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मकर संक्रांति: सूर्य, फसल, खिचड़ी और भारत की विविध परंपराएँ

चुने वर्ष की गणना-आधारित तारीख

दिल्ली · 2026 · Asia/Kolkata

इन गणना-आधारित तारीखों का हर नगर और हर दिन के लिए स्वतंत्र सत्यापन नहीं हुआ है। पर्व-दिन की पुष्टि स्थानीय पंचांग से करें; स्थान और परम्परा के अनुसार तारीख बदल सकती है। तारीखें कैसे चुनी जाती हैं

पंचांग में देखें
इस पंचांग की गणना कैसे होती है

दिल्ली के लिए समय भारतीय मानक समय (Asia/Kolkata) में हैं। तारीखें सूर्य और चन्द्र की गणना से निकाली गई हैं; इनकी स्वतंत्र प्रमाणिकता समीक्षा पूरी नहीं हुई है।

यह उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त मास-परम्परा का उपयोग करता है। अलग-अलग परम्पराओं में पर्व या व्रत की तारीख अलग हो सकती है। कुछ लुप्त-सूर्योदय तिथियों का व्रत-दिन अभी अनिर्णीत है।

चन्द्र-चित्र सूर्योदय के समय की सांकेतिक आकृतियाँ हैं। मुहूर्त, पारण या घटस्थापना के समय यहाँ नहीं दिए जाते।

पंचांग की पूरी पद्धति और सीमाएँ
संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

कहीं छतों पर पतंगें उड़ रही हैं, कहीं नई फसल का चावल दूध के साथ उबल रहा है, कहीं तिल-गुड़ बाँटे जा रहे हैं और कहीं श्रद्धालु खिचड़ी लेकर गुरु गोरखनाथ के मंदिर पहुँच रहे हैं। ये सब दृश्य मकर संक्रांति से जुड़े पर्वकाल में दिखाई दे सकते हैं। इनके बीच एक सुंदर सूत्र है—सूर्य के प्रति आदर, अन्न देने वाली प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और लोगों के साथ बाँटकर जीने की भावना। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हर प्रदेश की अपनी परंपरा है; सबके उत्सव का नाम और विधान एक जैसा नहीं है। 3, 5, 6, 10

मकर संक्रांति का मुख्य आधार सूर्य का परंपरागत निरयण मकर राशि में प्रवेश है। अधिकतर प्रसिद्ध हिंदू पर्व किसी चंद्र तिथि से जुड़े होते हैं, जबकि यह मुख्यतः सौर संक्रमण पर आधारित पर्व है। इस अवसर पर कई समुदायों में सूर्यदेव को अर्घ्य, स्नान, दान, तिल-गुड़, अन्न-वितरण और कृषि से जुड़े उत्सव विशेष महत्त्व रखते हैं। 1, 10, 12

संक्रांति का अर्थ क्या है?

'संक्रांति' का आशय एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के संक्रमण से है। वर्ष में ऐसे अनेक संक्रमण होते हैं, लेकिन जिस संक्रमण में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, उसे मकर संक्रांति कहा जाता है। संक्रमण का क्षण और लोगों द्वारा मनाया जाने वाला पर्व-दिन अलग बातें हैं। उदाहरण के लिए, संक्रमण रात्रि में हो सकता है, जबकि किसी परंपरा में स्नान-दान का विशेष समय अगले दिन के प्रकाशकाल से जुड़ा होता है। 1, 11

भारत मौसम विज्ञान विभाग से संबद्ध पोज़िशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर के राष्ट्रीय पंचांग में निरयण सूर्य-स्थिति और राशियों में प्रवेश की गणना की जाती है। इसीलिए विश्वसनीय कैलेंडर को स्पष्ट करना होगा कि वह किस गणना-पद्धति और अयनांश का उपयोग कर रहा है। केवल किसी एक अंग्रेज़ी तारीख को स्थायी पर्व-दिन मान लेना पर्याप्त नहीं। 12

मकर संक्रांति और उत्तरायण: श्रद्धा का संबंध, खगोल का अंतर

बोलचाल और धार्मिक परंपराओं में मकर संक्रांति को उत्तरायण से जोड़ा जाता है। उत्तरायण को सूर्य की उत्तर की ओर गति से संबंधित माना जाता है। पर आधुनिक खगोल-विज्ञान के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की प्रत्यक्ष स्थिति दक्षिणतम बिंदु तक दिसंबर की शीत अयनांत (winter solstice) पर पहुँचती है और उसके बाद उत्तर की ओर लौटने लगती है। निरयण मकर संक्रांति एक अलग, नक्षत्र-सापेक्ष राशि-सीमा पर आधारित गणना है। पृथ्वी की धुरी की दीर्घकालीन गति, अर्थात विषुवों के पूर्वगमन के कारण ऋतु-आधारित और निरयण राशि-आधारित चिह्नों में अंतर आया है। 2, 12

इसका सीधा अर्थ है: मकर संक्रांति को आज का वास्तविक शीत अयनांत बताना खगोलीय दृष्टि से ठीक नहीं होगा। त्योहार का धार्मिक 'उत्तरायण' संबंध अपनी जगह है, और वैज्ञानिक अयनांत की गणना अपनी जगह। इसी तरह पंचांग की मकर राशि को आकाश में दिखाई देने वाले आधुनिक तारामंडल मकर (Capricornus) की सीमाओं से हूबहू नहीं मिलाना चाहिए। दोनों का संदर्भ अलग है।

मकर संक्रांति कब मनाई जाती है?

यह वर्ष में एक बार, सामान्यतः अंग्रेज़ी कैलेंडर के जनवरी के मध्य आने वाला सौर पर्व है। हालाँकि हर वर्ष और हर नगर के लिए एक ही तारीख अथवा एक ही घड़ी का पुण्यकाल घोषित करना सही नहीं होगा। पंचांग में दर्शाया गया संक्रमण-क्षण स्थानीय दिन, सूर्योदय-सूर्यास्त तथा परंपरा-विशेष के चयन नियमों के कारण उत्सव के दिन से अलग पड़ सकता है। 1, 11

कुछ आवश्यक शब्दों को समझें:

  • मकर-संक्रमण: निर्धारित निरयण राशि-सीमा पर सूर्य के पहुँचने का क्षण।
  • पुण्यकाल: परंपरा के अनुसार स्नान, दान या उपासना के लिए महत्त्वपूर्ण समयावधि।
  • महापुण्यकाल: कुछ पंचांगों में पुण्यकाल के अंतर्गत अधिक विशेष मानी जाने वाली अवधि।
  • स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त: दिन में किए जाने वाले कर्मों और संक्रमण से जुड़े पर्व-दिन के निर्धारण के लिए संभावित आवश्यक आधार।

प्रचलित पंचांगों में सूर्यास्त के बाद होने वाली संक्रांति के लिए अगले सूर्योदय से जुड़े नियम भी मिलते हैं। ये किसी प्रकाशित पंचांग की पद्धति हैं; इन्हें अभी शिवगोरक्ष वेबसाइट के लिए अंतिम एवं स्वीकृत गणना-नियम नहीं माना गया है। भविष्य में सही स्थान और स्वीकृत परंपरा के अनुसार दिन एवं समय दिखाया जाएगा। तब तक उचित संदेश यही है कि इस नगर और वर्ष का समय अभी सत्यापित नहीं है। 1, 11

यह भी ध्यान रहे कि मकर संक्रांति तय करने का प्राथमिक आधार शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष या सूर्योदय की चंद्र तिथि नहीं है। उस दिन कोई भी चंद्र तिथि हो सकती है, पर उससे मूल सौर संक्रमण परिभाषित नहीं होता।

सूर्य के प्रति आभार

भारतीय जीवन में सूर्य प्रकाश, समय, ऋतु और खेती से गहरे जुड़े हैं। अनेक हिंदू घरों में सूर्यनारायण के प्रति नमस्कार, जलार्पण या प्रार्थना की परंपरा है। भक्त इन कार्यों को पवित्र और मंगलकारी मानते हैं। यह आस्था की भाषा है; इसका आशय किसी रोग के ठीक होने, धन मिलने या निश्चित परिणाम की वैज्ञानिक गारंटी नहीं है। 10, 13

खेत से थाली तक की कड़ी

इस अवसर का कृषि-संबंध भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। फसल उगाने वाले किसान, पशुधन, मिट्टी, वर्षा और मेहनतकश परिवारों को याद किया जाता है। अलग-अलग स्थानों पर फसल और खेती का समय समान नहीं होता, इसलिए यह कहना कि समूचे भारत में इसी दिन एक ही फसल कटती है, सही नहीं। फिर भी कई क्षेत्रीय पर्वों में अन्न के प्रति आभार एक साझा भाव है। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक संदेशों में भी इन पर्वों को खेती, प्रकृति और सामाजिक एकता से जोड़ा गया है। 10

दान और सामाजिक अपनापन

कई घरों में तिल, गुड़, अनाज, भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी सामग्री का दान किया जाता है। पड़ोसियों को मिठाई देना, बड़ों का आशीर्वाद लेना और जरूरतमंदों के साथ अन्न बाँटना भी महत्वपूर्ण है। दान अपनी सामर्थ्य से किया जाता है; किसी पर इसे अनिवार्य बोझ की तरह नहीं थोपा जाना चाहिए। कुछ तीर्थस्थलों पर पवित्र स्नान की परंपरा है, लेकिन हर व्यक्ति को किसी नदी में जाना जरूरी नहीं। 7, 10

मकर संक्रांति से जुड़ी कथाएँ: किस रूप में समझें?

लोककथाओं और धार्मिक प्रवचनों में भीष्म पितामह के उत्तरायण की प्रतीक्षा करने, सूर्य और शनि के संबंध तथा कुछ पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख होता है। ऐसी कथाएँ श्रद्धा की दुनिया में महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं। लेकिन बिना किसी प्रमाणित पाठ-संस्करण और श्लोक की जाँच किए यह कहना उचित नहीं कि ये सभी कथाएँ मकर संक्रांति की ऐतिहासिक उत्पत्ति सिद्ध करती हैं।

विशेषतः महाभारत में भीष्म से जुड़ी उत्तरायण की व्याख्या और आधुनिक पंचांग में सूर्य के मकर प्रवेश का गणित दो अलग स्तरों की बातें हैं। इस लेख में किसी असत्यापित श्लोक-संख्या, मंत्र या प्राचीन तिथि को प्रमाण बताकर प्रस्तुत नहीं किया गया है। सूर्योपासना कई हिंदू परंपराओं में मिलती है; यह पर्व किसी एक संप्रदाय की निजी परंपरा मात्र नहीं है।

घर पर यह पर्व कैसे मनाया जाता है?

अनेक परिवार स्नान, स्वच्छ वस्त्र, दीपक, सूर्य-नमस्कार या जलार्पण, दान और सामूहिक भोजन से दिन की शुरुआत करते हैं। कुछ परिवार मंदिर जाते हैं, कुछ तीर्थ-स्नान करते हैं, और कुछ परिवारों में अलग व्रत या पुजारी द्वारा कराई जाने वाली विशेष पूजा होती है। यह कोई सबके लिए समान एवं अनिवार्य पूजा-विधि नहीं है। 1, 10

जो व्यक्ति सरल रूप से पर्व की भावना से जुड़ना चाहे, वह अपने घर की परंपरा पूछ सकता है, अन्न और प्रकृति के लिए कृतज्ञता जता सकता है, भोजन बाँट सकता है और अपनी सामर्थ्य से मदद कर सकता है। विशिष्ट मंत्र, अनुष्ठान या संप्रदायगत विधान के लिए योग्य स्थानीय परंपरा-मार्गदर्शन अलग विषय है।

नदी में स्नान, भीड़भाड़ वाले मेलों में यात्रा और पतंग उड़ाने के सामान्य सुरक्षा-पहलुओं का ध्यान रखना चाहिए। विशेष रूप से हानिकारक धारदार मांझे से पक्षियों और लोगों को चोट लग सकती है। व्रत के बारे में भी यही बात लागू होती है—किसी की स्वास्थ्य-स्थिति उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण है; यह जानकारी किसी पर उपवास थोपने के लिए नहीं है।

उत्तर भारत: खिचड़ी, तिल और गुड़

उत्तर प्रदेश, बिहार और समीपवर्ती हिंदीभाषी क्षेत्रों में यह पर्व 'खिचड़ी' नाम से भी प्रसिद्ध है। चावल-दाल की खिचड़ी बनती है या चढ़ाई जाती है। तिल और गुड़ के लड्डू, दान, नदी-स्नान तथा मेलों की परंपरा भी देखने को मिलती है। पर हर घर का आहार या पूजा-पद्धति एक जैसी हो, ऐसा नहीं है। 6, 10

गोरखपुर: गुरु गोरखनाथ का खिचड़ी मेला

शिवगोरक्ष के पाठकों के लिए सबसे विशिष्ट प्रसंग गोरखपुर का श्री गोरखनाथ मंदिर है। यह नाथ संप्रदाय की प्रमुख परंपराओं से जुड़ा धार्मिक स्थल है। गोरखपुर जिला प्रशासन ने मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाले खिचड़ी मेले का उल्लेख किया है। उसके सांस्कृतिक विवरण में गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने, आसपास के क्षेत्रों और नेपाल से श्रद्धालुओं के आने तथा मेले के लंबे आयोजन की जानकारी भी मिलती है। 6

इससे पर्व का एक सुंदर नाथ-संबंधित रूप सामने आता है—अन्न का अर्पण और गुरु के प्रति श्रद्धा। किंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संपूर्ण नाथ पंथ की हर शाखा एक ही अनुष्ठान करती है, या मकर संक्रांति का जन्म ही नाथ परंपरा में हुआ था। मंदिर में अर्पण से आध्यात्मिक फल मिलने की मान्यता श्रद्धालुओं की आस्था है, कोई सुनिश्चित दावा नहीं।

गुजरात: उत्तरायण और पतंगें

गुजरात, विशेषकर अहमदाबाद, में उत्तरायण की पहचान छतों पर जुटते परिवारों और पतंगबाजी से जुड़ी है। गुजरात पर्यटन विभाग पतंग-बाज़ारों, घरों में मिलन और ऊंधियू जैसे पारंपरिक भोजन का वर्णन करता है। अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव आज इस सांस्कृतिक परंपरा का एक संगठित सार्वजनिक रूप है; उसे हजारों वर्ष पुरानी सभी पतंग-परंपराओं का आरंभ मानना गलत होगा। 3

पतंग का आनंद सुरक्षित डोर, पक्षियों की रक्षा और स्वच्छ सार्वजनिक स्थानों के साथ भी लिया जा सकता है। किसी विशेष वर्ष के महोत्सव की तारीख अलग आधिकारिक सूचना से ही देखनी चाहिए।

महाराष्ट्र: तिलगुल और शुभकामनाएँ

महाराष्ट्र में तिलगुल बाँटकर सौहार्द बढ़ाने की परंपरा अनेक परिवारों में मिलती है। कुछ समुदायों में हल्दी-कुमकुम की सामाजिक बैठकें भी होती हैं। रीति और भागीदारी परिवार और समुदाय के अनुसार बदलती है; इसे हर हिंदू परिवार पर लागू नियम न माना जाए। सामाजिक मेलजोल और अन्न-वितरण की व्यापक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का उल्लेख आधिकारिक स्रोतों में मिलता है, जबकि विशिष्ट स्थानीय रस्मों की विस्तृत ऐतिहासिक पड़ताल अभी शेष है। 10

तमिलनाडु: स्वतंत्र पहचान वाला पोंगल

पोंगल तमिल समाज का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृषि-पर्व है, जिसका संबंध तमिल सौर माह थै (Thai) के आरंभ से है। सिंगापुर के भारतीय विरासत केंद्र के विवरण के अनुसार इसका उत्सव-क्रम कई दिनों का होता है—भोगी, थै/सूर्य पोंगल, माट्टु पोंगल और कानुम पोंगल। नए चावल और दूध के उफनने को समृद्धि का शुभ प्रतीक माना जाता है। माट्टु पोंगल में खेती के काम आने वाले पशुओं के योगदान का सम्मान किया जाता है। 5

पोंगल और मकर संक्रांति एक व्यापक मौसमी समय में आते हैं, फिर भी पोंगल का तमिल सांस्कृतिक अर्थ और बहुदिवसीय क्रम स्वतंत्र है। उसके चारों पर्व-दिनों को एक ही सूर्य-संक्रमण क्षण का पर्याय नहीं बनाना चाहिए।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: भोगी, संक्रांति, कनुमा

तेलुगुभाषी क्षेत्रों में उत्सव के क्रम में भोगी, संक्रांति और कनुमा जैसे नाम मिलते हैं। अनेक घरों में रंगोली या मुग्गु, नए पकवान, परिवार से मिलना तथा पशुधन का सम्मान प्रमुख हैं। भारत सरकार के आधिकारिक शुभकामना संदेश में भी इन नामों को अलग-अलग पहचाना गया है। अतः इन्हें किसी एक समय-बिंदु के तीन समानार्थी नाम नहीं समझना चाहिए। 13

असम: माघ या भोगाली बिहू

असम का माघ बिहू, जिसे भोगाली बिहू भी कहा जाता है, फसल के बाद भोजन और समुदाय का उत्सव है। असम पर्यटन के अनुसार इस अवसर पर पिठा, सामूहिक भोज, मेजी नामक अलाव की तैयारी और अगली सुबह उससे जुड़ी प्रार्थना की परंपरा है। असम में अन्य ऋतुओं के बोहाग बिहू और काति बिहू भी मनाए जाते हैं; जनवरी वाला भोगाली बिहू उन्हीं में एक अलग पर्व है। 4

ओडिशा और गंगासागर

ओडिशा पर्यटन विभाग मकर संक्रांति को सूर्य-संक्रमण, दान, फसल, स्थानीय खाद्य-परंपरा और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा बताता है। पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध गंगासागर मेला गंगा के सागर-संगम में श्रद्धा-स्नान और तीर्थयात्रा के लिए जाना जाता है। भारत के पर्यटन मंत्रालय ने इसे एक बड़े धार्मिक मेले के रूप में दर्ज किया है। मेले की वास्तविक सुविधाएँ और यात्रा-नियम हर आयोजन में अलग सत्यापित होने चाहिए। 8, 7

नेपाल: माघे संक्रांति

नेपाल में माघे संक्रांति विक्रम संवत के माघ मास के आरंभ से जुड़ा पर्व है। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार इस अवसर पर तिल के लड्डू, चाकू (गुड़/गाढ़े शीरे की मिठाई), घी, शकरकंद तथा तरुल जैसे कंद खाए जाते हैं। अलग समुदायों, विशेषकर कुछ थारू परंपराओं, में माघी का स्वतंत्र सामाजिक महत्त्व भी है। नेपाल की इस विविधता को भारत के किसी एक प्रदेश के रीति-रिवाज का मात्र दूसरा नाम नहीं समझना चाहिए। 9

लोहड़ी और बैसाखी की स्थिति

पंजाब और उत्तर भारत के कुछ भागों में लोहड़ी का अलाव और सामुदायिक उत्सव इसी सर्दियों के समय के आसपास आता है, लेकिन लोहड़ी अपनी अलग परंपरा है। वहीं बैसाखी/वैशाखी किसी जनवरी के मकर-संक्रमण का क्षेत्रीय नाम नहीं; वह दूसरे मौसम का पर्व है। अनेक सरकारी संदेश आसपास मनाए जाने वाले पर्वों को साथ में गिनाते हैं, इसका अर्थ उनका एक ही अनुष्ठान होना नहीं है। 10

तिल-गुड़, खिचड़ी और पोंगल: खाने का अर्थ

मकर संक्रांति के आसपास तिल-गुड़, चावल-दाल की खिचड़ी, नए चावल का पोंगल, असम के पिठा, गुजरात का ऊंधियू और नेपाल के सर्दियों के पकवान अलग-अलग स्थानों में मिलते हैं। इन व्यंजनों को देखकर वहाँ की खेती और सामाजिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है। कहीं अन्न देवता को अर्पित होता है, कहीं मेहमानों को परोसा जाता है और कहीं पड़ोसी के लिए उपहार बनता है। कोई एक पकवान सभी के लिए अनिवार्य नहीं है और इनके सेवन से चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ का दावा भी नहीं किया जाना चाहिए। 3, 4, 5, 6, 9

इस पर्व को ठीक से समझने की सबसे उपयोगी बात

मकर संक्रांति सौर पर्व है। इसे किसी चंद्र पक्ष या चंद्र तिथि के आधार पर नहीं चुना जाना चाहिए। इसके लिए एक मान्य निरयण सौर गणना, संक्रमण का क्षण, चुनी हुई स्थानीय पंचांग-परंपरा और दिन/पुण्यकाल तय करने के विशेषज्ञ-समीक्षित नियम चाहिए। 1, 12

इसी समझ से कई प्रश्न स्पष्ट होते हैं—किसी नगर में अलग पुण्यकाल क्यों बताया जाता है, सूर्य-संक्रमण रात में हो तो उत्सव अगले दिन क्यों हो सकता है, और पोंगल या माघ बिहू जैसी परंपराओं की अपनी दिन-गणना तथा बहुदिवसीय पहचान क्यों हो सकती है। जब सही गणना उपलब्ध न हो तो वेबसाइट को तारीख गढ़ने के बजाय साफ बताना चाहिए कि तिथि या समय अभी सत्यापित नहीं है।

1. मकर संक्रांति धार्मिक पर्व है या फसल का त्योहार?

दोनों पहलू हैं। सूर्योपासना और दान जैसे धार्मिक पक्षों के साथ अनेक समुदाय किसान, फसल और प्रकृति के प्रति धन्यवाद व्यक्त करते हैं। 10

2. इसका नाम मकर संक्रांति क्यों पड़ा?

क्योंकि इसका मूल आधार सूर्य का परंपरागत निरयण मकर राशि में संक्रमण है। 12

3. क्या यह हमेशा एक ही अंग्रेज़ी तारीख को आती है?

नहीं। संक्रमण-क्षण और चुनी हुई परंपरा के अनुसार पर्व-दिन का निर्धारण करना होता है। सभी नगरों के लिए एक स्थायी तारीख मानना उचित नहीं। 1

4. क्या इसी दिन वास्तव में उत्तरायण शुरू होता है?

धार्मिक परंपरा में इस दिन को उत्तरायण से जोड़ा जाता है। लेकिन खगोल-विज्ञान का वास्तविक शीत अयनांत दिसंबर में होता है; वह निरयण मकर संक्रमण से अलग है। 2, 12

5. पुण्यकाल क्या होता है?

यह कुछ पंचांग-परंपराओं में स्नान, दान और पूजा के लिए निर्धारित शुभ मानी जाने वाली अवधि है। इसकी गणना स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और चयन नियमों पर निर्भर हो सकती है। 1

6. क्या मकर संक्रांति पर व्रत रखना जरूरी है?

इस लेख में किसी सार्वभौमिक व्रत-अनिवार्यता का दावा नहीं है। घर और समुदाय की परंपरा अलग हो सकती है; स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है।

7. गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी क्यों चढ़ती है?

गोरखपुर की नाथ परंपरा में गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करने और खिचड़ी मेले का विशेष महत्त्व है। जिला प्रशासन इस प्रथा का उल्लेख करता है। 6

8. क्या मकर संक्रांति और पोंगल बिल्कुल एक हैं?

नहीं। दोनों में मौसमी समानता है, किंतु पोंगल का अपना तमिल सांस्कृतिक रूप, नए चावल का प्रतीक और कई दिनों का उत्सव-क्रम है। 5

9. उत्तरायण पर पतंगें कहाँ विशेष रूप से उड़ाई जाती हैं?

गुजरात में, विशेषकर अहमदाबाद और अन्य नगरों में, पतंग उड़ाना इस पर्व की प्रमुख सार्वजनिक पहचान है। 3

10. माघ बिहू क्या है?

यह असम का शीतकालीन फसल-पर्व है, जिसे भोगाली बिहू भी कहते हैं। इसमें सामूहिक भोजन, पिठा और मेजी का महत्त्व है। 4

11. तिल और गुड़ क्यों बाँटे जाते हैं?

कई समुदायों में ये मौसमी पकवान और सौहार्द के उपहार हैं। इनके प्रतीकात्मक अर्थ स्थानीय रीति के अनुसार बदल सकते हैं। 6, 10

12. मेरे शहर की सही तारीख और पुण्यकाल कहाँ से पता चलेगा?

ऐसा पंचांग या कैलेंडर देखें जिसका सौर-गणना आधार, स्थान और पर्व-नियम स्पष्ट एवं सत्यापित हों। शिवगोरक्ष के लिए विशेषज्ञ-समीक्षित गणना उपलब्ध होने से पहले कोई स्थानीय मुहूर्त प्रकाशित नहीं किया जाएगा। 1, 12

संदर्भ और स्रोत (13)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. 2026 Makar Sankranti Punya Kaal (Bengaluru)

    स्रोत खोलें 1

    रचनाकार
    Drik Panchang
  2. Winter and Summer Solstice

    स्रोत खोलें 2

    रचनाकार
    NASA Earth Observatory
  3. International Kite Festival

    स्रोत खोलें 3

    रचनाकार
    Gujarat Tourism
  4. Assam Adventures: Bihu Festival and Beyond

    स्रोत खोलें 4

    रचनाकार
    Assam Tourism
  5. What is Pongal?

    स्रोत खोलें 5

    रचनाकार
    Indian Heritage Centre, National Heritage Board Singapore
  6. Culture & Heritage / Places of Interest: Khichdi Mela, Gorakhnath Temple

    स्रोत खोलें 6

    रचनाकार
    District Gorakhpur Administration, Government of Uttar Pradesh
  7. Gangasagar Mela

    स्रोत खोलें 7

    रचनाकार
    Utsav portal, Ministry of Tourism, Government of India
  8. Odisha Tourism: Events and Festivals calendar — Makar Sankranti

    स्रोत खोलें 8

    रचनाकार
    Odisha Tourism, Government of Odisha
  9. Maghe Sankranti

    स्रोत खोलें 9

    रचनाकार
    Nepal Tourism Board
  10. President’s Greetings on the Eve of Lohri, Makar Sankranti, Pongal and Magh Bihu

    स्रोत खोलें 10

    रचनाकार
    Rashtrapati Bhavan, President of India
  11. Makar Sankranti on January 14 or 15

    स्रोत खोलें 11

    रचनाकार
    Drik Panchang editorial
  12. Rashtriy Panchang

    स्रोत खोलें 12

    रचनाकार
    India Meteorological Department, Positional Astronomy Centre
  13. Press Release on regional harvest festival greetings

    स्रोत खोलें 13

    रचनाकार
    Press Information Bureau, Ministry of Home Affairs, Government of India
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स्रोत और संपादकीय टिप्पणी

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  • 1 द्रिक पंचांग — नगर-आधारित संक्रांति, पुण्यकाल और सूर्यास्त से जुड़े नियमों का प्रकाशित विवरण।
  • 2 नासा अर्थ ऑब्ज़र्वेटरी — वास्तविक शीत अयनांत और दिन के घटने-बढ़ने का खगोल-विज्ञान।
  • 3 गुजरात पर्यटन — उत्तरायण, पतंगबाजी और अहमदाबाद की परंपरा।
  • 4 असम पर्यटन — माघ/भोगाली बिहू, मेजी और खाद्य परंपराएँ।
  • 5 सिंगापुर का भारतीय विरासत केंद्र — पोंगल की तमिल पहचान और पर्व-दिवस।
  • 6 गोरखपुर जिला प्रशासन — गोरखनाथ मंदिर और खिचड़ी मेला।
  • 7 भारत का पर्यटन मंत्रालय — गंगासागर मेला।
  • 8 ओडिशा पर्यटन — मकर संक्रांति की स्थानीय रूपरेखा।
  • 9 नेपाल पर्यटन बोर्ड — माघे संक्रांति।
  • 10 भारत के राष्ट्रपति का सचिवालय — संबंधित कृषि-पर्व और सांस्कृतिक विविधता।
  • 11 द्रिक पंचांग का संपादकीय लेख — संक्रमण एवं पुण्यकाल संबंधी चयन-परंपरा।
  • 12 भारत मौसम विज्ञान विभाग / पोज़िशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर — निरयण सौर कैलेंडर और गणना-संदर्भ।
  • 13 पत्र सूचना कार्यालय — भोगी, संक्रांति, कनुमा आदि क्षेत्रीय नाम।
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