बाँकेबिहारी मंदिर के होली संबंधी विवरण।

ऋग्वेद का सूक्त इस पर्व की स्थापना की निश्चित ऐतिहासिक तारीख का प्रमाण नहीं माना गया है। इस लेख में कोई अप्रमाणित संस्कृत मंत्र, चमत्कार का निश्चित दावा, आने वाले वर्ष की अनुमानित तारीख या अस्वीकृत स्थानीय पूजा-समय प्रकाशित नहीं किया गया है।

इस लेख के बारे में

शैक्षिक पठन के लिए संस्थापक द्वारा समीक्षित संस्करण। स्वतंत्र विद्वत्-सत्यापन का दावा नहीं है। स्रोत-विशेष के पाठभेद और उपयोग की शर्तें ऊपर दिए गए संदर्भों में पढ़ें।

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